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विरोध-प्रदर्शनों में नाराज़गी केवल चुनाव आयोग से है या मोदी सरकार के रवैये से?

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Source :- BBC INDIA

10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान एक प्रदर्शनकारी को ले जातीं पुलिसकर्मी

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पढ़ने का समय: 9 मिनट

2026 में युवाओं से जुड़े विरोध प्रदर्शनों का दायरा सिर्फ़ रोज़गार या परीक्षा तक सीमित नहीं रहा है.

परीक्षा और नौकरी के सवालों से शुरू हुए युवा आंदोलनों के बाद अब मतदाता सूची और चुनाव आयोग को लेकर भी युवा समूहों और विपक्षी दलों के प्रदर्शन हो रहे हैं.

आज का सवाल यह है कि युवा किन मुद्दों पर सड़क पर आ रहा है और क्यों?

क्या रोज़गार की चिंता धीरे-धीरे संस्थाओं पर भरोसे की चिंता में बदल रही है? क्या परीक्षा में निष्पक्षता का सवाल और चुनाव में निष्पक्षता का सवाल, दोनों के पीछे व्यवस्था से न्याय मिलने के भरोसे का सवाल है?

या फिर विश्लेषक अलग-अलग मुद्दों और अलग-अलग आंदोलनों को जोड़कर एक बड़ी कहानी बना रहे हैं, जबकि ज़मीन पर तस्वीर इतनी सीधी नहीं है?

सवाल सरकार के लिए भी है. क्या हर विरोध प्रदर्शन को राजनीतिक लामबंदी या विपक्षी राजनीति के चश्मे से देखना पर्याप्त है?

या सरकार को यह भी पूछना होगा कि अगर लाखों युवा किसी व्यवस्था की विश्वसनीयता और उस पर अपने भरोसे को लेकर सवाल उठा रहे हैं, तो उस व्यवस्था में ऐसा क्या बदला जाए, जिससे सिर्फ़ नियम ही नहीं, बल्कि भरोसा भी बहाल हो?

सवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने भी है कि उन्हें इतने सालों से जो जनसमर्थन हासिल रहा है, क्या उसका आधार खिसक रहा है? आगे जो युवा मतदाता के रूप में आने वाले हैं, क्या उन्हें जोड़ना बीजेपी के लिए एक चुनौती साबित हो रही है?

इन सब पहलुओं की पड़ताल के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने बात की सीएसडीएस से जुड़े राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार, भारतीय जनता पार्टी के नेता प्रोफे़सर गौरव वल्लभ और राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी से.

‘यह सरकार लोगों की नहीं सुन रही’

दिल्ली में भारी पुलिसबल की तैनाती के बावजूद लोग सड़कों पर विरोध करने उतरे

नौकरियों और दूसरे विषयों को लेकर युवाओं के सामने जो समस्याएं हैं, वे अचानक पैदा नहीं हुई हैं. ये पिछले 10-15 साल या उससे भी पहले से बनी रही हैं. लेकिन आज एक के बाद एक आंदोलन हो रहे हैं. इसे युवाओं के संदर्भ में देखें तो क्या बदलाव हुआ है या क्या बदल रहा है?

इस सवाल के जवाब में संजय कुमार बताते हैं कि पिछले 30-35 साल से नियमित रूप से किए जाने वाले सर्वेक्षणों के दौरान एक सवाल ज़रूर पूछा जाता है कि आपके सामने या देश के सामने सबसे बड़ी समस्या क्या है?

वह कहते हैं कि आमतौर पर हर सर्वे में बेरोज़गारी एक बड़ी समस्या बनकर दिखाई पड़ती है.

युवा इस सवाल के जवाब में यही कहते हैं कि बेरोज़गारी सबसे बड़ी समस्या है.

इसलिए यह कहना ठीक है कि अचानक ऐसा कुछ नहीं हुआ, जिसके कारण दिल्ली की सड़कों और देश के अलग-अलग शहरों में इतना बड़ा विरोध प्रदर्शन दिखाई पड़ रहा है.

संजय कुमार के अनुसार, युवाओं के अलावा अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों और देश की आम जनता को भी कहीं न कहीं यह अहसास होने लगा कि सरकार उनकी बात नहीं सुन रही है.

इसी का नतीजा है कि आज दिल्ली और दूसरे शहरों की सड़कों पर जनता का आक्रोश दिखाई पड़ रहा है.

लेकिन सत्ताधारी बीजेपी से जुड़े प्रोफ़ेसर गौरव वल्लभ कहते हैं कि सरकार असहमति का स्वागत करती है. छात्रों के मुद्दे थे. सरकार ने उन्हें सुना और स्वीकार किया. कुछ मुद्दे वास्तविक थे, उनके समाधान के लिए सशक्त समिति बनाई और उन्हें हल करने का संकल्प लिया.

संजय कुमार का कोट

इसके साथ ही वह कहते हैं कि कुछ राजनीतिक पार्टियाँ उस असहमति के ऊपर सवार होकर अपने राजनीतिक उल्लू सीधे करना चाहती हैं.

“ध्यान रहे, ये भारत के युवा हैं. ये सब जानते हैं. ये कभी भी निराश और कुंठित लोगों को आगे बढ़ाने वाले नहीं हैं. जो लोग भारत की प्रगति में अवरोध पैदा करना चाहते हैं, हमें उन सभी दिमाग़ी नक्सलियों से भी सावधान रहना है.”

राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी को लगता है कि परिस्थितियां करवट ले रही हैं. वह कहती हैं कि वाजपेयी के ज़माने से मध्यम वर्ग भारतीय जनता पार्टी का पक्का समर्थक रहा है. अब वहाँ असंतोष दिखाई दे रहा है. नरेंद्र मोदी अपने आप में एक परिघटना रहे हैं लेकिन ऐसा लग रहा है जैसे कोई निर्णायक मोड़ आ रहा है.

उनके अनुसार यह मुद्दा लोगों को बहुत परेशान कर रहा है. अगर उनका वोट देने का हक़ उनसे छीन लिया जाता है, उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए जाते हैं, तो ग़रीबों को कल्याणकारी योजनाओं के तहत जो चीज़ें मिलती हैं, वे भी ख़त्म हो जाएंगी. उनके लिए यह दोहरा प्रहार हुआ.

“इसका मतलब यह हुआ कि अगर मुझे तकलीफ़ है, पीड़ा है और मुझे वह नहीं मिल रहा है जो मुझे मिलना चाहिए, तो मैं अपनी सरकार बदलने के लिए वोट भी नहीं दे पाऊँगी. समाज के आख़िरी तबके में यह शक पैदा होना, यह बेचैनी होना कि हमारे मतदान के अधिकार को लेकर कुछ ठीक नहीं हो रहा है, लोगों को परेशान कर रहा है.”

‘वे लोकतंत्र को कमज़ोर करना चाहते हैं’

10 अक्टूबर को दिल्ली में अभूतपूर्व पुलिस बंदोबस्त रहा

जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शनों को लेकर सरकार की कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों को रोकने की कोशिशों पर सवाल उठ रहे हैं एक लोकतांत्रिक देश में यह कितना जायज़ है?

इस पर गौरव वल्लभ कहते हैं कि किसी भी युवा को अपनी असहमति दर्ज कराने का पूरा अधिकार है. उसके लिए मुद्दे उठाइए, रचनात्मक चर्चा और बहस कीजिए और अपने विचार दीजिए. सरकार भी उन बातों पर अमल करेगी.

“मैं किसी के लिए कोई टिप्पणी नहीं कर रहा हूँ. मैं तो सीजेपी के बच्चों से भी कहना चाहता हूँ कि आपने अपनी चिंताएँ उठाईं, हमने आपको बुलाकर आपकी बात सुनी. अब आप भारत-विरोधी ताक़तों को अपने मंच पर मत आने दीजिए.”

एसआईआर के विरोध को लेकर वह कहते हैं कि इस पर सर्वोच्च न्यायालय भी सुनवाई कर रहा है. चुनाव आयोग राजनीतिक दलों की बात सुनने के लिए तैयार है.

“लेकिन आप रोज़ दोपहर का खाना खाकर, कनॉट प्लेस के पाँच सितारा और अच्छे रेस्तराँ में भोजन करके सड़कों पर निकल जाएँ और अराजकता फैलाएँ. संवैधानिक संस्थाओं के लिए आप अपशब्द कहें और उन्हें कमज़ोर करें. लेकिन यह सब क्यों किया जा रहा है? उनका संवैधानिक संस्थाओं से कोई लेना-देना नहीं है. वे लोकतंत्र को कमज़ोर करना चाहते हैं.”

गौरव वल्लभ का कोट

नीरजा चौधरी इस पूरे प्रकरण को अलग तरह से देखती हैं. वह कहती हैं कि कॉकरोच जनता पार्टी के जून-जुलाई में हुए प्रदर्शनों और 20 जुलाई को संसद के सामने जिस तरह हिंसा हुई, उसके बाद सरकार को लेकर जो डर था, वह ख़त्म होता जा रहा है.

लोगों के साथ अब विपक्षी पार्टियाँ, ख़ास तौर पर कांग्रेस, जुड़ती चली जा रही हैं.

राहुल गांधी हिरासत में लिए जाने के लिए तैयार हैं और सड़कों पर लेट रहे हैं. विपक्ष की दूसरी पार्टियाँ भी उतर रही हैं.

बीजेपी और कांग्रेस दोनों के खेमों से दूर नवीन पटनायक का बीजू जनता दल भी इसमें शामिल हुआ. अरविंद केजरीवाल की पार्टी, जो विपक्षी गठबंधन इंडिया से अलग हो गई थी, वह भी शामिल हुई.

इस तरह कारवाँ बनता चला जा रहा है.

हालांकि संजय कुमार इस मामले को अलग तरह से देखते हैं. वह कहते हैं कि इस वक़्त ये मुद्दे हैं. लेकिन जब चुनाव आ जाएगा, तो यही पार्टियाँ विरोध प्रदर्शन से हटकर चुनाव में व्यस्त हो जाएँगी, क्योंकि उन्हें चुनाव लड़ना है.

जब उत्तर प्रदेश, पंजाब और अन्य राज्यों के चुनाव आएँगे, तो ये मुद्दे धीरे-धीरे पीछे चले जाएँगे और उस समय चुनाव के मुद्दे हावी हो जाएंगे.

उस वक़्त ऐसे कई मतदाता हो सकते हैं, जो इस समय विरोध प्रदर्शन में शामिल हैं और बीजेपी के ख़िलाफ़ अपना आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं. लेकिन चुनाव के दिन हो सकता है कि वे सिर्फ़ इसी मुद्दे पर वोट न करें.

उनके सामने कई और मुद्दे होंगे और वोट देने का मन बनाते समय हो सकता है कि वे दूसरे मुद्दों के आधार पर अपना वोट देने का निर्णय लें.

‘हम वोट की पवित्रता के लिए लड़ेंगे’

सुरक्षाकर्मी किसी भी प्रदर्शनकारी को जंतर-मंतर जाने की इजाज़त नहीं दे रहे थे

इस समय जो माहौल है, उसे सरकार-विरोधी माहौल के तौर पर देखा जाए या व्यवस्था-विरोधी माहौल के तौर पर?

इस सवाल के जवाब में संजय कुमार कहते हैं, “मुझे ऐसा नहीं लगता कि ये प्रदर्शन सरकार के कामकाज़ के ख़िलाफ़ हैं, क्योंकि कोई ऐसा संकेत मुझे दिखाई नहीं पड़ता जिससे लगे कि लोग सरकार के कामकाज़ से नाराज़ हैं. दूसरी बात यह है कि क्या संस्थाओं से नाराज़गी है? संस्थाएँ तो कई हैं. देश को चलाने के लिए तमाम तरह की संस्थाएँ होती हैं. लेकिन अगर कोई नाराज़गी दिखाई पड़ती है, तो सिर्फ़ एक ही संस्था है और वह है चुनाव आयोग.”

“कुल मिलाकर नाराज़गी सिर्फ एक ही बात से है कि चुनाव आयोग ने एसआईआर के तहत मतदाताओं को जोड़ने और नाम हटाने का जो काम किया, क्या वह ठीक से हुआ या नहीं? सारा आक्रोश और सारी नाराज़गी सिर्फ़ चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ दिखाई पड़ती है, न कि सरकार के कामकाज़ से या किसी अन्य संस्था से.”

हालांकि नीरजा चौधरी को लगता है कि इन प्रदर्शनों का असर व्यापक हो सकता है क्योंकि प्रदर्शन करने वाली पीढ़ी अलग है.

वह कहती हैं, “मुझे लगता है कि यह नई पीढ़ी, ख़ास तौर पर शिक्षित मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग, सवाल करना सीख गई है. वह सवाल कर रही है. वह बेपरवाह है और स्थापित मान्यताओं को चुनौती देती है. लेकिन आरएसएस, बीजेपी और एबीवीपी से जुड़े जो नौजवान हैं, शायद उन्हें सवाल करने का प्रशिक्षण नहीं मिला है. उन्हें सवाल करना सिखाया नहीं जाता. जो तय लाइन है, उसी का पालन कीजिए.”

नीरजा चौधरी का कोट

“कॉकरोच जनता पार्टी के इन नौजवानों को सुनिए. वे कह रहे हैं कि हमें अपने भविष्य की फ़िक्र है. हमें देश के भविष्य के बारे में सोचना है. इसीलिए हम बाहर निकलेंगे. हिरासत में लिया जाता है तो लिया जाए. सरकार जो करना चाहती है, करे. हम अपनी आवाज़ उठाने वाले हैं. हम वोट की पवित्रता के लिए लड़ेंगे.”

सीजेपी शिक्षा, स्वास्थ्य और परीक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग कर रही है. अभी यह कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है, बल्कि एक दबाव समूह है. इसमें विपक्षी पार्टियाँ जुड़ गई हैं.

तो इसका क्या असर होगा?

नीरजा चौधरी कहती हैं, “मुझे लगता है कि इसका असर सभी संस्थाओं पर पड़ेगा. जैसे-जैसे लोग शांतिपूर्वक सड़कों पर उतरते हैं, नौकरशाह भी सावधान हो जाते हैं, राजनीतिक पार्टियाँ भी सावधान हो जाती हैं और न्यायपालिका भी शायद इस बात को लेकर सतर्क हो जाती है कि उसकी भूमिका क्या है.”

“ये सब प्रक्रियाएँ समानांतर चल रही हैं. यह सब कहाँ जाकर रुकेगा, आज कहना बहुत मुश्किल है. आज बीजेपी के लिए यह बहुत बड़ी समस्या बन गई है.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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