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इसराइल में अरब पार्टियां किसी की भी बना सकती हैं सरकार, कोई क्यों नहीं ले रहा है समर्थन?

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Source :- BBC INDIA

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पढ़ने का समय: 6 मिनट

इसराइल की ज़्यादातर प्रमुख यहूदी नेतृत्व वाली राजनीतिक पार्टियां अरब पार्टियों के समर्थन पर निर्भर रहने से बचती हैं.

इसके पीछे के कारण चुनावी नुक़सान का डर, इसराइल की राष्ट्रीय पहचान और सुरक्षा नीतियों को लेकर मतभेद हैं. इसके अलावा अरब नागरिकों के प्रतिनिधियों को लंबे समय से राजनीतिक रूप से अलग-थलग रखने की प्रवृत्ति को भी अहम कारण माना जाता है.

हालांकि, सभी पार्टियों का रुख़ एक जैसा नहीं है. कुछ यहूदी विपक्षी नेता अरब पार्टियों के साथ सहयोग का समर्थन करते हैं. 2021 में एक अरब पार्टी सरकार में भी शामिल हुई थी.

इस पूरे विवाद का सबसे अहम मुद्दा है राजनीतिक वैधता. यानी क्या यहूदी नेतृत्व वाली पार्टियां अरब पार्टियों को सिर्फ़ संसद के निर्वाचित सदस्यों के रूप में नहीं, बल्कि इसराइल की सरकार चलाने में वैध राजनीतिक साझेदार के रूप में स्वीकार करने को तैयार हैं?

इसराइल में विवाद सिर्फ़ इस बात को लेकर नहीं है कि अरब पार्टियां किसी गठबंधन को बहुमत दिलाने में मदद कर सकती हैं या नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या उनके समर्थन को सरकार चलाने का वैध आधार माना जाएगा.

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क्या हैं कारण?

इसराइल की राजनीतिक सलाहकार और चुनावी सर्वेक्षक डालिया शिंडलिन का तर्क है कि विपक्षी नेताओं को अरब पार्टियों के साथ सहयोग करने पर राजनीतिक विरोध का डर है, लेकिन नेतन्याहू को सत्ता से हटाने की चाहत रखने वाले कई मतदाता ऐसी व्यवस्था को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं.

‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ के अपने लेख में शिंडलिन ने कहा है, “विपक्ष के मतदाता नेतन्याहू को सत्ता से बाहर करने के लिए इतने बेताब हैं कि वे अरब पार्टियों के साथ हाथ मिलाने के विकल्प को भी स्वीकार करने के लिए तैयार हैं.”

उनकी बात का महत्व यह है कि नेताओं का यह दावा कि उनके मतदाता अरब पार्टियों के साथ सहयोग स्वीकार नहीं करेंगे, ज़रूरी नहीं कि सभी मतदाताओं की वास्तविक सोच को दर्शाता हो.

‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ की एक चर्चा में राजनीतिक रणनीतिकार और ‘हारेत्ज़’ की वरिष्ठ विश्लेषक शिंडलिन ने अरब मतों को अवैध ठहराने या अरब पार्टियों को गठबंधन बनाने की प्रक्रिया से बाहर रखने के प्रयासों को लेकर कहा है, “सिर्फ़ चुनाव के ज़रिए लोकतंत्र का दावा करने की कोशिश काफ़ी नहीं है. उसकी प्रक्रिया के अर्थ बनाए रखना भी ज़रूरी है.”

उनका तर्क है कि नागरिक अपने सांसद चुन सकते हैं, लेकिन अगर दूसरी पार्टियां व्यवस्थित तरीक़े से उन सांसदों को सरकार बनाने में साझेदार मानने से इनकार करती हैं, तो उनके चुनावी प्रतिनिधित्व का राजनीतिक प्रभाव सीमित हो जाता है.

29 अक्टूबर को ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ में प्रकाशित एक चर्चा में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि गठबंधन को लेकर विरोध दोनों तरफ़ से है.

कुछ अरब पार्टियां ‘जायोनिस्ट नेतृत्व’ वाली सरकार में शामिल नहीं होना चाहतीं, जबकि यहूदी नेतृत्व वाली पार्टियां उन्हें गठबंधन में शामिल करने से हिचकिचाती हैं.

इस चर्चा में प्रमुख अरब पार्टियां राअम और जॉइंट लिस्ट के बीच अंतर भी स्पष्ट किया गया. राअम सरकार में शामिल होने के लिए तैयार है, जबकि जॉइंट लिस्ट औपचारिक रूप से गठबंधन सरकार का हिस्सा बनने की इच्छुक नहीं है.

कैबिनेट में शामिल होने से इनकार करने का मतलब यह ज़रूरी नहीं है कि कोई पार्टी वैकल्पिक सरकार को सत्ता में बनाए रखने में मदद करने से भी इनकार कर रही है.

इसराइल में सरकार बनाने को लेकर जारी गतिरोध निर्वाचित प्रतिनिधित्व और सत्ता में भागीदारी के बीच के अंतर को उजागर करता है.

डालिया शिंडलिन का मानना है कि विपक्षी नेता अरब पार्टियों के साथ सहयोग को लेकर अपने मतदाताओं के विरोध को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर सकते हैं.

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यहूदी मतदाताओं के नाराज़ होने का डर

विपक्षी नेताओं को चिंता रहती है कि बिन्यामिन नेतन्याहू किसी भी ऐसी सरकार को जो अरब पार्टियों के समर्थन पर निर्भर हो, उसे सुरक्षा के मामले में कमज़ोर या इसराइल को यहूदी राष्ट्र बनाए रखने के प्रति कम प्रतिबद्ध बताकर निशाना बना सकते हैं.

नेतन्याहू का खेमा इस मुद्दे को विपक्ष के ख़िलाफ़ एक प्रमुख राजनीतिक हमले के रूप में इस्तेमाल करता रहा है.

हमास के नेतृत्व में सात अक्तूबर, 2023 को हुए हमलों के बाद यह दबाव और बढ़ गया है.

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़, कई यहूदी विपक्षी नेताओं का मानना है कि अरब पार्टियों के साथ गठबंधन वाली किसी नई सरकार को अपने मतदाताओं के बीच स्वीकार्य बनाना मुश्किल होगा.

यह एक चुनावी रणनीति से जुड़ी चिंता है. इसे इस बात का सबूत नहीं माना जा सकता कि अरब पार्टियां या अरब नागरिक सामूहिक रूप से हमास का समर्थन करते हैं.

राष्ट्रीय पहचान और सुरक्षा को लेकर वास्तविक मतभेद

कई यहूदी नेतृत्व वाली पार्टियां ख़ुद को जायोनिस्ट मानती हैं. वे इसराइल को यहूदी लोगों की ‘राष्ट्रीय मातृभूमि’ के रूप में देखती हैं.

वहीं, अरब पार्टियों के प्रतिनिधियों में ऐसे नागरिक भी शामिल हैं जो ख़ुद को फ़लस्तीनी मानते हैं और इसराइल की यहूदी राष्ट्रीय पहचान से जुड़े कुछ प्रावधानों पर सवाल उठाते हैं.

इन मतभेदों का दायरा फ़लस्तीन विवाद, सैन्य अभियानों और इसराइल के भीतर समानता जैसे मुद्दों तक फैला हुआ है.

गादी आइज़नकोट ने किसी भी गठबंधन सहयोगी के लिए कुछ शर्तें रखी हैं:

  • इसराइल को एक यहूदी, लोकतांत्रिक, उदारवादी और समानतावादी देश के रूप में मान्यता देना.
  • इसराइल की स्वतंत्रता की घोषणा के प्रति प्रतिबद्धता.
  • सभी नागरिकों के लिए सैन्य या नागरिक सेवा का समर्थन.
  • हमास को एक आतंकवादी संगठन के रूप में मान्यता देना, जिसे ग़ज़ा में सैन्य और शासन संबंधी ताक़त के रूप में काम करना बंद करना होगा.

कुछ अरब नेताओं का मानना है कि ऐसी शर्तें चुनिंदा तौर पर वफ़ादारी साबित करने की परीक्षा लेने जैसी हैं.

राअम पार्टी के नेता मंसूर अब्बास ने कहा है कि उनकी पार्टी ने सात अक्तूबर के अत्याचारों की निंदा की थी. उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि आइज़नकोट की शर्तें बातचीत में बाधा बनना ज़रूरी नहीं हैं.

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राजनीतिक बहिष्कार और पूर्वाग्रह की भी भूमिका

इस मुद्दे को सिर्फ़ नीतिगत मतभेदों के नज़रिए से देखना अधूरा होगा.

राजनीतिक विश्लेषक डालिया शिंडलिन ने विपक्ष की ओर से अरब पार्टियों को सरकार में शामिल करने से पूरी तरह इनकार करने को ख़ुद पर थोपी गई और नस्लवादी राजनीतिक पाबंदी बताया है.

अन्य विश्लेषणों में भी कहा गया है कि राजनीतिक प्रतिष्ठान का एक वर्ग यहूदी राष्ट्र के शासन में अरब प्रतिनिधियों को समान साझेदार के रूप में स्वीकार करने का विरोध करता है.

सभी अरब पार्टियों का रुख़ एक जैसा नहीं

राअम का नेतृत्व मंसूर अब्बास करते हैं. अब्बास अरब समुदायों में अपराध रोकने, आवास, बुनियादी ढांचे और नगरपालिका फंडिंग जैसे मुद्दों पर व्यावहारिक सुधार सुनिश्चित करने के लिए गठबंधन सरकार में शामिल होने को तैयार हैं.

वहीं जॉइंट लिस्ट जायोनिस्ट नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार में औपचारिक रूप से शामिल होने से इनकार करती है, लेकिन शर्तों के आधार पर बाहर से किसी वैकल्पिक सरकार का समर्थन करने की संभावना अब भी बनी हुई है.

2021-22 में राअम पार्टी नेफ़्टाली बेनेट और येर लैपिड की गठबंधन सरकार में शामिल हुई थी. ऐसा करने वाली यह पहली स्वतंत्र अरब पार्टी थी. यह उदाहरण दिखाता है कि अरब पार्टियों के साथ राजनीतिक सहयोग संभव है, भले ही इसे लेकर विवाद बना रहे.

बाहरी समर्थन का मतलब है कि कोई पार्टी औपचारिक रूप से गठबंधन सरकार का हिस्सा बने बिना और मंत्री पद लिए बिना संसद में विश्वास मत और अन्य अहम मतदान के दौरान सरकार का समर्थन करे, ताकि वह सत्ता में बनी रह सके.

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मौजूदा राजनीतिक गतिरोध में यह मुद्दा क्यों अहम है?

तीन नवंबर की रिपोर्टों के मुताबिक़, नेतन्याहू के गठबंधन के पास 53 सीटें हैं, यहूदी विपक्षी पार्टियों के पास 48 सीटें हैं और दोनों अरब पार्टियों के पास मिलाकर 19 सीटें हैं.

इसराइल की 120 सदस्यीय संसद (क्नेसेट) में बहुमत के लिए 61 सीटों की ज़रूरत होती है. इसका मतलब है कि मौजूदा यहूदी नेतृत्व वाली विपक्षी पार्टियां अकेले बहुमत हासिल नहीं कर सकतीं.

नेफ़्टाली बेनेट और एविगडोर लिबरमैन अरब पार्टियों पर निर्भर रहने का विरोध करते हैं.

यायर गोलान ऐसी सरकार के समर्थन में हैं, जिसमें राअम शामिल हो और जॉइंट लिस्ट बाहर से समर्थन दे सकती है.

बेनेट का तर्क है कि अरब पार्टियों के समर्थन से बनी सरकार गिर सकती है और इससे नेतन्याहू पहले से ज़्यादा मज़बूत होकर सत्ता में लौट सकते हैं.

विपक्षी नेता नेतन्याहू को सत्ता से हटाना चाहते हैं, लेकिन उन्हें डर है कि अरब पार्टियों का समर्थन स्वीकार करने से उन्हें चुनावी और वैचारिक नुकसान हो सकता है. जबकि सरकार बनाने के लिए यही समर्थन उनके लिए जरूरी साबित हो सकता है.

अरब पार्टियों को सरकार में शामिल होने से रोकने वाला कोई क़ानूनी प्रतिबंध नहीं है. उन्हें बाहर रखने का फ़ैसला राजनीतिक है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS