Source :- BBC INDIA
इमेज स्रोत, Getty Images
प्रकाशित
पढ़ने का समय: 9 मिनट
हाल ही में दिल्ली में जंतर-मंतर पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में जहां बाबा साहब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की चर्चा के साथ ही जय भीम के नारों की गूंज रही.
उस आंदोलन के कुछ दिनों बाद ही उसी जंतर-मंतर पर आरक्षण के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन हुए.
आरक्षण हटाओ आंदोलन के बैनर तले हो रहे इन प्रदर्शनों से आरक्षण की बहस एक बार फिर राजनीति के केंद्र में आ गई है.
लेकिन बीजेपी के लिए यह सिर्फ़ आरक्षण की नीति पर बहस नहीं है, यह उसके सामने खड़ी एक बड़ी राजनीतिक चुनौती है.
एक तरफ जनरल कैटेगरी के उस वर्ग की नाराज़गी है जो लंबे समय से उसके समर्थन का मूल आधार रहा है. दूसरी तरफ अन्य पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के समुदाय हैं, जिनमें बीजेपी ने पिछले एक दशक में अपना सामाजिक आधार बढ़ाया है.
इनके बीच उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अब कुछ ही महीने दूर है. ऐसे में सवाल यह भी है कि बीजेपी आरक्षण को लेकर उठ रही इन नई मांगों का जवाब कैसे देगी, वह भी बिना अपने एक समर्थक समूह को दूसरे से दूर किए हुए.
यही बीजेपी की असली राजनीतिक दुविधा है.
राजनीतिक संतुलन का संकट
प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

क्या बीजेपी अनारक्षित जातियों की चिंताओं को संबोधित करते हुए ओबीसी, एससी और एसटी समुदायों के बीच अपने समर्थन को बनाए रख पाएगी? या आरक्षण की बहस एक बार फिर उसके लिए वही मुश्किल राजनीतिक संतुलन पैदा करेगी, जिसमें एक समर्थन समूह को आश्वस्त करने की कोशिश दूसरे समूह में असुरक्षा पैदा कर सकती है.
‘द लेंस’ में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने इस पर तीन विषयों के विशेषज्ञों से चर्चा की. इस विषय के राजनीतिक पहलू पर बात की अमर उजाला से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार हिमांशु मिश्रा से.
दलितों के संदर्भ में आरक्षण पर जो सामाजिक बहस शुरू हुई है, उस पर बात की दलित विषयों पर लगातार लिखने वाली स्तंभकार तथा आंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में असोसिएट प्रोफ़ेसर अदिति नारायणी पासवान से.
और आरक्षण हटाने की हालिया मुहिम के सामाजिक असर पर चर्चा की टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेस के वाइस चांसलर प्रोफ़ेसर बद्री नारायण से.
आंदोलन बीजेपी के ख़िलाफ़ है या आरक्षण के ख़िलाफ़?

जिस तरह से बीजेपी ने धीरे-धीरे अपना एक जातियों का बुके या गुलदस्ता बनाकर अपना आधार बढ़ाया है, यह उसके ख़िलाफ़ है या यह सिर्फ़ आरक्षण के ख़िलाफ़ आंदोलन है?
इस सवाल के जवाब में हिमांशु मिश्रा कहते हैं कि बीजेपी ने जातियों का एक बुके तैयार किया और यह सिलसिला 2014 में मोदी युग के साथ शुरू हुआ. उससे पहले बीजेपी को लोकसभा में 22% के आसपास वोट मिलते थे… वह सैंतीस फ़ीसदी तक पहुंच गए. बीजेपी अपने मूल वोटर, ऊंची जातियों, से आगे बढ़ी थी.
“बीजेपी के मूल वोट बैंक, सवर्णों, को लगता था कि उनकी हित रक्षक बीजेपी ही है. लेकिन बीजेपी ने जातियों का गुलदस्ता बना दिया तो इन्हें लगा कि बीजेपी इनसे पीछा छुड़ा रही है, इसलिए इसको सबक सिखाया जाना चाहिए.”
वह कहते हैं कि मोदी युग शुरू होने के बाद से, इस आरक्षण विरोधी आंदोलन से पहली बार लग रहा है कि बीजेपी के मूल वोट बैंक में हलचल है और पार्टी को समझ नहीं आ रहा कि वह इस मामले में क्या करे.
इनकी (आरक्षण विरोधी आंदोलन के प्रतिनिधियों की) जेपी नड्डा से मुलाकात हुई है लेकिन दिक्कत यह है कि बीजेपी इनकी इस मांग का समर्थन नहीं कर सकती कि आरक्षण मेरिट के आधार पर हो. क्योंकि बीजेपी अगर ऐसा करेगी तो वह ओबीसी के वोट बैंक की कीमत पर करेगी.
बीजेपी को अपना स्टैंड साफ़ करना पड़ेगा

यह तो पार्टी के पक्ष से बात हुई. अब जो लोग आंदोलनकारी हैं या सवर्ण हैं उनके पक्ष से बात देखें… अगर बीजेपी नहीं तो कौन? आखिर उन्हें भी कहीं न कहीं अपना राजनीतिक नेतृत्व देखना पड़ेगा. तो इस आंदोलन के ज़रिए किसी नए नेतृत्व की संभावना नज़र आती है या उदासीनता के संकेत हैं?
ज़्यादातर उदासीनता की ही स्थिति है. देश में सबसे ज़्यादा युवा आबादी है लेकिन उस हिसाब से रोज़गार नहीं है.
अब अच्छी क्वालिटी की शिक्षा का सवाल उठ रहा है, रोज़गार का सवाल उठ रहा है लेकिन विपक्ष में ऐसा कोई नेता नहीं दिखता जो इसे कैच कर ले.
सीजेपी आंदोलन में भी किसी युवा में विपक्ष के किसी नेता के प्रति कोई आकर्षण नहीं दिखा. कई युवाओं का कहना था कि एक वर्ग ने इस व्यवस्था में अपने लिए जो इंडिया बनाया है, उसमें भारत के लिए जगह नहीं है.
और चूंकि यह आभासी माध्यम से उठे हुए हैं – चाहे सीजेपी हो या आरक्षण विरोधी आंदोलन हो, इनका कोई चेहरा नहीं है. इसलिए यह असमंजस की स्थिति बनी रहेगी.
अगले साल की शुरुआत में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने दीजिए, तब पता चलेगा कि सोशल मीडिया के जरिए जो स्वतः स्फूर्त आंदोलन आया है या इससे उपजी राजनीति का ऊंट है, वह किस करवट बैठेगा?
आर्थिक आधार पर आरक्षण नहीं हटा सकतेः अदिति पासवान

अगर कथित सामान्य वर्ग का कोई युवा कहता है कि मैं गरीब परिवार में पैदा हुआ और मैं इस (आरक्षण) व्यवस्था से प्रभावित हो रहा हूं… आप उसको कैसे समझाएंगे?
इस सवाल के जवाब में अदिति नारायणी पासवान कहती हैं कि कुछ लोग मानते हैं कि दलित समाज के जो लोग संपन्न हो गए हैं उन्हें अब आरक्षण नहीं मिलना चाहिए. तो पहले यह समझने की ज़रूरत है कि संपन्न का मतलब क्या है? आपको उस पैमाने की व्याख्या करने की ज़रूरत है.
वह कहती हैं कि आर्थिक आधार से आरक्षण एससी-एसटी को नहीं मिला था. अगर आप उसको हटाने की बात करेंगे तो आर्थिक आधार से नहीं होगा. आपको आर्थिक के आगे बढ़ना होगा… समाज में उनकी क्या रूपरेखा है, उनकी डिग्निटी, उनके प्रतिनिधित्व, उनके इंसाफ़ के बारे में बात करनी पड़ेगी. बहुत सारी ऐसी चीजे़ं हैं, बहुत सारे पैमाने हैं जिनके बारे में बात करने की ज़रूरत है.
आरक्षण से ‘सवर्णों’ के प्रभावित होने की बात पर वह जवाब देती हैं, “अगर आप गरीब वर्ग से आते हो तो सरकार ने ईडब्ल्यूएस कैटेगरी आपके लिए बनाई है. आप उस कैटेगरी में प्रतिस्पर्धा करेंगे, आप हमारी कैटेगरी में हैं ही नहीं. हम सब अपनी-अपनी कैटेगरी में लड़ रहे हैं.”
आज अगर आप किसी युवा से बात करें और कहें कि एक दलित आईएएस अफ़सर है… क्या आपके माता पिता उससे शादी करने को तैयार होंगे?
आपको उनका जवाब मिल जाएगा.
सवाल उठता है कि जातियों के अंदर भी तो कुछ उप-जातियां हैं जो संपन्न हो सकती हैं… इसका सामना कैसे किया जाएगा?
इसके जवाब में अदिति कहती हैं कि इसकी समीक्षा किए जाने की ज़रूरत है. वह कहती हैं, “अब बिहार में ही अनुसूचित जाति के अंदर 25 से 27 उप-जातियां हैं. उनमें से ऐसे बहुत सारी ऐसी जातियां हैं- मुसहर, भुइयां या पासवान… जिनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व बहुत है और दूसरे समाज का नहीं है.”
“आप इस पर एक अध्ययन करिए, श्वेत पत्र तैयार करिए… फिर देखा जाना चाहिए किस हद तक और किन पैमानों पर इस समाज का सशक्तीकरण हुआ है और कहां पर यह आज भी पीछे है.”
“आपको लगता है कि इस देश में जितने केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं, उनमें वाइस चांसलर इन समाज से आने लगे हैं? न्यूज़रूम में बैठे लोग इस समाज से आने लगे हैं? लोगों को यह दिक्कत है कि हम लोग लाभार्थी हैं लेकिन बात ये है कि एक दलित के रूप में हम लोग सिर्फ़ लाभार्थी नहीं रहना चाहते, हम लोग भी निर्णायक संस्थाओं का हिस्सा बनना चाहते हैं.”
‘हमदर्दी नहीं, बराबरी चाहिए’

कहा जा रहा है कि इस साल की शुरुआत में यूजीसी से जुड़े हुए जो प्रावधान आए थे, वहां से एक नाराज़गी पैदा हुई और यह आरक्षण विरोधी आंदोलन शुरू हुआ. क्या सवर्णों की चिंताएं जायज़ हैं?
अदिति इसका दो टूक जवाब देती हैं – बिल्कुल भी नहीं.
वह कहती हैं कि बहुत बार ऐसा होता है कि दलित समाज के स्टूडेंट्स के पीएचडी सबमिशन को आठ-आठ साल तक रोका जाता है. इतने समय में उनकी मानसिक स्थिति पर असर पड़ने लगता है. जब वह अपनी पीएचडी पूरी नहीं कर पाते, उनकी नौकरी पाने की संभावनाओं पर असर पड़ता है.
“आप देखेंगे कि हमारे समाज के लोगों को हमेशा इंटरव्यू में कम नंबर मिलते हैं. ऐसा क्यों होता है? क्या इंग्लिश बोलने में कमी है? किस चीज़ में कमी है? आप वह नहीं बताएंगे कि हमें क्या काम करने की ज़रूरत है? अगर हमें सुधार की ज़रूरत है, कहां करें?”
यूजीसी नोटिफ़िकेशन पर वह कहती हैं कि यूजीसी का जो नोटिफ़िकेशन आया था उसमें कहा गया था कि वह एक ऐसा सेल बनाएंगे जिसमें अगर कोई भी जाति के आधार पर कुछ भेदभाव महसूस करे, तो वह आकर बात कर सकता है.
“हर चीज़ में सुधार का एक तंत्र (रिड्रेसल मैकेनिज़्म) बना हुआ है और जो यूजीसी नोटिफ़िकेशन में साफ़ किया गया था कि ऐसे मामलों में एक समिति बनेगी. उस समिति में उस कॉलेज के प्रिंसिपल होंगे, उस कॉलेज के एससी-एसटी प्रतिनिधि होंगे, उस कॉलेज की गवर्निंग बॉडी बैठेगी.
ये सारे प्रतिनिधि होंगे, मतलब सब समाज के लोग वहां बैठेंगे और ऐसे मामलों को सुना जाएगा. तो कोई भी फ़ेक केस में आपको फंसा नहीं सकता.”
‘लोकतंत्र ने जाति को कमज़ोर किया’

आपने जाति के ऊपर काफी अध्ययन किया है. उनकी लामबंदी, उनकी एकजुटता के ऊपर. आरक्षण हटाओ आंदोलन के तौर पर जो चीज़ें हो रही हैं, क्या कोई नई लामबंदी दिखाई पड़ रही है?
इस सवाल पर प्रोफ़ेसर बद्री नारायण कहते हैं कि सामाजिक श्रेणियों की जो समझ थी, ज़मीनी स्तर पर उसमें बहुत परिवर्तन आया है.
“पहले भूमिधर वर्ग में सवर्ण जातियां ही आती थीं. लेकिन आप पिछले 20-30 सालों का भूमि रिकॉर्ड देखें तो उसमें ओबीसी के कई समाज सशक्त हुए हैं. भूमि का हस्तांतरण हुआ है, उनके हाथ में ज़मीन आई है.”
“दूसरा परिवर्तन यह हुआ है कि जातिपन में एक तरह की कमी आपको दिखाई पड़ेगी, क्योंकि आधुनिकता आई है. इसने उसमें काफ़ी परिवर्तन किया है. लोकतंत्र ने जाति को एक तरफ से कमज़ोर किया है लेकिन चुनावी लोकतंत्र ने जाति को मज़बूत भी किया है. यह अपने आप में बड़ा विरोधाभासी है.”
जिस तरह की जागरूकता इस समय हम देख रहे हैं, वह सामाजिक है या राजनीतिक पहचान का उभार?
बद्री नारायण कहते हैं जाति अपने दैनंदिन जीवन में कमजोर हुई है. अस्पृश्यता के स्तर पर देखिए, वह कितनी कम हुई है. अब शायद ही ऐसे वास्तविक मामले कहीं आपको दिखाई पड़ें. साथ में खाना शुरू हुआ है. अंतरजातीय विवाह भी शुरू हुए हैं.
“जो हमारा नया वर्ग पैदा हुआ है. ये जिसे हम जेन-ज़ी कहते हैं, वह बहुत सारी चीजों को नहीं मानता. रोज़मर्रा के जीवन में ज़्यादातर समय जब वह अपने दोस्तों के साथ होता है, तो जाति नहीं होती. लेकिन जैसे ही राजनीति का कोई मुद्दा आता है, ध्रुवीकरण का कोई मुद्दा आता है तो जाति उभर जाती है.”
मेरिट बड़ा मामला नहीं है

आरक्षण हटाओ आंदोलन में एक शब्द ‘मेरिट’ बार-बार आता है. मेरिट इस पूरे आंदोलन, इस पूरी व्यवस्था को कैसे डिफ़ाइन करती है?
प्रोफ़ेसर बद्री नारायण के अनुसार मेरिट बहुत सापेक्ष शब्द (रिलेटिव टर्म) है. कहीं मेरिट का कोई अर्थ होता है, कहीं मेरिट को किसी और तरह से लिया जाता है. मेरिट का जाति से बहुत मतलब होता नहीं है. मेरिट तो बहुत व्यक्तिगत क्षमता भी है ना. मेरिट इस तरह के मुद्दों में शायद ज़्यादा बड़ा मामला नहीं है.
“मुद्दा है असमानता, बढ़ती असमानता. असमानता की नई-नई विवेचनाओं का और जो समाज क्योंकि एक ही तरह से नहीं रहता, बदलता रहता है.”
वह कहते हैं कि सरकार ने हॉरिज़ॉन्टल और वर्टिकल, दोनों असमानता के समाधान की कोशिश की है. उससे शायद इस तरह के आंदोलनों के बहुत शक्तिमान होने में कमी आएगी.
लेकिन दूसरी तरफ सोशल मीडिया इसको बहुत नई शक्ति देगा. आप अच्छा कर रहे हैं, उससे ज़्यादा सोशल मीडिया या और दूसरे मीडिया में आपको दिखाना पड़ेगा कि आप अच्छा कर रहे हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट… सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.
और जानें
शॉर्ट वीडियो
प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
-

वीडियो, जब पाकिस्तान के एक एक्शन से इंग्लैंड ने जीता टेस्ट मैच, अवधि 1,42
-

वीडियो, बुलेट ट्रेन मुसीबत में फंसी तो एक पक्षी से मदद मिली, अवधि 1,10
-

वीडियो, व्हेल और डॉल्फ़िन को दूसरे महाद्वीप कैसे ले जाया गया, अवधि 0,36
-

वीडियो, नेपाल: जब 97 साल की बुज़ुर्ग ‘योद्धा’ की तरह मुस्कुराईं, अवधि 1,10
-

वीडियो, नेपाल: त्रिशूली में बाढ़ और भारी तबाही के बाद कैसे चल रहा है बचाव कार्य?, अवधि 1,29
-

वीडियो, नेपाल: भारी बाढ़ के बीच कुछ यूं खड़ा रहा ये पुल, अवधि 0,33
-

वीडियो, नेपाल में बाढ़: किसी को पति तो किसी को भाई की तलाश, अवधि 1,01
-

वीडियो, नेपाल में बाढ़ के बाद बुज़ुर्ग महिला को ऐसे बचाया गया, अवधि 0,53
-

वीडियो, नेपाल की भोटेकोशी नदी में आई बाढ़, 17 शव बरामद, अवधि 1,32
-

वीडियो, नेपाल बाढ़ की ड्रोन फ़ुटेज, अवधि 0,52
-

वीडियो, नेपाल में आई भीषण बाढ़, बहते दिखे कई गांव, अवधि 0,55
-

वीडियो, जब गुरुग्राम की सड़क पर हो गया इतना बड़ा गड्ढा, अवधि 0,27
-

वीडियो, पाकिस्तान: अस्पताल में आग लगने से 14 नवजातों की मौत, अवधि 1,09
-

वीडियो, फ़िल्ममेकर कुकु कोहली को पत्नी अरुणा ईरानी ने दी अंतिम विदाई, अवधि 0,52
-

वीडियो, चीनी की जगह मिठास के लिए और विकल्प क्या हैं?, अवधि 1,32
-

वीडियो, गुरमीत राम रहीम फिर जेल से बाहर, अवधि 0,46
शॉर्ट वीडियो का अंत
SOURCE : BBC NEWS




















