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बारूद से छलनी जमीन में जान फूंकने वाली घास

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Source :- LIVE HINDUSTAN

युद्ध से छलनी हो चुकी जमीन पर फिर से अन्न कैसे उगाया जा सकता है? पूर्वी एशिया की एक घास, यूरोप और यूक्रेन को इसका रास्ता दिखा रही है.चेक गणराज्य की यान इवांगेलिस्ता पुर्केनिया यूनिवर्सिटी (UJEP) ने एक रिसर्च फील्ड को पेट्रोलियम तेल, बारूद, राख और धातुओं के जले टुकड़ों से भरा है.असल में यह फील्ड एक खुली प्रयोगशाला है.पुरानी कोयला खदान में बनाई इस ओपन लैब में एक छोटे से खेत को युद्धभूमि की जमीन के बराबर प्रदूषित किया गया है.UJEP के पर्यावरण विज्ञानी जोसेफ त्रोगल कहते हैं, “लक्ष्य है इस दूषित जगह को फिर से पुर्नजीवित करना, वो भी बायोमास पैदा करते हुए”खेत में पूर्वी एशिया की एक सदाबहार घास, जायंट मिसकैनथस उगाई गई है.चार मीटर (13 फीट) की ऊंचाई तक जाने वाली इस घास की उम्र काफी लंबी होती है.वैज्ञानिकों को लगता है कि जायंट मिसकैनथंस मिट्टी से युद्ध के नामोनिशान मिटा सकती है.पूर्वी एशिया की घास से यूरोप को इतनी उम्मीदें क्यों?सफलता की ओर बढ़ते इस एक्सपेरिमेंट से यूरोप को बड़ी आशाएं हैं, क्योंकि यूक्रेन युद्ध ने उसकी खाद्य सुरक्षा पर चोट पहुंचाई है.यूक्रेन को यूरोप का अन्नदाता कहा जाता है.बेहद ऊपजाऊ काली मिट्टी के चलते यूक्रेन में मक्का, गेहूं, सूरजमुखी और सरसों की बंपर फसल हुआ करती थी.इस पैदावार की बदौलत यूक्रेन, दुनिया के बड़े खाद्यान्न उत्पादकों में शामिल था.लेकिन फरवरी 2022 में रूस के हमले के बाद शुरू हुई जंग ने यूक्रेन के बड़े इलाके में कृषि भूमि को बर्बाद कर दिया है.अब नाटो की अगुवाई में यूक्रेन के कृषि क्षेत्र को फिर से मजबूत बनाने की कवायद की जा रही है.UJEP में चल रहा प्रयोग इसी कड़ी का हिस्सा है.इस प्रोजेक्ट में चेक गणराज्य के साथ साथ अमेरिका, कनाडा, कजाखस्तान, यूक्रेन और क्रोएशिया के वैज्ञानिक शामिल हैं.हाल ही में जायंट मिसकैनथस घास पर प्रकाशित एक शोध की सह लेखिका और अमेरिका की वेस्ट वर्जीनिया यूनिवर्सिटी की वनस्पति विज्ञानी एम्बर मॉरिसे कहती हैं, यह घास “बर्बाद और प्रदूषित हो चुकी मिट्टी में भी लहलहा सकती है”मिट्टी में कैसा मैजिक करती है जायंट मिसकैनथसप्रयोग के दौरान वैज्ञानिकों ने दर्ज किया कि जायंट मिसकैनथस घास की जड़ ने मिट्टी में मौजूद प्रदूषित तत्वों को जकड़ लिया.मिट्टी के बाहर मौजूद घास काफी हद तक प्रदूषण मुक्त रही.UJEP के वैज्ञानिक त्रोगल के मुताबिक, “यह पौधा प्रकाश संश्लेषण द्वारा पैदा किए गए ऑर्गेनिक मैटीरियल का 40 फीसदी हिस्सा, वापस मिट्टी में भेजता है वो भी अपनी जड़ों के जरिए.यह खेती में उगाए जाने वाले पौधों के मुकाबले बहुत ज्यादा है”प्रकाश संश्लेषण या फोटोसिंथेसिस के जरिए पौधे कार्बन डाइऑक्साइड को ऑक्सीजन और कार्बन समृद्ध ग्लूकोज में बदलते हैं.जायंट मिसकैनथस में प्रकाश संश्लेषण की रफ्तार, मक्का और गन्ने की तरह बहुत तेज होती है.तेज फोटोसिंथेसिस की मदद से यह घास, जमीन में तेजी से ऑर्गेनिक कार्बन जमा करती है और इस तरह मिट्टी में फिर उर्वरा क्षमता लौटने लगती है.वैज्ञानिकों कहते हैं कि युद्ध से दूषित हुई मिट्टी को पूरी तरह साफ कर करने बरसों लगेंगे, लेकिन जायंट मिसकैनथस से मिल रहे नतीजे बेहद उत्साहजनक हैं.त्रोगल कहते हैं, इस घास के कारण “मिट्टी में नमी और उर्वरा क्षमता, बाकी किसी भी पौधे के मुकाबले बेहतर है”यूक्रेन के खेतों में उत्साहजनक परिणाम2023 से चल रहा यह प्रोजेक्ट नाटो के “सैन्य गतिविधियों के पर्यावरणीय असर” शोध का हिस्सा है.प्रोजेक्ट की प्रमुख और यूक्रेन में जन्मी UJEP की प्रोफेसर वेलेंटीना पिद्लिस्युंक हैं.उनकी टीम अब तक कीव के बाहरी इलाके बूचा में जायंट मिसकैनथस घास रोप चुकी है.अप्रैल 2022 में रूस कब्जे से आजाद कराए गए उस इलाके में बारे में वेलेंटीना कहती हैं, वहां जमीन पूरी तरह डिग्रेड हो चुकी थी.लेकिन हाल के नतीजे दिखा रहे हैं कि “जैविक मानकों और कार्बन संग्रहण के मामले में मिट्टी में सकारात्मक असर दिख रहा है”त्रोगल के मुताबिक, “आदर्श परिस्थितियों में यह घास 20 से 25 साल के लिए पर्याप्त बायोमास देगी.उसके बाद हमें इसे खोदकर उखाड़ना होगा और उम्मीद है कि तब हम खेती के लिए उस जमीन का इस्तेमाल कर सकेंगे”यूक्रेन के प्रयोग के साथ ही यूरोप में जायंट मिसकैनथस को बायोफ्यूल बनाने और घरों को गर्म रखने वाले प्राकृतिक इंसुलेशन मैटीरियल के तौर पर भी इस्तेमाल किया जा रहा है.

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