Home National news hindi नेपाल को ‘समय पर अलर्ट ना भेजने’ के आरोप पर चीन ने...

नेपाल को ‘समय पर अलर्ट ना भेजने’ के आरोप पर चीन ने क्या जवाब दिया, दोनों देशों के बीच कैसा समन्वय है?

3
0

Source :- BBC INDIA

नेपाल

इमेज स्रोत, Getty Images

प्रकाशित

पढ़ने का समय: 8 मिनट

नेपाल के भोटेकोशी नदी में बुधवार को आई अचानक बाढ़ ने तीन ज़िलों में भारी तबाही मचाई.

इसमें अब तक160 से ज़्यादा लोगों की मौतों की पुष्टि की जा चुकी है जबकि सुरक्षा बलों के जवान और विदेशी पर्यटकों समेत बड़ी संख्या में लोग लापता हैं.

इतनी बड़ी तबाही की आशंका की जानकारी ना नेपाल और ना ही चीन की तरफ़ से दी जा सकी थी.

नेपाल और चीन के बीच मौसम संबंधी सूचनाओं के आदान-प्रदान की व्यवस्था होने के बावजूद, इस हालिया घटना के बारे में पहले से कोई जानकारी नहीं मिली थी. नेपाल के जल और मौसम विज्ञान विभाग ने यह जानकारी दी.

हालांकि नेपाल में मौजूद चीनी दूतावास ने सोशल मीडिया पर फैल रही उन वायरल ख़बरों का खंडन किया जिनमें दावा किया जा रहा है कि चीन ने नेपाल को हादसे के पारे में पूर्व चेतावनी नहीं दी जिसकी वजह से नेपाल में इतनी तबाही मची.

एक्स पर जारी एक पोस्ट में चीनी दूतावास ने इन ख़बरों को फ़ेक बताया और लिखा, “26 अगस्त को नेपाल में भूकंप या ग्लेशियर ढहने से भूकंप जैसी स्थिति बन गई जिससे भूस्खलन हो गया और कई लोगों की मौत हो गई. इसके कारण नेपाल और चीन दोनों ही तरफ़ कई लोग लापता भी हो गए.”

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

बुधवार की घटना के कुछ घंटे बाद चीन के प्रधानमंत्री ली चियांग ने तिब्बत में हुई आपदा में महत्वपूर्ण नुक़सान होने की बात कहते हुए राहत और बचाव अभियान चलाने का निर्देश दिया था.

नेपाल में बाढ़ क्यों आई, इसे लेकर मौसम विभाग भी कुछ ठोस नहीं बता रहा है.

मौसम विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक विभूति पोखरेल ने कहा था, “इस बाढ़ के कारण के बारे में हम चीनी अधिकारियों के संपर्क में हैं, लेकिन अभी तक वे भी यह नहीं बता पाए हैं कि इसकी वजह क्या है. यह भी पता नहीं है कि घटना नेपाल में हुई या तिब्बत की तरफ़.”

2016 में भी रसुवागढ़ी में भीषण बाढ़ आई थी, तब विशेषज्ञों ने कहा था कि अगर दोनों देशों के बीच समय पर सूचना का आदान-प्रदान हुआ होता तो जान-माल के नुक़सान को कम किया जा सकता था. उन्होंने सरकार से इस दिशा में ध्यान देने की अपील की थी.

नेपाल

इमेज स्रोत, Getty Images

चीन ने क्या कहा?

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

पूरे मामले पर नेपाल में चीन के दूतावास ने एक बयान जारी किया है सूचना शेयरिंग नहीं करने के आरोपों को ख़ारिज किया है.

चीनी दूतावास ने अपने बयान में कहा है, ”रसुवा-ग्यिरोंग सीमा क्षेत्र में आई अचानक बाढ़ से चीन बेहद दुखी है और वह नेपाल को हरसंभव सहायता उपलब्ध कराएगा. शुरुआती जानकारी के अनुसार, नेपाल की तरफ़ आए भूकंप के कारण हिमस्खलन और मलबे का बहाव हुआ, जिससे सीमा के दोनों ओर लोगों की मौत हुई और कई लोग लापता हैं.”

चीनी दूतावास ने कहा, ”भविष्य में हम मौसम, जल विज्ञान और भूगर्भीय जोखिमों से जुड़ी सूचनाओं का बेहतर आदान-प्रदान, ख़ासकर सीमा पार होने वाली आपदाओं के मामले समन्वय मज़बूत करेंगे. नेपाल और चीन पड़ोसी देश हैं और भौगोलिक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. इसलिए इस आपदा से सबक लेते हुए दोनों देशों को अपनी तैयारियों को मज़बूत करना चाहिए, ताकि सीमा के दोनों ओर लोगों की जान और संपत्ति की बेहतर सुरक्षा हो सके.”

नेपाल

इमेज स्रोत, Getty Images

बीबीसी के पर्यावरण संवाददाता नवीन सिंह खड़का क्या कहते हैं?

बाढ़ कहाँ से शुरू हुई, ये बड़ा सवाल है. मुझे लगता है कि नेपाल और तिब्बत के बीच कहीं कोई लोकेशन है. अब भी लोग पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं. मुझे चीन की तरफ़ से ज़्यादा कुछ पता नहीं चल रहा है. इसे मडस्लाइड भी कहा जा रहा है.

लेकिन मैं जिन ग्लेशियोलॉजिस्ट्स से संपर्क कर रहा हूँ, वो बता रहे हैं कि यह शायद कोई रॉक और आइस का एवलांच हो सकता है, जिसने नीचे आकर नदी को रोक दिया था. बाद में जब पानी बहुत बढ़ा, तब वो फट गया. लेकिन यह कन्फर्म करना बाक़ी है कि यही हुआ या नहीं.

इसमें परेशानी यह है कि अभी मॉनसून का सीजन है तो बादल काफ़ी हैं. सैटेलाइट इमेजेस क्लियर नहीं आ रहे हैं. देखना बाक़ी है कि एग्जैक्टली कहाँ है, लेकिन यह सीमावर्ती इलाक़े से आया है.”

“यह हिमालयन रेंज है. ईस्टर्न हिमालय, सेंट्रल हिमालय, वेस्टर्न में इंडिया का है, उसके बाद काराकोरम आता है. नेपाल में ईस्टर्न हिमालय और सेंट्रल हिमालय का कुछ भाग होता है और वो तिब्बत में भी फैला हुआ है.वहां 7 से 8 हज़ार मीटर ऊंचे पहाड़ हैं. वहां से बहुत सारी नदियां आती हैं.

जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर्स काफ़ी तेज़ी से पिघल रहे हैं. इसकी वजह से पहाड़ काफ़ी कमज़ोर हो रहे हैं, क्योंकि जो बर्फ़ होती थी, वो सीमेंट का काम करती थी. अब वो तेज़ी से पिघल रही है, चट्टान नीचे आ रहे हैं. इसीलिए हम इतने सारे डर्बिस फ्लो देखते हैं.

नेपाल

पहले से ही भौगोलिक स्थिति मुश्किल थी, जलवायु परिवर्तन की वजह से ये सारी जगहें काफ़ी अस्थिर हो गई हैं. और जब स्थिति अस्थिर होती है, तो चट्टान और सेडिमेंट्स नीचे आते हैं, नदियां उन्हें कुछ देर रोकती हैं, फिर वो फूट जाते हैं और नीचे आकर ये तबाही मचाते हैं.

2016 में भी ऐसी ही बाढ़ आई थी, वो दूसरी भोटेकोशी थी. वहाँ दो भोटेकोशी हैं. वो पूरब की ओर थी. चीन की तरफ़ से तब भी कोई जानकारी नहीं दी गई थी.

अभी तकरीबन 10 साल बाद जब मैं आज अधिकारियों से पूछ रहा हूँ, तो वो कहते हैं कि हमें कोई जानकारी नहीं आती है.

मैं इसकी वजह जानने की कोशिश कर रहा हूँ कि ऐसा क्यों होता है. भूगोल तो कठिन है ही, लेकिन यह भी मुश्किल सवाल है कि इतने सारे पहाड़ और ग्लेशियर्स की मॉनिटरिंग हो सकती है या नहीं? ये प्रश्न आ रहे हैं.

उससे भी महत्वपूर्ण बात है कि इस जानकारी की शेयरिंग होती है या नहीं. ट्रांस-बाउंड्री, क्रॉस-बॉर्डर, जो चीन या तिब्बत से नेपाल में आना चाहिए, फिर नेपाल से इंडिया में जाना चाहिए. यह ट्रांस-बाउंड्री कम्यूनिकेशन हो पा रहा है या नहीं? यूएन हमेशा अर्ली वार्निंग की बात कर रहा है आपदा के संदर्भ में, लेकिन यह हम यहां नहीं देख रहे हैं और यह काफ़ी चिंता का विषय है.

नेपाल

इमेज स्रोत, Getty Images

सूचना शेयरिंग क्यों नहीं?

भोटेकोशी नदी में इससे पहले आई बाढ़ के बाद ज़िला आपदा प्रबंधन समिति की ओर से तैयार रिपोर्ट में भी अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने की सिफ़ारिश की गई थी.

रिपोर्ट में कहा गया था, “चीन और नेपाल के सीमा क्षेत्र में स्थित हिम झीलों और नदियों में से ज़्यादा जोखिम वाले क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने के लिए द्विपक्षीय सहयोग किया जाना चाहिए.”

“यह प्रणाली बाढ़, हिम झील फटने या अन्य संभावित आपदाओं के बारे में पहले से जानकारी उपलब्ध कराकर जान-माल के नुक़सान को कम करने में मदद करेगी.”

रिपोर्ट के निष्कर्ष में कहा गया था कि “चीन से लगी सीमा पर मौजूद हिम झीलों और जलस्रोतों से पैदा होने वाले जोखिम को ध्यान में रखते हुए, अंतरराष्ट्रीय समन्वय पर आधारित पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करना बेहद ज़रूरी है.”

तिब्बत की तरफ़ मौसम संबंधी कोई घटना होने पर नेपाल को सूचना देने की क्या व्यवस्था है?

वरिष्ठ मौसमविद् विभूति पोखरेल ने बीबीसी नेपाली से कहा, “सूचना आने की व्यवस्था है. लेकिन अगर घटना उसी जगह हुई है, तो सवाल यह है कि क्या वहाँ भी इसकी जानकारी थी.”

उन्होंने कहा, “मौसम से जुड़ी इस बात पर भी पहले चर्चा हुई थी कि अब सूचना दी जाएगी. लेकिन सूचना देने के लिए पहले सूचना का होना भी ज़रूरी है.”

आपदा प्राधिकरण की प्रवक्ता शांति महत ने कहा कि चीन के साथ सीमा पार सूचना के आदान-प्रदान को लेकर बातचीत की जानी चाहिए.

उन्होंने कहा, “चूंकि यह घटना दूसरी तरफ़ हुई थी, इसलिए हमें बाढ़ आने के बाद ही इसके बारे में पता चला. ऐसी समस्याएं बढ़ रही हैं, इसलिए हमें लगता है कि चीन सरकार और नेपाल सरकार के बीच एक समझौता करके इस दिशा में आगे बढ़ने की ज़रूरत है.”

बुधवार की बाढ़ की घटना के कुछ घंटे बाद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा था कि बाढ़ नियंत्रण की मौजूदा स्थिति बेहद संवेदनशील चरण में है.

सीसीटीवी के मुताबिक़, राष्ट्रपति शी ने सभी क्षेत्रों और संबंधित एजेंसियों से ज़्यादा सतर्कता बरतने के साथ जोखिम और ख़तरों की पहचान कर उन्हें दूर करने के प्रयास तेज़ करने को कहा था.

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

नेपाल

इमेज स्रोत, Getty Images

सूचना के आदान-प्रदान में सरकार की भूमिका पर विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर चीन में हिमनद टूटने या किसी अन्य वजह से नेपाल में बाढ़ आने की आशंका हो तो सूचना देने की व्यवस्था के लिए नेपाल सरकार को चीनी पक्ष के साथ पहल करनी चाहिए.

पुल्चोक इंजीनियरिंग कैंपस के आपदा अध्ययन केंद्र के निदेशक वसंत अधिकारी ने बीबीसी से कहा, “सीमा पार हिमनद टूटने की जो समस्या है, उसमें नेपाल सरकार को ही चीनी सरकार के साथ सरकारी स्तर पर समन्वय करके पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करनी चाहिए और ऐसा किया जा सकता है.”

उन्होंने कहा, “अगर आधिकारिक तौर पर चीन सरकार के साथ इसे आगे बढ़ाया जाए तो मुझे लगता है कि चीन सरकार ऐसी पूर्व सूचना देने में सहयोग करेगी. अभी सूचना का आदान-प्रदान नहीं हो रहा है.”

उन्होंने कहा कि इसके लिए भू-उपग्रह के ज़रिए निगरानी केंद्र स्थापित करना होगा. चूंकि तिब्बत की तरफ़ हिमनद से पैदा होने वाली किसी समस्या का असर नेपाल पर पड़ सकता है, इसलिए नेपाल को ख़ुद इस दिशा में सक्रियता दिखानी होगी.

त्रिभुवन विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान केंद्रीय विभाग के सहायक प्रोफेसर सुदीप ठाकुर भी मानते हैं कि सीमा पार सूचना का आदान-प्रदान होने से जान-माल के बड़े नुक़सान को कम किया जा सकता है.

उन्होंने कहा, “नेपाल-चीन या नेपाल-भारत के बीच पूर्व सूचना देने की व्यवस्था अभी उतनी स्थापित नहीं हो पाई है. इसके लिए कोई स्पष्ट तंत्र ही नहीं है.”

उन्होंने कहा, “वहां (तिब्बत) सूचना एकत्र करने की व्यवस्था है. लेकिन उस जानकारी को यहां साझा करने की व्यवस्था नहीं हो पाई है.”

उन्होंने कहा कि पिछले साल मितेरी पुल बह जाने की घटना के बाद सूचना के आदान-प्रदान की व्यवस्था बनाने को लेकर सरकार ने सक्रियता नहीं दिखाई.

उन्होंने कहा, “सरकारी स्तर पर कूटनीतिक प्रयास करने की ज़रूरत है, लेकिन इस मामले में हमारी कमज़ोरी दिखाई देती है. ऐसी वैज्ञानिक जानकारी देने में उन्हें भी परेशानी नहीं होनी चाहिए. इसलिए ऐसा लगता है कि हम अपनी बात स्पष्ट रूप से उनके सामने नहीं रख पाए हैं.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट… सब एक जगह

कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.

और जानें

शॉर्ट वीडियो छोड़ें और जारी रखें

शॉर्ट वीडियो

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

  • अपनों की तलाश करते इन लोगों ने क्या कहा?

  • नेपाल में बाढ़ के बाद बुज़ुर्ग महिला को किया गया रेस्क्यू

  • नेपाल में आई भीषण बाढ़

  • नेपाल बाढ़ की ड्रोन फ़ुटेज

  • नेपाल में आई भीषण बाढ़

  • गुरुग्राम की सड़क पर हो गया गड्ढा

  • पाकिस्तान के अस्पताल में आग लगने से कई नवजातों की मौत

  • पति को अंतिम विदाई देने पहुंचीं अरुणा ईरानी

  • चीनी

  • गुरमीत राम रहीम को मिली फ़र्लो

SOURCE : BBC NEWS