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बाढ़ में फंसी इस 97 साल की बुज़ुर्ग महिला की केले के पेड़ से बनी नाव ने कैसे बचाई जान

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Source :- BBC INDIA

असम के शिवसागर के एक गांव में बाढ़ के पानी से गुज़रती एक महिला

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19 जुलाई की आधी रात के बाद, जब असम के एक गांव में बाढ़ का पानी तेजी से बढ़ रहा था, तब बोरनाली बरुआ और उनके पति अपनी 97 वर्षीय मां को बचाने की कोशिश कर रहे थे.

बिस्तर पर पड़ी हुई लोकाडा दुआराह चल भी नहीं सकती थी. वहाँ न कोई नाव थी, न कोई बचाव दल और न ही कोई पड़ोसी मदद के लिए मौजूद था. इसलिए उन्होंने अपनी मां को केले के तनों से बनी एक अस्थायी नाव पर लिटाया और तेज़ बहते पानी में से होते हुए सुरक्षित स्थान की ओर ले गए. बरुआ कहती हैं, “हर कोई खुद को बचाने की कोशिश कर रहा था.”

वो बताती हैं कि एक घंटे बाद, तीनों राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित एक आश्रय शिविर में पहुंचे, जो उनके घर से कुछ दूरी पर शिवसागर ज़िले के चारिंग गांव में था. ये बाढ़ से सबसे बुरी तरह प्रभावित जिलों में से एक है.

पानी तीन से चार फीट गहरा था और धारा इतनी तेज थी कि उन्हें धीरे-धीरे आगे बढ़ना पड़ा, एक-दूसरे का हाथ पकड़कर और खुद को स्थिर रखने के लिए छड़ियों का सहारा लेते हुए. तब तक बरुआ का घर बाढ़ के पानी में डूबता जा रहा था. पानी अंततः घर के अंदर लगभग पांच फीट तक भर गया था.

बोरनाली बरुआ एक बकरी के साथ

चारिंग में जो दृश्य देखने को मिला, वह असम भर में घट रही एक बहुत बड़ी आपदा का हिस्सा था.

नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, बाढ़ से मरने वालों की संख्या 100 है, 10 जिले और 456 गांव प्रभावित हुए हैं और लगभग 140,000 लोग प्रभावित हुए हैं. 52 राहत शिविर स्थापित किए गए हैं. कुल मिलाकर, बाढ़ ने 25 जिलों में लगभग 12 लाख लोगों को प्रभावित किया है, 19,000 से अधिक घरों को नुकसान पहुंचाया है और 75,000 से अधिक लोग 252 राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं.

असम के ऊपरी हिस्सों में बाढ़ का कहर विशेष रूप से भीषण रहा है, चारिंग जैसे गांव, जो आमतौर पर बाढ़ से अब तक अप्रभावित रहे हैं वो भी इस साल जलमग्न हो गए हैं.

40 वर्षीय बरुआ के लिए यह सदमा विशेष रूप से गहरा है.

“हमारे जीवनकाल में इस क्षेत्र में हमने पहली बार ऐसी बाढ़ का सामना किया है,” वह कहती हैं.

बरुआ जन्म से ही चारिंग में रहती हैं, और उनके पूर्वज भी उनसे पहले यहीं रहते थे. उन्हें 1950 में आई एक भीषण बाढ़ के बारे में याद है, जो उनके जन्म से बहुत पहले की बात है, लेकिन उनके जीवनकाल में ऐसी कोई घटना नहीं घटी.

उनका घर नदियों से घिरे एक इलाके में है, हालांकि कोई भी नदी सीधे घर के पास से नहीं बहती. एक मंजिला, आठ कमरों वाला यह घर शिवसागर कस्बे से लगभग 25 किलोमीटर दूर है. यहां से ब्रह्मपुत्र नदी लगभग 20 किलोमीटर, दिखो नदी 12 किलोमीटर, झांजी नदी 10 किलोमीटर और मिटोंग नदी मात्र 5 किलोमीटर दूर है.

97 वर्षीय लोकाडा दुआरह को बाढ़ का पानी उनके घर के चारों ओर बढ़ने के बाद केले के पेड़ के तने पर उठाकर सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया
22 जुलाई, 2026 को भारत के जोरहाट में बाढ़ प्रभावित इलाके में एक लड़का डूबे हुए घरों के पास से बाढ़ के पानी में चलने के लिए केले से बनी एक अस्थायी नाव का इस्तेमाल कर रहा है.

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उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि पानी उनके घर तक पहुँच जाएगा. लेकिन बाढ़ ने न केवल उनके घर को, बल्कि वर्षों की मेहनत से बनाई उनकी आजीविका को भी खतरे में डाल दिया.

बरुआ कभी पूर्णकालिक पत्रकार थीं. 2016 में उन्होंने पत्रकारिता छोड़कर पशुपालन को अपना पेशा बनाया और तीन साल बाद उन्हें असम की ‘सर्वश्रेष्ठ पशुपालक’ का खिताब मिला.

उनके फार्म में लगभग 300 बकरियां, 500 बत्तखें और 1,000 मुर्गियां थीं, साथ ही मछलियां भी थीं. बाढ़ ने उनके फार्म के अधिकांश हिस्से को नष्ट कर दिया.

उनका कहना है कि उनकी अधिकांश बकरियां, 300 बत्तखें, 300 मुर्गियां और काफी मात्रा में मछलियां, साथ ही पशुओं के लिए चारा बनाने वाली मशीन भी नष्ट हो गई. फर्नीचर, लैपटॉप, वाहन और परिवार की किताबों का संग्रह भी तबाह हो गया.

उनके किसी भी पशुधन का बीमा नहीं था. वह कहती है, “यहाँ पशुधन, विशेषकर बकरियों के लिए कोई बीमा प्रणाली नहीं है.”

पहली चेतावनी 17 जुलाई को मिली, जब झांजी नदी का जलस्तर बढ़ने लगा. दो दिन बाद, ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों में तेजी से आए उफान के कारण दिखो और मिटोंग नदियों का पानी आसपास के इलाकों में फैल गया.

बरुआ का कहना है कि कई नदियों ने अपने तटबंध तोड़ दिए, जिससे कस्बों और गांवों में तेज धाराएं बहने लगीं.

अपना घर छोड़ने के बाद उन्होंने अगले 10 दिन एक राहत शिविर में बिताए.

बरुआ परिवार का बाढ़ग्रस्त घर

शिविर में पांच दिनों तक बिजली और मोबाइल कनेक्टिविटी नहीं थी और बरुआ अपना फोन भी चार्ज नहीं कर पाईं. सरकार ने परिवार को चावल, दाल और खाना पकाने के तेल से युक्त एक राहत किट प्रदान की.

शिविर में अजनबियों से भी मदद मिली. एक युवती, जिससे बोरनाली कभी नहीं मिली थी, ने भोजन, सफाई और उसकी बची हुई 60 बकरियों की देखभाल में मदद की. एक अन्य महिला ने बीमार जानवरों के इलाज और उन्हें खाना खिलाने की जिम्मेदारी संभाली.

लेकिन पानी उस जगह तक क्यों पहुंचा जहां बरुआ के अनुसार पहले कभी बाढ़ नहीं आई थी?

गुवाहाटी विश्वविद्यालय में भूगोल के प्रोफेसर और ब्रह्मपुत्र अध्ययन केंद्र के निदेशक ध्रुबज्योति सहारिया कहते हैं कि असम के निचले इलाके में ब्रह्मपुत्र घाटी में बाढ़ आना स्वाभाविक है. जो बदलाव आया है वह है बाढ़ की आवृत्ति, तीव्रता और गंभीरता का ऐतिहासिक मानकों से कहीं अधिक बढ़ जाना.

ब्रह्मपुत्र नदी, जो विश्व की सबसे बड़ी बहु-धारा वाली नदियों में से एक है, जल प्रवाह और गाद भार दोनों के मामले में विश्व स्तर पर शीर्ष पांच नदियों में शुमार है. इस गाद का अधिकांश भाग तिब्बत से आता है, जहाँ से यह नदी निकलती है.

 4 अगस्त, 2026 को भारत के असम राज्य के शिवसागर जिले में बाढ़ के कारण विस्थापित हुए बाढ़ प्रभावित निवासी एक अस्थायी तम्बू के अंदर शरण लिए हुए हैं.

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20 वर्षीय अमित गिरी 5 अगस्त, 2026 को असम, भारत के शिवसागर में बाढ़ से क्षतिग्रस्त अपने घर के बाहर एक मोबाइल फोन पकड़े हुए हैं, जिसमें उनके पिता शिव शंकर गिरी की तस्वीर दिखाई दे रही है, जिनकी बाढ़ में मृत्यु हो गई थी.

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असम के जिन इलाकों में बाढ़ का ख़तरा होता है वहां लगभग दो करोड़ 80 लाख लोग रहते हैं. यहां नदियों की रफ़्तार कम हो जाती है और गाद जमा होने लगती है, जिससे कटाव और बाढ़ की आशंका बढ़ जाती है. असम में बाढ़ आना एक वार्षिक घटना है, लेकिन कुछ वर्ष कहीं अधिक भयावह होते हैं. अकेले 2004 की बाढ़ ने एक करोड़ 20 लाख लोगों लोगों को प्रभावित किया और 251 लोगों की जान गई थी.

ध्रुबज्योति सहारिया का कहना है कि हाल ही में आई बाढ़ में, ऊपरी असम और पड़ोसी नगालैंड के मोन जिले में लगातार भारी बारिश के कारण शिवसागर, चराइदेव और जोरहाट में भीषण बाढ़ और बड़े पैमाने पर गाद का जमाव हुआ.

सहारिया का कहना है कि बाढ़ उन क्षेत्रों तक भी पहुंच रही है जो पहले बाढ़ से बचे रहते थे, क्योंकि सक्रिय बाढ़ के मैदानों पर अधिक लोग बस गए हैं, जंगलों की कटाई हुई है, खनन और पहाड़ी कटाई से नदियों में गाद की मात्रा बढ़ गई है, और सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचे का निर्माण क्षेत्र के जल विज्ञान को पर्याप्त रूप से ध्यान में रखे बिना किया गया है.

फिर भी असम अकेले ब्रह्मपुत्र नदी का प्रबंधन नहीं कर सकता. इसकी कई सहायक नदियाँ आसपास के पहाड़ी राज्यों से निकलती हैं, जबकि बाढ़ नियंत्रण के उपाय काफी हद तक असम के भीतर ही नियोजित किए जाते हैं.

सहारिया का कहना है, “जरूरत बेसिन-स्तरीय योजना की है,” साथ ही राज्यों के बीच बेहतर समन्वय और नदियों के बदलते भूगोल की बेहतर समझ की भी.

लेकिन बरुआ के लिए, विज्ञान एक बेहद व्यक्तिगत और दर्दनाक विषय बन गया है.

असम में बचाई गई एक बकरी

वह अपने बाढ़ से क्षतिग्रस्त घर के आसपास के इलाके में लौट आई है. फिलहाल, वह और उनका परिवार पास ही के एक पड़ोसी के घर में रह रहे हैं और उन्हें उम्मीद है कि वे एक सप्ताह के भीतर अपने घर में वापस चले जाएंगे.

बरुआ का कहना है कि उनका चारिंग छोड़ने का कोई इरादा नहीं है. उनका कहना है कि वहां से जाने के लिए आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियां आवश्यक हैं, जो उनके परिवार के पास अभी नहीं हैं.

इसलिए वह इस बारे में सोचने लगी है कि उस खतरे के साथ कैसे जिया जाए जो अब तक उसके जीवन से काफी हद तक अनुपस्थित था.

उनका कहना है कि अगर फिर से भारी बारिश हुई, तो उन्हें घर को ऊंचा करना पड़ेगा, शायद नींव को मजबूत करके. उन्हें अभी यह नहीं पता कि वह इसका इंतजाम कैसे करेंगी या इसका खर्च कैसे उठाएंगी. परिवार को एक ऊंचे चबूतरे की भी जरूरत होगी जहां वे सुरक्षित स्थान पर जा सकें, और वे पहले से ही खाने-पीने का सामान जमा करके रखेंगे.

बरुआ बाढ़ की बढ़ती संभावना के साथ जीना सीख रही हैं और इसके लिए तैयारी भी कर रही हैं.

वो कहती हैं “अगर हम अपनी आर्थिक और मानसिक शक्ति पुनः प्राप्त कर लें, तो जीवन पहले जैसा हो जाएगा.”

हमें बाढ़ के साथ सह-अस्तित्व में रहना सीखना होगा.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS