Source :- BBC INDIA

भारत की 2001 की जनगणना को चिह्नित करने के लिए जारी किए गए इस स्मारक टिकट में चार लोगों का परिवार दिखाया गया था, जिसके नीचे नारा लिखा था - 'जन-केंद्रित'. इसके पहले दिन के कवर ने भारत की विविधता को एक रंगीन भीड़ के दृश्य से मनाया, जबकि उसके डाक-छाप में पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को हाथों में हाथ डाले अर्धवृत्त में खड़े दिखाया गया - यह राष्ट्र का प्रतीकात्मक चित्र था, जो खुद को गिन रहा था.

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स्मार्टफोन और सरकारी ऐप्स आने से बहुत पहले, भारत ने लोगों को दुनिया की सबसे बड़ी सांख्यिकीय कवायदों में से एक- जनगणना- में शामिल करने के लिए अपने विशाल डाक नेटवर्क का इस्तेमाल किया था.

अब जबकि भारत अपनी 16वीं जनगणना की तैयारी कर रहा है, जो आज़ादी के बाद आठवीं होगी, एक नई प्रदर्शनी उस भूली-बिसरी कहानी को फिर से सामने ला रही है.

इसमें टिकटों, डाक-छापों (पोस्ट मार्क्स) और चिट्ठियों के ज़रिए दिखाया गया है कि कैसे नागरिकों को राष्ट्रीय जनगणना में भाग लेने के लिए प्रेरित किया गया था.

इस प्रदर्शनी को बेंगलुरु की अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर विकास कुमार ने तैयार किया है. प्रदर्शनी बताती है कि आज़ादी के बाद के दशकों में भारत की डाक व्यवस्था कैसे अप्रत्याशित रूप से राष्ट्र-निर्माण का माध्यम बन गई.

सबसे बड़ी चिंता थी भरोसे की

जनवरी 1951 में नंदीकोटकुर से भेजा गया  एक लिफ़ाफ़ा कुछ दिन बाद मद्रास (अब चेन्नई) पहुँचा. इसमें स्वतंत्रता के बाद भारत की पहली जनगणना को बढ़ावा देने वाले शुरुआती द्विभाषी डाक-छापों में से एक था. काले रंग का यह चित्रात्मक टिकट- जिसमें तीन लोगों का परिवार दिखाया गया था और हिंदी और अंग्रेज़ी में 'भारत की जनगणना, फरवरी 1951' लिखा था. यह उस दौर का व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाने वाला जनगणना डाक-छाप बन गया.

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आजाद भारत को तुरंत भरोसेमंद जनसांख्यिकीय आँकड़ों की ज़रूरत थी, ताकि सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार पर आधारित चुनाव कराए जा सकें और बेहतर अर्थव्यवस्था के लिए योजनाएं बनाई जा सकें.

जनगणना को नए गणराज्य की राजनीतिक अर्थव्यवस्था का इतना अहम हिस्सा माना गया था कि संविधान तैयार होने से पहले ही 1948 में संविधान सभा ने जनगणना अधिनियम पारित कर दिया.

लेकिन सरकार के सामने दो तात्कालिक चुनौतियाँ थीं: लोगों को जनगणना में भाग लेने के लिए कैसे राज़ी किया जाए, और विशाल, ग़रीब और मुख्यतः ग्रामीण देश में गणनाकर्ताओं और जनगणना अधिकारियों के बीच संवाद कैसे बनाए रखा जाए.

सबसे बड़ी चिंता भरोसे की थी. औपनिवेशिक दौर की 1931 और 1941 की जनगणनाओं का देश के कुछ हिस्सों में बहिष्कार हुआ था. वहीं 1941 में पंजाब और बंगाल की जनगणना पर साम्प्रदायिक हेरफेर के आरोप लगे थे. इसलिए स्वतंत्र भारत की पहली जनगणना की वैधता के लिए जनसंपर्क बेहद अहम हो गया.

यहीं पर डाकखाने (पोस्ट ऑफिस) की भूमिका शुरू हुई.

जनसंदेश पहुँचाने का आदर्श माध्यम

जनवरी 1961 में असम के भीतर भेजे गए इस इनलैंड लेटर कार्ड पर जनगणना का पोस्ट-मार्क था, जिसमें भारतीयों से अपील की गई थी: 'खुद को और परिवार को गिनवाइए'- और दोस्तों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित कीजिए. यह एक राष्ट्रीय डाक अभियान का हिस्सा था, जिसने रोज़मर्रा की चिट्ठियों को जनसंपर्क और जन-जागरण का औज़ार बना दिया.

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कुछ दशक पहले तक डाक विभाग भारतीय राज्य के पास उपलब्ध सबसे बड़ा एकीकृत संचार नेटवर्क था.

आज़ादी के बाद डाक व्यवस्था का विस्तार ज़्यादातर अन्य सार्वजनिक नेटवर्कों के मुक़ाबले तेज़ हुआ, जिनमें बैंकिंग भी शामिल थी. 1968 तक, एक लाख से अधिक डाकघर रोज़ाना तीन लाख गाँवों में चिट्ठियां पहुँचाते थे और हफ़्ते में एक बार दूसरे तीन लाख गाँवों तक.

कुमार के शोध से पता चलता है कि भारतीय राज्य कभी नागरिकों से कितने अलग तरीक़े से संवाद करता था.

1951 में हुई आज़ादी के बाद की पहली जनगणना से पहले सरकार ने पूरे देश में पहुंचने वाली चिट्ठियों पर द्विभाषी चित्रात्मक डाक छाप (पोस्टमार्क) का इस्तेमाल किया.

इस छाप में तीन लोगों का परिवार दिखाया गया था, जिसके चारों ओर हिंदी और अंग्रेज़ी में ‘भारत की जनगणना’ लिखा था.

यह अभियान सावधानी से उस देश के लिए तैयार किया गया था जहाँ साक्षरता दर बहुत कम थी. गाँवों में डाकिया अक्सर पाठक, लेखक और अनौपचारिक सरकारी मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे. इसके चलते डाक नेटवर्क जनसंदेश पहुँचाने का आदर्श माध्यम बन गया.

अपने दौर की चिंताओं के प्रतीक

फ़रवरी 2001 में दौसा से जयपुर भेजे गए इस पोस्टकार्ड पर हिंदी में जनगणना का पोस्ट-मार्क था, जिसमें भारतीयों से अपील की गई थी कि वे अपने और अपने परिवार के विवरण 'बिना किसी झिझक' साझा करें. यह दिखाता है कि जनगणना केवल लोगों को गिनने पर ही नहीं, बल्कि उन्हें इतना भरोसा दिलाने पर भी निर्भर थी कि वे अपनी जानकारी राज्य को सौंपने के लिए तैयार हों.

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आने वाले दशकों में यह संदेश देश के साथ-साथ बदलता गया.

1961 में डाक-छापों ने भारतीयों से अपील की: “ख़ुद की और पूरे परिवार को गणना करवाइए” और “अपने दोस्तों से भी ऐसा करने को कहिए.”

1971 में, स्मारक टिकटों ने जनगणना को “दुनिया के सबसे बड़े प्रशासनिक अभियानों में से एक” के रूप में मनाया, और गर्व से बताया कि अब जनसंख्या आँकड़े इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटरों से संसाधित किए जा रहे हैं.

डाक सामग्री यह भी दिखाती है कि सरकारें जनगणना को खुद कैसे देखती थीं.

साल 2000 के विज्ञापनों में इसे ‘राष्ट्र का आईना’ और ‘राष्ट्र का सामूहिक फ़ोटो’ कहा गया- यानी जनगणना को महज़ नौकरशाही की एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामूहिक आत्म-चित्र के रूप में पेश किया गया.

बाद की तस्वीरों में गिनती को जनसंख्या नियंत्रण से जोड़ना बढ़ता गया, जिसमें दो बच्चों के मानक को प्रमुखता से दिखाया गया, यह उस दौर की चिंताओं का प्रतिबिंब था.

1971 में जनगणना की शताब्दी मनाने के लिए तीन मिलियन स्मारक टिकट जारी किए गए थे. इनमें 100 संख्या के भीतर उकेरे गए चेहरों के ज़रिए देश की विविधता को दिखाया गया. इसके पहले दिन के कवर में जनगणना की तस्वीरों को उन नारेदार पोस्ट-मार्क्स के साथ जोड़ा गया था, जो भारतीयों से दुनिया की सबसे बड़ी गिनती अभियानों में से एक में भाग लेने की अपील कर रहे थे

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कुमार के लिए ये नाज़ुक डाक-नमूने महज़ नौकरशाही इतिहास से कहीं ज़्यादा हैं.

ये बताते हैं कि भारतीय राज्य ने रोज़मर्रा के संवाद के ज़रिए वैधता और भरोसा बनाने की कोशिश की, और कैसे जनगणना विकास, विविधता और राष्ट्रीय पहचान के विचारों से जुड़ गई.

यह भरोसे का सवाल आज भी उतना ही अहम है.

सिर्फ़ तकनीक ही भरोसेमंद आँकड़ों की गारंटी नहीं

2011 की जनगणना के लिए जारी किए गए इस स्मारक टिकट में परिवारों को हाथों में हाथ डाले दिखाया गया था, साथ ही एक गणनाकर्ता और जनगणना का प्रतीक भी था. इसके पहले दिन के कवर में भारत का पिक्सेलयुक्त नक्शा था, जिस पर जनगणना के चिन्ह वाला कैंसलेशन मार्क छपा था. यह उस देश का प्रतीक था जो गिनती के डिजिटल युग में प्रवेश कर रहा था.

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डिजिटल साधन भले ही आँकड़े जुटाने की रफ़्तार बढ़ा दें, लेकिन कुमार का कहना है कि तकनीक अकेले भरोसेमंद आँकड़ों की गारंटी नहीं दे सकती.

वह कहते हैं, “जनगणना के बारे में जागरूकता भरोसा बनाने के लिए बेहद ज़रूरी है,” और चेतावनी देते हैं कि जैसे-जैसे डाक व्यवस्था का दायरा घट रहा है, सरकार को जनता का विश्वास जीतने के नए तरीक़े खोजने होंगे.

बहरहाल, जिस जनगणना की तैयारी भारत आज कर रहा है, वह इन धुंधली पड़ चुकी डाक-निशानियों में याद की गई जनगणना से बिल्कुल अलग है.

चौंकाने वाला पैमाना

राजस्थान के भीलवाड़ा ज़िले में एक पर्यवेक्षक ने 23 फ़रवरी 1970 को यह पूर्व-मुद्रित पोस्टकार्ड भेजा था, ताकि 1971 की जनगणना के लिए नक़्शा-निर्माण, मकानों की नंबरिंग और गणना कार्य की निगरानी की जा सके.

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दुनिया के सबसे ज़्यादा आबादी वाले देश में नई जनगणना को नीति-निर्माण, कल्याणकारी योजनाओं की डिलीवरी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए बेहद अहम माना जा रहा है.

इसमें दशकों बाद पहली बार जाति का आँकड़ा भी जुटाया जाएगा. यह एक राजनीतिक रूप से संवेदनशील प्रक्रिया है, क्योंकि भारत में जाति अब भी सामाजिक और आर्थिक जीवन को आकार देती है.

इसका पैमाना चौंकाने वाला है: यह कवायद 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों, 7,000 से अधिक उप-ज़िलों, 9,700 से ज़्यादा कस्बों और लगभग 6,40,000 गाँवों में की जाएगी.

लाखों घरों का सर्वे गणनाकर्ता और पर्यवेक्षक करेंगे- जो आमतौर पर शिक्षक, स्थानीय अधिकारी और सरकारी कर्मचारी होते हैं.

भारत की 2001 की जनगणना से पहले जारी किए गए पोस्टकार्डों पर 13 भाषाओं में छपा नारा था - 'विकास की मंज़िल - जनगणना'. यह दिखाता है कि इस कवायद को राष्ट्र-निर्माण और तरक़्क़ी के केंद्र में रखकर पेश किया गया था

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मूल चुनौती अब भी वही

'राष्ट्र की सामूहिक तस्वीर': 2001 की जनगणना से पहले जारी किए गए इन बहुभाषी पोस्टकार्ड विज्ञापनों ने पूरे भारत में जनगणना का संदेश पहुँचाया. यह हिंदी-अंग्रेज़ी संस्करण जनवरी 2001 का है

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लेकिन एक चीज़ बुनियादी तौर पर बदल गई है. पहली बार जनगणना डिजिटल रूप से होगी, जिसमें गणनाकर्ता मोबाइल ऐप्स का इस्तेमाल कर आँकड़े तुरंत दर्ज और अपलोड करेंगे.

लिफ़ाफ़ों पर परिवार की आकृति वाले डाक-छाप से लेकर स्मार्टफ़ोन से तुरंत अपलोड किए गए आँकड़ों तक, जनगणना ने लंबा सफ़र तय किया है.

2001/राष्ट्र का आईना 'जनगणना': अक्टूबर 2000 में, 2001 की जनगणना के घरेलू चरण से पहले, यह जनगणना विज्ञापन पोस्टकार्डों पर छपा था. ये पोस्टकार्ड 13 भाषाओं में जारी किए गए थे

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हालांकि जैसा कि प्रदर्शनी बताती है, मूल चुनौती वही है: एक अरब से ज़्यादा लोगों को इतना भरोसा दिलाना कि वे अपना नाम राष्ट्र की कहानी में दर्ज करवाने के लिए तैयार हों.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS