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रावण जलते ही शुरू हो जाता है पान-जलेबी खाने का सिलसिला! जानिए दशहरे की अलग-अलग परंपराएं

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Source :- LIVE HINDUSTAN

भारत में हर तीज त्योहार को सेलिब्रेट करने का तरीका अलग-अलग है। यहां हम दशहरे के बारे में बता रहे हैं। बुराई पर अच्छाई की प्रतीक वाले इस त्योहार के दिन कुछ जगहों रावण का पुतला जलते ही पान और जलेबी खाई जाती है। जानिए दशहरे पर अलग-अलग जगहों की अनोखी परंपरा।  

दशहरा, जिसे विजयादशमी भी कहा जाता है। ये भारत के प्रमुख हिंदू त्योहारों में से एक है। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई, अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक माना है। रामायण के अनुसार, भगवान श्रीराम ने लंका के राजा रावण का वध करके माता सीता को मुक्त कराया था। इसी जीत की याद में दशहरा मनाया जाता है। कई जगहों पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले भी जलाए जाते हैं। दशहरे को पूरे भारत में अलग-अलग परंपराओं और उत्साह के साथ मनाया जाता है। भारत की कुछ जगहों पर रावण दहन के बाद पान और जलेबी खाई जाती है। ऐसी कुछ अनोखी परंपराओं और उनकी वजहों के बारे में इस आर्टिकल में जानिए।

क्या है जलेबी खाने का महत्व

दशहरे पर रावण दहन के बाद अक्सर आपने लोगों को जलेबी खाते हुए देखा होगा या फिर घर लेकर जाते हुए। ऐसा इसलिए क्योंकि माना जाता है कि भगवान श्री राम को शश्कुली नामक मिठाई बहुत पसंद थी। जिसे आजकल जलेबी के नाम से जाना जाता है। इसलिए रावण पर विजय के बाद जलेबी खाकर खुशी मनाई जाती है। उत्तर भारत के कई हिस्सों में दशहरे के अवसर पर जलेबी खाना शुभ माना जाता है। कुछ मान्यताओं के अनुसार, जलेबी की मिठास विजय की खुशी, सुख-समृद्धि और जीवन में खुशहाली का प्रतीक है।

पान खाने का महत्व है खास

दशहरे पर पान खाने की परंपरा हिंदू धर्म की मान्यताओं और लोक-परंपराओं से जुड़ी हुई है। दरअसल दशहरे पर भगवान श्रीराम की रावण पर विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस दिन पान के पत्ते को शुभ और मंगलकारी माना जाता है। हिंदू धर्म में पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान पान के पत्तों का खास महत्त्व होता है। ऐसे में कई जगहों पर दशहरे के दिन एक-दूसरे को पान खिलाकर शुभकामनाएं देते हैं। यह परंपरा प्रेम, सम्मान, खुशहाली और आपसी मेल-मिलाप का प्रतीक मानी जाती है। हालांकि, पान खाने की यह प्रथा हर क्षेत्र में एक जैसी नहीं है, बल्कि अलग-अलगजगहों पर इसके पीछे अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं।

शमी के पत्ते बांटना

महाराष्ट्र और कुछ दूसरे हिस्सों में दशहरे पर शमी के पत्ते एक-दूसरे को दिए जाते हैं। इन्हें प्रतीकात्मक रूप से सोना मानकर बांटना सुख-समृद्धि और शुभकामनाओं का संकेत है। शमी के पत्ते बांटते समय लोग एक-दूसरे के सुख, सौभाग्य और उन्नति की कामना करते हैं। इसका मुख्य संदेश है कि हम अपने प्रियजनों के जीवन में खुशहाली, सफलता और समृद्धि की कामना करें।

दशहरे के दिन टीका लगाना

दशहरे पर फॉलो की जाने वाली परंपराओ में से एक टीका लगाना भी है। घर के बड़े-बुजुर्ग परिवार के छोटे सदस्यों के माथे पर सिंदूर, दही और चावल का टीका लगाते हैं। ऐसा करके घर के बड़े सुख-समृद्धि, सफलता और लंबी उम्र का आशीर्वाद देते हैं। ये एक बहुत अनोखी और खास परंपरा है जिसे खासतौर से नेपाल में फॉलो किया जाता है।

शस्त्र पूजा

इस दिन कर्तव्य, ज्ञान और सुरक्षा के सम्मान में औजारों, किताबों और हथियारों की पूजा की जाती है। साउथ की जगहों पर इसका खास महत्व है और हर कोई इसे फॉलो करता है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN