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केरल विधानसभा ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग वाला प्रस्ताव लगभग सर्वसम्मति से पारित किया है. ऐसा करने वाली यह देश की पहली विधायी संस्था बन गई है.
ज्ञानेश कुमार केरल कैडर के पूर्व आईएएस अधिकारी हैं.
कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ़) के नेता और मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने यह प्रस्ताव पेश किया. विपक्षी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ़) ने भी इसका समर्थन किया.
विधानसभा में मौजूद बीजेपी के तीन सदस्यों में से दो विधायकों ने प्रस्ताव का विरोध किया. 140 सदस्यों वाली विधानसभा में यूडीएफ़ के 102 और एलडीएफ़ के 35 विधायक हैं.
प्रस्ताव में कहा गया, “चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर संदेह जताए जाने के मौजूदा हालात में संस्था की विश्वसनीयता बहाल करने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए क़दम उठाना ज़रूरी है.”
ऐतिहासिक प्रस्ताव

प्रस्ताव में केंद्र सरकार से मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन के लिए गठित समिति के ढांचे में बदलाव करने की मांग भी की गई.
इसमें केंद्रीय गृह मंत्री की जगह भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने की बात कही गई. प्रस्ताव में कहा गया है कि इस समिति में प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता भी शामिल होने चाहिए.
प्रस्ताव में केंद्र सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा गया, “केंद्र सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन वाली समिति को ऐसी समिति में बदलकर चुनाव आयोग की संस्था के रूप में विश्वसनीयता भी खत्म कर दी, जिसमें उसका बहुमत था.”
सतीशन ने एक्स पर लिखा, “हमारी चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता. मतदाता सूची में संशोधन, पात्र मतदाताओं को मतदान के अधिकार से वंचित किए जाने और चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर उठी गंभीर चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.”
सतीशन ने अपनी पोस्ट में यह भी कहा, “इस ऐतिहासिक प्रस्ताव के जरिए केरल ने तीन स्पष्ट मांगें रखी हैं.”
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सतीशन की तीन मांगें हैं – मतदान का अधिकार बहाल किया जाए, मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाया जाए और चयन प्रक्रिया में सुधार हो.
उन्होंने कहा, “विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया में हुई अनियमितताओं को दूर किया जाए और गलत तरीके से मतदाता सूची से बाहर किए गए सभी पात्र मतदाताओं के मतदान के अधिकार तुरंत बहाल किए जाएं. मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू की जाए, जिनकी निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठे हैं.”
सतीशन ने कहा, “मतदान का अधिकार हमारे लोकतंत्र की नींव है. किसी भी संस्था को हमारे नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. हमारा रुख स्पष्ट है. मतदान के अधिकार की रक्षा होनी चाहिए. संविधान का पालन होना चाहिए. लोकतंत्र की जीत होनी चाहिए. केरल स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के पक्ष में मजबूती से खड़ा है.”
प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि स्थिति की गंभीरता उन रिपोर्टों से और बढ़ गई है, जिनमें बताया गया है कि मतदाता सूची तैयार करने वाले इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स की शक्तियां कम कर दी गईं, फॉर्म 6 में संशोधन किए गए और चुनाव आयोग के फैसलों पर दो अन्य चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी.
प्रस्ताव में कहा गया, “मतदाता सूची में ऐसी अनियमितताएं जनता के जनादेश को कमजोर करने के समान हैं.”
सीपीएम के दो सदस्यों, साजी चेरियन और एम. विपिन ने प्रस्ताव में संशोधन पेश करने की मांग की. वे केरल की मतदाता सूचियों से 24 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने के मामले में जवाबदेही तय करना चाहते थे. उन्होंने केरल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग भी की.
मुख्यमंत्री सतीशन ने उनके प्रस्तावित संशोधनों को खारिज कर दिया. उस समय के मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. रतन यू. केलकर फिलहाल मुख्यमंत्री के सचिव हैं.
हालांकि, मुख्यमंत्री ने विपक्ष के नेता पिनराई विजयन के सुझाव को स्वीकार कर लिया.
विजयन ने कहा था कि प्रस्ताव में इस्तेमाल किए गए वाक्यांश “लाखों पात्र मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर रखा गया” को बदलकर पूरे देश के संदर्भ में “करोड़ों मतदाताओं को बाहर रखा गया” किया जाना चाहिए.
मुख्यमंत्री ने उत्साहित होकर सोशल मीडिया मंच पर लिखा, “केरल ने इतिहास रच दिया है. पहली बार केरल विधानसभा ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया है.”
उनका यह बयान पूरी तरह गलत नहीं है. देश की किसी भी विधायिका ने इससे पहले मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की मांग वाला प्रस्ताव पारित नहीं किया है.
कुछ महीने पहले विधानसभा चुनाव होने से पहले भी केरल विधानसभा ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के विरोध में एक प्रस्ताव पारित किया था.
ज्ञानेश कुमार से जुड़ा पुराना मामला
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यह प्रस्ताव ऐसे समय पारित हुआ है, जब राज्य सरकार दो दशक पहले लोक निर्माण विभाग के सचिव रहते हुए ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ दर्ज सतर्कता जांच रिपोर्ट की दोबारा समीक्षा कर रही है.
राज्य के गृह मंत्री रमेश चेन्नितला ने पिछले सप्ताह बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया था कि उन्होंने इस मामले में कानूनी राय मांगी थी.
उनके मुताबिक, उन्हें बताया गया कि लोक निर्माण विभाग के सचिव रहते हुए ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में 215 करोड़ रुपये की सड़क परियोजना में संज्ञेय अपराध हुआ था.
उन्होंने कहा, “इसलिए मैंने सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को जांच का आदेश दिया है.”
यह मामला 2006 में सामने आया था, जब एक इंजीनियर मलेशिया लौटने के बाद आत्महत्या कर ली थी. ली सी बीन विश्व बैंक की मदद से चल रही सड़क परियोजना पर काम कर रहे भारत-मलेशिया संयुक्त उपक्रम के मुख्य परियोजना प्रबंधक थे.
अपने सुसाइड नोट में उन्होंने आरोप लगाया था कि संयुक्त उपक्रम की परियोजना में भ्रष्टाचार के चक्र को बनाए रखने के लिए उन पर दबाव डाला जा रहा था, जिससे वह परेशान थे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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