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प्रयागराज छात्र आंदोलन: पुलिस ने कहा ‘गिरफ़्तार लोगों में कोई छात्र नहीं’, बीबीसी की पड़ताल में परिवारों ने दिखाए पढ़ाई के दस्तावेज़

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Source :- BBC INDIA

संदीप का परिवार

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जून में सीजेपी के बैनर तले शुरू हुआ नीट आंदोलन, जुलाई के आख़िर तक आते-आते देशव्यापी आंदोलन की शक्ल ले चुका था.

दिल्ली के बाद हमने पटना, कोलकाता, मुंबई, हैदराबाद और कई दूसरे शहरों में छात्रों को सड़कों पर उतरते देखा, उन पर पुलिस की कार्रवाई देखी और कुछ जगहों पर प्रदर्शनकारियों की तरफ़ से की गई हिंसा और उपद्रव की तस्वीरें भी.

ऐसी ही एक तस्वीर उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से तब सामने आई, जब बीते 25 जुलाई को छात्र हज़ारों की संख्या में सड़कों पर उतरे.

सुबह 11 बजे से शाम पांच बजे तक सबकुछ शांतिपूर्ण ही चल रहा था कि कुछ लोगों ने वाहनों में तोड़फोड़ करनी शुरू कर दी.

प्रदर्शन की कॉल देने वाली स्टूडेंट ऑर्गेनाइज़ेशन में से एक दिशा छात्र संगठन की अंजलि बताती हैं कि हिंसा की घटनाएं केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की पेशकश के कुछ घंटों के बाद शुरू हुईं.

वह कहती हैं, ”हमने सुबह 11 सिविल लाइंस इलाक़े में मौजूद पत्थर गिरिजाघर पर छात्रों को जुटने की कॉल दी थी. हज़ारों की संख्या में छात्र आए थे.”

“सबकुछ शांतिपूर्ण चल रहा था. पुलिस भी सहयोग कर रही थी. दोपहर ढ़ाई बजे धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की ख़बर आई. छात्र जश्न मनाने लगे और एक, दो घंटे बाद भीड़ छटनी भी शुरू हो गई.”

प्रयागराज में हिंसा

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अंजली ने कहा, “पर शाम पांच बजे सुनने को मिला कि वाहनों के साथ तोड़फोड़ की कुछ घटना हुई है. चूंकि हम वहां घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे इसलिए ये कैसे हुआ, किसने किया हमें नहीं पता. लेकिन हमारे लिए भी यह हैरान करने वाली बात थी कि उतनी भीड़ में वहां गाड़ियां पहुंचीं कैसे.”

पुलिस के मुताबिक़, कुल पांच-छह वाहनों को नुकसान पहुंचा. इनमें तीन बीजेपी के नेताओं की थीं. ये तीन नेता हैं – स्थानीय बीजेपी नेता रवींद्र जायसवाल, बांदा के पूर्व बीजेपी सांसद रमेश चंद्र द्विवेदी और मध्यप्रदेश के बीजेपी पदाधिकारी शशांक पाठक.

बीजेपी नेता रवींद्र जायसवाल ने क्या कहा

रवींद्र जायसवाल

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बीजेपी नेता रवींद्र जायसवाल ने घटना वाले दिन को याद करते हुए बताया, ”हमारी गाड़ी पर बीजेपी का झंडा लगा हुआ था. झंडे को देखकर भीड़ उग्र हो गई और हमारी गाड़ी पर बकायदा उन्होंने अटैक कर दिया.”

“मेरे अलावा बांदा के पूर्व सांसद और एक मध्यप्रदेश के हमारे पदाधिकारी की गाड़ी को नुकसान पहुंचाया गया. सांसद जी की गाड़ी तो बिल्कुल पलट दी गई. एमपी के जो हमारे नेता हैं उनकी गाड़ी में उनका पूरा परिवार सवार था.”

उन्होंने दावा किया, “मुझे भी बाहर निकालने की कोशिश कर रहे थे. पर मेरे ड्राइवर ने समझदारी से काम लिया और किसी तरह मैं जान बचाने में सफल रहा. वो छात्र नहीं, गुंडे थे. किसी ख़ास पार्टी के भेजे हुए गुंडे.”

इस घटना के बाद बीजेपी के तीनों ही नेताओं ने तीन अलग-अलग एफ़आईआर दर्ज करवाई है.

ये एफ़आईआर अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ दर्ज की गई और इसमें दंगा भड़काने, सरकारी काम में बाधा डालने, तोड़फोड़ करने और यहां तक कि हत्या के प्रयास जैसी गंभीर धाराएं लगाई गईं.

इन्हीं गंभीर धाराओं के तहत पुलिस ने 10 लोगों की गिरफ़्तारी की है.

इन 10 लोगों में शिवम कुमार यादव, अभिषेक सोनकर, अवनीश यादव, अमर यादव, कारगिल सिंह, आशीष यादव, दिलशाद, मोहम्मद सुफ़ियान ख़ान, मोहम्मद वैस और संदीप शामिल हैं.

पुलिस का दावा है कि इनमें एक हिस्ट्रीशीटर, एक फल और सब्जी विक्रेता, एक दूध विक्रेता, एक होटल संचालक, एक होटल में सफाई कर्मी और एक समाजवादी पार्टी का समर्थक था.

पुलिस ने यह भी कहा कि गिरफ़्तार किए गए 10 लोगों में कोई भी छात्र नहीं है.

प्रयागराज के डीसीपी सिटी मनीष शांडिल्य ने अपने बयान में कहा, ”ये छात्र नहीं थे और इनमें से कोई फल या सब्ज़ी बेचता है, कोई होटल में सफ़ाई करता है, एक तो इसमें से एक थाने का हिस्ट्रीशीटर भी है. तो इस तरह से इसका बैकग्राउंड है. और इनमें कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं था जो छात्र था.”

लेकिन बीबीसी हिंदी ने पुलिस के इस दावे की पड़ताल की और जो पाया वह पुलिस के दावे के ठीक उलट था.

बीबीसी की पड़ताल में क्या पता चला

संदीप का गांव

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इस पड़ताल के लिए मैं और मेरे वीडियो जर्नलिस्ट ने प्रयागराज के अलग-अलग हिस्सों में रह रहे इन दसों लोगों के परिवारों को ट्रैक करने की कोशिश की.

हम इनमें से आठ के परिवारों से मिलने में, उनसे बात करने में सफल रहे. इस बातचीत के दौरान हमने उनके बच्चों के शैक्षणिक दस्तावेज़ देखे, दूसरे उपलब्ध रिकॉर्ड खंगाले और जो पाया उसे इस कहानी में दर्ज किया.

सबसे पहले हम संदीप के पिता फूलचंद से मिले. उनके पिता से मेरी फ़ोन पर बात हुई थी. उन्होंने हमें बताया था कि उनका बेटा प्रयागराज के कटका इलाक़े में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता था.

फूलचंद ने बताया, “उसने बीएससी और एमएससी की हुई है. बीते 25 जुलाई को उसने प्रदर्शन में ज़रूर हिस्सा लिया पर हिंसा में उसकी कहीं से भी कोई भूमिका नहीं थी.”

हम संदीप के ही कमरे पर उनसे मिले. कमरे में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी संबंधित कई किताबें रखी थीं और इन पर संदीप का नाम लिखा था.

हमने उनके एकेडमिक रिकॉर्ड्स, कुछ एग्ज़ाम के एडमिट कार्ड्स भी दिखे और फिर शहर से तकरीबन 50 किलोमीटर दूर हंडिया तहसील के मुहिद्दीनपुर गांव पहुंचे. संदीप का पूरा परिवार यहीं रहता है.

उनकी मां ने हमसे कहा, ”क्या प्रदर्शन में जाने से किसी को जेल में डाल देंगे. हम लोग ग़रीब लोग हैं. इतनी मुश्किल से बच्चों को पढ़ा रहे हैं. सरकारी नौकरी की तैयारी करता है मेरा लड़का.”

“वो भी देख रहा है कि हर तरफ़ कितना भ्रष्टाचार है, इसलिए प्रदर्शन में गया. लेकिन उसने कोई हिंसा नहीं की. पुलिस ने कह दिया कि पढ़ने वाले बच्चे नहीं हैं, गुंडे हैं. अब क्या भविष्य रहेगा मेरे बच्चे का?”

पुलिस ने बताया सब्जी विक्रेता, पिता ने कहा- ‘बेटा क़ानून का छात्र’

सुफ़ियान के पिता

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इसी गांव में मोहम्मद वैस और मोहम्मद सुफ़ियान का परिवार भी रहता है. दोनोंं गिरफ़्तार लोगों में शामिल हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स में पुलिस के हवाले से लिखा गया था कि मोहम्मद सुफ़ियान अनाज और सब्ज़ियों की सप्लाई का काम करता है.

पर उनके पिता महमूद हसन ख़ान से हुई बातचीत और उनके द्वारा दिखाए गए शैक्षणिक दस्तावेज़ से पता चलता है कि सुफ़ियान एलएलबी फ़र्स्ट ईयर के छात्र हैं.

उनके पिता बताते हैं, ”बेटा 25 जुलाई वाले प्रदर्शन में इलाहाबाद गया था. घर पर किसी को बताया नहीं था कि वहां जा रहा है. अगले दिन क़रीब साढ़े नौ बजे रात में एक सादे वर्दी में आदमी आया और पूछा सुफ़ियान है?”

“सुफ़ियान बाहर ही खड़े थे, उन्होंने कहा, हम बताइए हम ही हैं. बस उसका हाथ पकड़ लिए और कहे कि चलो तुमको एसओ साहब ने बुलाया है. बताकर चले आइए कि उस दिन क्या हुआ था इलाहाबाद में, कैसे हुई थी तोड़फोड़.”

“सुफ़ियान ने कहा कि हम तो थे ही नहीं तोड़फोड़ में. तो उन्होंने कहा यही बताकर चले आओ…फिर सुफ़ियान ने कहा कि ठीक है. फिर उसे ले गए और छोड़ा नहीं, चालान कर दिया. चालान में सुफ़ियान को सब्ज़ी बेचने वाला बता दिया. जबकि मेरा बेटा एलएलबी कर रहा है.”

सुफ़ियान के पिता के मुताबिक़, वह प्रयागराज के प्रोफ़ेसर राजेंद्र सिंह यूनिवर्सिटी से क़ानून की पढ़ाई कर रहे हैं.

जिस रात उनकी गिरफ़्तारी हुई, उसी रात उनके साथी मोहम्मद वैस को भी पुलिस ने हिरासत में लिया.

25 की तारीख़ को वह सुफ़ियान के साथ ही प्रोटेस्ट में हिस्सा लेने शहर गए थे. गिरफ़्तारी के बाद से उनकी मां परेशान चल रही हैं.

वैस की मां कमरू निशा

वैस की मां रो पड़ीं और कहा, ”जिस दिन से हमारा लड़का गिरफ़्तार हुआ है, हमारा जीना हराम हो गया है. कालीन का काम करते हैं पिता इसके, मज़दूरी करते हैं, बच्चे को पढ़ाने के लिए अपने भाई के पास हमने छोड़ा था उसे.”

“हमारे पास इतनी हैसियत नहीं थी कि उसे अकेले पढ़ा पाए. पुलिस हमारे बच्चे को बस छोड़ दे. उसका भविष्य न ख़राब करे.”

वैस की मां कमरू निशा ने हमारे साथ उनके अकेडमिक रिकॉर्ड्स भी साझा किए. इन रिकॉर्ड्स के मुताबिक़ वैस भी सुफ़ियान के साथ ही एलएलबी की पढ़ाई कर रहे थे.

पर दोनों के सोशल मीडिया प्रोफ़ाइल खंगालने पर यह भी पता चलता है कि दोनों छात्र राजनीति और एक्टिविज़्म से जुड़े रहे हैं. दोनों समाजवादी पार्टी की सदस्यता भी ली हुई है.

हालांकि किसी राजनीतिक या छात्र संगठन से जुड़ा होना, अपने आप में इस बात का सबूत नहीं हो सकता कि सामने वाला छात्र नहीं है.

गिरफ़्तार लोगों की सूची में एक नाम शिवम यादव का भी है. उनके पिता धर्मराज यादव सीआरपीएफ़ में जवान हैं.

हम उनसे मुलाक़ात करने उनके गांव चकला द शेर पहुंचे, पर पता चला कि परिवार शहर में ही रहता है.

हमारी उनसे सिर्फ़ फ़ोन पर ही बात हुई. पता चला कि शिवम प्रयागराज के करछाना स्थित फूल दुलारी प्राइवेट आईटीआई कॉलेज के छात्र हैं.

परिवार ने इससे संबंधित दस्तावेज़ भी हमारे साथ साझा किए. उनके मुताबिक़, 4 अगस्त को शिवम के इंटर्नल एग्ज़ाम थे, पर जेल में होने की वजह से वह परीक्षा में शामिल नहीं हो सके.

अब परिवार इन्हीं दस्तावेज़ों के आधार पर अदालत में यह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि शिवम छात्र हैं और पुलिस का उनके बारे में किया गया दावा तथ्यों से मेल नहीं खाता.

‘भाई को बिना अरेस्ट मेमो के गिरफ़्तार किया’

स्वेताक्षी सिंह

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इसी कोशिश में स्वेताक्षी भी जुटी हैं. वह पेशे से वकील हैं और इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करती हैं. उनका आरोप है कि उनका भाई प्रदर्शन में शामिल भी नहीं था, पर पुलिस बिना किसी अरेस्ट मेमो के उसे गिरफ़्तार कर ले गई.

उनके मुताबिक़ उनका भाई सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है और पार्ट टाइम में अपने एक सीनियर के साथ काम भी करता है. प्रदर्शन वाले दिन भी वह काम के सिलसिले में ही घर से निकला था.

स्वेताक्षी सिंह कहती हैं, “सच्चाई यह है कि मेरा भाई उस घटना में शामिल ही नहीं था. वह सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है और अपने एक सीनियर के साथ पार्ट-टाइम काम करता है. उसके सीनियर नक्शे बनाते हैं और मेरा भाई उन्हें क्लाइंट तक पहुंचाने का काम करता है.”

“घटना वाले दिन भी वह इसी काम से निकला था. उस समय तक गाड़ियों में तोड़फोड़ हो चुकी थी और वहां भीड़ जमा थी. लोगों को हटाने के दौरान वह कुछ वीडियो क्लिप्स में दिखाई दे गया और पुलिस ने उसी आधार पर उसे आरोपी बना दिया.”

उन्होंने पूछा, “अगर कोई छात्र निर्दोष हो और उसने कुछ भी न किया हो, फिर भी उसे जेल भेज दिया जाए, तो मीडिया, पुलिस और समाज की नजर में वह अपराधी बन जाता है. ऐसे में जब वह जेल से बाहर आएगा तो उसकी मानसिक स्थिति क्या होगी?”

“मैंने उसके कॉलेज से दस्तावेज़ निकलवाकर पुलिस और कमिश्नर को दिए, यहां तक कि ईमेल भी किया, लेकिन अब तक न कोई जवाब मिला और न ही कोई पुलिसकर्मी जांच के लिए हमारे पास आया.”

उन्होंने कहा, “जिस तरह से ये दस के दस लोगों की छवि बनाई गई है समाज में, अब आप मुझे ये बताइए कि अगर वो बच्चा छूट के आता भी है, मान लीजिए सरकार केस ख़त्म भी कर देती है, तो क्या उसका फ़्यूचर रह जाएगा?”

25 जुलाई को प्रयागराज के सिविल लाइंस इलाक़े में छात्र प्रदर्शन के लिए इकट्ठा हुए थे

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कारगिल सिंह उर्फ़ श्वेताभ सिंह को बीजेपी के पूर्व सांसद रमेश द्विवेदी की गाड़ी के साथ तोड़फोड़ के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है.

इस एफ़आईआर के तहत दो और लोगों को गिरफ़्तार किया गया था. अवनीश यादव और अमर यादव. दोनों की उम्र 18 साल है.

अवनीश के बारे में पुलिस ने दावा किया कि वह एक होटल संचालक हैं. लेकिन उनकी मां सुनीता ने पुलिस के इस दावे को ख़ारिज करते हुए कहा कि उनका बेटा 18 साल का है और पढ़ाई कर रहा है.

परिवार ने उसकी 12वीं की मार्कशीट भी साझा की.

कुल मिलाकर दस में से छह परिवारों ने अपने बच्चों के छात्र होने से जुड़े दस्तावेज़ बीबीसी के साथ साझा किए.

दो अन्य परिवारों से मुलाकात तो हुई, लेकिन उन्होंने कैमरे पर बात करने या दस्तावेज़ साझा करने से इनकार कर दिया. वहीं दो अन्य अभियुक्तों से संपर्क नहीं हो सका.

पुलिस ने अपनी प्रेस रिलीज़ में उनमें से एक आशीष यादव को हिस्ट्रीशीटर और दूसरे दिलशाद को दूध विक्रेता और सपा समर्थक बताया था.

बीबीसी को दिलशाद के बारे में ऐसी कोई स्वतंत्र जानकारी नहीं मिली जिससे पुलिस के दावे का सत्यापन किया जा सके.

वहीं आशीष यादव के बारे में कुछ पुरानी मीडिया रिपोर्टें मिलीं, जिसमें उनके ऊपर चल रहे कुछ मुकदमों का ज़िक्र मिलता है. पर इन मामलों की वर्तमान क़ानूनी स्थिति क्या है, इसके बारे में हमें कोई जानकारी नहीं है.

पुलिस का क्या कहना है

मनीष शांडिल्य

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बीबीसी ने अपनी पड़ताल के आधार पर प्रयागराज के डीसीपी मनीष शांडिल्य से मुलाक़ात की. हमने उनसे सवाल किया कि क्या गिरफ्तारियों से पहले पुलिस ने इन लोगों का शैक्षणिक रिकॉर्ड जांचा था.

जवाब में मनीष शांडिल्य ने कहा, ”हां, हमने जांच की थी और हमारी जांच में यही सामने आया था कि इसमें कोई भी छात्र नहीं है.”

हमने अपनी फ़ाइन्डिंग्स उनके साथ साझा की, जिसके बाद उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसी कोई जानकारी नहीं है. इन सभी लोगों की गिरफ़्तारी सीसीटीवी फ़ुटेज के आधार पर की गई है, जिसमें यह हिंसा करते पाए गए थे.

उनसे यह भी पूछा गया कि परिवारों के उन आरोपों पर उनका क्या कहना है जिनमें सादे कपड़ों में गिरफ्तारी, बिना नंबर प्लेट वाली गाड़ियों का इस्तेमाल, घर से गिरफ्तारी और हिरासत में मारपीट जैसे आरोप शामिल हैं.

उन्होंने जवाब में कहा, ”सभी गिरफ़्तारियां क़ानून सम्मत तरीक़े से की गई हैं. मामला अब अदालत में है और पुलिस की भी जांच जारी है. ”

हालांकि गिरफ़्तार छात्रों के परिवार वाले इससे इत्तेफ़ाक नहीं रखते. वह गिरफ़्तारी की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े करते हैं.

इस पूरे मामले में ध्यान देने वाली बात ये है कि सीजेपी और केंद्र सरकार के बीच जिन शर्तों पर आंदोलन ख़त्म हुआ, उनमें एक अहम शर्त प्रदर्शन में शामिल छात्रों के ख़िलाफ़ दर्ज मामलों को वापस लेने और उन्हें रिहा करने की भी थी.

सुप्रीम कोर्ट ने भी प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ दंडात्मक कार्रवाई न करने की बात कही है लेकिन अगर पुलिस किसी गिरफ़्तार व्यक्ति को छात्र ही नहीं मानती, तो ऐसे मामलों में उन शर्तों और निर्देशों का असर कैसे होगा? कुछ परिवार यही सवाल पूछ रहे हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS