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‘टैरिफ बम’ से थमेगी रूस-यूक्रेन जंग? UNGA में ट्रंप ने खोले पत्ते, भारत के लिए टेंशन की बात

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Source :- LIVE HINDUSTAN

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को कहा कि जरूरत पड़ी तो वे रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म करने के लिए नए कानून के तहत मिली बड़ी टैरिफ लगाने की ताकत का इस्तेमाल करेंगे।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार ( 22 सितंबर) को संयुक्त राष्ट्र महासभा ( UNGA ) के 81वें सत्र में कहा कि जरूरत पड़ी तो वे रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म करने के लिए नए कानून के तहत मिली बड़ी टैरिफ लगाने की ताकत का इस्तेमाल करेंगे। उन्होंने कहा कि इस लड़ाई में हर महीने हजारों लोग मारे जा रहे हैं और अब इसे रोकने का समय आ गया है। ट्रंप का यह बयान उस समय आया जब रूसी और यूक्रेनी अधिकारी मौजूद थे, जिनमें यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की भी शामिल हैं। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका रूस और यूक्रेन, दोनों के नेताओं के साथ काम कर रहा है और यह युद्ध लोगों की सोच से ज्यादा तेजी से खत्म हो सकता है।

पिछले हफ्ते साइन हुआ नया कानून

बता दें कि ट्रंप ने पिछले शुक्रवार (18 सितंबर) को ‘लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ पर दस्तखत किए थे। यह कानून कांग्रेस से पास होने के बाद राष्ट्रपति के पास गया था। सीनेट में यह 86 के मुकाबले 11 वोट से पास हुआ था। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में 262 के मुकाबले 159 वोट से मंजूरी मिली थी। कानून का नाम दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम के सम्मान में रखा गया है। ग्राहम का जुलाई 2026 को निधन हो गया था। वे लंबे समय से रूस पर सख्त प्रतिबंध लगाने की वकालत करते रहे थे।

ट्रंप ने यूएन में कहा कि पिछले हफ्ते सीनेटर लिंडसे ग्राहम के सम्मान में मैंने कांग्रेस द्वारा पारित एक नए और ताकतवर कानून पर दस्तखत किए। इससे मुझे बहुत बड़ी नई टैरिफ लगाने की ताकत मिली है। जरूरत पड़ी तो मैं इसका इस्तेमाल करूंगा। अब हत्या रोकने का समय आ गया है। उन्होंने युद्ध को ‘खतरनाक’ और ‘विनाशकारी’ बताया और कहा कि हर महीने हजारों लोग, खासकर सैनिक मारे जा रहे हैं।

क्या कहता है कानून?

इस कानून का मुख्य मकसद रूस की ऊर्जा आमदनी पर दबाव डालना है। अमेरिका का कहना है कि रूस से कच्चा तेल और गैस खरीदने वाला व्यापार यूक्रेन युद्ध के लिए पैसे का बड़ा स्रोत रहा है। कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को अधिकार देता है कि वे रूस से तेल और गैस खरीदने वाले शीर्ष पांच देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगा सकें। चीन और भारत इस सूची में प्रमुख माने जाते हैं, क्योंकि दोनों रूस से बड़ी मात्रा में सस्ता तेल खरीदते हैं।

कानून के तहत अमेरिका 30 दिन के अंदर उन देशों की पहचान कर सकता है जो पिछले 12 महीनों में रूस से सबसे ज्यादा तेल या गैस खरीदते रहे और उसके बाद भी खरीद जारी रखते हैं। सूची हर 180 दिन में दोबारा देखी जा सकती है। गैस खरीद पर कुछ छूट भी है। अगर किसी देश की रूसी गैस खरीद रूस के कुल गैस निर्यात का 15 प्रतिशत से कम हो और उसने खरीद घटाने के कदम उठाए हों, तो उस आधार पर टैरिफ नहीं लगेगा। लेकिन तेल खरीद पर यह छूट लागू नहीं होती।

इस कानून में कुछ छूट भी दी गई हैं। अमेरिका अपने परमाणु रिएक्टर और मेडिकल आइसोटोप की जरूरत के लिए रूसी यूरेनियम खरीद सकता है। अंतरिक्ष क्षेत्र में अमेरिका-रूस सहयोग वाली गतिविधियां भी छूट में रखी गई हैं। कानून में ईरान पर मौजूदा प्रतिबंधों को भी बढ़ाया गया है।

भारत का रुख साफ

भारत ने कहा है कि वह अपने 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। रूस से जुड़े अमेरिकी प्रतिबंधों के जवाब में भारत अलग-अलग स्रोतों से तेल खरीदना जारी रखेगा। भारत का तर्क है कि उसकी ऊर्जा जरूरतें बहुत बड़ी हैं और सस्ते तेल से महंगाई और आयात बिल पर काबू रखने में मदद मिलती है। युद्ध शुरू होने के बाद भारत रूस से तेल खरीद बढ़ाता रहा है। चीन के बाद भारत रूसी कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार माना जाता है।

भारत पहले भी कह चुका है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा या व्यापार हितों से समझौता नहीं करेगा। नई दिल्ली वाशिंगटन के साथ इस कानून के असर पर बात भी कर चुकी है। कानून अपने आप भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ नहीं लगाता। फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति के हाथ में है कि वे इसे कब और कितना इस्तेमाल करते हैं।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN