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नेपाल: ग्लोबल वार्मिंग का ‘ज़िम्मेदार’ नहीं फिर भी आपदाओं का शिकार, क्या ये है वजह

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Source :- BBC INDIA

बेटे के अंतिम संस्कार के दौरान रोतीं एक महिला

इमेज स्रोत, PRAKASH MATHEMA / AFP via Getty Images

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नेपाल पर जलवायु संकट का गंभीर असर पड़ा है. वह बाढ़, भूस्खलन, जंगल की आग और सूखे जैसी घटनाओं से सबसे ज़्यादा प्रभावित देशों में शामिल है.

हालांकि नेपाल का कहना है कि वह ऐसे जलवायु संकट का शिकार है, जिसमें उसकी कोई भूमिका नहीं है.

अपने इस तर्क के समर्थन में नेपाल अक्सर वैश्विक स्तर पर कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में अपने हिस्से का ज़िक्र करता है. कुछ अध्ययनों के अनुसार यह 0.05% से भी कम है.

ग्रीनहाउस गैसें ग्लोबल वार्मिंग की मुख्य वजह हैं.

लेकिन नेपाल अक्सर विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन की वजह से सुर्खियों में रहता है. ख़ास तौर पर नेपाल-चीन के सीमावर्ती इलाक़े में अक्सर ऐसी आपदाएं आती रहती हैं.

नेपाल ख़ुद एक पहाड़ी देश है जिसकी आबादी क़रीब तीन करोड़ है. नेपाल दुनिया की दो सबसे बड़ी आबादी वाले देशों की सीमा पर बसा है. इसके उत्तर में चीन तो पूर्व, पश्चिम और दक्षिण सीमा की ओर भारत है.

बीबीसी नेपाली के संवाददाता नवीन सिंह खड़का कहते हैं, “नेपाल में एक पुरानी कहावत है कि यहां के ‘लोगों को वह ज़हर पीना पड़ता है, जो उन्होंने नहीं बनाया है.’ इस बात के पीछे उनका तर्क है कि कार्बन के वैश्विक उत्सर्जन में नेपाल का योगदान 0.05 फ़ीसदी से भी कम है.”

यानी नेपाल की ग्लोबल वार्मिंग में भूमिका नहीं के बराबर है, फिर भी उसे इसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं.

ग्रीन एनर्जी पर ज़ोर

नेपाल के रसुवा में भांगे वाटरफ़ॉल के पास मौजूद कुछ पर्यटक. यह तस्वीर 10 अगस्त, 2026 की है

इमेज स्रोत, Ambir Tolang/NurPhoto via Getty Images

नवीन सिंह खड़का बताते हैं कि पानी के प्रचुर संसाधनों के कारण नेपाल में बिजली का लगभग पूरा उत्पादन जलविद्युत (हाइड्रोइलेक्ट्रिक) से होता है, जो मूल रूप से हिमालय के ग्लेशियरों से मिलने वाले पानी पर निर्भर है.

उनका कहना है कि इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ आयात करने के मामले में भी नेपाल काफ़ी आगे है.

नेपाल सोलर और विंड एनर्जी जैसी अन्य स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन को भी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.

इसके अलावा अधिकारियों का कहना है कि नेपाल ने अपनी 46 प्रतिशत से अधिक ज़मीन को जंगलों के रूप में संरक्षित किया है, जो ‘कार्बन सिंक’ का भी काम करते हैं.

ये जंगल जलवायु संकट से निपटने की दुनिया की कोशिश में एक अहम साधन हैं.

‘कार्बन सिंक’ का मतलब ऐसी कोई भी प्राकृतिक या इंसानी व्यवस्था, जो वायुमंडल से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड गैस को अवशोषित करता हो. यानी नेपाल का दावा है कि वह वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ता नहीं है बल्कि वायुमंडल से उसे ले लेता है.

नवीन सिंह खड़का कहते हैं, “इन संदर्भों में देखें तो नेपाल बाढ़, जंगल की आग, लैंड स्लाइड या जिस हिसाब से सूखा हो रहा है, लोगों की जान जा रही है, उससे प्रभावित होता है. नेपाल के लोग कहते हैं कि यह पर्यावरण का अन्याय है, न्याय नहीं हैं.”

बार-बार आ रही आपदाएं

नेपाल की नदियां

एक तरफ नेपाल क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) के दुष्परिणामों का शिकार रहा है वहीं इसकी भोगौलिक स्थिति भी इसे हर वक़्त ख़तरे के क़रीब रखती है.

विशेषज्ञ इसके पीछे नेपाल-चीन सीमावर्ती हिमालयी क्षेत्र की भौगोलिक बनावट को भी ज़िम्मेदार ठहराते हैं. इसके अलावा ग्लेशियल झीलों की स्थितियों में परिवर्तन की वजह से इस क्षेत्र में बार-बार हादसे होते रहते हैं.

दरअसल तिब्बती क्षेत्र में कई ग्लेशियल लेक (हिमताल) हैं और नेपाल की ओर ढलानदार क्षेत्र में कई बस्तियां होने के कारण इन झीलों के फटने और हिमस्खलन की वजह से नुक़सान की आशंका बनी रहती है.

मॉनसून के दौरान भारी बारिश, ग्लेशियर में होने वाले बदलाव और हिमस्खलन, कम समय में ही बड़ी मात्रा में पानी और पत्थर-मिट्टी निचले तटीय क्षेत्रों तक पहुंचा देते हैं.

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SOURCE : BBC NEWS