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वो वादा, जिसकी वजह से ईरान से आए पारसी भी गुजराती बोलने लगे

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Source :- BBC INDIA

क्या आप जानते हैं कि ईरान से आए पारसी गुजराती कैसे बोलने लगे और उनकी गुजराती में यह ख़ास लहजा कहां से आया?

‘अशोक पारसी था’ जाने-माने गुजराती हास्य लेखक ज्योतींद्र दवे का लिखा एक बेहद लोकप्रिय व्यंग्यात्मक निबंध है.

ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो मौर्य वंश के राजा सम्राट अशोक पारसी नहीं थे. लेकिन ज्योतींद्र दवे ने अपनी किताब ‘रंगतरंग भाग-1’ में इस शीर्षक से एक मज़ेदार लेख लिखा था.

इस लेख में उन्होंने पारसी समुदाय की ख़ास गुजराती बोली, उनके लहजे और तौर-तरीक़ों का इस्तेमाल करके हास्य पैदा किया है.

लेखक ने अपने अनोखे अंदाज़ में तर्क और कल्पनाओं का सहारा लेकर यह साबित करने की कोशिश की है कि सम्राट अशोक असल में पारसी थे. हालांकि, उन्होंने ऐसा केवल मनोरंजन के लिए किया है.

ज्योतींद्र दवे का यह लेख गुजराती हास्य साहित्य की बेहतरीन रचनाओं में गिना जाता है. इसमें दो काल्पनिक पारसी दोस्तों रुस्तमजी और फ़रामजी के बीच मज़ेदार बातचीत दिखाई गई है.

‘तो फिर अशोकजी भी हमारा ही हुआ न’

पारसी इतिहासकारों के मुताबिक़, अरबों ने ईरान में “भयानक क़त्लेआम” किया और ज़रथुश्ती धर्म को मानने वाले “पारसियों पर इस्लाम धर्म अपनाने का दबाव” डाला.

अख़बार एक तरफ़ रखते हुए रुस्तमजी हैरानी से कहते हैं, “अरे फ़रामजी, तुझे कुछ पता है? ये हिंदू और बौद्ध लोग जिसे अपना महान राजा ‘अशोक’ कहते हैं न, वह असल में हमारा पारसी बेटा था, पारसी.”

हाथ में चाय की प्याली लिए फ़रामजी यक़ीन न करते हुए कहते हैं, “चल न यार रुस्तम. क्या बेकार की बातें कर रहा है? वह तो मौर्य वंश का बड़ा राजा था, मगध का. वह हमारा पारसी कहां से हो गया?”

रुस्तमजी मेज़ पर हाथ मारकर कहते हैं, “अरे बेटा, तेरी अक़्ल कहां चली गई है? ज़रा उसका नाम तो देख. इतिहास में उसे क्या कहा गया है? ‘राजा अशोकजी’. अब तू ही बता, नाम के पीछे ‘जी’ लगाने का हक़ किसका है? जमशेदजी, कावसजी, फ़रामजी… तो फिर अशोकजी भी हमारा ही हुआ न. इन लोगों ने हमारा नाम चुरा लिया.”

फ़रामजी थोड़ा सोचकर कहते हैं, “हां यार, बात में दम तो है. लेकिन उसने पत्थरों पर जो कुछ खुदवाया है, उसका क्या?”

रुस्तमजी हंसकर कहते हैं, “अरे, वही तो सबसे बड़ा सबूत है. आम आदमी काग़ज़ पर लिखता है, लेकिन ये अशोकजी पत्थर और चट्टान लेकर बैठ जाता था. हर जगह दीवारों और पत्थरों पर अपना नाम और क़ानून खुदवाने की ऐसी अजीब आदत सिर्फ़ पारसी मिज़ाज में ही हो सकती है. वह असल में हमारा नवसारी का ही रहा होगा.”

फ़रामजी उत्साहित होकर कहते हैं, “ओ ख़ोदा. फिर तो कलिंग की लड़ाई में ख़ून की नदियां देखकर उसने तलवार भी फेंक दी थी न?”

रुस्तमजी कहते हैं, “हां, बिल्कुल. लड़ाई के मैदान में इतनी हिंसा और इतने मरे हुए लोगों को देखकर उस बेचारे दयालु पारसी का दिल कांप गया. उसके मुंह से निकल गया, ‘ओ माय गॉड, ये मैंने क्या कर दिया? ये तो बहुत बड़ा लोचा हो गया.’ इसके बाद उसने हिंसा छोड़ दी और शांति का रास्ता अपना लिया.”

ज्योतींद्र दवे सूरत के रहने वाले थे और उन्होंने मुंबई में भी लंबा समय बिताया था. ये दोनों शहर पारसी संस्कृति और उनकी अनोखी बोली के प्रमुख केंद्र रहे हैं.

यही वजह है कि उन्होंने पारसी समुदाय के लहजे को बहुत बारीकी से समझा और उसे लिखित रूप दिया. इसे पढ़ते समय पाठक के मन में पारसी बोली की वही ख़ास आवाज़ गूंजने लगती है.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि ईरान से आए पारसी गुजराती कैसे बोलने लगे और उनकी गुजराती में यह ख़ास लहजा कहां से आया?

ईरान से संजान पहुंचे और गुजराती अपनाई

पारसियों के भारत के साथ व्यापारिक और सामाजिक संबंध पहले से थे.

क़रीब आठवीं शताब्दी में ईरान, जिसे उस समय फ़ारस कहा जाता था, में धार्मिक बदलाव और हमलों का दौर चल रहा था.

उस समय ज़रथुश्ती धर्म को मानने वाले पारसी समुद्र के रास्ते भारत आने के लिए निकल पड़े.

वैसे पारसियों के भारत के साथ व्यापारिक और सामाजिक संबंध पहले से थे. लेकिन एक मान्यता के मुताबिक़, जब ईरान पर अरबों का हमला हुआ तो पारसी “अपने धर्म को बचाने” के लिए सबसे पहले भारत में दीव पहुंचे.

दीव में 19 साल बिताने के बाद वे संजान गए.

‘क़िस्सा-ए-संजान’ को पारसी इतिहास का एकमात्र ग्रंथ माना जाता है. इसे नवसारी के पारसी धर्मगुरु बहरमन कैकोबाद संजाना ने क़रीब 1600 ईस्वी में लिखा था.

इस किताब में दी गई जानकारी को लेकर अलग-अलग मत हैं. इसकी कुछ जानकारियां आपस में मेल नहीं खातीं. इस कारण कुछ इतिहासकार इसे पूरी तरह सही मानने को तैयार नहीं हैं.

इसके बावजूद इसे गुजरात में पारसियों के आने की जानकारी देने वाला एकमात्र स्रोत कहा जाता है.

इस किताब में बताया गया है कि पारसी साल 775 में संजान पहुंचे थे. हालांकि, कुछ इतिहासकारों का मानना है कि वे साल 716 में आए थे.

किताब के मुताबिक़, उस समय संजान पर जादी राणा का शासन था.

हालांकि, इस नाम का कोई राजा उस समय था या नहीं, इसे लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है.

'क़िस्सा-ए-संजान' को गुजरात में पारसियों के आने की जानकारी देने वाला एकमात्र स्रोत कहा जाता है.

‘क़िस्सा-ए-संजान’ में लिखा है कि पारसियों ने जादी राणा के सामने ज़रथुश्ती धर्म के 16 सिद्धांत रखे थे. इन्हें सुनने के बाद राजा ने कुछ शर्तों के साथ उन्हें शरण देने का फ़ैसला किया.

पारसी इतिहासकार और भारत के अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष केरसी देबू ने बीबीसी गुजराती से कहा, “राजा ने पारसियों के सामने स्थानीय भाषा अपनाने की शर्त रखी थी. इसके साथ उनसे स्थानीय पहनावा अपनाने, शादी रात में करने, हथियार न रखने और किसी का धर्म परिवर्तन न कराने का वादा लिया गया था. अपने इसी वादे के कारण पारसियों ने गुजराती बोलना शुरू किया.”

नवसारी के ‘सर कावसजी जहांगीर नवसारी ज़रथुश्ती मदरसा’ के पूर्व प्रिंसिपल और पारसी इतिहास के जानकार दारा जोखी ने बीबीसी गुजराती से कहा, “पारसी गुजरात में दूध में चीनी की तरह घुल-मिल गए. ज़ाहिर है, उन्हें स्थानीय लोगों के साथ उनकी भाषा में ही बातचीत करनी थी. इसलिए समय के साथ उन्होंने गुजराती अपना ली. वे जहां गए, वहीं के होकर रहे.”

अवेस्ता, पहलवी और प्राचीन ईरानी भाषाओं के जानकार और मुंबई यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डॉक्टर परवेज़ बजान ने बीबीसी गुजराती से कहा, “हमारे पूर्वजों ने इन शर्तों को मानकर अपना धर्म नहीं बदला था. लेकिन इससे उनके जीवन में एक सामाजिक बदलाव आया. समय के साथ गुजराती ही उनकी मातृभाषा बन गई.”

पारसियों का ख़ास लहजा कैसे बना?

ईरान से आए पारसियों के लिए गुजराती के 'ળ' (ळ), 'ણ' (ण), 'શ' (श) और 'ષ' (ष) जैसे कुछ अक्षरों का साफ़ उच्चारण करना मुश्किल था.

ईरान से आए पारसियों के लिए गुजराती के ‘ળ’ (ळ), ‘ણ’ (ण), ‘શ’ (श) और ‘ષ’ (ष) जैसे कुछ अक्षरों का साफ़ उच्चारण करना मुश्किल था.

इसलिए उन्होंने शब्दों को अपने लहजे के मुताबिक़ ढाल लिया. इससे बोलने का एक अनोखा अंदाज़ बना, जिसे आज हम ‘पारसी बोली’ के नाम से जानते हैं.

डॉक्टर परवेज़ बजान कहते हैं, “पुराने फ़ारस में अरबों के हमले के बाद जब पारसी बचते-बचाते घूम रहे थे, तब वे अपनी मूल भाषा बोलने के बजाय बीच में दूसरे शब्द डाल देते थे, ताकि उनकी पहचान सामने न आए.”

“उस समय ज़रथुश्ती के रूप में पहचान सामने आना उनके जीवन के लिए ख़तरा था. इस भाषा का नाम ‘दरी’ पड़ा. दरी बोलने की वजह से भी पारसियों का लहजा बदल गया.”

दारा जोखी बताते हैं, “शुरुआत में पारसियों को गुजरात के तटीय इलाक़ों में रहना पड़ा. वहां उनका संपर्क स्थानीय आदिवासियों से हुआ.”

“रोज़ाना की बातचीत के कारण फ़ारसी और गुजराती आपस में मिलने लगीं. स्थानीय भाषा की कुछ आवाज़ों के उच्चारण में उनकी जीभ और तालू ठीक तरह से तालमेल नहीं बैठा पाए. इस कारण उनकी बोली का रूप बदल गया.”

वह कहते हैं, “गुजरात में कहा जाता है कि हर 12 गांव के बाद बोली बदल जाती है. पारसी जब मराठी बोलने वाले इलाक़ों में गए तो वहां की बोली बोलने लगे.”

“दहाणू, वांसदा और वसई में वे स्थानीय समुदायों के साथ घुल-मिल गए. इससे उनकी बोली में दूसरी भाषाएं भी शामिल होती चली गईं.”

पारसियों के धार्मिक ग्रंथ अवेस्ता भाषा में लिखे गए थे. अब यह भाषा किसी को नहीं आती. उस समय फ़ारसी या पहलवी का चलन था. आधुनिक फ़ारसी बाद में बोली जाने लगी.

डॉक्टर परवेज़ बजान कहते हैं, “वैदिक काल की संस्कृत और अवेस्ता भाषा में काफ़ी समानता है. जब पारसी पहली बार गुजरात आए थे, तब शुद्ध गुजराती भी अस्तित्व में नहीं आई थी.”

“अवेस्ता और संस्कृत के श्लोकों में कई समानताएं दिखाई देती हैं. उस समय हमारे पारसी विद्वानों ने संस्कृत पढ़ी और हमारे ग्रंथों का संस्कृत में अनुवाद किया.”

वह कहते हैं, “आज भी कई पारसी विद्वानों के किए हुए पवित्र ग्रंथों के संस्कृत अनुवाद की पांडुलिपियां मौजूद हैं.”

पारसी लेखन मंडल की प्रकाशित किताब ‘गुजराती शैली तथा लेखन पद्धति’ में इतिहासकार और लेखक शापुरजी कावसजी होडीवाला लिखते हैं, “निचले तबके के लोगों के संपर्क में आने से पारसियों की भाषा बिगड़ गई. समय के साथ पारसियों में फ़ारसी बोलने का चलन भी बढ़ा. गुजराती के व्याकरण और शब्दों के रूप में बदलाव आने लगा.”

पारसी गुजराती

पारसी गुजराती, शुद्ध गुजराती का एक दिलचस्प और मीठा रूप है. इसमें फ़ारसी, अंग्रेज़ी और गुजराती का मेल दिखाई देता है.

भाषा केवल बातचीत का ज़रिया नहीं होती. वह किसी समुदाय के इतिहास, संस्कृति, मिज़ाज और पहचान से भी जुड़ी होती है.

दुनिया भर में और ख़ास तौर पर भारत में पारसी समुदाय की आबादी बहुत कम है. इसके बावजूद यह समुदाय अपनी अलग जीवनशैली के लिए जाना जाता है.

पारसियों की इस ख़ास पहचान का एक बड़ा हिस्सा उनकी अनोखी ‘पारसी बोली’ है.

दारा जोखी बताते हैं, “जब पारसी मुग़लों के संपर्क में आए तो उन्होंने फ़ारसी बोलना शुरू किया.”

“दक्षिण गुजरात में पुर्तगालियों के आने के बाद पारसियों के उनके साथ भी संबंध बने. इस कारण सिलवासा और दीव-दमन में रहने वाले पारसी पुर्तगाली भाषा के संपर्क में आए.”

“बाद में अंग्रेज़ों के साथ संपर्क बढ़ा तो उन्होंने अंग्रेज़ी भी अपना ली. इस तरह अलग-अलग लोगों की बोलियां उनकी भाषा में मिलती चली गईं.”

‘गुजराती शैली तथा लेखन पद्धति’ में शापुरजी कावसजी होडीवाला लिखते हैं, “कवि प्रेमानंद के समय पारसी मोबेद यानी धर्मगुरु रुस्तम पेशुतन हमजियार हुए थे.”

“उन्होंने उस समय की शुद्ध गुजराती में क़रीब साल 1680 में ‘श्यावक्षनामा’, ‘ज़रथोस्तनामा’, ‘वीराफ़नामा’ और ‘अस्पंदियारनामा’ जैसे ग्रंथ लिखे थे. इन ग्रंथों में गुजराती की वर्तनी पर बहुत ज़्यादा ध्यान नहीं दिया गया था.”

पारसी समुदाय में शिक्षा का काफ़ी प्रसार था. साल 1819 में फ़रदूनजी मरज़बान ने पहली बार ‘मुंबई समाचार’ अख़बार निकाला. इसके बाद 1831 में ‘जाम-ए-जमशेद’ की शुरुआत हुई.

शापुरजी कावसजी होडीवाला लिखते हैं, “इन रचनाओं में घर में बोली जाने वाली भाषा का असर ज़्यादा था. इसलिए इन अख़बारों और दूसरी रचनाओं में मिली-जुली भाषा का इस्तेमाल बढ़ता गया. इसी वजह से हिंदू भाइयों ने इसे ‘पारसी गुजराती’ नाम दिया.”

वह लिखते हैं, “हालांकि, कुछ ऐसी प्रमुख हस्तियां भी थीं जिन्होंने इस आरोप को ग़लत साबित किया. बहरामजी मलाबारी, जमशेदजी पीटिट, ख़ुर्शेदजी फ़रामरोज़ और अरदेशर ख़बरदार जैसे लेखकों ने गुजराती भाषा में कम या ज़्यादा सुधार किया.”

पारसी गुजराती, शुद्ध गुजराती का एक दिलचस्प और मीठा रूप है. इसमें फ़ारसी, अंग्रेज़ी और गुजराती का मेल दिखाई देता है.

यह बोली सुनने में जितनी मीठी और मज़ेदार लगती है, इसका इतिहास भी उतना ही दिलचस्प है.

पारसी लेखकों ने शुद्ध और ठेठ गुजराती की जगह अपने ख़ास उच्चारण वाली ‘पारसी गुजराती बोली’ में ही ज़्यादातर नाटक, हास्य लेख और दूसरी साहित्यिक रचनाएं लिखीं.

उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं और साहित्य के ज़रिए इस बोली को और जीवंत और मज़ेदार बनाया.

पारसी गुजराती के अनोखे और मज़ेदार शब्द

पारसियों ने जब गुजराती अपनाई तो उसमें फ़ारसी और अंग्रेज़ी को मिलाकर अपनी अलग पहचान बनाई.

पारसियों ने जब गुजराती अपनाई तो उसमें फ़ारसी और अंग्रेज़ी को मिलाकर अपनी अलग पहचान बनाई.

उनकी बोली में इस्तेमाल होने वाले कुछ मशहूर और मज़ेदार शब्द और मुहावरे इस तरह हैं.

‘एवण तो फ़ोटो फ़्रेम थई गया’: इसका मतलब है कि वे गुज़र गए या उनका निधन हो गया.

‘तंबू में साहब’: यह कोई ख़ुशख़बरी देने का मज़ेदार संकेत है. इसका मतलब है कि कोई महिला गर्भवती है.

‘विकेट पूरी थई गई’: किसी के निधन की ख़बर देने के लिए क्रिकेट की भाषा में इस्तेमाल होने वाला वाक्य.

‘फेंकोलॉजी मास्टर’: बहुत बड़ी-बड़ी बातें करने या डींगें हांकने वाले व्यक्ति को पारसी इस नाम से बुलाते हैं.

‘माई घी’ या ‘दूध पाऊं’: बहुत नरम, भोले या डरपोक स्वभाव वाले लड़के के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द.

‘भेजा नु दही करवूं’: दिमाग़ ख़राब करना या बहुत परेशान करना.

पानी को ‘पानि’ और आलू को ‘पपेटा’ कहना: पारसी गुजराती के ‘ण’ अक्षर का बहुत हल्का उच्चारण करते हैं और इसे ‘न’ की तरह बोलते हैं.

कुछ मशहूर पारसी शब्द

मायजी या बावजी: मां को 'मायजी' या 'माय' और पिता को 'बावजी' कहा जाता है.

एवण या तेवण: ‘वे’ या ‘वे लोग’ कहने के लिए पारसी एवण या तेवण शब्द का इस्तेमाल करते हैं.

दीकरा या दीकरी: इन शब्दों का इस्तेमाल केवल अपने बेटे या बेटी के लिए नहीं होता. उम्र में छोटे किसी भी व्यक्ति को प्यार से बुलाने के लिए ये शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं.

मायजी या बावजी: मां को ‘मायजी’ या ‘माय’ और पिता को ‘बावजी’ कहा जाता है.

ख़ोदायजी: भगवान या ईश्वर यानी ख़ुदा के लिए पारसी इस शब्द का इस्तेमाल करते हैं.

पोइरी या पोइरो: लड़की या लड़का. यह मराठी के ‘पोरी’ शब्द से आया है और मुंबई के पारसियों में ज़्यादा प्रचलित है.

घेलो या घेली: पागल. इसका इस्तेमाल प्यार या मज़ाक़ में किया जाता है.

चवली: बहुत ज़्यादा बात करने या दूसरों के मामलों में पड़ने वाला व्यक्ति.

मरे रे: हैरानी, अफ़सोस या परेशानी ज़ाहिर करने के लिए बोला जाने वाला शब्द. इसका इस्तेमाल ‘ओह माय गॉड’ की तरह किया जाता है.

भोंयतलियूं: घर की निचली मंज़िल या ज़मीन.

पारसी बोली की ख़ास बातें

पारसी बोली अपने हास्य और तीखे अंदाज़ के लिए जानी जाती है.

पुरानी गुजराती की झलक: पारसी बोली ने प्राचीन या मध्यकालीन गुजराती के कुछ रूप आज भी संभालकर रखे हैं.

मिसाल के लिए, इसमें भूतकाल के लिए ‘इयो’ का इस्तेमाल होता है. ‘गयो’ की जगह ‘गियो’ और ‘कर्यो’ की जगह ‘करियो’ कहा जाता है. ऐसा रूप 17वीं और 18वीं शताब्दी की पुरानी गुजराती में दिखाई देता था.

फ़ारसी और अंग्रेज़ी शब्दों का मेल: पारसी गुजराती में अवेस्ता, पहलवी और फ़ारसी के कई धार्मिक और सामाजिक शब्द मिलते हैं.

ब्रिटिश शासन के दौरान पारसी समुदाय अंग्रेज़ी संस्कृति के क़रीब रहा. इस वजह से अंग्रेज़ी के शब्द भी उनकी बोली में आसानी से शामिल हो गए.

अलग उच्चारण और लहजा: आम गुजराती के मुक़ाबले पारसियों का उच्चारण काफ़ी अलग होता है.

वे ‘छे’ को ‘च’ या थोड़ा अलग तरह के ‘छ’ की तरह बोलते हैं. जैसे ‘शूं करे छे?’ यानी ‘क्या कर रहे हो?’ की जगह वे कहते हैं, ‘सु करेच?’

मज़ेदार और जीवंत अंदाज़: पारसी बोली अपने हास्य और तीखे अंदाज़ के लिए जानी जाती है.

नाटकों, साहित्य और रोज़ाना की बातचीत में पारसी कहावतें और उनका अलग उच्चारण बहुत मनोरंजक लगता है.

रोज़ाना इस्तेमाल होने वाले पारसी वाक्य

पारसी बोली में वाक्य के आख़िर में 'नी' जोड़ने का ख़ास अंदाज़ है. जैसे 'आवजो नी' और 'करजो नी'.

‘आप क्या कर रहे हैं?’ को पारसी कहते हैं, ‘तमे शूं करेच?’ या ‘शूं चालेच दीकरा?’

‘मैं अभी आता हूं’ को वे कहते हैं, ‘हूं हमणां ज आयो ने गियो.’

‘बहुत पंचायत मत करो’ को वे कहते हैं, ‘बहु चवलीवेड़ा ना कर नी.’

‘चिंता मत करो, भगवान सब ठीक करेंगे’ को वे कहते हैं, ‘फ़िकर नहीं करो, ख़ोदायजी बद्धु सारु करशे.’

‘जल्दी तैयार हो जाओ, देर हो रही है’ को वे आम तौर पर कहते हैं, ‘झटपट तैयार थई जाव नी, मोडु थायच.’

‘वह बिल्कुल पागल हो गया है’ को वे कहते हैं, ‘ते तो आखो घेलो थई गियो छे.’

पारसी बोली में वाक्य के आख़िर में ‘नी’ जोड़ने का ख़ास अंदाज़ है. जैसे ‘आवजो नी’ और ‘करजो नी’.

इसी तरह आख़िर में ‘च’ भी लगाया जाता है. जैसे ‘खायच’ और ‘पीयच’.

यह लहजा पारसी बोली को और मीठा और अनोखा बनाता है.

कुछ पारसी कहावतें

पारसी गुजराती में इस सीधे-सादे और मज़ेदार माने जाने वाले समुदाय की समझदारी भी दिखाई देती है.

पारसी गुजराती में इस सीधे-सादे और मज़ेदार माने जाने वाले समुदाय की समझदारी भी दिखाई देती है.

पारसी लोग दुनिया और रोज़मर्रा की बातों को बहुत आसानी से हास्य के ज़रिए ज़ाहिर करते हैं.

पारसी कहावतों और मुहावरों पर सूनी तारापोरवाला और मेहर मारफ़तिया ने ‘पारसी बोल’ नाम की एक किताब भी लिखी है.

अगर कोई व्यक्ति मूर्ख हो तो पारसी उसके बारे में कहते हैं, ‘उसे तो बुधवार में भी दिक़्क़त है.’

इसका मतलब है कि उसे सोमवार और मंगलवार के बाद क्या बोलना है, यह भी मालूम नहीं.

अगर कोई पारसी कहे, ‘नाक सुकायच’, तो समझना चाहिए कि नाक सूख रही है और ड्रिंक लेने का समय हो गया है.

अगर कोई पारसी कहे, ‘जीभ में छेद हो गया’, तो इसका मतलब है कि अब उसे समझ नहीं आ रहा कि क्या कहा जाए.

अगर कोई झूठ-मूठ आपके दुख में शामिल होने का दिखावा करे तो पारसी कहते हैं, ‘आंख में आंसू नहीं और नाक में नीट नहीं.’

‘लंबे के साथ छोटा जाए’ जैसी कहावत पारसी इस तरह कहते हैं, ‘मोगलनी सूझे वाणियो चाले, मरे नहीं ने मांदो पड़े.’

‘कौआ कुछ उठाकर ले जाए’ को वे कहते हैं, ‘गधेरो दराख चावी गयो.’

किसी को ‘किसी काम का नहीं’ कहना हो तो वे कहते हैं, ‘तद्दन पोनियो छे, माय-बापे अमथो उजागरो कीधो.’

किसी व्यक्ति से परेशान पारसी क्या कहेगा? ‘अहीं मल्यो तो मल्यो, ऊपर नीं मलतो.’

किसी को बददुआ देने का मन हो तो वे कहते हैं, ‘तारे घेर तार आवे.’

बहुत डींगें मारने वाले लोगों के लिए पारसी कहते हैं, ‘मोटे घेरे मोटी वात ने अरधी रोटली पर आखी रात.’

दिखावा करने वाले लोगों के लिए वे कहते हैं, ‘पाछल मोगरो ने अंदर छाननो पोडरो.’

पारसी हास्य में सेक्स से जुड़े मज़ाक़ भी बहुत सहजता से आते हैं. कभी वे भद्दे या अश्लील लगते हैं और कभी हंसाते भी हैं.

एक और मज़ेदार कहावत है, ‘ऊंटने घेर लगन थया, तो गधेराने गावा तेड्या.’

पारसी कहावतों में कई जगह शरीर के एक ख़ास अंग का ज़िक्र भी आता है.

‘छांटोपानी’ और ‘बूमबराडा’ जैसे शब्दों के बारे में तो हम जानते हैं. लेकिन ‘गतरम-सतरम’ का मतलब गड़बड़ी या हाथ की सफ़ाई है.

‘डोलती-डमकती’ का मतलब आवारा है.

‘तीरीमतराक’ का मतलब सज-धजकर तैयार होना है.

‘धुतमद्याटम’ का मतलब काला जादू है.

‘चावाचीवी’ का मतलब गॉसिप है.

बुरी संगत का उदाहरण देते हुए पारसी कहते हैं, ‘गधेरा पासे गाय बांधी, ते तीजे दिवस भूकवा लागी.’

रंग-रूप और स्वभाव बताने वाले ख़ास शब्द

पारसी कहावतों में कई जगह शरीर के एक ख़ास अंग का ज़िक्र भी आता है.

घरारा जेवो: बहुत लंबा, मज़बूत शरीर वाला और आकर्षक पुरुष. आम गुजराती में इसे हट्टा-कट्टा आदमी कहा जाएगा.

दूध पाव: बिल्कुल ढीला, छोटी-सी बात पर रो देने वाला या हमेशा मां के पीछे घूमने वाला लड़का. आम गुजराती में इसके लिए डरपोक जैसे शब्द इस्तेमाल होते हैं.

जीभडुं: कोई छोटा बच्चा बहुत चंचल हो, तुरंत जवाब देता हो और बहुत बोलता हो तो पारसी उसे प्यार से ‘जीभडुं’ कहते हैं.

हाउसन-जाउसन: ऐरा-ग़ैरा नत्थू ख़ैरा, यानी आम या इधर-उधर घूमने वाले लोगों का समूह.

खान-पान और महफ़िल से जुड़े अनोखे शब्द

कोई छोटा बच्चा बहुत चंचल हो, तुरंत जवाब देता हो और बहुत बोलता हो तो पारसी उसे प्यार से 'जीभडुं' कहते हैं.

भोणुं: खाना या खाने की थाली. जब शादी या नवजोत यानी जनेऊ संस्कार जैसी दावत होती है तो पारसी कहते हैं, “चलो रे भाई, भोणुं तैयार छे.”

तांस मारवी: पुराने समय में पारसी ताड़ी या शराब के मटके से सीधे एक सांस में पीते थे. इसे ‘तांस मारवी’ कहा जाता था.

सरको: सरको का मतलब सिरका है. यह शब्द मूल रूप से फ़ारसी के ‘सेरकेह’ से आया है. पारसी खाना बनाने में इसका काफ़ी इस्तेमाल करते हैं.

पियाज़: आम गुजराती में जिसे ‘डुंगली’ या ‘कांदो’ कहा जाता है, उसके लिए पारसी फ़ारसी मूल का शब्द ‘पियाज़’ इस्तेमाल करते हैं.

सामाजिक और धार्मिक शब्द

प्रतीकात्मक तस्वीर

पाक: पवित्र या शुद्ध. पारसी अगियारी यानी अपने धर्मस्थल में मौजूद आग को बहुत सम्मान के साथ ‘पाक आतश आदरियान’ कहते हैं.

अवलमंज़ल: किसी व्यक्ति की मौत के बाद की अंतिम क्रिया या आख़िरी सफ़र. आम गुजराती में इसे अंतिम संस्कार कहा जाता है.

नवजोत: पारसी समुदाय में बच्चे को धर्म की दीक्षा देने का पवित्र मौक़ा. यह वैसा ही है, जैसे हिंदुओं के कुछ समुदायों में जनेऊ संस्कार होता है.

कुछ अलग तरह के वाक्य

पारसी लंबी बात को कम शब्दों में कहने के लिए तुक वाले कुछ अनोखे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं.

पारसी लंबी बात को कम शब्दों में कहने के लिए तुक वाले कुछ अनोखे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं.

घोरामा गधेरो: कोई बात बिल्कुल बेमेल होना. जैसे बहुत पढ़ा-लिखा व्यक्ति बिल्कुल मूर्खता वाला काम करे.

माय मूरो, बाप गाजर: ऐसा व्यक्ति, जिसके परिवार या ठिकाने के बारे में ठीक जानकारी न हो.

तात्या टोपे जेवो: जिस व्यक्ति के बाल पूरी तरह बिखरे और अस्त-व्यस्त हों, उसके लिए पारसी कहते हैं, “शूं तात्या टोपे जेवो थईने रखडेच.”

इस तरह गुजराती भाषा पारसियों के लिए सिर्फ़ शरण पाने की एक शर्त नहीं रही. समय के साथ यह उनकी पहचान और संस्कृति का ऐसा हिस्सा बन गई, जिसे उनसे अलग नहीं किया जा सकता.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS