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https://www.livehindustan.com/lh-img/smart/img/2026/06/30/1200x900/Mughal_1782817368460_1782817372109_648cc9c1-8303-42cf-8a2a-9d71e52268f2.jpgआज भी फिल्ममेकर्स के लिए इस तरह का सीन तैयार करने में पसीने छूट जाते हैं, तो फिर साल 1960 में तो यह सीन कर पाना असंभव जैसा था। फिर सवाल यह उठता है कि इस फिल्म में इतना परफेक्टली यह सीन किया कैसे गया?
आज के वक्त में एक युद्ध वाले सीन शूट करना इतना मुश्किल नहीं होता है। क्योंकि टेक्नोलॉजी बहुत एडवांस हो चुकी है। आधा काम ग्रीन स्क्रीन संभाल लेती है और बाकी का VFX टीम। लेकिन जरा सोचिए, साल 1960 के दशक में चीजें किस तरह की जाती होंगी? आज हम आपको ऐसी ही एक फिल्म के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसमें पूरी की पूरी फौज एक साथ एक्शन करते नजर आती है। कहीं गलती नहीं होती है और हर एक शॉट बिलकुल परफेक्ट। उस दौर में ये चीजें बिना इतनी एडवांस तकनीक के कैसे की जाती होंगी? आज इसी सवाल का जवाब जानेंगे।
वॉर सीक्वेंस की खूब हुई तारीफ
हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड की कुछ सबसे आइकॉनिक फिल्मों में से एक ‘मुगल-ए-आजम’ की। इस फिल्म की IMDb पर रेटिंग 8.1 है और यह उस दौर की सबसे महंगी फिल्म थी। के.आसिफ के निर्देशन में बनी इस फिल्म पर पैसा पानी की तरह बहाया गया था और इसमें मधुबाला, दिलीप कुमार, पृथ्वीराज कपूर और निगार सुल्ताना जैसे एक्टर्स ने अहम किरदार निभाए थे। फिल्म के कई सीन्स बहुत कमाल के थे, लेकिन सबसे ज्यादा तारीफ मिली इस फिल्म के वॉर सीक्वेंस को।
शूट में ये थी सबसे बड़ी चुनौती
इस फिल्म में सलीम और अकबर की जो विशाल सेना दिखाई गई थी, उसके बारे में अलर आपको लगता है कि इन्हें बस तकनीक की मदद से बना दिया गया था, तो आप गलत हैं। क्योंकि तब की टेक्नोलॉजी इतनी एडवांस थी ही नहीं। अगर आप सोच रहे हैं कि ये सब एक्ट्रा या जूनियर एक्टर्स हैं, तो भी आपका अनुमान गलत है। दरअसल उस वक्त एक्टर्स ही इतने कम थे तो इतने सारे जूनियर या साइड एक्टर्स लाने का तो सवाल ही नहीं था। इस चुनौती का हल निकालना बहुत मुश्किल था, लेकिन फिर के.आसिफ ने एक तरकीब लगाई।
भारतीय सेना की ली गई मदद
इतने सारे एक्टर्स को अगर कहीं से खोज भी लिया जाता तो उन्हें यूनिफॉर्म देना और उन्हें प्रॉपर ट्रेन करके हर शॉट करवा पाना तब असंभव था। इस दिक्कत का हर निकालने के लिए के.आसिफ ने भारत सरकार और रक्षा मंत्रालय से संपर्क किया। खबरों की मानें तो इन सीक्वेंस के लिए बकायदा भारतीय सेना के जवानों की मदद ली गई थी। सभी जवानों को यूनिफॉर्म में मार्च करवाया गया था। क्योंकि सभी जवान ट्रेंड थे, इसलिए उन्हें परेड करवाना और हथियारों के साथ फाइट सीक्वेंस शूट करना आसान था। कहते हैं कि इसके लिए 10000 जवान और करीब 2000 घोड़ों की मदद ली गई थी।
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