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विदेशी मीडिया में भारत के चुनाव आयोग की चर्चा किस रूप में हो रही है?

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Source :- BBC INDIA

ज्ञानेश कुमार

प्रकाशित

पढ़ने का समय: 9 मिनट

भारत में चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद की रिपोर्ट की चर्चा विदेशी मीडिया में भी हो रही है.

भारत के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया था कि दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में आयोग की ओर से लिए गए फ़ैसले को लेकर 14 बार आपत्तियां जताई थीं.

अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक़ दोनों चुनाव आयुक्तों का कहना था कि इस दौरान लिए गए अहम फ़ैसलों में उन्हें शामिल नहीं किया गया था.

‘इंडियन एक्सप्रेस’ की इस रिपोर्ट के बाद पूरे देश में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार चर्चा में हैं.

वहीं अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इस पर टिप्पणियां छप रही हैं.

‘चुनाव व्यवस्था के अंदर गंभीर आपत्तियों के संकेत’

नई दिल्ली में भारत निर्वाचन आयोग की सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मी

अमेरिकी अख़बार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की इस रिपोर्ट का ज़िक्र करते हुए लिखा है, ”भारत के चुनाव आयोग ने ऐसी चीज़ों को तेज़ी से लागू किया, जिनसे करोड़ों लोगों के मतदान से वंचित होने का ख़तरा पैदा हो गया. इसी दौरान तीन चुनाव आयुक्तों में से दो ने इन क़दमों की क़ानूनी वैधता को लेकर आपत्ति जताई थी. बुधवार को भारत के एक प्रमुख अख़बार में प्रकाशित एक सनसनीखेज रिपोर्ट में यह बात सामने आई है.”

न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है, ”भारत में विपक्षी दल अक्सर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाते रहे हैं कि वो मतदान प्रक्रिया पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल अपनी भारतीय जनता पार्टी की सत्ता मज़बूत करने के लिए करते हैं. लेकिन यह रिपोर्ट पहली बार चुनाव व्यवस्था के भीतर से उठ रही गंभीर आपत्तियां के संकेत दे रही है.”

न्यूयॉर्क टाइम्स लिखता है, ”अख़बार की जांच का मुख्य फ़ोकस स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) नाम की प्रक्रिया पर था. यह प्रक्रिया पिछले साल शुरू हुई थी. इसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की मतदाता सूचियों को दुरुस्त करने की कोशिश के तौर पर पेश किया गया था. लेकिन शुरुआत से ही इसे गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा.”

”यह प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है. इसमें काफ़ी अव्यवस्था रही है और देश के सबसे ग़रीब लोगों पर ऐसे दस्तावेज जमा करने का बोझ पड़ा है, जिनकी ज़रूरतें कई बार एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं. इस साल की शुरुआत में पश्चिम बंगाल में एक बेहद कड़े मुकाबले वाले चुनाव से पहले, जिसमें मोदी की पार्टी ने सत्तारूढ़ दल को हरा दिया, मतदाता सूची के संशोधन के दौरान लाखों लोगों के नाम हटा दिए गए थे.”

‘एसआईआर बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना’

 एसआईआर

अमेरिकी मीडिया आउटलेट ‘ब्लूमबर्ग’ ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए लिखा है, ”एसआईआर में योग्य मतदाताओं के नाम हटाए जाने और इससे चुनावी नतीजों पर असर पड़ने की आशंका ने इस प्रक्रिया को राजनीतिक मुद्दा बना दिया है.”

ब्लूमबर्ग ने लिखा, ”सितंबर के अंत में इस मुद्दे पर फिर सवाल उठे, जब अख़बार ‘ इंडियन एक्सप्रेस’ ने ख़बर दी कि तीन चुनाव आयुक्तों में से दो ने दस महीने की अवधि में कम से कम 14 बार इस प्रक्रिया को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त के सामने चिंता जताई थी. चुनाव आयोग ने इस ख़बर का खंडन किया है.”

”हाल में चुनाव आयोग के भीतर से कथित असहमति की ख़बरों ने चुनावों की निगरानी करने वाली इस संस्था पर और सवाल खड़े किए हैं. पिछले एक साल में राज्य विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी की लगातार जीत के बाद मतदाता सूची की सफाई का मुद्दा राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील हो गया है.”

”अप्रैल में पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले मतदाता सूची से क़रीब 90 लाख नाम हटाए गए थे. इसके बाद बीजेपी ने पहली बार पश्चिम बंगाल में बड़ी जीत हासिल की. पिछले साल बिहार में भी विधानसभा चुनाव से पहले इसी तरह मतदाता सूची का पुनरीक्षण किया गया था. वहां भी बीजेपी और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों ने जीत हासिल की.”

”बीजेपी ने इन आरोपों से इनकार किया है. राजनीतिक विश्लेषकों में भी इस बात पर मतभेद है कि पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों पर एसआईआर का कितना असर पड़ा.”

”द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट आयोग के आंतरिक रिकॉर्ड और उन अधिकारियों के इंटरव्यू पर आधारित थी, जिनकी पहचान अख़बार ने जाहिर नहीं की. रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने 10 महीने में कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज कराई. इनमें मतदाताओं के नाम जोड़ने और हटाने के साथ मतदाता सूची के प्रबंधन वाले सिस्टम के बढ़ते केंद्रीकरण को लेकर चिंताएं शामिल थीं.”

ब्लूमबर्ग ने लिखा, ”दोनों आयुक्तों ने यह भी कहा कि कुछ फ़ैसले लिए गए और आदेश जारी किए गए, लेकिन इसकी जानकारी उन्हें नहीं थी. विपक्षी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने बुधवार को नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “यह बेहद गंभीर मुद्दा है. यह हमारे लोकतंत्र के लिए घातक है.”

‘विधानसभा चुनावों में होगी मोदी की लोकप्रियता की परीक्षा’

नरेंद्र मोदी

ब्रिटिश अख़बार ‘फ़ाइनेंशियल टाइम्स’ ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट आने के बाद ज्ञानेश कुमार और सरकार के ख़िलाफ़ होने वाले प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग की है.

अख़बार लिखता है, ”भारत में पुलिस ने कई शहरों में आंसू गैस के गोले छोड़े और पानी की बौछार की. पुलिस ने दर्जनों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में भी लिया. ये लोग देश के मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफ़े की मांग कर रहे थे. आरोप है कि चुनाव आयोग ने ग़लत तरीक़े से लाखों लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए हैं.”

फ़ाइनैंशियल टाइम्स ने लिखा, ”इन प्रदर्शनों का आह्वान विपक्षी कांग्रेस पार्टी और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने किया था. उनका आरोप है कि पिछले एक साल में मतदाता सूचियों से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से राजनीतिक मुक़ाबले का संतुलन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में झुक गया है. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की अध्यक्षता वाले चुनाव आयोग ने किसी भी ग़लत काम से इनकार किया है.”

”कांग्रेस पार्टी ने एक बयान में कहा कि आज नागरिक और कांग्रेस कार्यकर्ता अपने वोट के मौलिक अधिकार को छीने जाने और मुख्य चुनाव आयुक्त की सुनियोजित हरकतों के लिए जवाबदेही की मांग करते हुए सड़कों पर उतरे.”

एफ़टी ने लिखा है, ”जून 2025 में शुरू हुए देशव्यापी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) के दौरान क़रीब 13 करोड़ लोगों के नाम शुरुआती वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं. इनमें से कई लोगों ने नाम हटाए जाने के ख़िलाफ़ अपील की, जिसके बाद उनके नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल किए गए. हालांकि, अब तक अंतिम आंकड़ा जारी नहीं किया गया है कि कितने लोगों के नाम वास्तव में मतदाता सूची से हटे हैं.”

अख़बार ने लिखा, ”प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 2029 तक लोकसभा चुनाव में वोट डालने वाले मतदाताओं का सामना नहीं करना पड़ेगा. लेकिन अगले साल भारत का सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं. इसके साथ ही प्रधानमंत्री मोदी के गृह राज्य गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनाव उनकी लोकप्रियता के लिए अहम राजनीतिक टेस्ट होंगे.”

”सरकार का कहना है कि मतदाता वोटर लिस्ट का रिवीजन एक सामान्य प्रक्रिया है. इसका मक़सद वोटर लिस्ट को अपडेट रखना और जिन लोगों की मृत्यु हो चुकी है, उनका इससे नाम हटाना है.”

‘कॉकरोच जनता पार्टी की चेतावनी’

कॉकरोच जनता पार्टी

क़तर के न्यूज आउटलेट ‘अल जज़ीरा’ ने चुनाव आयोग से जुड़ी ख़बर प्रकाशित होने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन का ज़िक्र करते हुए लिखा है ‘कॉकरोच’ पार्टी के युवा आंदोलनकारियों ने चेतावनी दी है कि अगर देश के मुख्य चुनाव आयुक्त शनिवार तक इस्तीफ़ा नहीं देते हैं, तो वह देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू करेगा.

”जुलाई में कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में हुए प्रदर्शनों के बाद प्रश्नपत्र लीक होने के मामले में मोदी सरकार के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफ़ा दिया था. 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद यह मोदी के लिए सबसे बड़े राजनीतिक झटकों में से एक था.”

”मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने शुक्रवार को देशभर में राज्य चुनाव कार्यालयों के बाहर विरोध मार्च निकालने की घोषणा की. पार्टी ने ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी, उन्हें पद से हटाने और उनके कार्यकाल में लिए गए फैसलों और मतदाता सूची में किए गए बदलावों की स्वतंत्र समीक्षा की मांग की.”

‘अल जज़ीरा’ ने लिखा, ”विपक्षी दल लंबे समय से चुनाव आयोग पर आरोप लगाते रहे हैं कि उसने बिना किसी सूचना के लाखों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए और बीजेपी को फ़ायदा पहुंचाने के लिए बिना उचित सत्यापन के नए मतदाताओं के नाम जोड़ दिए.”

”बीजेपी ने चुनाव आयोग का बचाव करते हुए विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह लगातार चुनाव हारने के कारण आयोग के ख़िलाफ़ बदनाम करने का अभियान चला रहा है. बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने बुधवार को कहा कि भारत का चुनाव आयोग या भारत की कोई भी संवैधानिक संस्था किसी तानाशाही शासन के अधीन नहीं है.”

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार

जर्मनी के प्रसारक डीडब्ल्यू ने भी भारत के चुनाव आयोग के भीतर मतभेद की ख़बरों को लेकर बढ़ते विवाद का ज़िक्र किया है.

डीडब्ल्यू ने लिखा है कि शुक्रवार को दिल्ली में विभिन्न संगठनों के प्रदर्शनकारी जुटे और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे़ की मांग की.

गुरुवार को कॉकरोच जनता पार्टी ने ज्ञानेश कुमार को इस्तीफ़ा देने के लिए 48 घंटे का समय दिया था. पार्टी ने चेतावनी दी थी कि अगर उन्होंने इस्तीफ़ा नहीं दिया तो वह जंतर-मंतर पर दोबारा प्रदर्शन समेत देशभर में आंदोलन शुरू करेगी.

शुक्रवार को सीपीआई (एमएल) लिबरेशन लिबरेशन के नेता दीपांकर भट्टाचार्य, आइसा की नेता नेहा बोरा ( जो जंतर-मंतर पर हुए पहले प्रदर्शन के दौरान भूख हड़ताल पर बैठी थीं) , वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण और सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव भी प्रदर्शन में शामिल हुए.

दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर के आसपास भारी बैरिकेडिंग कर रखी थी और प्रदर्शनकारियों को निर्धारित प्रदर्शन स्थल में प्रवेश नहीं करने दिया. मौके पर पहुंचने के कुछ ही मिनटों के भीतर कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में ले लिया गया.

डीडब्ल्यू से बात करते हुए नेहा बोरा ने चुनाव आयोग पर “वोट चोरी” करने और लोकतंत्र के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया.

उन्होंने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की और कहा कि प्रदर्शनकारी अपना आंदोलन जारी रखेंगे.

दीपांकर भट्टाचार्य ने डीडब्ल्यू से कहा कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) को ख़त्म किया जाना चाहिए और कई राज्यों में नए सिरे से चुनाव कराए जाने चाहिए.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS