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ईरान से जंग छेड़कर आख़िर अमेरिका को क्या मिला?

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Source :- BBC INDIA

ईरान के राष्ट्रपति मसूज पेज़ेश्कियान और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

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ईरान पर अमेरिका और इसराइल के हमलों के 100 दिन बाद दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया है. दोनों पक्ष अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं.

यह इस बात का संकेत है कि दोनों इस संघर्ष से निकलने का रास्ता चाहते थे.

समझौता होने के बाद जंग भले ही आधिकारिक तौर पर खत्म हो गई हो, लेकिन असली और कठिन बातचीत अब शुरू होगी.

दोनों पक्षों ने इस समझौते को अपनी जनता के सामने जीत के तौर पर पेश किया है.

लेकिन, जैसा कि हमारे विश्लेषक बताते हैं, वे अपने लोगों को पूरी तरह भरोसा नहीं दिला पाए हैं.

दोनों देशों में आलोचकों का कहना है कि इस समझौते में जरूरत से ज्यादा रियायतें दी गई हैं.

ईरान क्या दावे कर रहा है?

तेहरान

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ईरान के लिए यह समझौता सिर्फ युद्धविराम नहीं है. यह उससे कहीं ज्यादा अहम है.

इससे ईरान यह दावा कर सकता है कि उसने बिना आत्मसमर्पण किए जंग में खुद को टिकाए रखा. वह यह भी कह सकता है कि वह इस संघर्ष से पहले से ज़्यादा मजबूत होकर बाहर निकला है.

शुरुआत से ही ईरान का मक़सद पारंपरिक सैन्य अर्थों में अमेरिका और इसराइल को हराना नहीं था. उसका लक्ष्य यह था कि संघर्ष ख़त्म होने के बाद इस्लामिक गणराज्य की व्यवस्था बनी रहे.

उसका नेतृत्व काम करता रहे. उसकी बातचीत की स्थिति पूरी तरह कमजोर न हो.

एमओयू कहे जाने वाला यह समझौता ईरान को यह कहने का मौका देता है कि वह अपने इस लक्ष्य को हासिल करने में सफल रहा.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान के हस्ताक्षर वाले इस समझौते में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत के लिए 60 दिनों का ढांचा तय किया गया है.

इसमें सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई तुरंत रोकने की बात कही गई है. इसमें लेबनान भी शामिल है. समझौते में एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करने की बात भी कही गई है.

साथ ही होर्मुज़ स्ट्रेट को फिर से खोलने और ईरानी जहाजों पर लगी अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की पुष्टि की गई है.

फिलहाल ईरान की जिम्मेदारियां अहम हैं, लेकिन सीमित हैं.

ईरान ने होर्मुज़ स्ट्रेट से सुरक्षित व्यावसायिक आवाजाही सुनिश्चित करने में मदद करने पर सहमति जताई है. उसने यह प्रतिबद्धता भी दोहराई है कि वह परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश नहीं करेगा.

साथ ही उसने अपने उच्च स्तर तक समृद्ध यूरेनियम के भंडार और यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम के भविष्य पर बातचीत में शामिल होने पर भी सहमति जताई है.

वहीं, अमेरिका की प्रतिबद्धताएं कहीं ज़्यादा बड़ी दिखाई देती हैं.

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प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

एमओयू के मुताबिक़, अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की प्रक्रिया शुरू करेगा. वह ईरानी तेल निर्यात के लिए छूट भी जारी करेगा. साथ ही फ़्रीज़ की गई और प्रतिबंधित ईरानी संपत्तियां उपलब्ध कराएगा. अमेरिका ईरान पर लगे प्रतिबंधों में ढील देने की दिशा में भी काम करेगा.

इसके अलावा वह अपने क्षेत्रीय साझेदारों के साथ मिलकर ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर की योजना पर काम करेगा.

यही वजह है कि अब तक ईरान के आलोचकों की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत शांत रही है.

एमओयू की यही बातें ईरानी नेतृत्व को इस समझौते को जीत के रूप में पेश करने का पर्याप्त आधार देती हैं.

ईरान कह सकता है कि उसकी संप्रभुता को मान्यता मिली है. नाकेबंदी हटने वाली है. प्रतिबंधों में राहत मिलने की संभावना है.पुन र्निर्माण के लिए वित्तीय सहायता का भी स्पष्ट उल्लेख किया गया है.

लेकिन यह खामोशी ज्यादा समय तक रहने की संभावना नहीं है. यहां तक कि ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई की पहली प्रतिक्रिया भी काफ़ी संतुलित थी. उन्होंने समझौते को आगे बढ़ने की अनुमति दी.

लेकिन साथ ही यह भी साफ़ कर दिया कि इसे ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की ज़िम्मेदारी पर स्वीकार किया गया है. सबसे कठिन मुद्दों को फिलहाल टाल दिया गया है. उनका समाधान अभी नहीं हुआ है.

उच्च स्तर तक समृद्ध यूरेनियम के भंडार, यूरेनियम संवर्धन उद्योग के आकार और जंग में क्षतिग्रस्त परमाणु संयंत्रों के पुनर्निर्माण जैसे मुद्दों पर अब भारी दबाव के बीच बातचीत होगी.

यह ईरान के नेतृत्व के सामने एक बड़ी चुनौती है.

ईरानी नेतृत्व की चुनौतियां

होर्मुज़ स्ट्रेट

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सरकारी मीडिया, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स, संसद और कट्टरपंथी नेताओं ने कई हफ़्तों तक अपने समर्थकों से कहा है कि ईरान ने अमेरिका और इसराइल को हरा दिया है.

ऐसे में जनता और समर्थकों की उम्मीदें काफ़ी बढ़ गई हैं.

अब अगर उच्च स्तर तक समृद्ध यूरेनियम या परमाणु ढांचे को लेकर कोई समझौता होता है, तो आलोचक इसे ऐसी रियायत बता सकते हैं जो जीत का दावा करने के बाद दी गई. लेकिन कोई समझौता न करना भी उतना ही ख़तरनाक हो सकता है.

अगर ईरान अपने उच्च स्तर तक समृद्ध यूरेनियम या अपने परमाणु कार्यक्रम के भविष्य पर आगे बढ़ने से इनकार करता है, तो पूरी प्रक्रिया विफल हो सकती है. साथ ही युद्धविराम भी ख़तरे में पड़ सकता है.

ऐसी स्थिति ईरान और इसराइल में उन लोगों की दलीलों को मजबूत करेगी, जो पहले से कहते रहे हैं कि ईरान ने एमओयू का इस्तेमाल सिर्फ़ समय हासिल करने के लिए किया है.

इससे दोनों पक्ष फिर से जंग की ओर बढ़ सकते हैं.

ईरानी संसद के अध्यक्ष और ईरान की वार्ता टीम के प्रमुख मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ ने बातचीत को चुनौतीपूर्ण और मजबूत रुख़ के साथ पेश करने की कोशिश की है.

उन्होंने सरकारी टीवी पर कहा, “मैं राजनयिक नहीं हूं. लेकिन मैं अच्छी तरह जानता हूं कि अमेरिका को कैसे समझाना है.”

ख़ामेनेई की प्रतिक्रिया ने इस काम को और मुश्किल बना दिया है. उन्होंने कहा कि सैद्धांतिक रूप से उनकी ‘एक अलग राय’ थी. लेकिन उन्होंने एमओयू को मंजूरी दे दी.

उन्होंने कहा कि ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख के रूप में मसूद पेज़ेश्कियान ने ईरान और उसके सहयोगियों के अधिकारों की रक्षा की ज़िम्मेदारी स्वीकार की थी.

इस तरह की भाषा ख़ामेनेई को समझौते के इतना क़रीब रखती है कि वह इसे आगे बढ़ा सकें. साथ ही वह खुद को इससे इतना दूर भी रखते हैं कि अगर समझौता विफल हो जाए, तो पूरी ज़िम्मेदारी उन पर न आए.

ईरानी वार्ताकारों के लिए इसका मतलब है कि समझौते की गुंजाइश और सीमित हो सकती है. उन्हें अमेरिका को संतुष्ट भी करना है. साथ ही ऐसी कोई सीमा भी पार नहीं करनी है, जिसे खुद सर्वोच्च नेता ने पूरी तरह स्वीकार न किया हो.

ग़ालिबाफ़ की भाषा सिर्फ अमेरिका के लिए नहीं है. यह ईरान की घरेलू राजनीति से जुड़े लोगों के लिए भी है. पूर्व रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कमांडर होने के नाते उन्हें इस समझौते को अपने कट्टर समर्थकों के बीच भी स्वीकार्य बनाना है.

ये वे लोग हैं, जो अमेरिका के साथ किसी भी समझौते को शक़ की नज़र से देखते हैं.

2015 के परमाणु समझौते से इस समझौते की तुलना होना लगभग तय माना जा रहा है. अमेरिका में कुछ लोग इस एमओयू को जेसीपीओए से भी ख़राब बता सकते हैं.

उनका तर्क है कि ट्रंप ने ऐसा ढांचा स्वीकार कर लिया है, जो ईरान को प्रतिबंधों में राहत और आर्थिक लाभ देता है. जबकि सबसे कठिन परमाणु मुद्दों को बाद के लिए टाल दिया गया है.

लेकिन ईरान में ख़तरा अलग है. वहां कट्टरपंथी सरकार और वार्ता टीम पर 2015 की ‘ग़लती’ दोहराने का आरोप लगा सकते हैं.

उस समय राष्ट्रपति हसन रूहानी को सांसदों, रूढ़िवादी मीडिया और राजनीतिक विरोधियों की तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा था. उन पर आरोप लगा था कि उन्होंने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर ज़रूरत से ज़्यादा रियायतें दी थीं.

मसूद पेज़ेश्कियान और मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है. उन्हें इस युद्धविराम के ढांचे को राजनीतिक सफलता में बदलना होगा. उन्हें यह काम विरोध की आवाज़ और मजबूत होने से पहले करना होगा.

फिलहाल ईरान ने समय हासिल कर लिया है. उसे तत्काल सैन्य दबाव से राहत मिली है. उसे बड़े आर्थिक लाभ मिलने की संभावना भी बनी है. साथ ही वह उस नतीजे से भी बच गया है, जिसकी अमेरिका सबसे ज़्यादा मांग कर रहा था.

अमेरिका ईरान से पूर्ण समर्पण चाहता था.

लेकिन ईरान अभी अंतिम समझौते तक नहीं पहुंचा है. फ़िलहाल एमओयू ने उसकी स्थिति मजबूत की है. उसकी राजनीतिक व्यवस्था सुरक्षित बनी हुई है. अमेरिका ने भी कुछ स्पष्ट प्रतिबद्धताएं की हैं.

हालांकि, ईरान के सामने सबसे बड़ा जोखिम अभी बाकी है. अगले 60 दिनों में घरेलू स्तर पर पेश की गई “जीत” की तस्वीर और युद्ध दोबारा शुरू होने से रोकने के लिए ज़रूरी समझौतों के बीच का अंतर साफ़ दिखाई दे सकता है.

युद्ध के पहले चरण से ईरान कई लोगों की उम्मीद से ज़्यादा मजबूत होकर निकला है. लेकिन उसकी अगली चुनौती शायद इससे भी कठिन होगी. उसे अपने राजनीतिक समर्थकों को अंतिम समझौते तक अपने साथ बनाए रखना होगा.

साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी समझौता रियायत या हार जैसा न दिखे.

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बर्न्ड डिबशमैन जूनियर, व्हाइट हाउस संवाददाता

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शुरुआती लक्ष्यों का एमओयू में ज़िक्र नहीं

SOURCE : BBC NEWS