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मोदी सरकार में मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रमण्यम

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सुरजीत भल्ला सितंबर 2017 से दिसंबर 2018 तक प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रहे.

अक्तूबर 2018 में भल्ला ने कहा था कि मोदी सरकार के पहले चार वर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था के सबसे अच्छे वर्ष रहे हैं. इस पद से हटने के बाद भी भल्ला मोदी सरकार की नीतियों का बचाव करते रहे.

भल्ला की पहचान मोदी समर्थक अर्थशास्त्री की थी. लेकिन अब उनका रुख़ बदल रहा है और वह खुलकर मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना कर रहे हैं.

सुरजीत भल्ला ने 21 मई को प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में एक आर्टिकल लिखा था, जिसका शीर्षक था- बीजेपी चुनाव जीत रही है लेकिन अर्थव्यवस्था हार रही है.

इस लेख में भल्ला ने मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की तीखी आलोचना की है. भल्ला ने लिखा है, ”पश्चिम बंगाल में बीजेपी की यह जीत भारतीय राजनीति में शीर्ष की सियासी कामयाबी और एक ऐतिहासिक उपलब्धि का पल है. अब बंगाल में पार्टी जिस ऊंचाई पर पहुँच चुकी है, उससे आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता 2029 में नरेंद्र मोदी के लिए और भी बड़े जनादेश का होगा.

भल्ला ने लिखा है, ”लेकिन इसी समय अर्थव्यवस्था को संभालने के मामले में बीजेपी का प्रदर्शन निचले स्तर पर पहुँचता दिख रहा है और इसकी कोई गारंटी नहीं कि स्थिति और ख़राब नहीं होगी. मुख्य सवाल यह है: क्या ये दोनों घटनाएं सिर्फ संयोग हैं या फिर एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं?

भल्ला कहते हैं, ”आर्थिक अव्यवस्था के लिए चार प्रमुख कारक ज़िम्मेदार हैं. पहला और सबसे महत्वपूर्ण ख़ुद सरकार. सरकार समस्या को पहचानती ज़रूर है, लेकिन संकट की ज़िम्मेदारी स्वीकार करने के बजाय दूसरों को दोष देने में ज़्यादा सहज है. दूसरा कारक बड़े उद्योग जगत, जो मौजूदा आर्थिक ढांचे के अहम घटक हैं.”

भारतीय अर्थव्यवस्था

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भारतीय अर्थव्यवस्था के विरोधाभास

भल्ला लिखते हैं, ”तीसरा कांग्रेस पार्टी, जो गांधी परिवार के नेतृत्व में इतनी संतुष्ट और निष्क्रिय हो चुकी है कि भारत में बीजेपी के लिए लगभग एकदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था का रास्ता साफ़ हो गया है. चौथा वह डीप स्टेट, जिसे भल्ला इन तीनों के पीछे कंट्रोलिंग पावर के रूप में देखते हैं. संकट इसलिए लगातार बना हुआ है क्योंकि अर्थव्यवस्था अब भी उस गति से बढ़ रही है, जिसे सरकार दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में प्रचारित करती है.”

भल्ला कहते हैं, ”कुछ लोगों को आर्थिक गिरावट की बात अतिशयोक्ति लग सकती है. ज़ाहिर है कि भारत लगभग छह प्रतिशत वार्षिक जीडीपी वृद्धि के साथ दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था कहलाता रहा है, जो 35 वर्षों के ऐतिहासिक औसत के आसपास है.”

”लेकिन असली बात ‘बड़ी अर्थव्यवस्था’ और 35 साल के औसत से तुलना में छिपी है. 2014 से बीजेपी शासनकाल के दौरान जीडीपी वृद्धि दर के आधार पर भारत दुनिया में नौवें स्थान पर रहा है. प्रति व्यक्ति जीडीपी वृद्धि के मामले में भारत आठवें स्थान पर और अमेरिकी डॉलर में प्रति व्यक्ति आय वृद्धि के आधार पर 16वें स्थान पर.”

भल्ला कहते हैं, ”इस अवधि में बांग्लादेश अमेरिकी डॉलर में प्रति व्यक्ति आय वृद्धि के मामले में पहले स्थान पर रहा, जहाँ औसत वार्षिक वृद्धि 8.3 प्रतिशत रही. इथियोपिया 7.2 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रहा जबकि भारत केवल 4.7 प्रतिशत के साथ 16वें स्थान पर रहा. आँकड़ों को किसी भी तरीके से देखें, अब भारत को दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था कहना छोड़ देने का समय आ गया है.”

अर्थव्यवस्था

पिछले एक साल में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुक़ाबले लगभग 12 प्रतिशत कमज़ोर हुआ है. यह लगातार सातवां वर्ष है, जब रुपये में गिरावट दर्ज की गई और 2025 में यह एशिया की सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल रहा.

भल्ला कहते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था में कई विरोधाभास हैं. वह कहते हैं, ”महंगाई नियंत्रित दिखाई देती है. चालू खाता घाटा संभालने योग्य स्तर पर है. आर्थिक वृद्धि बनी हुई है और राजनीतिक स्थिरता असामान्य रूप से मज़बूत है. सैद्धांतिक रूप से ऐसी परिस्थितियों में रुपये पर भरोसा मजबूत होना चाहिए था न कि इतना अस्थिर और कमज़ोर.”

भूटान के वरिष्ठ पत्रकार और वहाँ के अंग्रेज़ी अख़बार द भूटनीज के संपादक तेनज़िंग लामसांग ने सुरजीत भल्ला के लेख पर टिप्पणी करते हुए एक्स पर लिखा है, ”मैं सुरजीत भल्ला को 2014 के बाद से बीजेपी सरकार के सबसे बौद्धिक और कट्टर समर्थकों में से एक मानता हूँ. ऐसे व्यक्ति के रूप में जिन्होंने वर्षों तक टीवी बहसों और लेखों में सरकार के बचाव में लगभग ख़ूब तार्किक कलाबाज़ी की है. इसलिए जब वही व्यक्ति अब यह कहने लगे कि स्थिति ख़राब है, तो इसका मतलब शायद यह है कि हालात वास्तव में ज़्यादा गंभीर हो चुके हैं.”

भारतीय अर्थव्यवस्था

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अरविंद सुब्रमण्यम की आलोचना

लेकिन बात केवल सुरजीत भल्ला की नहीं है. मोदी सरकार में 2014 से 2018 तक मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रमण्यम ने भी 26 मई इंडियन एक्सप्रेस में एक आर्टिकल लिख सरकार की नीतियों की आलोचना की है.

अरविंद सुब्रमण्यम ने अपने लेख की शुरुआत में लिखा है अमेरिका के जाने-माने डिप्लोमैट और पॉलिटिकल साइंटिस्ट यूरोपीय यूनियन की सामूहिक निर्णय लेने की अक्षमता का मज़ाक उड़ाते हुए पूछा करते थे, संकट के समय आख़िर फोन किसे किया जाए?

अरविंद सुब्रमण्यम ने लिखा है, ”आज जब रुपया लगातार गिर रहा है और भारत गंभीर आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, तो वैसी ही भावना यहां भी दिखाई देती है, “आख़िर ज़िम्मेदारी किसके हाथ में है? जो भी हैं, या नहीं हैं, उन्हें बदल देना चाहिए. नेतृत्व परिवर्तन की ज़रूरत इसलिए भी है क्योंकि संकट की स्थिति में जनता और बाज़ार दोनों को यह भरोसा चाहिए होता है कि कोई निर्णायक व्यक्ति है.”

”आज ज़रूरत ऐसे विश्वसनीय चेहरे की है जो साफ़ संदेश दे सके. जैसे यूरो संकट के दौरान इटली के पूर्व प्रधानमंत्री मारियो द्रागी ने कहा था, जो भी होगा, हम देख लेंगे. दिल्ली से ख़ामोशी और दिशाहीनता दोनों दिखाई देती है, जबकि मुंबई से ऐसा लगता है मानो घटनाएं नीति-निर्माताओं पर हावी हो चुकी हों. यहां तक कि प्रधानमंत्री की ओर से किफ़ायती की अपील ने भी बाज़ार को आश्वस्त करने के बजाय चिंता बढ़ाने का काम किया.”

अरविंद सुब्रमण्यम ने लिखा है, ”इसके बाद उनका लंबा विदेश दौरा घरेलू स्तर पर निर्णयहीनता और स्पष्ट कार्ययोजना के अभाव की भावना को और मज़बूत करता दिखाई दिया. नेतृत्व परिवर्तन का एक और गंभीर कारण यह कि सरकार को केवल और ज़्यादा करने की नहीं बल्कि कुछ चीज़ें बंद करने की भी ज़रूरत हैं.”

”आज का रुपया संकट केवल ईरान युद्ध और ऊर्जा आयात पर निर्भर भारत पर पड़े उसके प्रभाव का परिणाम नहीं है. यह उतना ही या उससे भी ज़्यादा भारत की मध्यम अवधि की आर्थिक संभावनाओं को लेकर बढ़ते संदेह को दर्शाता है. युद्ध शुरू होने से पहले ही रुपया उभरते बाज़ारों वाले देशों की मुद्रा की तुलना में कमज़ोर हो चुकी थी.”

अरविंद सुब्रमण्यम

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अरविंद सुब्रमण्यम ने लिखा है, ”युद्ध से पहले के दो-तीन वर्षों में तुर्की को छोड़कर शायद ही किसी देश की मुद्रा में इतनी बड़ी गिरावट आई जितनी भारतीय रुपये में. भारतीय रिज़र्व बैंक ने उसे बचाने के लिए असाधारण स्तर पर हस्तक्षेप किया तब भी इसका कोई असर नहीं हुआ. 2022 से फ़रवरी 2026 के बीच रुपया 20 प्रतिशत से ज़्यादा गिर गया जबकि आरबीआई की हर कोशिश नाकाम रही.”

”आरबीआई का हस्तक्षेप विदेशी मुद्रा भंडार के लगभग 50 प्रतिशत के बराबर था. रुपये के इस व्यवहार ने वह सच उजागर कर दिया, जिसे आधिकारिक आंकड़े लंबे समय से छिपाए हुए थे. निवेशकों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर भरोसा कम हो रहा है. निवेशकों ने आख़िरकार उस संकेत को गंभीरता से लेना शुरू किया है जो काफ़ी समय से “रेड अलर्ट” दे रहा था.”

”2000 के शुरुआती वर्षों में निजी कॉर्पोरेट निवेश जीडीपी के लगभग 17 प्रतिशत के शिखर पर था. आज यह घटकर लगभग आधा रह गया है. कोविड के बाद थोड़े समय के लिए इसमें सुधार दिखाई दिया था, लेकिन वह भी टिक नहीं पाया. भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या कमज़ोर निजी निवेश है और इसे ज़िंदा करना सबसे अहम चुनौती.”

अरविंद सुब्रमण्यम

”लेकिन सवाल यह है कि इससे केवल नीतिगत सुधार की मांग नहीं, बल्कि नेतृत्व परिवर्तन की मांग क्यों निकलती है? सरकार के पक्ष में यह ज़रूर कहा जा सकता है कि उसने हाल के वर्षों में कारोबार करने की लागत घटाने के लिए कई सुधार लागू किए हैं. लेकिन इससे निवेशकों में भरोसा नहीं लौटा.”

अरविंद सुब्रमण्यम ने लिखा है, ”सरकार ने व्यवस्था को इस तरह मोड़ दिया है कि उसका लाभ कुछ बड़े कॉर्पोरेट घरानों को मिले जबकि दूसरे घरेलू और विदेशी निवेशक नुक़सान में रहें. इसके अलावा, संसाधनों के आवंटन और निवेश प्रवाह में बीजेपी-शासित राज्यों को प्राथमिकता देने, राज्य की दमनकारी संस्थाओं का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों और कारोबारियों के ख़िलाफ़ करने, टैक्स क़ानूनों को ज़्यादा आक्रामक और मनमाने तरीक़े से लागू करने और भारत की फेडरल निर्णय-प्रक्रिया को कमज़ोर करने जैसे क़दमों ने निवेशकों के बीच भरोसा और विश्वास पैदा करने के बजाय उसे नुक़सान पहुँचाया है.”

अरविंद सुब्रमण्यम के अनुसार, नीतिगत सुधार की मांग को आम तौर पर सरकार की करने योग्य कामों सूची बढ़ाने के रूप में देखा जाता है. लेकिन यहाँ समस्या सरकार की कुछ ग़लत प्रवृत्तियों की है और उसका समाधान क्या करना है से ज़्यादा क्या नहीं करना है, की सूची तैयार करने में है.

संजय बारू

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बढ़ता अविश्वास

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू भी शुरुआत में नरेंद्र मोदी की तारीफ़ करते थे लेकिन उनके भी स्वर बदल गए हैं.

बारू ने 24 मई को न्यू इंडियन एक्सप्रेस में लिखा था, ”2004 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार की हार और वामपंथी दलों के समर्थन वाली कांग्रेस-नेतृत्व वाली सरकार के सत्ता में आने से बाज़ारों में अस्थिरता और निवेशकों के बीच चिंता पैदा हो गई थी. लेकिन नव-निर्वाचित प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बहुत जल्दी भरोसा बहाल किया और निवेशकों की आशंकाओं को शांत कर दिया.”

संजय बारू को लगता है कि आज फिर से भारत उसी स्थिति में हैं, जहाँ निवेशकों को भरोसा नहीं है. बारू ने लिखा है, ”1991 और 2004 में कारोबारी जगत और मीडिया ने खुलकर अपनी चिंताएं व्यक्त की थीं और राजनीतिक नेतृत्व पर ऐसा माहौल बनाने का दबाव डाला था, जिससे निवेशकों का भरोसा लौट सके. लेकिन आज का मीडिया काफ़ी हद तक भयभीत और संकोची हो चुका है, जबकि कारोबारी समुदाय ज़्यादा जोखिम से बचने वाला और डरा हुआ दिखाई देता है.”

संजय बारू

बारू ने लिखा है, ”अब हर अच्छी ख़बर को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है और हर बुरी ख़बर को दबा दिया जाता है. जब भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दहलीज पर बताया जा रहा था, तब ख़ूब उत्सव मनाया गया. लेकिन आज जब भारत छठे स्थान पर पहुंच गया है, तो बहुत कम लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि ऐसा क्यों हुआ. 2017 में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि 2020 तक भारत की अर्थव्यवस्था पाँच ट्रिलियन डॉलर की हो जाएगी. फिर लक्ष्य को पहले 2022, उसके बाद 2025 तक आगे बढ़ाया गया और अंततः वह चर्चा से ही ग़ायब हो गया.”

बारू ने लिखा है, ”2026 में भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार अभी सिर्फ़ चार ट्रिलियन डॉलर से थोड़ा अधिक है. 1990 से 2025 के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था की औसत वार्षिक वृद्धि दर लगभग 6 प्रतिशत रही. 2000 से 2012 के बीच यह औसत सात प्रतिशत से अधिक था. अगर भारत को 2047 तक विकसित बनना है, तो अगले दो दशकों में औसत वार्षिक वृद्धि दर लगभग आठ प्रतिशत रखनी होगी. आख़िर पिछले एक दशक में ऐसा क्या हुआ कि 1990 से 2010 के बीच दिखाई देने वाली तेज़ विकास गति को कायम नहीं रखा जा सका?”

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SOURCE : BBC NEWS