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पिछले कुछ हफ़्तों में भारत ने एक ऐसा आंदोलन देखा जिसमें हज़ारों युवा अपनी मांगों के साथ सड़कों पर नज़र आए. मगर सड़कों पर सिर्फ़ स्टूडेंट्स ही नहीं थे. उनके साथ अभिभावक भी थे और टीचर भी.
धीरे-धीरे समाज के अलग-अलग वर्ग के लोग भी इस आंदोलन से जुड़ते चले गए और इसका चेहरा बनी सीजेपी यानी कॉकरोच जनता पार्टी.
सीजेपी के साथ सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी जुड़े. उनकी मांगें साफ़ थीं- परीक्षाओं के पेपर (प्रश्नपत्र) लीक रुकने चाहिए, पेपर लीक में पाए गए दोषियों को सज़ा मिलनी चाहिए, परीक्षा व्यवस्था में सुधार हो और इसकी जवाबदेही तय की जाए.
आंदोलन बड़ा होता देखकर सरकार ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत की और फिर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा.
सरकार ने परीक्षा व्यवस्था में सुधारों का भरोसा दिया और संसद ने पेपर लीक को रोकने के लिए नया क़ानून भी पास कर दिया. सरकार का दावा है कि यह ज़्यादा सख़्त क़ानून होगा.
इन सब बातों पर गौर करने से पहली नज़र में ऐसा लगता है कि युवाओं का यह आंदोलन सफल रहा… सरकार ने कदम उठाए और मामला यहीं ख़त्म हो जाना चाहिए.
लेकिन क्या सचमुच ऐसा है? क्योंकि विपक्षी दलों की ओर से कई सवाल खड़े किए जा रहे हैं कि क्या सिर्फ़ सज़ा बढ़ा देने से पेपर लीक रुक जाएंगे.
अगर साल 2024 में भी क़ानून था और उसके बाद भी पेपर लीक हुए तो क्या 2026 में ज़्यादा कड़ा क़ानून बना देने से समस्या ख़त्म हो जाएगी? क्या केवल क़ानून बना देने से अपराध रुक सकता है?
कॉकरोच जनता पार्टी का कहना है कि आंदोलन इसलिए नहीं हुआ था कि केवल क़ानून और सख़्त हो जाए, आंदोलन इसलिए हुआ था कि व्यवस्था बदले.
वहीं विपक्ष पूछ रहा है कि अगर बार-बार पेपर लीक हो रहे थे तो इसकी राजनीतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या सिर्फ़ नए कानून बना देने से सरकार की जवाबदेही ख़त्म हो जाती है?
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बात यहीं ख़त्म नहीं हो जाती है. सीजेपी के आंदोलन ख़त्म करने पर भी कई लोगों ने सवाल उठाए.
कुछ छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता पूछ रहे हैं कि क्या आंदोलन बहुत जल्दी ख़त्म कर दिया गया और सरकार के वादों पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा कर लिया गया? क्या ज़मीन पर सुधार लागू होने का इंतज़ार करना चाहिए था?
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के साप्ताहिक कार्यक्रम, ‘द लेंस’ में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़म मुकेश शर्मा ने इन्हीं मुद्दों पर बात की.
कार्यक्रम में सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका, द मोजो स्टोरी की एडिटर बरखा दत्त और द ट्रिब्यून की एसोसिएट एडिटर अदिति टंडन ने भाग लेकर अपने विचार रखे.
‘सरकार समस्या की वजहों पर बात नहीं कर रही’
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सरकार पेपर लीक रोकने के लिए पारित किए गए नए क़ानून को ऐतिहासिक बता रही है.
इस पर सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने कहा, “सबसे पहले अच्छी बात यह है कि सरकार और पूरा सिस्टम अब देश के युवाओं के मुद्दों को और पेपर लीक की समस्या को मान रही है. इन पर संसद में चर्चा हो रही है.”
“लेकिन हमारा आधिकारिक बयान यही है कि आप पेपर लीक होने के बाद की बात कर रहे हैं. इसमें सज़ा, ज़ुर्माना और फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट की बात की जा रही है, लेकिन पेपर लीक रोकने के लिए क्या कर रहे हैं, सरकार के विधेयक में इस पर कोई ख़ास बात नहीं की गई है.”
आशुतोष रांका ने कहा कि सरकार ने परीक्षा कराने के बुनियादी ढांचे की बात नहीं की. न ही स्टूडेंट्स के अधिकारों की बात की गई. इसमें ऑडिटिंग, डिजिटल सिक्योरिटी, ट्रेनिंग, परीक्षा के शेड्यूल और जवाबदेही की बात नहीं की गई है.
साथ ही सीजेपी के प्रवक्ता ने कहा कि सरकार सिलेबस और उसकी पारदर्शिता या कोचिंग सेंटर्स की भूमिका पर बात नहीं कर रही.
उनका कहना है कि सरकार नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) या एसएससी जैसी संस्थाओं में सुधार की बात नहीं कर रही और जब तक पेपर लीक रोकने की बात नहीं होगी तब तक पेपर लीक होते रहेंगे.
यानी सीजेपी का मानना है कि सरकार को ढांचागत समस्याओं पर बात करनी पड़ेगी और चोट लगने के बाद मरहम लगाने से बेहतर है कि चोट न लगे, इस पर ध्यान देना ज़रूरी है.
इन असहमतियों के बाद सीजेपी का अगला कदम क्या हो सकता है?
आशुतोष रांका ने बताया, “फ़िलहाल हमारी प्राथमिकता अपनी पुरानी मांगों को पूरा कराने की है, जिस पर 25 जुलाई को सरकार के साथ बातचीत के बाद सहमति बनी थी.”
“यानी प्रदर्शनकारियों पर दिल्ली और बीजेपी शासित राज्यों में की गई एफ़आईआर वापस ली जाए. जिन्हें गिरफ़्तार किया गया है, उन्हें छोड़ा जाए. सरकार की तरफ से उन मुद्दों पर अभी तक लिखित में कोई राज़ीनामा नहीं आया है “
उन्होंने कहा कि अगर सरकार की तरफ से जल्द ही लिखित राज़ीनामा नहीं आता है तो वे सरकार को इसकी छूट नहीं देंगे कि किसी भी प्रदर्शनकारी स्टूडेंट को परेशान किया जाए. इसके लिए वे फिर से दिल्ली में प्रदर्शन करने के लिए मजबूर होंगे.
गृह मंत्री अमित शाह की भूमिका

इस बीच स्टूडेंट्स पर पुलिस की कार्रवाई को लेकर संसद में लगातार सवाल पूछे जा रहे हैं और कांग्रेस पार्टी इसके लिए गृह मंत्री अमित शाह को ज़िम्मेदार ठहरा रही है.
कांग्रेस ने इसके लिए अमित शाह के इस्तीफ़े की मांग भी की है. संसद में गृह मंत्री की ग़ैर मौजूदगी पर भी कांग्रेस पार्टी ने सवाल खड़े किए हैं.
आशुतोष रांका का कहना है, “दिल्ली पुलिस गृह मंत्रालय के अधीन आती है इसलिए सीधी ज़िम्मेदारी गृह मंत्री की ही है. बच्चों पर पैलेट गन का इस्तेमाल किया गया, जिसके स्पष्ट सबूत अब मीडिया में भी आ गए हैं. बच्चों को जिस तरह से पीटा गया, उन्हें प्रताड़ित किया गया, सड़कों पर घसीटा गया, उनके सिर फ़ोड़े गए, वह सबके सामने है. इसलिए गृह मंत्री को जवाब देना होगा.”
आशुतोष रांका ने कहा, “अगर यह सब गृह मंत्री के इशारे पर हुआ तो उनसे भी जवाब मांगा जाएगा. ज़रूरत पड़ी तो उनसे भी इस्तीफ़ा मांगा जाएगा.”
उन्होंने बताया, “हम लोग पुलिस के अत्याचार के सारे सबूत इकट्ठा कर रहे हैं. इसके लिए एक पोर्टल भी शुरू किया है. जिस-जिस पुलिस वाले ने मर्यादाएं लांघी हैं उन सबको अदालत तक लाएंगे. इसके लिए हमने देश के सबसे अच्छे वकीलों को रखा है.”
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‘द ट्रिब्यून’ की एसोसिएट एडिटर अदिति टंडन ने कहा, “हम सब जानते हैं कि यह एक ताक़तवर सरकार है. इस सरकार में लचीलापन बहुत नहीं दिखाई देता. लेकिन सरकार की अपनी इंटेलिजेंस एजेंसियाँ होती हैं. उनको अपना भी फ़ीडबैक मिला होगा.”
“मेरे हिसाब से सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से उठाना एक टर्निंग प्वॉइंट था. फिर सबने देखा कि ‘चलो संसद’ मार्च के दिन क्या हुआ. ज़ाहिर सी बात है कि सरकार इसके लिए तैयार नहीं थी और जब तक कि सरकार ने समझा कि यह बहुत बड़ा आंदोलन बनने वाला है, तब सरकार इससे बाहर निकलने के लिए रणनीति बनाने लगी और सीजेपी के साथ बातचीत शुरू हुई.”
उनका कहना है, “एक बात हम लोग भूल गए और वह है- मोहन भागवत का बयान. पहली बार बीजेपी के मार्गदर्शक मंडल में से किसी ने आवाज़ उठाई. जबकि बीजेपी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने सार्वजनिक तौर पर एक्स पर पोस्ट कर सरकार को चेताया.”

बीजेपी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा, “देश के अलग-अलग हिस्सों से आए स्टूडेंट्स को कई दिनों से नई दिल्ली की सड़कों पर प्रदर्शन करते देखना बेहद दुखद है.”
उन्होंने कहा कि परीक्षा व्यवस्था को लेकर स्टूडेंट्स की चिंताएं जायज़ हैं और उनका समाधान संवेदनशीलता के साथ निकालने की ज़रूरत है.
अदिति टंडन कहती हैं, “आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हैदराबाद में अपने वक्तव्य में कहा कि जेन ज़ी ऐसी पीढ़ी है जिसके साथ आपको प्यार से बात करनी होगी. उन पर आप अपने विचार नहीं थोप सकते, उन्हें अपने सांचे में नहीं ढाल सकते.”
“वह अपने अभिभावकों से भी सवाल करती है और व्यवस्था से भी. वह विपक्ष से भी सवाल कर रही है. इसलिए आपको कम्युनिकेशन का तरीक़ा बदलना होगा. उनके पुराने ढर्रे पर बात नहीं की जा सकती है.”
क्या सीजेपी ने आंदोलन ख़त्म करने में जल्दबाज़ी की

वरिष्ठ पत्रकार और ‘द मोजो स्टोरी’ की संपादक बरखा दत्त कहती हैं, “कांग्रेस ने या राहुल गांधी ने कोशिश की है, लेकिन मुझे लगता है कि इस आंदोलन का भाव सीजेपी के पक्ष में रहा है. हालांकि राजनीति में कोई चीज़ स्थायी नहीं होती है.”
वह आगे कहती हैं, “यह तो मानना ही होगा कि इस आंदोलन की वजह से मोदी सरकार को एक झटका लगा है. यह कहा जाता था मोदी सरकार दबाव में फ़ैसले नहीं लेती है. लेकिन अब ख़ुद प्रधानमंत्री के इंस्टाग्राम पर वीडियो आ रहे हैं. सरकार को मिली इस चुनौती का फ़ायदा कांग्रेस और विपक्ष को होगा.”
हालांकि कुछ स्टूडेंट्स और विश्लेषक मानते हैं कि सिर्फ़ सरकार पर भरोसा करके शायद सीजेपी ने आंदोलन ख़त्म करने में जल्दबाज़ी कर दी और इसके लिए नतीजों का इंतज़ार नहीं किया गया.

आशुतोष रांका ने कहा, “धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा एक ठोस नतीजा था. 12 साल में इस देश ने किसी भी मंत्री का इस तरह इस्तीफ़ा नहीं देखा था. दो महीने पुराने आंदोलन ने जो हासिल किया, मुझे लगता है कि उसने बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल की.”
“दूसरी बात यह भी है कि अगर सरकार के वरिष्ठ मंत्री सबके सामने आकर बोल रहे हैं कि हमने प्रदर्शनकारियों की सभी मांगें मान ली हैं और अब सरकार अपनी बात का सम्मान नहीं रखती है तो आप सोचिए यह कितनी बड़ी बात होगी. फिर तो केंद्र सरकार की किसी बात को कोई महत्व ही नहीं बचेगा और इस सरकार पर भरोसा ही नहीं किया जा सकता है.”
हालांकि बरखा दत्त इस बात से असहमत दिखती हैं कि सीजेपी आंदोलन ख़त्म करने में जल्दबाज़ी कर दी. उनका मानना है कि यह उस समय के हिसाब से सही फ़ैसला था.
बरखा दत्त ने कहा, “धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की घोषणा के बाद शायद सीजेपी के पास कोई मज़बूत वजह नहीं बचती कि वह अपना प्रदर्शन जारी रखे. फिर शायद लोग भी कहने लगते कि सबसे बड़ी मांग मान ली गई फिर भी ये अड़े हुए हैं.”
क्या युवाओं से पीएम मोदी और बीजेपी की दूरी बन गई
शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफ़ा देने के बाद जब धर्मेंद्र प्रधान संसद पहुंचे तो एनडीए की तरफ से उनके समर्थन में नारे लगाए गए, कई नेताओं ने उनकी तारीफ़ों के पुल बांधे.
तो क्या उनका इस्तीफ़ा सीजेपी के लिए महज़ एक सांकेतिक जीत थी और व्यवस्था वैसी ही चलती रहेगी, जैसी पहले चल रही थी?
आशुतोष ने कहा, “न केवल जंतर-मंतर से सीजेपी की, बल्कि देश भर में सड़कों पर उतरे युवाओं की एक ही मांग थी, धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा. इसलिए इसे सांकेतिक जीत कहकर युवाओं को संघर्ष को छोटा नहीं किया जाना चाहिए.”
बीजेपी सांसद कंगना रनौत ने सीजेपी के एक प्रवक्ता और जेन ज़ी पर जो टिप्पणी की, उसमें कॉकरोच जनता पार्टी बीजेपी से किस तरह के कमिटमेंट की उम्मीद कर रही है?
आशुतोष रांका कहते हैं, “अहंकार से किसी का भला नहीं हुआ है. अहंकार ने अच्छे-अच्छों को चकनाचूर किया है. बीजेपी को पिछले दो महीने में जो चीज़ सीखनी चाहिए वह है उदारता. थोड़ा सा इस देश की जनता के प्रति झुकिए, उनकी बात सुनिए.”
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SOURCE : BBC NEWS




