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‘भीड़ में एफ़बीआई एजेंटों का पता लगाना सीखा…’: जाँच एजेंसी से भागते माता-पिता के बच्चे ने और क्या बताया

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Source :- BBC INDIA

एक ब्लैक एंड व्हाइट पारिवारिक तस्वीर में, एक पुरुष और एक महिला कार के सामने पोज़ दे रहे हैं. उन्होंने कैज़ुअल कपड़े पहने हैं - जींस, जैकेट और स्कार्फ - और उनके सामने लंबे सुनहरे बालों वाला एक छोटा बच्चा है जिसने गहरा कोट पहना है, और पुरुष की पीठ पर एक बेबी कैरियर में एक और बच्चा है. कार के पिछले कोने में अस्पष्ट विरोध के संकेत लगे हैं जिन पर लिखा है:

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पढ़ने का समय: 10 मिनट

“जब मैं बहुत छोटा था, तभी से मुझे क्रांतिकारी विचार सिखाए जा रहे थे. उन्होंने मुझे सिखाया कि भीड़ में छिपे हुए पुलिस और एफ़बीआई एजेंटों को कैसे पहचानना है. उन्होंने मुझे फ़ोन पर कोड भाषा में बात करना भी सिखाया. मुझे यह सब किसी खेल जैसा लगता था.”

ज़ायद एयर्स डोर्न का बचपन आम बच्चों जैसा नहीं था.

उनके बेडरूम की दीवारों पर डिज़्नी के किरदार नहीं लगे थे. उनकी जगह क्यूबा क्रांतिकारी चे ग्वेरा और वियतनामी क्रांतिकारी हो ची मिन्ह की तस्वीरें टंगी थीं. कई सालों तक वे प्री-स्कूल नहीं जा सके.

परिवार के साथ कैंपिंग पर जाना मार्शमैलो सेंकने के लिए नहीं होता था. कम से कम एक बार तो यह यात्रा एक जेल की टोह लेने के लिए की गई थी, ताकि वहां से कैदियों को छुड़ाने की योजना बनाई जा सके.

एक संयुक्त छवि में बर्नाडाइन और बिल के

जब ज़ायद का जन्म हुआ, तब उनकी मां बर्नाडीन डोर्न एफ़बीआई की सबसे वांछित फ़रार लोगों की सूची में शामिल थीं. वे ‘वेदर अंडरग्राउंड’ नाम के एक कट्टर युद्ध-विरोधी संगठन की नेता थीं.

यह संगठन अमेरिका में असमानता और नस्लीय अन्याय को उजागर करने के लिए बम धमाकों का अभियान चलाता था. इसके निशाने पर कैपिटल, पेंटागन और विदेश मंत्रालय जैसी प्रमुख सरकारी इमारतें थीं.

उनके पिता बिल एयर्स भी इस संगठन के सह-संस्थापकों में से एक थे. इसी वजह से परिवार को नकली पहचान के साथ रहना पड़ता था. वे बार-बार अपना ठिकाना बदलते थे और हर समय गिरफ़्तारी के ख़तरे से सतर्क रहते थे.

माता-पिता के जीवन लक्ष्य और बचपन

भूरे बालों वाली एक युवती का क्लोज-अप शॉट, जिसके पीछे अन्य लोग खड़े हैं. उसके होंठ खुले हुए हैं, मानो वह कुछ चिल्लाने वाली हो. वह कैमरे के पीछे किसी को या किसी चीज़ को देख रही है.

लेकिन ज़ायद के लिए यह सब सामान्य जीवन का हिस्सा था.

वह कहते हैं, “मुझे पता था कि एफ़बीआई हमारे पीछे लगी हुई है. इस बारे में उन्होंने मुझसे कभी झूठ नहीं कहा. वे मुझे इसे ऐसे समझाते थे, जैसा उन्हें लगता था कि कोई बच्चा समझ सकता है. वे हमारी तुलना रॉबिनहुड से करते थे. उनका कहना था कि हम क़ानून से बाहर रहने वाले लोग हैं, जो अमीरों से लेकर ग़रीबों को देते हैं. ऐसी ही बातें वे मुझे बताते थे.”

उनके माता-पिता दोनों ही श्वेत मध्यमवर्गीय परिवारों से थे, जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी थी. उनकी मां यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो में क़ानून की पढ़ाई कर रही थीं और पढ़ाई में हमेशा सबसे आगे रहने वाली छात्रा थीं.

लेकिन 1966 में जब डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर शिकागो आए और किराया बढ़ाने के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलन का समर्थन किया, तो वे उससे सक्रिय रूप से जुड़ गईं.

इसके बाद उन्हें लगने लगा कि अमेरिका में कहीं ज़्यादा बड़े और बुनियादी बदलाव की ज़रूरत है.

किंग की हत्या और उसके बाद ब्लैक पैंथर संगठन के नेता फ़्रेड हैम्पटन की पुलिस गोलीबारी में मौत ने उन्हें और ज़्यादा उग्र रास्ते की ओर धकेल दिया.

ज़ायद कहते हैं, “मुझे लगता है कि इसी वजह से मेरी मां और उनके जैसे कई लोग बहुत ज़्यादा कट्टर हो गए. मेरी मां, ब्लैक पैंथर संगठन के फ़्रेड हैम्पटन को सिर्फ़ अपना दोस्त नहीं मानती थीं, बल्कि उन्हें अपना आदर्श भी समझती थीं. और उनकी नज़र में उनकी ही सरकार ने उन्हें मार डाला.”

उनके पिता के लिए शुरुआत में वियतनाम युद्ध और अनिवार्य सैन्य भर्ती का विरोध ही वह वजह थी, जिसने उन्हें इस समूह की ओर आकर्षित किया.

“उस समय उनका एक नारा था, ‘युद्ध को घर तक ले आओ’.”

“इसका मतलब था कि वियतनाम युद्ध में जो हिंसा हो रही थी, उसे अमेरिका की सड़कों पर भी दिखाया जाए. वे लोगों को झकझोर कर जगाना चाहते थे.”

“वे दिखाना चाहते थे कि विदेशों में क्या किया जा रहा है और अपने ही देश में अश्वेत संगठनों और नेताओं के साथ क्या व्यवहार हो रहा है.”

पर्स में बम

एक साधारण से पोस्टर के ऊपरी भाग में लाल रंग में

आज यह बात हैरान करने वाली लगती है कि मध्यमवर्गीय विद्यार्थियों का एक समूह देश की सबसे कड़ी सुरक्षा वाली सरकारी इमारतों में बम धमाके कर सका.

लेकिन ज़ायद का कहना है कि उन्होंने युवा, श्वेत और शिक्षित होने से जुड़े सामाजिक पूर्वाग्रहों का फ़ायदा उठाया.

कुछ महिलाएं सचिव बनकर सरकारी इमारतों में जाती थीं. वे वहां जानकारी इकट्ठा करती थीं और कम इस्तेमाल होने वाली जगहों पर विस्फोटक रख देती थीं.

कई बार ये विस्फोटक महिलाओं के शौचालयों में रखे जाते थे.

ज़ायद बताते हैं, “उनके पास एक फ़ायदा यह था कि वे कॉलेज-शिक्षित, अच्छी तरह बात करने वाले और काफ़ी संपन्न श्वेत लोग थे. वे सत्ता से जुड़े इन स्थानों में बिना ज़्यादा ध्यान आकर्षित किए अंदर जा सकते थे.”

समूह की नस्लीय पहचान से मिलने वाले विशेषाधिकार का असर ब्लैक लिबरेशन आर्मी के साथ उसके रिश्तों पर भी पड़ा. यह संगठन ब्लैक पैंथर पार्टी से अलग होकर बना था.

श्वेत कार्यकर्ता अपनी पहुंच और अपेक्षाकृत कम संदेह होने का फ़ायदा उठाकर अश्वेत कार्यकर्ताओं की मदद करते थे. इसमें जेल से फ़रार होने की घटनाओं और दूसरे ग़ैरक़ानूनी कामों के बाद उन्हें वहां से निकालकर ले जाने जैसे काम भी शामिल थे.

जब बचपन में कैंपिंग को गए

हल्के रंग की टोपी और नारंगी रंग का स्कार्फ पहने एक युवती वैन के खुले दरवाजे पर बैठी है, उसकी गोद में हल्के रंग के ओवरऑल पहने एक छोटा बच्चा है. वैन के अंदर, उनके पीछे, लाल रजाई से ढका एक बिस्तर है. वाहन के दरवाजे के पास

जैसे-जैसे ज़ायद बड़े होते गए, भूमिगत जीवन की सच्चाइयों का असर उनके बचपन पर और ज़्यादा पड़ने लगा.

उनके पास आधिकारिक दस्तावेज़ नहीं थे, इसलिए वे स्कूल नहीं जा सकते थे. उनके ज़्यादातर दोस्त भी दूसरे कार्यकर्ताओं के बच्चे थे.

उनका बचपन कई मायनों में दूसरे अमेरिकी बच्चों जैसा ही था. परिवार के साथ सड़क यात्राएं, घूमने जाना और कैंपिंग की छुट्टियां उनकी ज़िंदगी का हिस्सा थीं.

लेकिन इन गतिविधियों में भी एक अलग तरह का क्रांतिकारी रंग होता था.

“हम कभी डिज़्नीलैंड, अमेरिकी कैपिटल या ऐसी दूसरी जगहों पर नहीं गए. मेरे माता-पिता मुझे उन जगहों पर ले जाते थे जो क्रांतिकारी संघर्ष से जुड़ी थीं. वे मुझे वहां ले जाते थे जहां उनके नायकों की हत्या हुई थी.”

“…जहां पुलिस ने फ़्रेड हैम्पटन को मार डाला था. जहां जॉन ब्राउन को फांसी दी गई थी. और उस जगह पर भी, जहां नैट टर्नर ने ग़ुलामों का विद्रोह शुरू किया था. इसलिए यह अमेरिका की ऐसी यात्रा थी, जिसे मेरे माता-पिता एक ऐसे देश के रूप में देखते थे जिसके ख़िलाफ़ वे संघर्ष कर रहे थे.

कई साल बाद उन्हें पता चला कि परिवार की एक कैंपिंग यात्रा का मक़सद कुछ और भी था. उनका कैंप एक संघीय जेल से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर लगा था, जहां ब्लैक पैंथर संगठन का एक सदस्य बंद था.

उनके माता-पिता ने इस यात्रा का इस्तेमाल उस जेल का अध्ययन करने के लिए किया था, ताकि संभावित फ़रारी की किसी कोशिश से पहले उसकी जानकारी जुटाई जा सके.

इस ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर में एक क्षतिग्रस्त ईंट के बने टाउनहाउस के बगल में एक बड़ी मोबाइल क्रेन खड़ी दिखाई दे रही है - इमारत का बाहरी हिस्सा और ऊपरी मंजिलें ढह गई हैं, जिससे अंदर की दीवारें और मलबा दिखाई दे रहा है; मलबे के पास एक मजदूर दिखाई दे रहा है और 'पुलिस लाइन' लिखे एक बैरियर से इलाके को घेर दिया गया है.

तस्वीर के अग्रभाग में, एक बैरियर के पीछे मलबा और ईंटों का ढेर लगा हुआ है. पीछे, दो मजदूर एक तेज रोशनी के सामने खड़े हैं, जबकि कुछ पुलिसकर्मी उन्हें देख रहे हैं. एक पुलिसकर्मी तस्वीर के किनारे पर खड़े किसी व्यक्ति से बात कर रहा है.

बड़े होने पर अपने बचपन को कैसे देखा

वयस्क होने के बाद, और अब ख़ुद एक पिता बनने के बाद ज़ायद ने अपने माता-पिता के फ़ैसलों को समझने की कोशिश में कई साल बिताए हैं.

वे उनके सोचने के तरीक़े की तुलना उन लोगों से करते हैं, जो ख़ुद सेना में भर्ती होने का फ़ैसला करते हैं.

उनका कहना है कि उनके माता-पिता मानते थे कि वे अपनी ही सरकार के ख़िलाफ़ एक युद्ध लड़ रहे हैं. इसलिए वे इसके व्यक्तिगत नतीजों को स्वीकार करने के लिए तैयार थे.

“मुझे कई मायनों में उन पर गर्व महसूस होता है. उस समय अमेरिका में ज़्यादातर लोग, ख़ासकर ज़्यादातर श्वेत लोग, अपने सामने हो रहे अन्याय को बस देखते रहते थे और उसके ख़िलाफ़ कुछ नहीं करते थे. लेकिन मेरे माता-पिता ऐसे लोग थे, जो कुछ करने पर ज़ोर देते थे.”

हालांकि ज़ायद के लिए यह कल्पना करना मुश्किल है कि वे ख़ुद कभी ऐसा फ़ैसला लेते. वे नहीं सोच सकते कि अपने बच्चों को घर पर छोड़कर बैंक लूटने या किसी को जेल से छुड़ाने जैसी कार्रवाई करने निकल पड़ें.

“लेकिन मुझे यह भी लगता है कि ऐसा सोच पाना अपने आप में एक विशेषाधिकार है. दुनिया में बहुत से लोग ऐसे हैं, जिनके पास अपने परिवार को जोखिम में डालने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता. वे दमन और अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए ऐसा करने को मजबूर होते हैं.”

सामान्य जीवन की आस में आत्मसमर्पण

एक पोर्ट्रेट तस्वीर में कंधे तक लंबे काले बालों वाली एक महिला तीन छोटे बच्चों के पीछे बैठी है, जिनके बाल हल्के रंग के हैं और उन्होंने ऊपर कुछ नहीं पहना है. सभी बच्चे एक-दूसरे के करीब खड़े हैं और कैमरे की ओर देख रहे हैं. यह समूह धूप से जगमगाते हरे-भरे वातावरण में बाहर है.

अपने छोटे भाई के जन्म के बाद, बर्नाडीन ने आख़िरकार अधिकारियों के सामने आत्मसमर्पण करने और समझौता करने का फ़ैसला किया.

ऐसा इसलिए किया गया ताकि परिवार को कुछ हद तक सामान्य जीवन मिल सके.

शुरुआत में एफ़बीआई की जांच में ग़ैरक़ानूनी तरीक़ों और ग़लतियों के कारण उन्हें जेल नहीं जाना पड़ा. लेकिन वेदर अंडरग्राउंड के दूसरे सदस्यों के ख़िलाफ़ गवाही देने से इनकार करने पर उन्हें लगभग एक साल के लिए जेल भेज दिया गया.

ज़ायद के पिता पर न सिर्फ़ उनकी और उनके छोटे भाई की ज़िम्मेदारी आ गई, बल्कि एक अन्य क़ैद कार्यकर्ता के बच्चे की देखभाल भी उन्हें करनी पड़ी.

उस समय ज़ायद पांच साल के थे. वे दुखी और ग़ुस्से में थे और अपनी मां से घर लौट आने की गुहार लगाते थे. उनकी मां जेल से उन्हें चिट्ठियां लिखती थीं और अपनी बात समझाने की कोशिश करती थीं. ज़ायद आज भी उन चिट्ठियों को पढ़ते हैं.

ज़ायद कहते हैं, “वह लिखा करती थीं कि मां होना उनके लिए दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है. और एक क्रांतिकारी होना भी उनके लिए दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है.”

“वह अपने आदर्शों का उदाहरण देती थीं. जैसे मार्टिन लूथर किंग जूनियर, फ़्रेड हैम्पटन और मैल्कम एक्स. उनका कहना था कि ये लोग किसी मक़सद के लिए लड़े थे. और इन सभी लोगों के बच्चे भी थे.”

क्रांतिक्रारी से प्रोफ़ेसर

बड़े हो चुके ज़ायद ने चश्मा और गहरे रंग की कमीज़ पहनी हुई है और वह अपने माता-पिता के बीच खड़ा है, उसने उन्हें बाहों में भर रखा है. उसके दाहिनी ओर (तस्वीर के बाईं ओर), बर्नाडाइन ने चमड़े की जैकेट पहनी है और उसके भूरे, लहराते बालों में एक लाल फूल लगा है. उसके बाईं ओर, बिल ने टोपी पहनी है. दोनों ने ही युवा पोशाक पहनी हुई है.

आज उनके माता-पिता दोनों अस्सी साल की उम्र पार कर चुके हैं. ज़ायद उन्हें “बेहतरीन दादा-दादी” बताते हैं.

लेकिन यह सुझाव सुनकर हंस पड़ते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ उनके राजनीतिक विचार नरम पड़ गए होंगे.

भूमिगत जीवन छोड़ने के बाद उनकी मां क़ानून की प्रोफ़ेसर बन गईं. उन्होंने चार दशकों तक एक क़ानूनी क्लिनिक चलाया.

वहां वे उन लोगों की मदद करती थीं, जिनके बारे में उनका मानना था कि उन्हें एक अन्यायपूर्ण आपराधिक न्याय व्यवस्था ने निराश किया है.

उनके पिता प्रोफ़ेसर बन गए और उन्होंने सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था में सुधार को अपना मुख्य काम बना लिया.

उनके काम करने के तरीक़े बदल गए थे. लेकिन उनके विश्वास नहीं बदले थे.

ज़ायद कहते हैं, “अगर कोई उन्हें उदारवादी या मध्यमार्गी कहे, तो उन्हें बुरा लगेगा.”

(यह लेख बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के कार्यक्रम ‘आउटलुक’ के एक एपिसोड पर आधारित है. इस एपिसोड का शीर्षक था, “अमेरिका के सबसे वांछित लोग: फ़रारी में मेरा परिवार.”)

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS