Source :- BBC INDIA
इमेज स्रोत, Krishna Adhikari
प्रकाशित
पढ़ने का समय: 7 मिनट
नेपाल के भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों में आई बाढ़ और भूस्खलन के बाद मरने वालों की संख्या 332 हो गई है. अब तक 900 से अधिक लोग लापता हैं. यह संख्या लगातार बढ़ रही है.
नेपाल के विदेश मंत्री ने कहा है कि भारत के क़रीब 300 लोग लापता हैं. इनमें कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए तीर्थयात्री शामिल हैं.
बुधवार को आध्यात्मिक गुरु जग्गी वासुदेव ने बताया कि उनके ईशा फ़ाउंडेशन के 80 लोग इस आपदा से प्रभावित हो सकते हैं और उनके बारे में कोई ख़बर नहीं है.
जग्गी वासुदेव ने कहा, “कुल 80 लोग हैं, जिनमें 34 पुरुष और 46 महिला शामिल हैं, साथ ही कुछ अन्य वालंटियर भी हैं जो पास के होटलों में ठहरे हुए हैं. जितनी बड़े पैमाने पर तबाही हुई है, स्थिति बहुत खराब लग रही है. अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है.”
ईशा फ़ाउंडेशन के ग्रुप में अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, जर्मनी और भारत समेत 19 देशों के श्रद्धालु शामिल हैं. गुरुवार को जग्गी वासुदेव ने प्रशासन से ग्यिरोंग जाने की अनुमति मांगी है.
ग्यिरोंग काउंटी का बॉर्डर चीन और नेपाल के बीच टूरिस्ट और ट्रैफिक के लिए मेन क्रॉसिंग पॉइंट है. वहां क़रीब 4,000 लोग रहते हैं.
बुधवार सुबह तिब्बत से होकर बहने वाली नदी में अचानक आई बाढ़ से नेपाल के रसुवा, नुवाकोट, धाडिंग, गोरखा और चितवन ज़िले प्रभावित हुए हैं.
फ़्लैश फ़्लड से कैलाश मानसरोवर जाने वाले मुख्य रास्तों में से एक रसुवा ज़िले में सड़कें, पुल और संचार संपर्क पूरी तरह तबाह हो चुके हैं.
कैलाश मानसरोवर जाने के रूट
इमेज स्रोत, Getty Images
समुद्र तल से 6,638 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील की हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म में विशेष मान्यता है. और हर साल सैकड़ों तीर्थ यात्री यहां की यात्रा करते हैं.
भारत सरकार तिब्बत में स्थित कैलाश मानसरोवर यात्रा का आयोजन हर साल जून से सितंबर के दौरान दो अलग-अलग मार्गों – लिपुलेख दर्रा (उत्तराखंड)- धारचूला या दिल्ली, और नाथू ला दर्रा (सिक्किम)- गंगटोक या दिल्ली से कराती है.
लिपुलेख दर्रा (उत्तराखंड) के रास्ते पर क़रीब 200 किलोमीटर ट्रैकिंग करनी पड़ती है. जबकि नाथु ला दर्रे वाले मार्ग पर क़रीब 36 किलोमीटर की ट्रैकिंग करनी होती है.
एक तीसरा रूट है काठमांडू से, जिसे प्राइवेट टूर ऑपरेटर संचालित करते हैं. इस रूट में काठमांडू से नेपालगंज और फिर यहां से ज़मीन के रास्ते तिब्बत की यात्रा की जाती है.
नेपाल के रास्ते दो प्राइवेट रूट
इमेज स्रोत, Reuters
नेपाल से कैलाश मानसरोवर जाने का रास्ता काठमांडू से शुरू होता है और निजी टूर ऑपरेटरों की ओर से संचालित सड़क या हेलीकॉप्टर मार्गों से तिब्बत पहुंचता है.
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़, तिब्बत में ग्यिरोंग और नेपाल में रसुवा से होकर जाने वाले सड़क मार्ग से क़रीब 10 से 14 दिनों का समय लगता है.
इसमें काठमांडू से सड़क मार्ग से सीमा चौकी तक और फिर तिब्बत में दारचेन तक यात्रा जारी रहती है. दारचेन से पैदल यात्रा शुरू होती है.
दूसरा हेलीकॉप्टर मार्ग नेपालगंज और सिमिकोट/हिल्सा होकर जाता है. इसमें करीब 5 से 11 दिन लगते हैं. इसमें काठमांडू से नेपालगंज, फिर छोटे विमान से सिमिकोट और उसके बाद हेलीकॉप्टर से सीमा पर स्थित हिलसा पहुंचना होता है.
यहां से पुरांग और कैलाश पर्वत तक छोटी दूरी सड़क से तय की जाती है.
इन यात्रियों के लिए वैध पासपोर्ट और चीन के विशेष परमिट जरूरी होते हैं. इनमें चीनी ग्रुप वीजा और तिब्बत ट्रैवल परमिट शामिल हैं.
हर साल मई से सितंबर के बीच बड़ी संख्या में यात्री इन मार्गों से जाते हैं.
प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

SOURCE : BBC NEWS




