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यूपी के सहारनपुर में मस्जिद गिराने का पूरा मामला जानिए, विपक्ष के नेताओं को हाउस अरेस्ट करने का आरोप

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Source :- BBC INDIA

सहारनपुर

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पढ़ने का समय: 6 मिनट

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में कलेक्ट्रेट कार्यालय परिसर के भीतर मौजूद एक मस्जिद को अवैध घोषित किए जाने के बाद शनिवार सुबह गिरा दिया गया.

कार्रवाई के दौरान बड़ी संख्या में पुलिस बल को तैनात किया गया था.

यह प्रशासनिक कार्रवाई चार सितंबर को ज़िला जज की अदालत के उस फ़ैसले के बाद हुई, जिसमें मस्जिद प्रबंधन समिति की अपील ख़ारिज कर दी गई और पहले के उस फ़ैसले को बरकरार रखा गया.

इसमें धार्मिक ढांचे को सरकारी ज़मीन पर अतिक्रमण माना गया था. सिटी मजिस्ट्रेट ने जुलाई में मस्जिद को अवैध घोषित करते हुए इसे गिराने का आदेश जारी किया था.

सहारनपुर के डीआईजी अभिषेक सिंह ने कहा, “सहारनपुर कलेक्ट्रेट में एक मस्जिद थी. सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने पाया कि इसे सरकारी ज़मीन पर अवैध रूप से बनाया गया था. मस्जिद कमिटी की ओर से इसे गिराए जाने के ख़िलाफ़ दायर अपील ख़ारिज कर दी गई.”

उन्होंने कहा, “क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए हमने सभी एहतियाती क़दम उठाए हैं. यह कार्रवाई करते हुए हम सभी क़ानूनी प्रक्रियाओं का पालन कर रहे हैं.”

मस्जिद गिराने से पहले, समाजवादी पार्टी की लोकसभा सांसद इक़रा हसन को कथित तौर पर कैराना स्थित उनके आवास पर नज़रबंद कर दिया गया, ताकि उन्हें सहारनपुर जाने से रोका जा सके. इक़रा हसन ने एक्स पर एक वीडियो शोयर किया है, जिसमें उन्हें पुलिसकर्मी जाने से रोक रहे हैं.

मस्जिद एक सौ साल से भी पुरानी बताई जा रही है. कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का दावा है कि मस्जिद का मालिकाना हक़ वाहिद ख़ान और याक़ूब ख़ान के नाम दर्ज है.

डीआईजी ने बताया कि त्योहारों को देखते हुए सहारनपुर में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है और सोशल मीडिया पर भी नज़र रखी जा रही है.

उन्होंने कहा कि इस मामले में कोई भी अफ़वाह फैलाने पर कार्रवाई की जाएगी.

‘लोगों को घरों में क़ैद कर मस्जिद गिरा दी गई’

कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का कहना है कि लोगों को उनके घरों में कैद करके मस्जिद गिरा दी गई

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स्थानीय पत्रकार अमित सैनी के मुताबिक़ शुक्रवार रात अचानक यह बात फैलने लगी थी कि कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद को प्रशासन रात में ही गिराने जा रहा है. देखते ही देखते यह चर्चा शहर और सोशल मीडिया तक पहुंच गई.

रात बढ़ने के साथ कलेक्ट्रेट परिसर के आसपास पुलिस बल की मौजूदगी भी बढ़ती गई.

शनिवार तड़के क़रीब चार बजे से मस्जिद को हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई.

सुबह तक मस्जिद का एक हिस्सा गिरा दिया गया था. पूरी इमारत को हटाने के लिए प्रशासन की ओर से छह बुलडोजर लगाए गए थे.

इसके बाद कलेक्ट्रेट परिसर के बाहर नेताओं और लोगों की हलचल बढ़ गई.

इस मामले पर कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा, “हमारे लोग पूरी रात जागते रहे. हम अधिकारियों से लगातार संपर्क करने की कोशिश करते रहे. सारी जानकारी देने के बावजूद मस्जिद तोड़ दी गई. दरअसल मस्जिद नहीं तोड़ी गई है, वहां संविधान की धज्जियां उड़ाई गई हैं.”

उन्होंने कहा, “यह मस्जिद सन 1911 से भी पहले की है. आज भी मस्जिद की मिल्कियत वहिद ख़ान और याक़ूब ख़ान के नाम है. सारी जानकारी देने के बाद भी सिटी मजिस्ट्रेट ने आदेश दिया. हाई कोर्ट में हर बात को नज़रअंदाज किया गया. न तो वक़्फ बोर्ड को मामले में पक्ष बनाया गया और न ही उसे कार्यवाही में शामिल किया गया.”

इमरान मसूद ने आरोप लगाया, “मस्जिद को चारों तरफ से घेर लिया गया. लोगों को उनके घरों में क़ैद कर दिया गया. इसके बाद मस्जिद गिरा दी गई.”

मस्जिद गिराए जाने पर क्या बोले ये नेता

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने सहारनपुर में मस्जिद गिराए जाने पर चिंता जताई है

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मस्जिद गिराए जाने की कार्रवाई पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा, ”सौहार्द बनाए रखना सरकार की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी होती है और उपलब्धि भी.”

बहुजन समाज पार्टी की मायावती ने मस्जिद गिराने पर लिखा, ”ज़िला सहारनपुर की मस्जिद सहित पूरे उत्तर प्रदेश में आए दिन मस्जिदों को काफ़ी आपाधापी में अवैध बताकर उनको ध्वस्त करने का जो सरकारी अभियान चल रहा है वह ठीक नहीं है. सरकार को ऐसे निगेटिव हालात से बचने के लिए इस पर तुरंत रोक लगाकर इसके समाधान के अन्य उपाय ज़रूर करने चाहिए.”

हैदराबाद से लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने एक्स पर लिखा, ”सहारनपुर कलेक्ट्रेट में मौजूद मस्जिद को आज सुबह पाँच बजे ढहा दिया गया.”

”क्या मुसलमानों के लिए अब मज़हबी आज़ादी का संवैधानिक हक़ भी नहीं बचा है? हमारी इबादतगाहों पर बार-बार कमज़ोर और मनगढ़ंत वजहों के नाम पर बुलडोज़र क्यों चलाया जाता है?”

”मस्जिद कमिटी ने 1911 के दस्तावेज़ अदालत में पेश करके यह साबित करने की कोशिश की कि यह मस्जिद कलेक्ट्रेट से पहले से मौजूद थी. एक सदी से भी ज़्यादा वक़्त से वहाँ लगातार नमाज़ होती रही है.”

”यानी यह कोई आज खड़ी कर दी गई इमारत नहीं है, बल्कि लंबे अरसे से एक इबादतगाह के तौर पर इस्तेमाल होती रही है. यही वक़्फ़ बाय यूज़र की बुनियाद है, जिसे क़ानून में भी मान्यता मिली है.”

मस्जिद गिराए जाने के बाद नज़रबंद किए गए समाजवादी पार्टी के एमएलसी शाहनवाज खान ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया, ” यह 1911 से चली आ रही मस्जिद है, जिसे आज सुबह शहर के सोते रहने के दौरान अचानक गिरा दिया गया. मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई गई.”

”अगर निचली अदालत से राहत नहीं मिलती है, तो इस देश में हर व्यक्ति को ऊपरी अदालत का दरवाज़ा खटखटाने का अधिकार है. जिस तेज़ी से यह कार्रवाई की गई, उससे गंभीर सवाल खड़े होते हैं.”

”मैं बार-बार कहता रहा हूँ कि यह मस्जिद शहर की विरासत का हिस्सा है. इस विरासत की रक्षा करना पूरे समाज की जिम्मेदारी है.”

”मैं समाज के सभी वर्गों के लोगों से अपील करता हूं कि वे आगे आएं, अपनी आवाज उठाएं और हमारे शहर की शांति, सद्भाव और विरासत को बचाने में मदद करें.”

मस्जिद विवाद में कैसे आई?

कथित अवैध मस्जिद गिराए जाने के दौरान इलाके में तैनात पुलिस

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मस्जिद पर शनिवार को हुई कार्रवाई के पीछे क़रीब डेढ़ साल से चल रहा कानूनी विवाद है.

जिला जज सत्येंद्र कुमार की अदालत ने दो सितंबर 2026 को मस्जिद पक्ष की ओर से दाखिल अपील ख़ारिज करते हुए सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह के 16 जुलाई 2026 के आदेश को बरकरार रखा था.

ज़िला अदालत ने विवादित भूमि को सरकारी भूमि माना. मस्जिद पक्ष ने सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देते हुए 20 जुलाई को अपील दाखिल की थी और अदालत में कुल 17 तारीख़ों पर सुनवाई हुई.

सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने जुलाई में मस्जिद को सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण मानते हुए बेदखली का आदेश दिया था.

आदेश में 30 दिन में परिसर ख़ाली करने के निर्देश के साथ 6 करोड़ 41 लाख 65 हजार 565 रुपये की क्षतिपूर्ति भी निर्धारित की गई थी.

मस्जिद पक्ष की ओर से अदालत में इसे वक़्फ संपत्ति बताते हुए दलील दी गई थी.

पक्ष ने मस्जिद के करीब 150 वर्ष पुरानी होने का दावा भी किया था, लेकिन अदालत में इस दावे के समर्थन में ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जा सके.

कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद को लेकर विवाद की शुरुआत बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक विकास त्यागी की शिकायत से हुई थी.

इसके बाद 24 मार्च 2025 को सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत में उत्तर प्रदेश लोक परिसर अधिनियम के तहत मामला दाखिल हुआ था.

लंबी सुनवाई के बाद 16 जुलाई 2026 को सिटी मजिस्ट्रेट ने मस्जिद को अवैध घोषित करते हुए बेदखली और ध्वस्तीकरण का आदेश दिया था.

मस्जिद पक्ष ने इस आदेश को ज़िला अदालत में चुनौती दी. क़रीब डेढ़ महीने की सुनवाई के बाद ज़िला जज की अदालत ने दो सितंबर को अपील ख़ारिज कर दी और सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा.

अब शनिवार सुबह शुरू हुई ध्वस्तीकरण की कार्रवाई ने इस पूरे विवाद को एक बार फिर शहर के केंद्र में ला दिया है.

एक तरफ अदालत के आदेश के बाद प्रशासनिक कार्रवाई हो रही है, वहीं दूसरी तरफ़ मस्जिद पक्ष की ओर से क़ानूनी और राजनीतिक स्तर पर आगे की कार्रवाई की बात कही जा रही है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS