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न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज की ओपनिंग बेल
जगह 11 वॉल स्ट्रीट, लोअर मैहेटन
तारीख़: 2 मार्च, 2026 और वक्त सुबह के 9.30 बजे
फ़्लोर पर ज़्यादातर लोगों ने ये न्यूज़ पहले ही देख रखी थी. कुछ घंटे पहले ही अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमला किया था. जब मार्केट खुला, उस वक़्त भी मिसाइलें हवा में ही थीं.
सवाल यह नहीं था कि क्या हुआ बल्कि यह था कि ट्रेडिंग हॉल के चारों ओर लगी स्क्रीन पर जो नंबर्स तैर रहे हैं, उनके लिए इसके क्या मायने हैं?
सबसे पहले बात हथियारों की, क्योंकि ईरान युद्ध ने पहले दो महीनों में ही अमेरिका के हथियारों को इतनी तेज़ी से खत्म किया, जितना अमेरिकी सेनाओं ने खाड़ी युद्ध के बाद कभी नहीं देखा था.
जब कोई देश मिसाइल फ़ायर करता है, तो कहीं और उस मिसाइल का पूरा कॉन्ट्रैक्ट प्राइस ही बदल जाता है. मार्क हैनसेन, एक रिटायर्ड यूएस मरीन कर्नल हैं. जो वॉशिंगटन में सेंटर फ़ॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ में सीनियर एडवाइज़र हैं. उन्होंने इस युद्ध की लागत पर पैनी नज़र बनाकर रखी है.
वो कहते हैं, “किसी भी युद्ध की लागत, लगभग पूरी तरह से हथियारों पर निर्भर करती है. हमारा अनुमान है कि कुल लागत लगभग 35-40 अरब डॉलर होगी. लेकिन इराक और अफ़ग़ानिस्तान में हुए युद्धों से तुलना करें तो वे युद्ध सालों तक चले और उनमें हर साल सैकड़ों अरब डॉलर ख़र्च हो रहे थे.”
टॉमहॉक क्रूज़ मिसाइल का सबसे अधिक इस्तेमाल
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ये लड़ाई 39 दिन चली. पहले चार दिन में ही, अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 35 अलग-अलग तरह के लगभग 5000 से ज़्यादा हथियार आज़माए. हथियारों का रीप्लेसमेंट बिल ही करीब 10 से 16 अरब डॉलर के बीच था. सबसे ज़्यादा इस्तेमाल टॉमहॉक क्रूज़ मिसाइल का किया गया.
मार्क हैनसेन कहते हैं, “टॉमहॉक मिसाइल, लंबी दूरी तक ज़मीनी हमला करती है, जो सटीक होता है. इसका मतलब है कि जहां निशाना लगाया गया, ये मिसाइल उसके लगभग 10 मीटर के दायरे में गिरेगी. इन्हें आमतौर पर जहाज़ों से दागा जाता है, और इनकी रेंज एक हज़ार मील तक होती है. इस लड़ाई में हमारे पास लगभग 3,100 टॉमहॉक मिसाइलें थीं.”
“मुझे लगता है कि हमने 1000 मिसाइलों का इस्तेमाल किया है. अमेरिकी कांग्रेस से रकम मिलने के बाद, डिपार्टमेंट ऑफ़ डिफ़ेंस इसे अपने हिसाब से ख़र्च कर सकता है. नेवी ही टॉमहॉक मिसाइलें ख़रीदती है.”
टॉमहॉक मिसाइलों का मैन्युफ़ेक्चरर रेथियॉन, अब तेज़ी से प्रोडक्शन में लगा है. लेकिन सेंटर फ़ॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ के अनुसार, मैन्युफ़ैक्चरिंग लीड टाइम दो से तीन साल तक बढ़ गया है, क्योंकि डिमांड और भी तेज़ी से बढ़ी है.
एक ग्राउंड अटैकिंग टॉमहॉक क़ीमत 25 लाख डॉलर आती है. वहीं शिप-अटैक वर्ज़न, जिसे खाड़ी में यूएस नेवी डिस्ट्रॉयर से फ़ायर किया जाता है, उसकी कीमत लगभग 50 लाख डॉलर है. साल 2020 की शुरुआत में टॉमहॉक पर सालाना कुल ख़र्च लगभग 25 करोड़ डॉलर था. जो साल 2027 के लिए यूएस डिफ़ेंस बजट में एक अरब डॉलर प्रस्तावित है.
ड्रोन बनाम पेट्रियट इंटरसेप्टर
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ईरान ने इस जंग में शाहेद ड्रोन का जमकर इस्तेमाल किया. ऐसे एक ड्रोन की कीमत लगभग 30,000 डॉलर है. अमेरिका ने उन्हें मार गिराने के लिए पेट्रियट इंटरसेप्टर की मदद ली. हर इंटरसेप्टर की कीमत लगभग 40 लाख डॉलर है.
बीबीसी इंक्वायरी के प्रोड्यूसर मैट लाइन्स ने कुछ डिफ़ेंस कंपनियों के आंकड़ों की पड़ताल की है. वो कहते हैं, “टॉमहॉक क्रूज़ मिसाइल बनाने वाली कंपनी रेथियॉन ने बताया कि पहली तिमाही की कमाई साल-दर-साल, 21 फ़ीसद बढ़ी है. साथ ही हथियारों की डिलीवरी 40 फ़ीसद से ज़्यादा बढ़ी है.”
“ब्रिटेन की सबसे बड़ी डिफ़ेंस कंपनी बीएई सिस्टम्स, जंग के पहले दिन गिरते इंडेक्स के मुक़ाबले छह प्रतिशत बढ़ गई. वहीं जर्मनी की राइनमेटल, साल 2026 में लगभग 40 फ़ीसद की सेल्स ग्रोथ का अनुमान लगा रही है.”
“फ़्रांस की कंपनी थेल्स ने बताया है कि पहली तिमाही के ऑर्डर, साल-दर-साल 27 प्रतिशत बढ़े हैं. पहली तिमाही में इस कंपनी के सात सबसे बड़े कॉन्ट्रैक्ट में से पाँच, डिफ़ेंस से जुड़े हैं. इटली की कंपनी लियोनार्डो ने साल 2030 तक अपना मुनाफ़ा दोगुना करने की योजना बनाई है. उसके शेयर एक ही सेशन में नौ प्रतिशत बढ़ गए.”
दूर की कौड़ी और मुनाफ़े का सौदा
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जब होर्मुज़ स्ट्रेट बंद हुआ, तो कतर की स्थिति बड़ी विकट हो गई. दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत लिक्विफ़ाइड नेचुरल गैस यानी एलएनजी की सप्लाई, रातों-रात मार्केट से गायब हो गई.
शरीफ़ सूकी, श्नीर एनर्जी के फाउंडर हैं, जो अमेरिका में सबसे बड़ी एलएनजी एक्सपोर्टर कंपनी है. बीस साल पहले, उन्होंने अमेरिका में गैस इंपोर्ट करने के लिए, गल्फ़ ऑफ़ मेक्सिको पर एक टर्मिनल बनाने का फ़ैसला किया था.
लेकिन जब तक यह बना, बदलती तकनीकों ने अमेरिका को दुनिया के सबसे बड़े गैस इंपोर्टर से सबसे बड़े एक्सपोर्टर में बदल दिया था. उन्होंने टर्मिनल को ही बदल दिया और पूरी दुनिया में अमेरिकन गैस भेजना शुरू कर दिया. जब ईरान युद्ध शुरू हुआ, उनकी कंपनी दुनिया की कुल एनर्जी के दसवें हिस्से से ज़्यादा सप्लाई कर रही थी.
शरीफ़ सूकी कहते हैं, “यूनाइटेड स्टेट्स बहुत तेजी से, सबसे बड़े इम्पोर्टर से सबसे बड़ा एक्सपोर्टर बन गया. इसमें महज़ दस साल का वक़्त लगा. उस हिसाब से देखें तो होर्मुज़ में कोई समस्या है या नहीं, क़तर कुछ महीनों तक डिलीवरी कर सकता है या नहीं, इससे कोई बड़ा फ़र्क नहीं पड़ता, क्योंकि हमारी इंडस्ट्री लगभग 85 प्रतिशत क्षमता पर काम करती है. लेकिन थोड़े ही समय में हम 95 प्रतिशत की क्षमता तक जा सकते हैं.”
शरीफ़ सूकी की कंपनी, डॉक से निकलने वाले हर कार्गो पर लिक्विफ़िकेशन चार्ज लेती है. आप इसे किसी हाई-वे पर टोल बूथ की तरह समझ सकते हैं. टोल बूथ को इससे कोई मतलब नहीं कि वहां से निकलने वाली गाड़ियां कहां जा रही हैं. वो हर उस गाड़ी से चार्ज लेते हैं, जो टोल से गुजरती है. इसी तरह ये कंपनी, लिक्विफ़िकेशन सर्विस के लिए चार्ज करती है.
इसके कस्टमर, ट्रेडर वही हैं जो गैस लेते हैं. जो इसे हमारी धरती के पूर्वी हिस्से में भेजते हैं और ग्लोबल मार्केट में जो भी क़ीमत मिले, उसी दाम पर बेचते हैं.
अमेरिका में आप गैस के लिए जो पेमेंट करते हैं और एशिया में आप इसे जिस क़ीमत पर बेच सकते हैं, उसके बीच के गैप को स्प्रेड कहते हैं. युद्ध तो बाद में शुरू हुआ, ये पहले से ही ज़्यादा था.
तेल का गणित
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जब क़तर की मुश्किलें बढ़ीं, तो ये गैप और भी ज़्यादा बड़ा हो गया. आयरा जोसेफ़ के पास एनर्जी मार्केट में काम करने का 35 साल का अनुभव है. वो अब कोलंबिया यूनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर ग्लोबल एनर्जी पॉलिसी में ग्लोबल-फ़ेलो हैं.
आयरा जोसेफ़ कहते हैं, “अमेरिका में क़ीमत काफी कम है क्योंकि वहाँ सप्लाई बहुत ज़्यादा है और उस सप्लाई की दूसरे मार्केट तक पहुँचने की क्षमता उतनी अधिक नहीं है. अमेरिका से आने वाले एक टैंकर के लिए हर डॉलर के स्प्रेड की क़ीमत लगभग तीस से पैंतीस लाख डॉलर है. यह बहुत बड़ी रकम है. तो अगर 15 डॉलर का स्प्रेड है, तो आप हर टैंकर के लिए साढ़े चार करोड़ डॉलर की बात कर रहे हैं.”
युद्ध जब शुरू हुआ, उसके बाद इसका दायरा 50 से 100 प्रतिशत तक बढ़ गया, लेकिन फिर भी अमेरिका में गैस की घरेलू कीमत में ज़्यादा बदलाव नहीं हुआ.
आयरा जोसेफ़ कहते हैं, “वैसे तो ये कुछ अजीब बात है कि वेस्ट टेक्सस में क़ीमत गिर गई है. वेस्ट टेक्सस में क़ीमत असल में चार-पांच डॉलर प्रति मिलियन BTU ( यानी ब्रिटिश थर्मल यूनिट) के बीच है. लेकिन जब यही गैस टोक्यो पहुँचती है, तो वहां 20 डॉलर प्रति यूनिट के हिसाब से बिकती है. उस गैस को शिप करने वाले ट्रेडर, एक टैंकर पर साढ़े चार करोड़ डॉलर कमा रहे हैं.”
क़ीमत में इतने बड़े अंतर के बारे में शरीफ़ सूकी कहते हैं, “किसी असाधारण घटना से फ़ायदा उठाने के लिए दस साल की तैयारी लगती है. इसके लिए तैयारी और अवसर का मेल होना ज़रूरी है. ऐसा उन लोगों के साथ नहीं होता, जिन्होंने पिछले दस साल से इन्वेस्टमेंट नहीं किया है.”
लेकिन बांग्लादेश, पाकिस्तान, मिस्र जैसे देशों का क्या, जिनके लिए ये क़ीमतें बर्दाश्त से बाहर हैं. इस बारे में शरीफ़ सूकी कहते हैं, “ये एक दुखद घटना है, यही वो लोग हैं जो क़ीमत चुकाते हैं. उन्हें एलएनजी की ज़रूरत, फ़र्टिलाइज़र के लिए ज़्यादा होती है और अगर आपके पास फ़र्टिलाइज़र नहीं हैं, तो आप अपने लोगों का पेट नहीं भर सकते. ये अस्तित्व का मुद्दा बन जाता है, इसलिए ये एक दुखद घटना है.”
मुनाफ़े की बारिश
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बीबीसी इंक्वायरी के प्रोड्यूसर मैट लाइन्स कहते हैं, “युद्ध से पहले, ब्रेंट क्रूड ऑयल का एक बैरल लगभग 73 डॉलर पर था. युद्ध के दौरान ये 120 डॉलर को भी पार कर गया. इतना ही नहीं, ये उतार-चढ़ाव भी एक बिज़नेस बन गया है. ख़रीदने और बेचने की क़ीमतों के बीच जितना बड़ा अंतर होगा, ऑयल ट्रेडर उतना ही ज़्यादा मुनाफ़ा कमाएंगे.”
“बीपी का प्रॉफ़िट भी इस दौरान दोगुने से अधिक हो गया. नॉर्वे की कंपनी इक्विनोर ने अपना मुनाफ़ा 9.8 अरब डॉलर बताया है. ये बीते तीन साल में किसी भी तिमाही में हुआ अब तक का सबसे ज्यादा प्रॉफ़िट है. लड़ाई की वजह से मार्च की शुरुआत से ही कतर में शेल का एलएनजी प्रोडक्शन बंद रहा. हमलों से कतर में उसकी पर्ल फ़ैसिलिटी को नुकसान हुआ. इस वजह से शेल का आउटपुट 4 प्रतिशत गिर गया. जिस युद्ध की वजह से कतर में उसका ऑपरेशन बंद हुआ, उसी युद्ध ने कई वर्षों में उसका सबसे बड़ा प्रॉफिट कमाया. लड़ाई की वजह से उसे नुकसान हुआ, लेकिन साथ ही जंग से उसने कमाई भी की.”
खाड़ी के देश सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और क़तर इस युद्ध में सिर्फ़ मूकदर्शक नहीं रहे, उनकी भूमिका पड़ोसी और ख़रीदार की भी रही. साथ ही उन्हें निशाना भी बनाया गया.
संघर्ष के पहले तीन हफ़्तों में, यूएस स्टेट डिपार्टमेंट ने इमरजेंसी पावर का इस्तेमाल करके, कांग्रेस को दरकिनार करते हुए खाड़ी के देशों को, 23 अरब डॉलर से ज़्यादा के हथियार बेचने की इज़ाजत दे दी.
अमेरिकी कांग्रेस की भूमिका
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विल हार्टुंग ने अमेरिकी हथियार इंडस्ट्री का चार दशकों तक अध्ययन किया है.
वे क्विंसी इंस्टीट्यूट फ़ॉर रिस्पॉन्सिबल स्टेटक्राफ़्ट में सीनियर फ़ेलो हैं. विल हार्टुंग कहते हैं, “70 के दशक में, कांग्रेस को यह भी नहीं बताया जाता था कि अमेरिका कब हथियार बेच रहा है. फिर उन्होंने आर्म्स एक्सपोर्ट कंट्रोल एक्ट पास किया. इसलिए बड़ी डील्स के बारे में कांग्रेस को बताना होता है, और कांग्रेस ऐसी किसी भी डील को ब्लॉक कर सकती है. लेकिन इस प्रोसेस के तहत, वे कांग्रेस को बताते भी नहीं, वो बस इसे लागू कर देते हैं.”
ईरान पर पहला बम गिराने से 22 दिन पहले, 6 फरवरी 2026 को राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिका फ़र्स्ट आर्म्स ट्रांसफ़र स्ट्रैटेजी नाम के एक एग्ज़ीक्यूटिव ऑर्डर पर साइन किए.
इसका मक़सद विदेशों में अमेरिकी हथियार बेचने की प्रोसेस को आसान बनाना था. इस ऑर्डर के साथ ही, कांग्रेस के नोटिफ़िकेशन की निगरानी, स्टेट डिपार्टमेंट से डिपार्टमेंट ऑफ़ वॉर को सौंप दी गई.
आंकड़ें तो ये कह रहे हैं कि खाड़ी देशों को होने वाली सैन्य बिक्री में 23 अरब डॉलर का इज़ाफ़ा हो रहा है. वहीं राष्ट्रपति ट्रंप ने अगले साल डिफ़ेंस बजट, एक ट्रिलियन डॉलर से बढ़ाकर 1.5 ट्रिलियन डॉलर करने का वादा किया है. इसमें ईरान युद्ध का ख़र्च शामिल नहीं है, जिससे अमेरिकी टैक्स-पेयर्स पर सैकड़ों अरब डॉलर, और बढ़ सकते हैं.
‘प्रीडिक्शन मार्केट’
इस चेन की आखिरी कड़ी, बाकी कड़ियों से थोड़ी अलग है.
हमें पता है हथियार कौन बनाता है. हमें ये भी पता है कि गैस एक्सपोर्ट करने वाले स्टॉक एक्सचेंज में मौजूद हैं. हथियारों की क़ानूनी बिक्री भी एक मसला है, लेकिन एक ग्रुप, एक ऐसे मार्केट में काम करता है, जिसके बारे में हममें से बहुतों ने कभी नहीं सुना होगा.
प्रीडिक्शन मार्केट ऐसे प्लेटफॉर्म हैं, जहां आप असली दुनिया की घटनाओं के नतीजे पर असली पैसे की शर्त लगाते हैं.
मसलन, क्या ईरान पर हमला होगा? क्या सुप्रीम लीडर का पतन होगा? चुनाव कौन जीतेगा? आप बस अपनी शर्त लगाएं और अगर आप सही हैं, तो आप ही जीतेंगे.
जोशुआ मिट्स कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हैं. उन्होंने इनसाइडर ट्रेडिंग और प्रीडिक्शन मार्केट पर काफी रिसर्च किया है.
जोशुआ मिट्स कहते हैं, “यह असल में एक तरह का मार्केट है जहाँ कॉन्ट्रैक्ट होता है और कॉन्ट्रैक्ट की एक कीमत होती है जो आप देते हैं. आप नतीजे पर दांव लगाते हैं और अगर नतीजा आपके दांव के मुताबिक निकलता है तो आपको एक डॉलर मिलता है और अगर ऐसा नहीं होता, तो आप अपनी ही रकम खो देते हैं.”
“कोई भी क़ीमत ज़ीरो और एक डॉलर के बीच होगी. क़ीमत असल में मार्केट के नज़रिए को दिखाती है कि किसी घटना के होने की कितनी संभावना है और रिसर्च से पता चलता है कि ये कीमतें असल में काफी सही होती हैं. ज़्यादातर यही होता है कि कॉन्ट्रैक्ट, मार्केट में दिखने वाली संभावनाओं के हिसाब से ही पेमेंट करते हैं,”
जोशुआ मिट्स ने ईरान पर हुए हमलों और उससे जुड़े संघर्षविराम के एलान के दौरान हुई सट्टेबाज़ी की पड़ताल की है. उन्हें दो लाख से ज़्यादा ट्रेड्स के, ऐसे संकेत मिले जो उनके अबनॉर्मल एक्टिविटी के क्राइटेरिया को पूरा करते थे, जिससे लगभग चौदह करोड़ डॉलर का प्रॉफ़िट हुआ.
जोशुआ मिट्स कहते हैं, “अगर घटना हो चुकी है, तो कॉन्ट्रैक्ट की असल क़ीमत एक डॉलर होनी चाहिए. आप इसके लिए 50 सेंट या 20 सेंट या 10 सेंट दे सकते हैं और हर कॉन्ट्रैक्ट के लिए एक डॉलर पा सकते हैं. अगर आपके पास जानकारी है तो यह आपके लिए लगभग मुफ़्त पैसे जैसा है. ये एक ग्रुप से दूसरे ग्रुप में ट्रांसफ़र है और दौलत उन लोगों के हाथों में पहुंच रही है, जिनके पास जानकारी है.”
हम आपको ये तो नहीं बता सकते कि ये दांव किसने लगाए थे, क्योंकि ये प्लेटफ़ॉर्म्स दुनिया में कहीं और से चलाए जा रहे हैं और इनके अकाउंट्स गुमनाम हैं. लेकिन हम ये ज़रूर बता सकते हैं कि आगे क्या हुआ.
अमेरिकी सीनेट ने अपने सदस्यों को प्रीडिक्शन मार्केट में ट्रेडिंग करने से प्रतिबंधित करने के लिए आम सहमति से मतदान किया. कमोडिटी फ्यूचर्स ट्रेडिंग कमीशन और सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज कमीशन दोनों को इसकी जांच करने के लिए कहा गया है.
सवाल है कि इस युद्ध से सबसे अधिक लाभ किसे हुआ और पैसा कहाँ गया?
तो इसका जबाव ये है कि पैसा उन कंपनियों के पास गया, जो हथियार बनाती हैं, जो नए हथियारों के सौदे के लिए एकदम तैयार हैं. मुनाफ़ा उन गैस निर्यातकों ने कमाया, जो सप्लाई चेन टूटने के ही इंतज़ार में बैठे थे. मुनाफ़ा, हथियारों के सौदागरों ने भी कमाया और उस व्यक्ति ने भी कमाया, जिसे हम नहीं जानते, जिसने ईरान पर बम गिरने से 71 मिनट पहले शर्त लगाकर बड़ा दांव खेला था.
इसका ख़मियाज़ा वो परिवार भी भुगत रहे हैं जो बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों में रहते हैं, जो उस गैस के लिए अधिक भुगतान कर रहे हैं, जिससे फ़र्टिलाइज़र बनता है, वही फ़र्टिलाइज़र, जिससे अनाज की पैदावार बढ़ती है.
और इसकी मार उन देशों पर भी पड़ रही है, जो तीस हज़ार डॉलर की लागत वाले ड्रोन को मार गिराने के लिए, चालीस लाख डॉलर में पेट्रियट मिसाइलें ख़रीद रहे हैं.
जंग ख़त्म करने के लिए, लड़ने वाले देशों ने भले ही दस्तख़त कर दिए हों, मुनाफ़ा कमाने वाले इस जंग से अपनी जेबें पहले ही भर चुके हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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