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जयशंकर ने अमेरिका में किस तीसरे पक्ष की बात की, क्या ये बड़े बदलाव के हैं संकेत

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Source :- BBC INDIA

एस जयशंकर

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विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है कि भारत और चीन के बीच गतिरोध दोनों में से किसी के भी हित में नहीं है और तीसरा पक्ष इसका फ़ायदा उठाएगा.

जयशंकर ने कहा कि उन्होंने यह संदेश चीन को कई बार व्यक्तिगत स्तर पर भी दिया है.

जयशंकर ने सोमवार को न्यूयॉर्क में एशिया सोसाइटी की ओर से आयोजित कार्यक्रम में भारत-चीन संबंधों पर बात करते हुए कहा, “अगर आप मुझसे पूछें कि 2025 में जहाँ हम थे, उसकी तुलना में क्या आज रिश्ते बेहतर हैं? तो मैं कहूंगा, हाँ. 2024 की तुलना में देखें तो और भी ज़्यादा.”

विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा, “2020 में जो कुछ हुआ और सीमा पर लंबे समय तक जो गतिरोध रहा, उसका रिश्तों पर काफ़ी असर पड़ा था. एक बार सीमा पर गतिरोध सुलझ गया तो स्वाभाविक था कि रिश्तों में सुधार शुरू हो. हम लंबे समय से चीनियों से कहते रहे हैं, व्यक्तिगत रूप से भी मैंने अपने स्तर पर कहा है कि हमारे बीच गतिरोध या रिश्तों में गिरावट हम दोनों में से किसी के भी हित में नहीं है. तीसरे पक्ष इसका फ़ायदा उठाएंगे. चीनी पक्ष को इस बात से सहमत होने में थोड़ा समय लगा, वजह चाहे जो भी रही हो.”

उन्होंने कहा, “लेकिन मुझे नहीं लगता कि इतने लंबे समय तक चला गतिरोध हमारे हित में था. निश्चित तौर पर यह उनके हित में भी नहीं था. हमने देखा है कि जैसे-जैसे सीमा पर स्थिति सामान्य होती जा रही है, वैसे-वैसे रिश्ते भी सामान्य होते जा रहे हैं. अगर ऐसा होता है तो इससे हम दोनों को फ़ायदा होता है.”

जयशंकर ने कहा कि रिश्तों में यह सुधार ऐसे संबंधों की वापसी है जो “काफ़ी हद तक पटरी से उतर गए थे.”

ट्रंप

क्या बड़े बदलाव के संकेत?

जयशंकर की इस टिप्पणी को काफ़ी अहम माना जा रहा है.

जियोपॉलिटिकल और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को विश्लेषक ज़ोरावर दुलत सिंह ने एक्स पर लिखा है, ”बहुत ही महत्वपूर्ण बयान. हाल के वर्षों में जहाँ भारत और चीन ने अपनी सीमा पर गतिरोध को नियंत्रित करने के लिए व्यवहारिक स्तर पर साथ मिलकर काम किया है, वहीं खुले तौर पर यह कहना कि भारत-चीन संघर्ष तीसरे पक्षों, ख़ास तौर पर अमेरिका और पाकिस्तान के हित में है, भारतीय नीति में बदलाव का संकेत है.”

बिजिंग स्थित थिंक टैंक इंटरनेशनल कोऑपरेशन सेंटर के एनलिस्ट माओ केजी जयशंकर की टिप्पणी को ख़ासा अहम मानते हैं. माओ केजी ने एक्स पर लिखा है, ”जयशंकर की टिप्पणियां अहम संकेत देती हैं. इनका स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन इससे भी ज़्यादा ज़रूरी है कि इन पर गंभीरता से विचार किया जाए.”

”लंबे समय तक वास्तव में भारत ऐसा पक्ष था, जो चीन-भारत संबंधों को गतिरोध में बनाए रखने से ख़ुश था. इस गतिरोध को बनाए रखने से भारत अपनी अहमियत बढ़ा सकता था, ताकि वह अमेरिका से बेहतर तरीक़े से संसाधन हासिल कर सके, चाहे वह भारत में आने वाला निवेश हो, तकनीक हो, बाज़ार तक पहुंच हो या यहां तक कि कूटनीतिक स्तर पर अमेरिकी संयम का लाभ हो.”

”लेकिन जब ट्रंप ने भारत को ऐसा मोहरा मानना बंद कर दिया, जिसे सब्सिडी या समर्थन दिया जाना चाहिए और इसके बजाय उसे केवल अपने हितों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले एक कमज़ोर पक्ष के रूप में देखना शुरू किया, तो चीन-भारत गतिरोध नई दिल्ली के लिए फ़ायदे की जगह नुक़सान का कारण बन गया. अब यह भारत को अमेरिकी संसाधन हासिल करने में मदद नहीं करता, बल्कि उसे वॉशिंगटन के दबाव के प्रति और अधिक संवेदनशील बना देता है.”

चीन

माओ ने लिखा है, ”अमेरिका ने जब अपने पास उपलब्ध हर साधन का इस्तेमाल करके भारत पर दबाव डालना शुरू किया, तभी भारत की नींद खुली और शायद तब तक बहुत देर हो चुकी थी. असल में, जयशंकर की टिप्पणियां इस बात की स्वीकारोक्ति के तौर पर देखी जा सकती हैं कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपनी मज़बूत स्थिति का पूरा फ़ायदा नहीं उठाया.”

”भारत अपनी अलग और संतुलित स्थिति का इस्तेमाल करके चीन और अमेरिका, दोनों से लाभ हासिल कर सकता था. लेकिन दुखद वास्तविकता यह है कि अब भारत ने खुद को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया है, जहाँ दोनों में से कोई भी पक्ष उसे विशेष रूप से अपने साथ नहीं चाहता.”

जयशंकर ने यह बात तब कही है, जब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पिछले हफ़्ते व्हाइट हाउस से लौटे हैं. ट्रंप शी जिनपिंग की अगवानी में एयरपोर्ट पर खड़े थे. अमेरिका विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि चीन और अमेरिका के बीच संबंध 21वीं सदी की दिशा तय करेंगे.”

यानी अमेरिका भी चीन से संबंधों को बेहतर बनाने के लिए काफ़ी उत्साहित दिख रहा है. इस संदर्भ में भारत और अमेरिका के संबंधों की गर्मजोशी में आई गिरावट को आसानी से समझा जा सकता है.

मार्क रुबियो की इस टिप्पणी पर प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू के अंतरराष्ट्रीय संपादक स्टैनली जॉनी ने लिखा है, ”भारत में कई लोगों ने मान लिया था कि 21वीं सदी में वैश्विक वर्चस्व के लिए अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा के दौरान भारत ख़ुद को चीन के ख़िलाफ़ अमेरिका के लिए एक मज़बूत सहारे के तौर पर उपयोगी बना सकता है.”

स्टैनली जॉनी ने लिखा, ”आज अमेरिका चीन के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहा है, लेकिन वह टकराव में दिलचस्पी नहीं रखता. वह इस प्रतिस्पर्धा को मैनेज करना चाहता है और ऐसी रणनीतिक स्थिरता कायम करना चाहता है, जिसे चीनी रणनीतिक भाषा में रणनीतिक स्थिरता कहा जाता है. अमेरिका यह भी स्पष्ट रूप से नहीं चाहता कि वह भारत को मज़बूत समर्थन देकर एक तीसरा ध्रुव बनाने में मदद करे. अमेरिका अच्छी तरह समझता है कि एकध्रुवीयता का दौर ख़त्म हो चुका है.”

”यह जी-2 वाला नज़रिया सिर्फ़ ट्रंप का नज़रिया नहीं है. वॉशिंगटन का पॉलिसी मेकिंग सिस्टम चीन के साथ बाइपोलर प्रतिस्पर्धा को प्राथमिकता देना पसंद करेगा, जबकि बाकी देशों को ऐसे छोटे या सीमित प्रभाव वाले शक्ति केंद्रों के रूप में देखेगा जिन्हें मैनेज किया जा सके. इससे वॉशिंगटन की रणनीतिक सोच में भारत की अहमियत प्रभावी तौर पर कम होती है. भारतीयों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए.”

चीन अमेरिका

अमेरिका और चीन के संबंधों का भारत पर असर

हाल ही में पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन ने कहा था कि अमेरिका और चीन के बीच कोई रणनीतिक स्थिरता नहीं है, लेकिन एक टैक्टिकल तनाव का भी भारत पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है.

ऐसा इसलिए है क्योंकि चीन भारत को अमेरिका के चश्मे से देखता है. कई बार जब चीन को अमेरिका के साथ रिश्ते अधिक सहज महसूस हुए हैं, तो उसे ऐसा लगा है मानों उसे इस क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगियों और साझेदारों पर दबाव बनाने के लिए कोई अनुमति पत्र या खुला रास्ता मिल गया हो.

अमेरिका और चीन के संबंधों का असर भारत पर क्या पड़ता है?

इस सवाल का जवाब थिंक टैंक ब्रुकिंग्स इंस्टिट्यूशन की सीनियर फेलो तन्वी मदान ने 26 सितंबर को डीडी इंडिया के कार्यक्रम ‘इंडियन डिप्लोमैसी’ में प्रोफ़ेसर श्रीराम चौलिया के साथ बातचीत में दिया था.

तन्वी मदान ने कहा था, ”इतिहास गवाह है कि जब भी अमेरिका और चीन के बीच तनाव कम होता है तब चीन अपने पड़ोसियों विशेष रूप से भारत और जापान पर दबाव बढ़ाने में अधिक स्वतंत्र महसूस करता है. भारत ने कभी भी चीन को केवल अमेरिकी चश्मे से नहीं देखा है. भारत के चीन के साथ सीधे और स्वतंत्र संबंध हैं. 2024 की गर्मियों से ही भारत और चीन ने आपसी संबंधों में स्थिरता लाने की कोशिशें शुरू कर दी थीं. भारत अपनी आर्थिक वृद्धि और विकास पर ध्यान केंद्रित करना चाहता है और सीमा पर नया संकट नहीं चाहता.”

तन्वी मदान ने कहा था, ”विशेष रूप से तब जब आपका एक क़रीबी साझेदार रूस चीन के साथ और भी नज़दीकी दोस्ती रखता हो,

और आपका दूसरा क़रीबी साझेदार अमेरिका चीन के साथ तनाव कम कर रहा हो.”

चीन

भारत की रणनीति क्या है?

भारत चीन की अहमियत और ताक़त को बख़ूबी समझता है. एस जयशंकर से 2023 में 21 फ़रवरी को एक सवाल पूछा गया था कि चीन के मामले में भारत सख़्ती से पेश क्यों नहीं आता है?

इस सवाल के जवाब में जयशंकर ने समाचार एजेंसी एएनआई की स्मिता प्रकाश से कहा था, ”वह बड़ी अर्थव्यवस्था है. आपको क्या लगता है कि हम छोटी अर्थव्यवस्था के रूप में बड़ी अर्थव्यवस्था से जंग करने चले जाएं? सवाल सख़्ती से जवाब देने का नहीं है बल्कि कॉमन सेंस का है.”

एस. जयशंकर 2009 से 2013 तक चीन में भारत के राजदूत रहे हैं और वह चीन की ताक़त को बख़ूबी समझते होंगे.

एस. जयशंकर कहना चाह रहे हैं कि क़रीब 18 ट्रिलियन डॉलर की चीनी अर्थव्यवस्था से लगभग 3.5 ट्रिलियन डॉलर की भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए टकराना आसान नहीं है.

जयशंकर को यह भी पता है कि भारत अपनी रक्षा आपूर्ति के लिए अब भी बहुत हद तक रूस पर निर्भर है और जंग किसी दूसरे के भरोसे नहीं लड़ी जाती है.

ट्रंप ने पिछले साल ही भारत को डेड इकोनॉमी कहा था. ट्रंप का दूसरा कार्यकाल भारत के लिए काफ़ी मुश्किल भरा रहा है जबकि चीन के मामले में उनकी उदारता साफ़ी दिखी है. पाकिस्तान को लेकर भी ट्रंप का रुख़ भारत के पक्ष में नहीं है.

एस जयशंकर ने अपनी किताब ‘द इंडिया वे’ में लिखा है कि चीन बिना कोई युद्ध लड़े कई युद्ध जीत चुका है और अमेरिका बिना कोई युद्ध जीते कई युद्ध लड़ता रहा है.

हालांकि अमेरिकी विश्लेषकों को अब भी लगता है कि ट्रंप की सख़्त नीतियों के बावजूद भारत को चीन पर भरोसा नहीं करना चाहिए.

जेम्स क्रैबट्री अमेरिकी पत्रिका फॉरेन पॉलिसी के कॉलमनिस्ट हैं.

जेम्स ने पिछले साल 27 अगस्त को फॉरेन पॉलिसी में ‘भारत को क्यों चीन और रूस के झांसे में नहीं आना चाहिए’ शीर्षक से एक आर्टिकल लिखा था.

जेम्स क्रैबट्री का मानना है कि ट्रंप भारत के प्रति पिछले दो दशक की नीतियां बदल रहे हैं. जेम्स ने लिखा था, ”पिछले दो दशकों से अमेरिका की सोच रही है कि भारत का उभार अमेरिका की लंबी अवधि के हित के हक़ में है. ट्रंप ने इस नीति को झटके में पीछे छोड़ दिया है और तत्काल फ़ायदे के लिए ट्रेड डील पर ज़ोर दे रहे हैं. यह नीति ख़ुद को नुक़सान पहुँचाने वाली है क्योंकि चीन का सामना करने के लिए भारत की भूमिका अहम है.”

जेम्स मानते हैं कि भारत को इस मुश्किल घड़ी में अपने कंधे पर कुछ ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए. जेम्स ने लिखा था, ”भारत मल्टी-अलाइनमेंट यानी सभी गुटों के साथ रहने की नीति पर चलता है. यानी पश्चिम के साझेदारों के साथ भी अच्छे संबंध रखने हैं और साथ में पुतिन से भी रिश्तों में भरोसा बनाए रखना है. भारत ईरान से भी दूर नहीं होना चाहता है. बाइडन प्रशासन में अमेरिका ने भारत की इस नीति को बर्दाश्त किया और उसकी रणनीतिक अहमियत को स्वीकार किया था. लेकिन ट्रंप ने इस नीति को छोड़ दिया.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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