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पश्चिम एशिया में हूतियों ने यमन के लाल सागर तट और बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट के आसपास तेज सैन्य बढ़त बनाकर ईरान-अमेरिका संघर्ष को एक नए थिएटर तक पहुंचा दिया है।
पश्चिम एशिया में युद्ध की लपटें अब इस्लाम के सबसे पवित्र स्थल मक्का के मुहाने तक पहुंच गई हैं। सऊदी के नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने दावा किया है कि उसने मक्का के प्रतिबंधित एयर स्पेस में दाखिल होने से पहले ही एक हूती ड्रोन को मार गिराया।
सऊदी गठबंधन ने साफ चेतावनी दी है कि “दोनों पवित्र मस्जिदों और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा हमारी ‘रेड लाइन’ है” और इसके खिलाफ सख्त जवाबी कदम उठाए जाएंगे। हालांकि, हूती विद्रोहियों के सैन्य प्रवक्ता यह्या सरी ने मक्का को निशाना बनाने के दावों को सिरे से खारिज करते हुए इसे सऊदी अरब का ‘घिसा-पिटा प्रोपेगैंडा’ करार दिया है।
हूतियों ने कैसे खोला नया मोर्चा?
पश्चिम एशिया में हूतियों ने यमन के लाल सागर तट और बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट के आसपास तेज सैन्य बढ़त बनाकर ईरान-अमेरिका संघर्ष को एक नए थिएटर तक पहुंचा दिया है। इससे सऊदी अरब पर सैन्य दबाव बढ़ा है और तेल और वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए जोखिम पैदा हुआ है।
रणनीतिक तट और द्वीप पर कब्जा
ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने यमन के लाल सागर तट पर करीब 130 किलोमीटर क्षेत्र में बढ़त बनाई। उन्होंने मोखा बंदरगाह और बाब-अल-मंदेब के प्रवेश पर स्थित मयून या पेरिम द्वीप पर कब्जा कर लिया।
बाब-अल-मंदेब लाल सागर को अदन की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ता है। यह दुनिया के प्रमुख समुद्री और ऊर्जा मार्गों में शामिल है। इस इलाके पर नियंत्रण का मतलब है कि हूती जहाजों की आवाजाही और सऊदी तेल निर्यात को प्रभावित करने की स्थिति में आ गए हैं।
सऊदी अरब पर ड्रोन और मिसाइल हमले
हूतियों ने सऊदी अरब में सैन्य ठिकानों और तेल ढांचे को निशाना बनाने के लिए ड्रोन और मिसाइल हमले किए। 14 सितंबर को उन्होंने दक्षिणी सऊदी अरब के खामिस मुशैत सैन्य अड्डे पर हमले का दावा किया। हूतियों के मुताबिक, निशाने पर एयरक्राफ्ट हैंगर, रडार, रनवे और हथियार भंडार थे।
सऊदी अरब ने एक बड़े ड्रोन हमले के बाद अपनी ईस्ट-वेस्ट तेल पाइपलाइन को एहतियाती तौर पर बंद कर दिया। यह पाइपलाइन सऊदी तेल को फारस की खाड़ी से हटाकर लाल सागर के रास्ते निर्यात करने में मदद करती है।
मक्का से लेकर जेद्दा तक साइरन की गूंज
यमन सीमा से करीब 1,100 किलोमीटर दूर मक्का में मौजूदा जंग के दौरान यह पहली बार था, जब हमलों का अलर्ट बजा। मक्का के अलावा जेद्दा, ताइफ और अल उला जैसे प्रमुख शहरों में भी खतरे के साइरन सुने गए।
इस नए घटनाक्रम ने सऊदी अरब को चौतरफा संकट में धकेल दिया है। एक तरफ उसकी दक्षिणी सीमा पर ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों का हमला तेज हो गया है, तो दूसरी तरफ उसका सबसे प्रमुख तेल निर्यात मार्ग पूरी तरह ठप पड़ा है।
ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन ठप, 108 डॉलर पहुंचा ब्रेंट क्रूड
सऊदी अरब के लिए असली सिरदर्दी उसकी अर्थव्यवस्था और तेल निर्यात को लेकर खड़ी हुई है।
पाइपलाइन पर हमला: फारस की खाड़ी में ‘स्ट्रैट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) के रास्ते तेल की सप्लाई पहले ही आधी रह गई थी। इससे बचने के लिए सऊदी अरब अपनी 1,200 Km लंबी ‘ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन’ के जरिए लाल सागर के यनबू पोर्ट से तेल भेज रहा था। लेकिन शुक्रवार को इराकी गुटों के ड्रोन हमले के बाद यह पाइपलाइन भी बंद हो गई।
वैश्विक सप्लाई को झटका: इस पाइपलाइन के बंद होने से दुनिया की करीब 4 फीसदी तेल सप्लाई अटक गई है।
कच्चे तेल में उबाल: अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें उछलकर 108 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई हैं। अबू धाबी कमर्शियल बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री मोनिका मलिक के मुताबिक, अगर यह रुकावट एक महीने तक जारी रही तो इस साल सऊदी अर्थव्यवस्था में 4.5% तक की बड़ी गिरावट आ सकती है।
10 साल की बमबारी के बाद भी क्यों बेअसर रहे हूती?
सऊदी अरब, अमेरिका, ब्रिटेन और इजराइल बीते एक दशक में हूती ठिकानों पर हजारों टन बारूद बरसा चुके हैं। अकेले 2025 में अमेरिकी वायुसेना ने 1,000 से ज्यादा ठिकानों पर 750 मिलियन डॉलर के बम गिराए, लेकिन हूतियों की कमर नहीं टूट सकी।
2015 में 30 हजार की ताकत वाला यह संगठन आज करीब 3.5 लाख लड़ाकों का नेटवर्क बन चुका है।
यमन के दुर्गम पहाड़ों में फैले होने और ईरान से मिलने वाले एडवांस गाइडेंस सिस्टम के दम पर हूती अपने हथियार खुद असेंबल कर लेते हैं।
ट्रंप का हाथ खींचना और रियाद की बेबसी
सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर सीधी सैन्य मदद मांगी थी, लेकिन वॉशिंगटन से फिलहाल केवल खुफिया जानकारीही मिल रही है। ट्रंप ने खुद कहा, “हूतियों ने हमसे संपर्क किया है, वे अमेरिका से नहीं लड़ना चाहते।”
दूसरी तरफ, सऊदी अरब ने तुर्की और पाकिस्तान के साथ जो रक्षा समझौता किया था, वह भी अभी तक कागजों से बाहर नहीं निकला है। दोनों देशों ने साफ किया है कि रियाद की तरफ से अभी कोई औपचारिक सैन्य मदद नहीं मांगी गई है।
जब तक वॉशिंगटन और तेहरान के बीच तनातनी कम नहीं होती, तब तक सऊदी अरब और हूतियों के बीच किसी समझौते की गुंजाइश बेहद कम नजर आ रही है।
हूतियों ने मोखा बंदरगाह और मयून द्वीप पर कब्जे, लाल सागर में समुद्री नाकेबंदी और सऊदी तेल ठिकानों पर हमलों के जरिए युद्ध को यमन से बाहर निकालकर वैश्विक समुद्री व्यापार और तेल सप्लाई तक पहुंचा दिया है। यही वजह है कि इसे पश्चिम एशिया के संघर्ष का नया और बेहद संवेदनशील मोर्चा कहा जा रहा है।
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