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जंतर मंतर प्रोटेस्ट और राम मंदिर चंदा चोरी पर सरकार ने संसद में अपना पक्ष क्यों नहीं रखा?

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Source :- BBC INDIA

मंगलवार मॉनसून सत्र के दौरान, कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी, समाजवादी पार्टी सांसद जया बच्चन और विपक्ष के अन्य सांसदों ने संसद के मकर द्वार पर विरोध प्रदर्शन किया.

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संसद का मानसून सत्र गुरुवार को ख़त्म हो गया. 13 अगस्त को दोनों ही सदनों की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई.

पर पूरे सत्र के दौरान दो सवाल ऐसे रहे जिन पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव की स्थिति बनी रही.

पहला सवाल दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए स्टूडेंट प्रोटेस्ट और उस दौरान पुलिस कार्रवाई का था, तो दूसरा अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे और चंदा गबन का.

दोनों मुद्दों को विपक्ष ने संसद और संसद के बाहर ज़ोर-शोर से उठाया. विपक्ष की मांग थी कि सरकार सदन में जवाब दे. लेकिन सत्र के अंत तक दोनों ही मुद्दों पर वैसी बहस नहीं हो सकी, जैसी विपक्ष चाहता था.

आख़िर ये स्थिति बनी क्यों ? जब सरकार के पास संसद में अपना पक्ष रखने का मौका था, तो उसने ऐसा क्यों नहीं किया?

सत्र के आख़िरी दिनों में आकर गृहमंत्री अमित शाह जवाब देने के लिए क्यों तैयार हुए? इसके पीछे की वजह क्या थी? जब अमित शाह जवाब देने के लिए तैयार हो गए तब विपक्ष चर्चा के लिए तैयार क्यों नहीं हुआ?

आख़िर ये स्थिति बनी क्यों ? जब सरकार के पास संसद में अपना पक्ष रखने का मौका था, तो उसने ऐसा क्यों नहीं किया?

सत्र के आख़िरी दिनों में आकर गृहमंत्री अमित शाह जवाब देने के लिए क्यों तैयार हुए? इसके पीछे की वजह क्या थी? जब अमित शाह जवाब देने के लिए तैयार हो गए तब विपक्ष चर्चा के लिए तैयार क्यों नहीं हुआ?

वरिष्ठ पत्रकार और द हिंदू की पॉलिटिकल एडिटर निस्तुला हेब्बार का मानना है कि इस पूरे सत्र के दौरान सरकार बैकफुट पर थी.

वह कहती हैं, ” छात्रों पर पुलिस की कार्रवाई के मुद्दे पर सरकार पूरे सत्र के दौरान रक्षात्मक स्थिति दिखाई दी. गृहमंत्री अमित शाह जंतर-मंतर प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई पर चर्चा और जवाब देने के लिए तब तैयार हुए, जब झारखंड में भी प्रदर्शन शुरू हो गए थे और वहां प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ पुलिस कार्रवाई की ख़बरें सामने आ चुकी थीं.”

”हम जानते हैं कि झारखंड में कांग्रेस गठबंधन की सरकार है. ऐसे में सरकार के लिए इस मुद्दे का सामना करना पहले की तुलना में सहज हो गया था. पर विपक्ष भी इस राजनीतिक गणित को समझ रहा था.”

निस्तुला के मुताबिक़ पूरे सत्र के दौरान विपक्ष ने यह धारणा बनाने की कोशिश की थी कि सरकार इस मुद्दे पर जवाब देने से बच रही है.

उनका कहना है ”ऐसे में अगर सत्र के आख़िरी दो-तीन दिनों में गृह मंत्री जवाब दे देते, तो सरकार को अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिल जाता और संभव है कि इस बहस को वहीं समाप्त कर दिया जाता. विपक्ष शायद यह नहीं चाहता था कि सरकार को इस मुद्दे पर अपनी बात रखने और बहस को समेटने का मौका मिले.”

मानसून सत्र में हावी रहे दो मुद्दे

विपक्षी सांसदों के साथ राहुल गांधी

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संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू हुआ था. इसी दिन जंतर-मंतर से स्टूडेंट्स का संसद मार्च भी प्रस्तावित था.

मार्च के दौरान पुलिस की कार्रवाई को लेकर गृह मंत्री अमित शाह पर सवाल खड़े किए गए.

कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल मांग करने लगे कि अमित शाह संसद में आकर बताएं कि आख़िर स्टूडेंट्स के ख़िलाफ़ ऐसी कार्रवाई का आदेश किसने दिया था.

वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं, ”अगर सरकार पहले ही सदन में आकर अपनी बात रख देती, तो शायद स्थिति कुछ सामान्य हो सकती थी. लेकिन वह इससे बचते रहे जिससे यह भी विपक्ष के लिए एक राजनीतिक मुद्दा बन गया कि गृह मंत्री संसद भवन में मौजूद होने के बावजूद सदन में आकर इस मामले पर जवाब नहीं दे रहे हैं. प्रधानमंत्री के सदन में नहीं आने को लेकर भी विपक्ष ने सवाल उठाए और मामला और बड़ा होता गया.”

अमित शाह

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सत्र के आखिर में जब सरकार ने गृह मंत्री अमित शाह के बयान के लिए तैयार होने की बात कही, तब तक विपक्ष की रणनीति भी बदल चुकी थी.

नीरजा चौधरी के मुताबिक़, विपक्ष को लग रहा था कि जंतर-मंतर के मुद्दे ने अमित शाह की राजनीतिक छवि को पहली बार कुछ हद तक चुनौती दी है. और वह इस स्थिति को कमजोर नहीं करना चाहता था.

नीरजा चौधरी

वह कहती हैं, “मुझे लगता है कि विपक्ष को लगा कि अमित शाह को जितना अजेय माना जाता है, उनकी उस छवि में एक दरार आई है. विपक्ष नहीं चाहता था कि गृह मंत्री का बयान आने के बाद वह दरार कम हो जाए. इसलिए जब सरकार आखिरकार जवाब देने के लिए तैयार हुई, तब विपक्ष ने उसे स्वीकार नहीं किया.”

हालांकि, नीरजा चौधरी मानती हैं कि यहां संसद की भूमिका को भी ध्यान में रखना चाहिए. उनका कहना है कि सरकार के मंत्री का जवाब सुनना संसद की प्रक्रिया का हिस्सा है.

वह कहती हैं, “अगर इतने दिनों से विपक्ष गृह मंत्री से जवाब मांग रहा था और अंत में वह जवाब देने के लिए तैयार हो गए, तो उनकी बात सुनी जानी चाहिए थी. देश यह जानना चाहता है कि जंतर-मंतर पर पुलिस कार्रवाई के आदेश किसने दिए और गृह मंत्री इस पर क्या कह रहे हैं. संसद की अपनी गरिमा और भूमिका है. हर संस्था को अपनी भूमिका के मुताबिक़ काम करना चाहिए.”

राम मंदिर चढ़ावा चोरी का मुद्दा

राम मंदिर में चंदा चोरी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते विपक्ष के सांसद

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हालांकि, स्टूडेंट प्रोटेस्ट से पहले तक कांग्रेस राम मंदिर में चंदे के गबन के मुद्दे को अपना मुख्य एजेंडा मानकर चल रही थी.

निस्तुला हेब्बार का कहना है कि सत्ता पक्ष को भी अंदाज़ा था कि विपक्ष सत्र के दौरान राम मंदिर के मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश करेगा.

”इसलिए बीजेपी राम मंदिर के चंदे से जुड़े मामले पर अपना जवाब तैयार करके आई थी. उसके पास इस मुद्दे पर अपने तर्क थे और वह उन्हें सदन में रखना चाहती थी. लेकिन जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई का मुद्दा इतना हावी हो गया कि राम मंदिर का मुद्दा पीछे चला गया.”

नीरजा चौधरी भी मानती हैं कि मानसून सत्र शुरू होने से पहले सरकार काफ़ी आत्मविश्वास से भरी हुई थी.

वह कहती हैं, ”पश्चिम बंगाल में टीएमसी और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना में हुई फूट और एनसीपी के भीतर परिसीमन विधेयक पर दोबारा विचार करने की बातें सामने आने के बाद सरकार को लग रहा था कि वह सदन में मज़बूत स्थिति में है और चीज़ें उसके नियंत्रण में रहेंगी. उसे उम्मीद थी कि वह एफसीआरए और परिसीमन जैसे अपने एजेंडे को बिना किसी बड़े गतिरोध के आगे बढ़ा सकेगी.”

सदन के पहले ही दिन जंतर-मंतर पर छात्रों के ख़िलाफ़ हुई पुलिस कार्रवाई ने पूरा समीकरण बदल दिया. ख़ासतौर पर पैलेट गन के कथित इस्तेमाल और उसके बाद उठे सवालों ने सरकार के ‘मोरल हाई ग्राउंड’ को कुछ हद तक डगमगा दिया

वह कहती हैं, ”धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े से भी सरकार के आत्मविश्वास को चोट पहुंचा इसलिए वह इन सवालों से भागते रहे और जब जवाब देने को तैयार हुए तब विपक्ष ने मौका ही नहीं दिया.”

20 जुलाई की तस्वीर, जिस दिन पुलिस ने प्रदर्शनकारी छात्रों पर कार्रवाई की

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सत्र ख़त्म होने से एक दिन पहले अमित शाह ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए विपक्ष पर निशाना साधा और सदन की कार्यवाही में आई बाधा के लिए विपक्ष को ज़िम्मेदार ठहराया.

उन्होंने कहा, ”देखिए, लापता और भाग गए हैं जैसी भाषा भारत की सर्वाजनिक जीवन में, संसदीय जीवन में अभी भी सुनाई देती है. जब से संसद सत्र शुरू हुआ है तबसे मैं लगातार संसद में आता हूं और अपने चैंबर में बैठता हूं चूंकि विपक्ष सदन को चलने नहीं दे रहे हैं. तो कोई जाकर क्या करेगा? जहां तक चर्चा का सवाल है सरकार की ओर से किरेन रिजिजू ने साफ़ कर दिया कि स्टूडेंट प्रोटेस्ट के प्रदर्शन पर सभी प्रकार की चर्चा करने के लिए तैयार हैं और चर्चा के लिए समय सुनिश्चित किया जाए और विपक्ष तैयार हो जाए.”

” मैंने भी कह दिया कि मैं किसी भी सवाल का जवाब देने के लिए तैयार हूं लेकिन वो चर्चा ही नहीं होने देना चाहते हैं.”

अमित शाह के बयान के जवाब में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा, ”पिछले 20 दिनों से अमित शाह गायब हैं. भारत के गृह मंत्री में हिम्मत नहीं है, वे सदन में नहीं आ सकते. विपक्ष ने साफ़ कहा है कि हमें अमित शाह का बयान सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं है. जब मैं ‘हम’ कहता हूं, तो मेरा मतलब देश की युवा पीढ़ी से है. छात्रों पर गोली किसने चलाई? कील लगी लाठियों से छात्रों को पीटने का आदेश किसने दिया? क्या हमारे बच्चों पर गोली चलाने का आदेश अमित शाह ने दिया था? अगर उन्होंने ऐसा किया है, तो उन्हें इस्तीफ़ा दे देना चाहिए.”

इस वार-पलटवार के बीच मानसून सत्र ख़त्म हो गया है और दो अहम सवालों के जवाब अनुत्तरित रह गए.

हालांकि नीरजा चौधरी इन दो सवालों को मानसून सत्र तक ही सीमित नहीं देखती हैं.

अमित शाह और राहुल गांधी

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नीरजा चौधरी कहती हैं, ”इस पूरे घटनाक्रम से सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच कटुता और बढ़ी है. दोनों के बीच ध्रुवीकरण बढ़ा है और संवाद की संभावना कम हुई है. यह लोकतंत्र के लिए अच्छी स्थिति नहीं है.

”अब यह देखना होगा कि सरकार इस स्थिति से निकलने के लिए आगे क्या कदम उठाती है. अगले साल महत्वपूर्ण चुनाव हैं और विपक्ष इस पूरे घटनाक्रम को अपनी राजनीतिक उपलब्धि के तौर पर देख रहा है. वह निश्चित रूप से इसे आगे ले जाने की कोशिश करेगा.”

”हालांकि, विपक्ष के लिए भी चुनौती कम नहीं है. किसी आंदोलन से पैदा हुई नाराज़गी को चुनावी सफलता में बदलने के लिए उसे लगातार राजनीतिक और संगठनात्मक काम करना होगा.”

जंतर-मंतर के आंदोलन में जिस तरह अलग-अलग पृष्ठभूमि के युवा एक मुद्दे पर साथ आए, वह बीजेपी के लिए निश्चित रूप से चिंता का विषय है. लेकिन विपक्ष के लिए भी सवाल यही है कि क्या वह इस एकजुटता को लंबे समय तक बनाए रख पाएगा.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS