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मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य बन गया है, जिसने वक़्फ़ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के तहत राज्य वक़्फ़ बोर्ड में दो ग़ैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति की है.
राज्य सरकार ने वक़्फ़ बोर्ड का पुनर्गठन करते हुए इंदौर के मनोज मालपानी और गुना ज़िले के राघौगढ़ निवासी अनिमेष भार्गव को सदस्य बनाया है. वहीं, सनवर पटेल को दूसरी बार राज्य वक़्फ़ बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है.
मुख्यमंत्री का दावा है कि संशोधित वक़्फ़ क़ानून के प्रावधानों के अनुरूप बोर्ड का गठन करने वाला मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य है. नए बोर्ड में कुल 10 सदस्य शामिल किए गए हैं.
इससे पहले वक़्फ़ अधिनियम, 1995 के तहत राज्य वक़्फ़ बोर्डों में आमतौर पर मुस्लिम समुदाय के लोगों को ही सदस्य नामित किया जाता था.
हालांकि सरकार के इस फ़ैसले के साथ ही विवाद भी शुरू हो गया है. राजधानी भोपाल में सोमवार को ऑल इंडिया मुस्लिम त्योहार कमेटी के बैनर तले लोगों ने वक़्फ़ बोर्ड में ग़ैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया.
प्रदर्शनकारियों ने सरकार से निर्णय वापस लेने की मांग करते हुए कहा कि यह क़दम मुस्लिम समाज की धार्मिक भावनाओं के उलट है.
वक़्फ़ के नए सदस्यों का बीजेपी और संघ से संबंध
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अनिमेष भार्गव ने एमबीए (फाइनेंस) की पढ़ाई की है और उनके पास बैंकिंग क्षेत्र में 18 वर्षों का अनुभव है. इसके अलावा, उन्हें वक़्फ़ संपत्तियों से जुड़े मामलों पर काम करने का आठ वर्षों का अनुभव भी है. वर्तमान में वो बीजेपी के मीडिया पैनलिस्ट के तौर पर सक्रिय रहे हैं.
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में कहा, “वक़्फ़ बोर्ड में आने के बाद मेरी कोशिश होगी कि इसके बेहतर संचालन के लिए काम करूँ. जहां कहीं भी संसाधनों का दुरुपयोग हो रहा होगा, उसे रोकने का प्रयास किया जाएगा. साथ ही बोर्ड की आय बढ़ाने के लिए भी काम किया जाएगा.”
उन्होंने स्वीकार किया कि उनके सामने चुनौतियाँ भी होंगी, क्योंकि सबकी नज़र उन पर रहेगी. हालांकि, उनका कहना है कि उनकी प्राथमिकता संस्था के हित में काम करना और उसे अधिक प्रभावी बनाना होगी.
वहीं, इंदौर के मनोज मालपानी ने बताया कि वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यकर्ता हैं लेकिन बीजेपी से उनका कोई संबंध नहीं है. मालपानी स्नातक हैं और लंबे समय से वक़्फ़ बोर्ड से जुड़े मामलों का अध्ययन करते रहे हैं.
उन्होंने बीबीसी से कहा, “पिछले पाँच वर्षों में वक़्फ़ बोर्ड के कामकाज में पहले की तुलना में काफ़ी सुधार आया है. लेकिन सरकार का यह नया फ़ैसला व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी तथा जवाबदेह बनाने में मदद करेगा.”
उनका मानना है कि बोर्ड में दो ग़ैर-मुस्लिम सदस्यों की मौजूदगी से निर्णय प्रक्रिया में संतुलन और भरोसा बढ़ेगा. हालांकि, अन्य सदस्यों के बीच अपनी बात प्रभावी ढंग से रखना एक चुनौती भी हो सकती है.
मनोज मालपानी का कहना है कि नए सदस्यों के शामिल होने से निश्चित रूप से बदलाव आएगा और वक़्फ़ बोर्ड की कार्यप्रणाली पहले से अधिक बेहतर होगी.
मुस्लिम संगठनों ने जताई आपत्ति
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ऑल इंडिया मुस्लिम त्योहार कमेटी के संरक्षक शमशुल हसन ने कहा कि वक़्फ़ मुस्लिम समाज की एक धार्मिक और सामाजिक संस्था है, जहाँ लोग अपनी संपत्ति अल्लाह की रज़ा के लिए वक़्फ़ करते हैं.
ऐसे में वक़्फ़ बोर्ड के प्रबंधन में गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति उचित नहीं मानी जा सकती.
उन्होंने कहा कि अगर सरकार बोर्ड में नए सदस्यों को शामिल करना चाहती थी, तो मुस्लिम समाज के भीतर से सेवानिवृत्त आईएएस और आईपीएस अधिकारियों, डॉक्टरों, इंजीनियरों और अन्य विशेषज्ञों को यह ज़िम्मेदारी सौंपी जा सकती थी.
उनके अनुसार, समुदाय में योग्य और अनुभवी लोगों की कोई कमी नहीं है.
शमशुल हसन ने यह भी आरोप लगाया कि नए क़ानून के लागू होने के तुरंत बाद जल्दबाज़ी में बोर्ड का गठन किया गया.
उन्होंने सवाल उठाया कि जब मुस्लिम समाज ने कभी अयोध्या, सोमनाथ या मथुरा जैसे हिंदू धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन में प्रतिनिधित्व की माँग नहीं की, तो वक़्फ़ बोर्ड में ग़ैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने की आवश्यकता क्यों महसूस की गई.
उन्होंने कहा कि यह फ़ैसला मुस्लिम समुदाय के एक बड़े वर्ग में असहजता पैदा कर रहा है और सरकार को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए.
भोपाल में प्रदर्शन, सरकार के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी
विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारी मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के पोस्टर लेकर पहुँचे. उन्होंने सरकार पर वक़्फ़ संस्थाओं के कामकाज में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाया.
प्रदर्शनकारियों का कहना था कि वक़्फ़ संपत्तियाँ मुस्लिम समाज की धार्मिक आस्था और सामुदायिक अमानत हैं. इसलिए इनके प्रबंधन की ज़िम्मेदारी उन्हीं लोगों को दी जानी चाहिए, जिन पर समुदाय को भरोसा हो.
उन्होंने चेतावनी दी कि अगर सरकार ने अपना आदेश वापस नहीं लिया, तो इस मुद्दे को लेकर प्रदेशभर में आंदोलन चलाया जाएगा.
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वक़्फ़ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति को लेकर मुस्लिम समाज में व्यापक असहमति है और सरकार को इस फ़ैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए.
भोपाल मध्य से कांग्रेस विधायक आरिफ़ मसूद ने भी राज्य सरकार के फ़ैसले का विरोध किया है.
उन्होंने एक प्रेस वार्ता में कहा कि वक़्फ़ (संशोधन) अधिनियम की संवैधानिक वैधता का मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है.
ऐसे में, उनके अनुसार, सरकार को इतनी जल्दबाज़ी में वक़्फ़ बोर्ड का गठन नहीं करना चाहिए था. मसूद ने आरोप लगाया कि सरकार ने बोर्ड के गठन में नियमों का भी पूरी तरह पालन नहीं किया है.
उनका दावा है कि क़ानून में अन्य समुदायों के दो प्रतिनिधियों को शामिल करने का प्रावधान है, जबकि सरकार ने तीन गैर-मुस्लिम प्रतिनिधियों को बोर्ड में जगह दी है.
उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले को लेकर वे सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाएंगे.
सरकार और हिंदू संगठनों ने किया स्वागत
प्रदेश सरकार के मंत्री विश्वास कैलाश सारंग ने इस फ़ैसले का बचाव करते हुए कहा कि मध्य प्रदेश, वक़्फ़ (संशोधन) अधिनियम-2025 के प्रावधानों को लागू करने वाला देश का पहला राज्य बना है, जो गर्व की बात है.
उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और राज्य वक़्फ़ बोर्ड के अध्यक्ष सनवर पटेल को बधाई देते हुए कहा कि इस क़ानून के दूरगामी और सकारात्मक परिणाम सामने आएँगे.
सारंग ने कहा, “वक़्फ़ बोर्ड को केवल मस्जिद प्रबंधन समिति के रूप में देखना ग़लत होगा.”
उनके अनुसार, वक़्फ़ बोर्ड की ज़िम्मेदारियाँ सिर्फ़ मस्जिदों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वह बड़ी संख्या में वक़्फ़ संपत्तियों के प्रशासन, संरक्षण और प्रबंधन का काम भी करता है.
उनका कहना है कि नए ढांचे से पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी.
जहाँ मुस्लिम संगठनों ने इस फ़ैसले का विरोध किया है, वहीं कुछ हिंदू संगठनों ने इसका स्वागत किया है.
श्री हिंदू उत्सव समिति और संस्कृति बचाओ मंच के अध्यक्ष चंद्रशेखर तिवारी ने कहा कि वक़्फ़ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल किए जाने से बोर्ड की कार्यप्रणाली अधिक पारदर्शी बनेगी.
और वक़्फ़ संपत्तियों के प्रबंधन में जवाबदेही बढ़ेगी.
सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है मामला
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इस बीच, वक़्फ़ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली कई याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं.
सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा था कि अगर वक़्फ़ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल किया जा सकता है, तो क्या भविष्य में मुस्लिम समुदाय के लोगों को भी हिंदू धार्मिक ट्रस्टों और संस्थाओं के प्रबंधन में शामिल होने की अनुमति दी जाएगी.
तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने संशोधित क़ानून के विभिन्न प्रावधानों पर भी केंद्र सरकार से स्पष्टीकरण माँगा था. इनमें विशेष रूप से “वक़्फ़ बाय यूज़र” से जुड़े प्रावधान शामिल थे.
मध्य प्रदेश में नए वक़्फ़ बोर्ड के गठन के बाद यह बहस और तेज़ हो गई है कि धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन में विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधित्व की सीमा क्या होनी चाहिए.
एक ओर सरकार इसे पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रशासनिक सुधार की दिशा में उठाया गया क़दम बता रही है. वहीं, मुस्लिम संगठन इसे धार्मिक स्वायत्तता और सामुदायिक अधिकारों से जुड़ा मसला मानते हुए इसका विरोध कर रहे हैं.
आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक, सामाजिक और क़ानूनी स्तर पर बहस और तेज़ होने की संभावना है.
सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों और विभिन्न पक्षों की दलीलों के बीच इस विवाद की दिशा काफ़ी हद तक न्यायिक प्रक्रिया के आगे बढ़ने पर निर्भर करेगी.
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