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फ़्लाइट 901: आसमान में फटे विमान की अनसुलझी कहानी

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Source :- BBC INDIA

अलास चिरिकानास का विमान 901 कोलोन एयरपोर्ट से उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद आसमान में फट गया था

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होसे एंटोनियो गोंज़ालेज़ को लगा था कि 19 जुलाई 1994 की शाम फ़्लाइट 901 से उनका हवाई सफ़र शुरू हो रहा है और आगे उन्हें ऐसी बहुत-सी उड़ानें भरनी हैं.

उनकी मां मार्ता मार्केज़ कहती हैं, “उस साल, वो मई में ही 19 साल का हुआ था. थोड़े दिन पहले ही उसने अमेरिका में अपनी पायलट ट्रेनिंग पूरी की थी. वह अपने पिता की तरह पायलट बनना चाहता था. उसने फ़्लाइट सुपरवाइज़र बनने की ट्रेनिंग भी शुरू कर दी थी और इसे लेकर बहुत उत्साहित था.”

वहीं, 35 साल के कारोबारी साउल श्वार्ट्ज के लिए यह रोज़ की तरह एक सामान्य उड़ान थी. वह पनामा के दूसरे सबसे बड़े शहर कोलोन के फ़्री ज़ोन में कारोबार करते थे.

यह छोटी उड़ान उन्हें कोलोन से पनामा सिटी में उनके घर ले जाती थी. विमान में सवार 18 यात्रियों में से अधिकतर लोग भी इसी रास्ते से आते-जाते थे.

उड़ान भरने के 10 मिनट बाद ही फटा विमान

कोलोन दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फ़्री ट्रेड ज़ोन है. यह लैटिन अमेरिका में सामान की सप्लाई का भी एक बड़ा केंद्र है.

लेकिन फ़्रांस फ़ील्ड एयरपोर्ट से उड़ान भरने के सिर्फ़ 10 मिनट बाद विमान आसमान में फट गया. उसका मलबा सांता रीटा पहाड़ की ढलानों पर बिखर गया. कोई भी ज़िंदा नहीं बचा.

इस घटना को तीन दशक से ज़्यादा समय बीत चुका है. इतने साल तक यह मामला रहस्य बना रहा और कई सवालों के जवाब नहीं मिले. लेकिन अब इसकी सच्चाई सामने आने की उम्मीद पहले से ज़्यादा दिखाई दे रही है.

हाल ही में वेनेज़ुएला ने इस मामले के एक अभियुक्त को पनामा के हवाले किया है. इसराइल का मानना है कि उसका संबंध हिज़्बुल्लाह से है.

पनामा का अभियोजन विभाग अब इस आशंका की जांच कर रहा है कि यह एक आतंकवादी हमला हो सकता है.

अगर यह बात साबित हो जाती है, तो यह पनामा के इतिहास में इस तरह का सबसे जानलेवा हमला होगा.

इस मामले की अभियोजक गेओमारा ग्वेरा ने बीबीसी मुंडो से कहा, “हमें कुछ नए सबूत मिले हैं. हमारा मानना है कि सच्चाई सामने लाने के लिए ये बेहद ज़रूरी हैं. हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.”

शुरुआती जांच में कोई बड़ी सफलता नहीं

उस मनहूस दिन अपने रिश्तेदार को खोजने के लिए सांता रीटा की पहाड़ियों पर सबसे पहले पहुंचने वालों में अबनेर बेनाइम भी थे. वह पनामा के फ़िल्म निर्माता और साउल श्वार्ट्ज के भांजे हैं.

उन्होंने बीबीसी मुंडो को बताया, “बारिश हो रही थी और हर तरफ़ कीचड़ था. मैं बहुत दूर तक पैदल चला. आज भी नहीं जानता कि कितना चला था. कुछ लोग कहते हैं कि हमने एक नदी भी पार की थी. आख़िरकार हम उस खेत तक पहुंचे, जहां विमान गिरा था.”

पुलिस पहले ही घटनास्थल पर पहुंच चुकी थी. एक पुलिस अधिकारी ने अबनेर को अंदर जाने से रोक दिया.

अबनेर याद करते हैं, “मैंने उससे कहा कि मैं एक यात्री का रिश्तेदार हूं और मदद करना चाहता हूं. उसने कहा, ‘नहीं, नहीं…सबकी मौत हो चुकी है.'”

यहीं से अबनेर के मन में एक डॉक्यूमेंट्री बनाने का विचार आया. कई साल बाद यह डॉक्यूमेंट्री बनकर तैयार हुई.

यह उनके लिए बेहद निजी कहानी है. साथ ही यह इस मामले से जुड़े उन सवालों के जवाब खोजने की कोशिश भी है, जो अब तक नहीं मिले हैं.

इसी साल रिलीज़ हुई अपनी डॉक्यूमेंट्री ‘ट्रॉपिकल पैराडाइज़’ के एक दृश्य में अबनेर अपने मनोवैज्ञानिक से कहते हैं, “1994 में मेरे मामा के साथ अचानक क्या हुआ था, यह मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सवाल बन गया. ऐसा लगा जैसे विमान मेरे ही ऊपर फटा हो.”

असल में हुआ क्या था? इसके पीछे कौन था? इसमें किसने मदद की? निशाना कौन था? और यह घटना पनामा में ही क्यों हुई?

इस विस्फोट में कोई भी ज़िंदा नहीं बचा था.

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समय बीतने के साथ कुछ सवालों के जवाब मिले, लेकिन कई सवाल आज भी रहस्य बने हुए हैं. यह रहस्य उतना ही घना है, जितना बारिश के मौसम में कैरेबियाई तट की पहाड़ियों को ढकने वाला कोहरा.

हादसे के कुछ समय बाद ही पता चल गया था कि मारे गए 21 लोगों (क्रू मेंबर समेत) में से 12 पनामा के यहूदी समुदाय से थे. साउल श्वार्ट्ज भी उनमें शामिल थे.

मृतकों में तीन अमेरिकी नागरिक भी थे.

कुछ दिनों बाद एक शव को छोड़कर बाकी सभी शव उनके परिवारों को सौंप दिए गए.

उस शव पर गंभीर चोटों के निशान थे. दूसरे सबूतों को देखने के बाद फ़ोरेंसिक जांच करने वालों ने माना कि यह शव शायद उस व्यक्ति का था, जो विमान में विस्फोटक लेकर आया था.

माना जाता है कि इसी विस्फोटक के कारण विमान आसमान में फटा था.

बाद में उस व्यक्ति की पहचान ‘लिया जमाल’ या ‘अली हवा जमाल’ के रूप में बताई गई. वह सीट नंबर छह पर बैठा था. कहा जाता है कि उसने एक वायरलेस उपकरण में छिपे बम में विस्फोट किया था.

यह घटना ब्यूनस आयर्स में अर्जेंटीना के यहूदी सहायता केंद्र ‘आमिया’ पर हुए जानलेवा बम धमाके के सिर्फ़ 24 घंटे बाद हुई थी.

आमिया पर हुए कार बम हमले में 85 लोग मारे गए थे. उस हमले का मामला भी अब तक किसी अंतिम नतीजे तक नहीं पहुंचा है.

दोनों घटनाएं इतने कम समय के अंतर पर हुई थीं. इससे फ़्लाइट 901 की जांच और मुश्किल हो गई.

इस मामले में दो संभावनाएं सामने रखी गईं.

पहली संभावना यह थी कि यह हमला यहूदी समुदाय को निशाना बनाकर किया गया था. हो सकता है कि इसे हूती विद्रोहियों ने अंजाम दिया हो. हूती यमन का शिया अंसार अल्लाह आंदोलन है, जिसके हिज़्बुल्लाह से संबंध बताए जाते हैं.

दूसरी संभावना यह थी कि यह घटना किसी व्यक्ति से “हिसाब चुकाने” के लिए हुई हो. उस व्यक्ति के संबंध कोलंबिया के ड्रग कार्टेल से होने की आशंका थी.

पनामा में जांच की दिशा कई बार बदली गई. आख़िरकार कोई बड़ी सफलता मिले बिना मामला बंद कर दिया गया.

बीबीसी मुंडो ने उस समय इस मामले के अभियोजक रहे हुआन एंटोनियो तेहादा से इंटरव्यू मांगा. लेकिन उन्होंने कहा कि इस बारे में मौजूदा अभियोजन अधिकारियों से बात की जाए.

इस बीच अर्जेंटीना की न्याय व्यवस्था ने भी अलग से जांच की. उसके नतीजे एक गोपनीय फ़ाइल में दर्ज हैं.

कई साल बाद इसराइल की ख़ुफ़िया एजेंसियों और अमेरिका की जांच एजेंसी एफ़बीआई ने इस मामले में कुछ जानकारी दी.

इसके बाद पनामा सरकार ने साल 2018 में इस मामले को दोबारा खोलने की मांग की.

मामला दोबारा खोला गया

यह मामला पनामा के उस समय के राष्ट्रपति हुआन कार्लोस वारेला के लिए भी निजी था.

उन्होंने बीबीसी मुंडो से कहा, “मेरे कॉलेज के सहपाठी माउरिसियो हारोश भी उसी विमान में थे. हमने अटलांटा के जॉर्जिया टेक में चार साल साथ पढ़ाई की थी. हमारे कमरे एक-दूसरे के पास थे. आख़िरी साल वह मेरे साथ ही रहते थे.”

वारेला बताते हैं कि दोनों परिवारों के पनामा लौटने के बाद उनकी दोस्ती और गहरी हो गई थी.

साल 2009 में वारेला उपराष्ट्रपति बने. इसके बाद उन्होंने इस मामले के बारे में पता लगाना शुरू किया. वह बोगोटा में इसराइल की ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद के एजेंटों के संपर्क में भी थे.

बाद में उन्हें एफ़बीआई के एक एजेंट से भी ज़्यादा जानकारी मिली. उस एजेंट ने इस घटना की जांच की थी. वारेला की उससे मुलाक़ात राष्ट्रपति रहने के दौरान हुई थी.

इसराइल की सरकारी यात्रा के दौरान वारेला को बिन्यामिन नेतन्याहू का एक पत्र भी मिला. इस पत्र के बाद उन्होंने मामले को दोबारा खोलने की मांग की.

नेतन्याहू ने पत्र में लिखा था कि इसराइल की ख़ुफ़िया एजेंसियों के पास ऐसे सबूत हैं, जिनसे पता चलता है कि विमान में हुआ विस्फोट “साफ़ तौर पर एक आतंकवादी हमला” था.

इसके बाद मई 2018 में हुआन कार्लोस वारेला ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस की.

उन्होंने कहा, “हम पनामा के अधिकारियों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से मिलेंगे. हम उनसे अलास चिरिकानास मामले को आधिकारिक रूप से दोबारा खोलने की मांग करेंगे. हम चाहते हैं कि इस हमले के ज़िम्मेदार लोगों की पहचान हो और उन पर मुक़दमा चले.”

पनामा के पूर्व राष्ट्रपति ने बीबीसी मुंडो से कहा, “अपने दोस्त को न्याय दिलाना मेरा लक्ष्य बन गया था.”

वारेला को ख़ुद भी ओडेब्रेक्ट मामले में अदालत में बुलाया गया था. यह लैटिन अमेरिका के सबसे बड़े और विवादित भ्रष्टाचार मामलों में से एक है.

अभियोजन पक्ष के मुताबिक़, यह मामला ब्राज़ील की एक निर्माण कंपनी से जुड़ा था. इसमें क़रीब 10 देशों के कई नेताओं, सरकारी अधिकारियों और कारोबारियों के नाम भी सामने आए थे. यह मामला साल 2005 से 2014 के बीच का था.

हुआन कार्लोस वारेला ने उस समय ओडेब्रेक्ट या किसी दूसरे सरकारी ठेकेदार से “ग़लत तरीक़े से भुगतान” लेने से इनकार किया था.

उन्होंने कहा था कि वह मुक़दमे में “नतीजों का सामना” करने के लिए तैयार हैं.

मध्य अमेरिकी संसद का सदस्य होने के कारण उनके मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होनी थी.

एफ़बीआई और इसराइल की जांच

पनामा के उस समय के राष्ट्रपति हुआन कार्लोस वारेला ने इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू का पत्र मिलने के बाद मामले की दोबारा जांच की मांग की थी. नेतन्याहू ने पत्र में दावा किया था कि उनके पास इसे हमला साबित करने वाले सबूत हैं.

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पनामा में जांच के साथ-साथ एफ़बीआई ने भी ‘अलास मामले’ की जांच जारी रखी.

एफ़बीआई ने 29 मई 2024 से अपनी वेबसाइट पर लोगों से इस मामले से जुड़ी जानकारी देने की अपील कर रखी है.

वेबसाइट पर संदिग्ध हमलावर अली हवा जमाल के चेहरे का एक स्केच जारी किया गया है.

इसके साथ सुरक्षा कैमरे से ली गईं तीन ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें भी हैं. इनमें कुछ अनजान पुरुष दिखाई देते हैं. माना जाता है कि उनका इस घटना से संबंध हो सकता है.

जारी जानकारी के मुताबिक़, 27 और 28 मई 1994 को मध्य पूर्वी मूल के एक अज्ञात व्यक्ति ने एक अमेरिकी नागरिक का चोरी हुआ क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल किया था.

उस कार्ड से पनामा सिटी में दो एसयूवी गाड़ियां और दो लाइनों वाला एक टेलीफ़ोन सिस्टम किराये पर लिया गया था.

दोनों गाड़ियां बाद में टोकुमेन एयरपोर्ट के पास मिली थीं.

रिपोर्ट में कहा गया, “यह साफ़ नहीं है कि तस्वीरों में दिखाई दे रहे अज्ञात पुरुष अली हवा जमाल के साथी थे या नहीं.”

“माना जाता है कि उन्होंने कोलंबिया, वेनेज़ुएला, कोस्टा रिका और लेबनान की यात्रा की थी. यह भी कहा जाता है कि वे ऐसे लोगों के संपर्क में थे, जिनका हथियारों की तस्करी से संबंध था.”

एफ़बीआई ने यह भी बताया कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने इस मामले में 50 लाख डॉलर तक का इनाम रखा है.

यह इनाम ऐसी जानकारी के लिए है, जिससे फ़्लाइट 901 में हुए विस्फोट के हमलावरों, इसकी योजना बनाने वालों या उनके साथियों की गिरफ़्तारी हो सके या उन्हें दोषी ठहराया जा सके.

एफबीआई ने पोस्टर जारी किया

एफबीआई का वह वेब पेज जिस पर एक व्यक्ति की तलाश के लिए उसकी कई तस्वीरें जारी की गई हैं.

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साल 2020 में एफ़बीआई ने एक और पोस्टर जारी किया. इसमें अली ज़की जलील नाम के शख़्स के ठिकाने के बारे में जानकारी मांगी गई थी.

उस समय उनकी उम्र क़रीब 52 साल बताई गई थी. उनका वज़न 91 किलोग्राम और लंबाई 180 सेंटीमीटर बताई गई.

उन्हें स्काई डाइविंग में दिलचस्पी थी. वह बहुत यात्राएं करते थे और वेनेज़ुएला के मार्गारीटा द्वीप पर कई बार और रेस्टोरेंट के मालिक थे.

एफ़बीआई का मानना था कि उनके पास इस मामले से जुड़ी “बेहद महत्वपूर्ण जानकारी” हो सकती है.

बीबीसी मुंडो के सवाल के जवाब में एफ़बीआई के प्रेस कार्यालय ने कहा कि उसके पास सार्वजनिक करने के लिए कोई और जानकारी नहीं है.

हालांकि, एफ़बीआई ने इस बात की पुष्टि की कि इनाम अब भी जारी है.

मियामी में एफ़बीआई की आतंकवाद निरोधी इकाई के माइक बेनहैम ने डॉक्यूमेंट्री बनाने वाले अबनेर बेनाइम से कहा कि यह मामला अब भी खुला है.

उन्होंने बताया कि अलग-अलग संभावनाओं के आधार पर जांच जारी है. ऐसे तीन लोगों की पहचान भी की गई है, जिनके बारे में जांच एजेंसियां और जानकारी चाहती हैं.

हिज़्बुल्लाह पर शक

एफबीआई का वेब पेज, चार तस्वीरें और कुछ पैराग्राफ का लेख.

इमेज स्रोत, FBI

अबनेर बेनाइम इस मामले से जुड़े हर संभव व्यक्ति से बात करना चाहते थे. इसी कोशिश में वह तेल अवीव भी गए.

उनकी डॉक्यूमेंट्री में शबताई शावित भी दिखाई देते हैं. वह साल 1989 से 1996 तक मोसाद के प्रमुख थे.

शावित ने कैमरे पर कहा कि वह इस विषय पर बात नहीं कर सकते, क्योंकि इस मामले को “वर्जित विषय” माना जाता है.

उन्होंने यह भी कहा कि इतने साल बीतने के बाद उन्हें इस मामले की बहुत सी बातें याद नहीं हैं.

लेकिन इसराइल की आंतरिक सुरक्षा एजेंसी शिन बेट के पूर्व प्रमुख याकोव पेरी और इसराइल के इंस्टीट्यूट फ़ॉर नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज़ में आतंकवाद अध्ययन कार्यक्रम के निदेशक योराम श्वाइट्ज़र का मानना था कि इस कार्रवाई के पीछे हिज़्बुल्लाह था.

श्वाइट्ज़र कहते हैं, “शुरू में किसी को नहीं पता था कि यह एक आतंकवादी हमला है. इसलिए इसकी जांच भी आतंकवादी हमले की तरह नहीं की गई.”

“जब संदिग्ध आत्मघाती हमलावर के शव और दूसरे फ़ोरेंसिक सबूतों से सच्चाई का पता चला, तब जांच शुरू हुई.”

“लेकिन तब तक काफ़ी समय निकल चुका था. इससे सबूत खोजने में परेशानी हुई. ऐसे मामलों में समय बहुत महत्वपूर्ण होता है.”

याकोव पेरी ने कहा, “दुनिया में कहीं भी होने वाला आतंकवादी हमला इसराइल की ख़ुफ़िया एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण होता है.”

“लेकिन इस मामले की जांच पनामा के अधिकारियों के हाथ में थी. उन्होंने अर्जेंटीना के अधिकारियों के साथ मिलकर ठीक काम किया है.”

अभियुक्त का प्रत्यर्पण और ‘जटिल मामला’

कोलंबियाई-वेनेज़ुएलाई नागरिक अली ज़की हज जलील को अप्रैल में वेनेज़ुएला की कड़ी सुरक्षा के बीच पनामा को सौंपा गया था.

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लेबनानी मूल के कोलंबियाई-वेनेज़ुएलाई नागरिक अली हज जलील को नवंबर 2025 में मार्गारीटा द्वीप से गिरफ़्तार किया गया.

उनकी गिरफ़्तारी के बाद इस मामले में जांच का एक नया दौर शुरू हुआ.

इस साल अप्रैल में वेनेज़ुएला ने उन्हें पनामा के हवाले कर दिया.

इसके बाद उन्हें इस मामले में अभियुक्त बनाया गया. माना जाता है कि वह इस घटना में शामिल हो सकते हैं. पनामा का अभियोजन विभाग इस आशंका की जांच कर रहा है कि यह एक आतंकवादी हमला था.

उस समय अमेरिका के राजदूत केविन मरीनो कबरेरा ने कहा, “यह प्रत्यर्पण एक साफ़ संदेश देता है. डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की याददाश्त लंबी है और उसकी कार्रवाई की पहुंच उससे भी लंबी है.”

उन्होंने कहा, “हमें उम्मीद है कि न्यायिक प्रक्रिया और उसके अंतिम नतीजे से उन परिवारों को सुकून मिलेगा, जो 30 साल से ज़्यादा समय से न्याय का इंतज़ार कर रहे हैं.”

अभियोजक गेओमारा ग्वेरा के मुताबिक़, उनकी टीम अब पुरानी जांच की कमियों पर ध्यान दे रही है और नए सबूत जुटा रही है.

उन्होंने कहा, “हम कुछ ऐसी जगहों का पता लगाने में सफल रहे हैं, जहां घटना से पहले वह व्यक्ति मौजूद था, जो शायद बम लेकर आया था.”

“हमने दो अन्य लोगों को भी इस मामले से जोड़ा है.”

हालांकि, वह मानती हैं कि तीन दशक से ज़्यादा समय बीत जाने के कारण जांच मुश्किल हो गई है.

उन्होंने कहा, “हम बड़े स्तर पर जांच करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन अब कई सबूत उपलब्ध नहीं हैं. इनमें लोगों के एक-दूसरे से संपर्क करने के तरीक़े और उनकी बातचीत भी शामिल है

इस मामले के बाद लैटिन अमेरिका के दूसरे देशों में फैले चरमपंथी संगठनों के नेटवर्क पर भी फिर से ध्यान गया है.

अमेरिका और इस क्षेत्र के अधिकारी कई साल से चेतावनी देते रहे हैं कि हिज़्बुल्लाह जैसे संगठनों ने लैटिन अमेरिका के कुछ हिस्सों में पैसे और सामान पहुंचाने का नेटवर्क बना रखा है.

ये संगठन अक्सर कारोबारी कंपनियों और प्रवासी समुदायों के ज़रिए काम करते हैं.

अप्रैल में हुई सुनवाई के दौरान अली हज जलील ने अपने क़ानूनी अधिकार का इस्तेमाल किया और किसी भी सवाल का जवाब देने से इनकार कर दिया.

उनके वकीलों ने भी मामला बंद करने की मांग की.

वकीलों का कहना था कि घटना को 20 साल से ज़्यादा हो चुके हैं. घटना के समय लागू क़ानून के मुताबिक़, इस मामले की क़ानूनी समय सीमा 20 साल थी.

जून की शुरुआत में अभियोजन पक्ष की मांग पर पनामा की सर्वोच्च आपराधिक अपील अदालत ने इसे “जटिल मामला” घोषित कर दिया.

इस फ़ैसले के बाद अभियोजकों को जांच आगे बढ़ाने के लिए 12 महीने का अतिरिक्त समय मिल गया है. इसके बाद वे आरोप पत्र दाख़िल कर सकेंगे.

ग्वेरा कहती हैं, “इसका यह मतलब नहीं है कि हमें पूरा एक साल लगाना ही होगा. हम कम से कम समय में नतीजे तक पहुंचने की कोशिश करेंगे.”

हिंसा का गहरा असर

19 जुलाई 1994 को आसमान में विस्फोट के बाद विमान का मलबा पनामा की सांता रीटा पहाड़ी पर बिखर गया था.

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फ़्लाइट 901 में मारे गए युवा पायलट होसे एंटोनियो गोंज़ालेज़ की मां मार्ता मार्केज़ पूछती हैं, “लेकिन 32 साल बाद और इतनी जांच के बावजूद क्या अब भी कोई नया सबूत मिल सकता है?”

वह कहती हैं, “मैंने कभी नहीं सोचा था कि किसी को गिरफ़्तार किया जाएगा या यह मामला दोबारा खुलेगा.”

“मुझे लगता था कि सब कुछ इसी तरह छोड़ दिया जाएगा. इसलिए जब मैंने सुना कि मामले की पुरानी फ़ाइलें फिर से खोली गई हैं और शायद अब आख़िरकार न्याय मिलेगा, तो मुझे बहुत ख़ुशी हुई.”

“इससे हमें थोड़ा सुकून मिल सकता है, भले ही हमारे अपने लोग वापस न लौट सकें.”

अबनेर बेनाइम कहते हैं कि अब भी कई सवालों के जवाब नहीं मिले हैं. “ऐसा क्यों किया गया? इसका मक़सद क्या था? पनामा को ही क्यों चुना गया?”

वह बताते हैं कि अपनी डॉक्यूमेंट्री लोगों को दिखाने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि इस घटना के भावनात्मक घाव अब भी पूरी तरह नहीं भरे हैं.

यह बात उन लोगों पर भी लागू होती है, जिन्हें यह घटना अच्छी तरह याद है. इसका असर उन पीढ़ियों पर भी पड़ा है, जिन्होंने इसके बारे में कभी नहीं सुना था.

अबनेर कहते हैं, “मेरा मक़सद यही था. मैं समझना चाहता था कि ऐसा क्यों हुआ.”

“इसके साथ मैं यह भी दिखाना चाहता था कि ऐसी घटनाएं कितना गहरा असर छोड़ सकती हैं. समय बीतने के साथ ये लोगों की ज़िंदगी बदल सकती हैं और इनका असर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंच सकता है.”

वह कहते हैं, “मैं बड़ी-बड़ी बातें और आम निष्कर्ष निकालने वालों में से नहीं हूं.”

“लेकिन यह बात सच है कि हिंसा हम सभी पर असर डालती है, भले ही यह सुनने में घिसी-पिटी बात लगे.”

“जब तक आप ख़ुद इसे नहीं झेलते, तब तक आप सही मायने में यह नहीं समझ सकते कि हिंसा किसी समाज को कितना गहरा नुक़सान पहुंचाती है.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS