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चेतावनी: इस लेख में हिंसा और हत्या से जुड़ी ऐसी जानकारियां हैं, जो कुछ पाठकों को परेशान कर सकती हैं.
भारत में ईसाइयों के ख़िलाफ़ हिंसा की सबसे चौंकाने वाली घटनाओं में से एक घटना 25 साल से भी ज़्यादा समय बाद एक बार फिर चर्चा में है. इस घटना की दुनियाभर में निंदा हुई थी.
बुधवार को सुप्रीम कोर्ट दोषी दारा सिंह की उस याचिका पर फ़ैसला कर सकता है, जिसमें उसने जेल से रिहाई की मांग की है. दारा सिंह, ऑस्ट्रेलियाई ईसाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो नाबालिग बेटों की 1999 में की गई हत्या का दोषी है.
दारा सिंह, जिसका असली नाम रवींद्र कुमार पाल है, 2000 में गिरफ़्तारी के बाद से जेल में हैं. वह उम्रकैद की सज़ा काट रहा है. उसे ओडिशा (पहले उड़ीसा) के एक गांव में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी और उनके छह और 10 साल के बेटों को ज़िंदा जलाने का दोषी ठहराया गया था.
स्टेन्स ने कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों के साथ काम करते हुए 30 साल बिताए थे. लेकिन दारा सिंह और हिंदू कट्टरपंथी संगठनों से जुड़े उनके साथियों ने उन पर आरोप लगाया था कि वह दलितों और आदिवासी समुदाय के लोगों का ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन कराकर उन्हें ईसाई बना रहे थे.
इस जघन्य अपराध ने भारत के अल्पसंख्यक ईसाई समुदाय को झकझोर दिया था और दुनियाभर में आक्रोश पैदा हुआ था. अब दारा सिंह की इस याचिका पर सुनवाई से जुड़ी ख़बरों ने उस जघन्य अपराध की यादें फिर ताज़ा कर दी हैं.
स्टेन्स मयूरभंज ज़िले के बारीपदा में रहते थे. वह वहां स्थानीय आदिवासी समुदाय के बीच काम करते थे.
22 जनवरी 1999 की रात उनकी हत्या हुई थी. स्टेन्स और उनके बेटे पड़ोसी ज़िले क्योंझर के एक दूरदराज़ के गांव मनोहरपुर में ईसाई सभा में शामिल हुए थे. वे अपनी जीप में सो रहे थे. तभी दारा सिंह के नेतृत्व में 60 से 70 लोगों की भीड़ ने उनकी गाड़ी को घेर लिया. भीड़ ने गाड़ी में आग लगा दी और उन्हें बाहर निकलने से रोक दिया.
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क्या आरोप थे?
सिंह अपराध के बाद फ़रार हो गया था. पुलिस ने उसकी जानकारी देने और उसे पकड़वाने में मदद करने वाले व्यक्ति को 8 लाख रुपये का इनाम देने की घोषणा की थी. इसके लिए पूरे राज्य में पोस्टर लगाए गए थे.
उस समय आई रिपोर्टों के मुताबिक, गांवों में रहने वाले लोगों और आदिवासियों ने उसे छिपने में मदद की थी. वे उसकी तारीफ़ करते थे और उसे “आधुनिक दौर का टार्ज़न, जो हाथियों के साथ खेलता और बाघों की सवारी करता है” कहते थे. एक साल बाद पुलिस ने जंगल में उसके ठिकाने पर रात में छापा मारकर उसे गिरफ़्तार कर लिया.
कुछ महीने बाद जेल से इंडिया टुडे पत्रिका के रूबेन बनर्जी को दिए एक सनसनीखेज़ इंटरव्यू में उसने स्टेन्स और उनके बच्चों की हत्या से इनकार किया. लेकिन उसने कहा कि उसे “ग्राहम स्टेन्स पसंद नहीं थे” और उसने “मिशनरियों के ख़िलाफ़ आंदोलन का नेतृत्व किया था”.
उसने कहा, “मिशनरी हमारे धर्म को निशाना बना रहे हैं. वे धोखे और लालच देकर हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कर रहे हैं. हमारा धर्म ख़तरे में है. एक सच्चे हिंदू के तौर पर उन्हें रोकना मेरी ज़िम्मेदारी थी.”
उसने कहा, “चूंकि मैं शायद इस इलाक़े में सबसे मशहूर नाम था, इसलिए पुलिस ने मुझे हत्याओं के मामले में फंसा दिया.”
सिंह ने यह भी कहा कि वह “हिंदुओं के हित के लिए शहीद होने को तैयार है”. लेकिन उसका मानना था कि उसे कभी दोषी नहीं ठहराया जाएगा.
उसका यह भरोसा ग़लत साबित हुआ. 2003 में एक निचली अदालत ने सिंह को मौत की सज़ा सुनाई. 12 अन्य लोगों को उम्रकैद की सज़ा दी गई.
दो साल बाद हाई कोर्ट ने सिंह की मौत की सज़ा को उम्रकैद में बदल दिया. अदालत ने उसके साथी महेंद्र हेम्ब्रम की उम्रकैद की सज़ा बरक़रार रखी. लेकिन 11 अन्य लोगों को रिहा कर दिया. अदालत ने कहा कि उनकी सज़ा के लिए पर्याप्त सबूत नहीं थे.
जनवरी 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने सिंह की उम्रकैद की सज़ा बरक़रार रखी. उसने अभियोजन पक्ष की मौत की सज़ा फिर से लागू करने की मांग को ख़ारिज कर दिया.
स्टेन्स की हत्या ही सिंह का एकमात्र अपराध नहीं था. 2007 में उसे 1999 में धार्मिक अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ किए गए दो और जघन्य अपराधों में दोषी ठहराया गया. ये वही साल था, जब उसने ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी और उनके बच्चों की हत्या की थी.
उसे दो मामलों में उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई. पहले मामले में उसने एक भीड़ का नेतृत्व किया था, जिसने एक चर्च में आग लगा दी थी. कैथोलिक पादरी अरुल दास जलती इमारत से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे. तभी उन्हें तीर मारकर उनकी हत्या कर दी गई.
दूसरे मामले में एक मुस्लिम कपड़ा व्यापारी शेख़ रहमान को पीटकर और जलाकर मार दिया गया था. इस मामले में भी सिंह को उम्रकैद की सज़ा मिली.
याचिका में क्या कहा गया है?
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पुलिस ने सिंह के ख़िलाफ़ 10 मामले दर्ज किए थे. इन मामलों में उस पर मुस्लिम व्यापारियों के उन ट्रकों को हाईजैक करने का आरोप था, जिनमें गायें ले जाई जा रही थीं.
इंटरव्यू में सिंह ने इन मामलों में “खुद शामिल होने” से इनकार किया. उसने कहा, “मेरे समर्थकों ने ऐसा किया हो सकता है.” लेकिन उसने यह माना कि वह “गायों के अवैध कारोबार और गोहत्या के ख़िलाफ़ आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल था”. उसने कहा कि इसे “किसी भी क़ीमत पर रोकना ज़रूरी था”.
चर्च के नेताओं ने आरोप लगाया था कि ये हमले कट्टरपंथी हिंदू संगठन बजरंग दल के कहने पर किए गए थे. लेकिन सिंह ने बजरंग दल का सदस्य होने से इनकार किया. बाद में सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज डीपी वाधवा की अध्यक्षता वाले जांच आयोग ने कहा कि उसने अकेले ये काम किया था.
ग्राहम स्टेन्स की पत्नी ग्लैडिस जुलाई 2004 तक अपनी बेटी एस्थर के साथ भारत में ही रहीं. उन्होंने ‘ईसाई भावना’ के तहत कहा था कि उन्होंने दारा सिंह को “माफ़ कर दिया” है.
उन्होंने कहा था, “माफ़ी से ज़ख़्म भरने का रास्ता खुलता है.”
जुलाई 2024 में सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में सज़ा में छूट के लिए याचिका दायर की. उसने कहा कि उसे रिहा किया जाना चाहिए, क्योंकि वह 25 साल से ज़्यादा समय जेल में बिता चुका है. उसने कहा कि जेल में उसका आचरण अच्छा रहा है और उसने अपने किए पर पछतावा जताया.
जल्दी रिहाई की मांग वाली अपनी याचिका में 62 वर्षीय दारा सिंह ने अपराध के लिए “युवावस्था के जोश” को ज़िम्मेदार ठहराया.
उसकी पिटीशन में लिखा है, “याचिकाकर्ता दो दशक से भी ज़्यादा पहले किए गए अपने अपराधों को स्वीकार करता है और उन पर गहरा पछतावा जताता है.
“युवावस्था के जोश में, भारत के क्रूर इतिहास पर भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से प्रभावित होकर, याचिकाकर्ता कुछ समय के लिए अपना संयम खो बैठा. अदालत के लिए केवल उसके किए गए कामों को देखना ही नहीं, बल्कि उसके पीछे की मंशा को भी देखना ज़रूरी है. यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि किसी भी पीड़ित के प्रति उसकी कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी.”
पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से उसकी याचिका पर फ़ैसला लेने को कहा था. लेकिन अधिकारियों ने अब तक अदालत को यह नहीं बताया है कि वे क्या फ़ैसला लेने वाले हैं.
19 अगस्त को हुई पिछली सुनवाई में अधिकारियों ने अदालत को बताया कि सिंह की याचिका पर विचार कर रहा सज़ा समीक्षा बोर्ड कुछ और दस्तावेज़ों का इंतज़ार कर रहा है. अधिकारियों ने मामले की सुनवाई टालने की मांग की.
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की दो जजों की बेंच ने राज्य की ओर से मामले की सुनवाई कई बार टाले जाने पर नाराज़गी जताई. अदालत ने कहा कि अगर बोर्ड ने 2 सितंबर तक दारा सिंह की याचिका पर फ़ैसला नहीं लिया, तो अदालत खुद फ़ैसला करेगी.
अदालत ने कहा, “आप जो भी फ़ैसला लेना चाहते हैं, ले लीजिए. अगर आप फ़ैसला नहीं लेते हैं, तो हम लेंगे.”
स्टेन्स की पत्नी ने क्या कहा था?
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सिंह की रिहाई की संभावना से जुड़ी ख़बरों ने भारत के कई ईसाइयों के बीच चिंता पैदा कर दी है. भारत में क़रीब 3 करोड़ ईसाई रहते हैं. अगर राज्य सरकार या अदालत उसकी सज़ा में छूट की याचिका मंज़ूर कर लेती है, तो वह जेल से बाहर आ सकता है. इस चिंता की एक वजह सिंह के पुराने बयान भी हैं.
2000 में इंडिया टुडे को दिए इंटरव्यू में उसने कहा था कि स्टेन्स के बच्चों की हत्या को लेकर उसे “कोई पछतावा नहीं है” और “कभी पछतावा नहीं होगा”.
उसने कहा था, “जब हिंदू मरते हैं, तो दूसरे लोग नहीं रोते. फिर दूसरों की मौत पर हमें क्यों रोना चाहिए? जो हुआ, सही हुआ. जो होगा, वह भी सही होगा.”
उसने कहा था कि अगर वह जेल से बाहर आता है, तो “वही काम फिर शुरू करेगा जो वह करता रहा है – गोहत्या और धर्म परिवर्तन का विरोध”.
उसने कहा था, “सरकार को इसे रोकना चाहिए. अगर इसे नहीं रोका गया, तो और लोग मारे जा सकते हैं. कुछ भी हो सकता है.”
यूनियन ऑफ कैथोलिक न्यूज़ (यूसीएन) की वेबसाइट पर हाल में लिखे एक लेख में मानवाधिकार कार्यकर्ता और ईसाई राजनीतिक कार्यकर्ता जॉन दयाल ने कहा कि भारत में दशकों तक जेल में रहने के बाद सज़ा में छूट मिलना “असामान्य नहीं है”. उन्होंने कहा कि इसके पीछे का सिद्धांत मानवीय है. इसका मतलब है कि सज़ा का मक़सद व्यक्ति में सुधार लाना और उसे बाद में समाज में लौटने का मौक़ा देना होना चाहिए.
लेकिन ओडिशा में धार्मिक अल्पसंख्यकों की चिंता “सिर्फ़ काल्पनिक नहीं है”. दयाल ने ओडिशा में ईसाइयों के ख़िलाफ़ हिंसा के इतिहास का ज़िक्र करते हुए 2008 के कंधमाल दंगों का उदाहरण दिया. इनमें दर्जनों लोग मारे गए थे और हज़ारों लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा था.
उन्होंने लिखा, “स्टेन्स की हत्या कोई सामान्य हत्या नहीं थी. यह सार्वजनिक तौर पर की गई ऐसी हिंसक घटना थी, जिसका मक़सद लोगों को डराना और चेतावनी देना था. पादरी अरुल दास और शेख़ रहमान की हत्याओं ने भी यही संदेश दिया.”
दयाल ने आगे लिखा, “अब यह देखना अहम नहीं है कि सिंह आख़िरकार जेल से बाहर आएगा या नहीं. अहम यह है कि सरकार इस फ़ैसले को किस तरह लेती है और क्या अल्पसंख्यक समुदायों को कोई भरोसा दिलाया जाता है.”
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