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सिनेमा से कितनी कमाई होती है और फ़िल्में बनाने में क्या चुनौतियां आती हैं?

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Source :- BBC INDIA

फ़िल्म की शूटिंग के दौरान की तस्वीर

सारांश

  • सिनेमा जगत में फ़िल्मों के बॉक्स ऑफ़िस पर सफल या असफल होने की तो चर्चा होती है लेकिन ये नहीं पता चलता कि समय के साथ फ़िल्में बनाना कितना चुनौतीपूर्ण हो चला है.
  • फ़िल्मों से कमाई के तरीके कितने बदले हैं और हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री किस दिशा में आगे बढ़ रही है.
  • सिनेमा के कारोबार पर हमारी इस सीरीज़ की दूसरी कड़ी में हमने कुछ इन्हीं पहलुओं पर बात की है.
  • इस सीरिज़ की पहली कहानी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

इस चर्चा में शामिल हैं एक्सेल एंटरटेनमेंट के सीईओ विशाल रामचंदानी, सनशाइन पिक्चर्स के विपुल अमृतलाल शाह, पूजा फ़िल्म्स के जैकी भगनानी और दक्षिण भारतीय फ़िल्म निर्माता दिल राजू.

अगर इनके काम की बात करें तो इन्होंने डॉन फ्रेंचाइज़ी, द केरल स्टोरी और कुली नं. 1 जैसी सफल फ़िल्में बनाई हैं.

वहीं, दिल राजू की आने वाली फ़िल्मों में अक्षय कुमार स्टारर SVC60 और सलमान खान-नयनतारा अभिनीत SVC63 शामिल हैं.

क्या मौजूदा दौर में फ़िल्म बनाने में चुनौतियां बढ़ी हैं?

फ़िल्म की शूटिंग के दौरान की तस्वीर

एक्सेल एंटरटेनमेंट के सीईओ विशाल रामचंदानी मानते हैं कि, “फ़िल्म बनाने के लिए ये एक रोमांचक समय है. उनका कहना है कि यह धारणा काफी हद तक गलत साबित हुई है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने सिनेमाघरों के दर्शकों को छीन लिया है.”

वो कहते हैं, “हमने देखा है कि अलग-अलग शैलियों, बजट और भाषाओं की फ़िल्मों को थियेटर में दर्शक मिले हैं. हालांकि, अब चुनौती यह है कि आपको अपनी कहानी और कंटेंट पर पहले से ज़्यादा भरोसा रखना पड़ता है, सिर्फ़ प्री-सेल्स के सहारे नहीं चला जा सकता. आखिरकार, अगर दर्शकों को कोई फ़िल्म देखने लायक लगती है, तो वे उसे देखने जरूर आएंगे.”

वहीं, फ़िल्म निर्माता विपुल अमृतलाल शाह का मानना है कि, “फ़िल्म बनाना हमेशा से एक मुश्किल काम रहा है, क्योंकि ऐसा कोई तय फॉर्मूला नहीं है जिससे ये पता चल सके कि दर्शकों को क्या पसंद आएगा इसलिए लगातार बेहतर कहानियों की तलाश करनी पड़ती है.”

वो कहते हैं, “हमारे लिए, खासकर सनशाइन पिक्चर्स में, यह चुनौती और बड़ी है क्योंकि हम किसी एक शैली की फ़िल्में नहीं बनाते, बल्कि नए-नए विषयों और शैलियों पर काम करते हैं.”

वो ओटीटी प्लेटफॉर्म्स का हवाला देते हुए कहते हैं कि, “इन प्लेटफॉर्म्स के बढ़ने के बाद दर्शकों के पास मनोरंजन के पहले से कहीं अधिक विकल्प हैं, इसलिए अब उन्हें ऐसी कहानियां तलाशनी पड़ती हैं जिनसे दर्शक खुद को जोड़ सकें.”

फ़िल्म प्रोड्यूसर दिल राजू का कहना है कि, “फ़िल्म बनाना कभी भी आसान नहीं था लेकिन मौजूदा दौर में चुनौतियां कहीं ज़्यादा हैं.”

वो कहते हैं, “फ़िल्मों का बजट बढ़ गया है, दर्शकों के पास ओटीटी और दूसरे मनोरंजन माध्यमों के रूप में कई विकल्प हैं. ऐसे में लोगों को दो घंटे से ज़्यादा समय के लिए सिनेमाघरों तक लाना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है. इसके लिए फ़िल्म का कंटेंट इतना मजबूत होना चाहिए कि वह दर्शकों को थियेटर तक खींच सके और अंत तक उन्हें बांधे रखे.”

अभिनेता और प्रोड्यूसर जैकी भगनानी कहते हैं कि, “दर्शकों की पसंद लगातार बदल रही है. बजट का भी दबाव रहता है, मार्केटिंग की लागत काफी बढ़ गई है.”

वो कहते हैं, “एक निर्माता के रूप में चुनौती सिर्फ़ अच्छी फिल्म बनाने की नहीं है, बल्कि सही कहानी चुनने, उसे सही तरीके से पेश करने, लागत को नियंत्रित रखने और यह सुनिश्चित करने की भी है कि फ़िल्म अपने दर्शकों तक पहुंचे.”

प्रोडक्शन हाउस के बिज़नेस मॉडल का बुनियादी ढांचा क्या है?

स्टेज पर डांस आर्ट परफ़ॉर्म करते कलाकार

इस सवाल पर एक्सेल एंटरटेनमेंट के सीईओ कहते हैं कि, “मुख्य कारोबार कंटेंट बनाने पर ही आधारित है.”

इसमें फ़ीचर फ़िल्म और लंबी वेब सिरीज़ शामिल हैं. वो बताते हैं,”हमारा लक्ष्य हर साल लगभग तीन फीचर फिल्में और दो सिरीज़ बनाने की है, ताकि फिल्मों और सिरीज़ के बीच संतुलन बना रहे.”

उनका कहना है, “हम नए क्षेत्रों में भी विस्तार कर रहे हैं. हमने अपना म्यूज़िक लेबल शुरू किया है, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टीज़ (आईपी), मर्चेंडाइजिंग और नए मीडिया के अवसरों पर काम कर रहे हैं, साथ ही अंतरराष्ट्रीय कॉलेबोरेशन (सहयोग) की संभावनाएं भी तलाश रहे हैं. हमारा उद्देश्य ऐसी क्रिएटिव कंपनी बनना है जो दमदार कहानियां बनाए, उन्हें दुनिया भर के दर्शकों तक पहुंचाए. हमारी हाल की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक ‘मिर्जापुर: द मूवी’ रही है.”

इस सवाल पर विपुल शाह का कहना है कि, “वो फ़िल्म शुरू करने से पहले काफी तैयारी और रिसर्च करते हैं.”

वो कहते हैं, “यह बेहद ज़रूरी है कि हमारे पास सारे आंकड़े और योजनाएं सही हों. हम कई तरह के वित्तीय मॉडल की जांच-परख करते हैं और जब हमें भरोसा हो जाता है कि सभी डेटा और मॉडल सही हैं, तभी हम फ़िल्म बनाना शुरू करते हैं.”

बातचीत में वो आगे बताते हैं कि, “फ़िल्म बनाना एक सामूहिक प्रयास है. इसमें स्पॉट बॉय से लेकर निर्माता, निर्देशक, अभिनेता और लेखक हर व्यक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है और जब पूरी टीम एक यूनिट की तरह काम करती है तभी एक अच्छी फ़िल्म बन पाती है.”

वहीं दिल राजू बताते हैं कि, “प्रोडक्शन कंपनी श्री वेंकटेश्वर क्रिएशंस का मूल बिज़नेस मॉडल सही कहानी और सही निर्देशक का चयन करने, बजट को सख्ती से नियंत्रित रखने, फिल्म को बेहतर तरीके से पेश करने और उसकी सही रिलीज़ सुनिश्चित करने पर आधारित है.इसके बाद कमाई थियेटर, ओटीटी, सैटेलाइट, म्यूज़िक और अन्य अधिकारों के ज़रिए की जाती है.”

दक्षिण भारतीय फ़िल्म की तस्वीर

उन्होंने बताया, “हमने तमिल और हिंदी भाषाओं में भी फिल्में बनाई हैं. हालांकि प्लान बनाने में डेटा और स्प्रेडशीट्स मदद करते हैं, लेकिन अंतिम फ़ैसला हमेशा कहानी की “आत्मा”, निर्देशक के विज़न और इस विश्वास पर आधारित होता है कि दर्शक उससे जुड़ पाएंगे.”

जैकी भगनानी का कहना है कि, “उनकी प्रोडक्शन कंपनी पूजा फ़िल्म्स की सबसे बड़ी ताकत हमेशा से अच्छी कहानियों को पहचानना और उन्हें पर्दे पर लाने की रही है. लेकिन समय के साथ फिल्म का कारोबार बदल गया है, इसलिए अब काम के तरीके में भी बदलाव हो रहे हैं.”

वो बताते हैं कि, “अब प्रोडक्शन हाउस बजट को लेकर अधिक सतर्क हैं, नए प्रोजेक्ट्स का चयन सोच समझकर करते हैं. वो बताते हैं कि अब प्रोडक्शन हाउस नए आईपी (बौद्धिक संपदा) तैयार करने पर भी ध्यान देते हैं.”

सिनेमाघरों की कमाई के अलावा आज कमाई के दूसरे स्रोत क्या हैं?

भारतीय सिनेमाघर के बाहर की तस्वीर

जब हमने ये सवाल विशाल रामचंदानी से किया तो उनका कहना था कि, “सिनेमाघरों से होने वाली कमाई के अलावा आज फ़िल्मों की आय के प्रमुख स्रोत डिजिटल/ओटीटी स्ट्रीमिंग राइट्स, सैटेलाइट टीवी राइट्स, म्यूज़िक राइट्स हैं,”

वो बताते हैं, “इसके अलावा मर्चेंडाइजिंग, ब्रांड साझेदारियों और आईपी के विभिन्न तरीकों से व्यावसायिक उपयोग के अवसर भी बढ़ रहे हैं. अंततः लक्ष्य ऐसी आईपी तैयार करना है जो अलग-अलग प्लेटफॉर्म, फॉर्मेट और बाजारों में कमाई कर सके.”

वहीं, विपुल शाह का कहना है कि, “कमाई के कई स्रोत हैं लेकिन वो आम तौर पर उन्हें पांच कैटेगरी में रखते हैं”

  • भारत में थियेटर से होने वाली कमाई
  • विदेशी बाजारों में थिएटर से होने वाली कमाई
  • ओटीटी राइट्स
  • सैटेलाइट राइट्स
  • म्यूज़िक राइट्स

वो बताते हैं कि, “इसके अलावा भी कई दूसरे अधिकार होते हैं, जैसे जहाज़, एयरलाइंस, केबल नेटवर्क और होटलों में प्रसारण के अधिकार.”

उनका कहना है कि, “आजकल इन्हें आमतौर पर एक साथ पैकेज के रूप में बेचा जाता है और इनकी व्यावसायिक कीमत पहले की तुलना में काफी कम रह गई है.”

दिल राजू बताते हैं कि, “थियेटर और डिजिटल/ओटीटी अधिकारों के अलावा कभी-कभी हिंदी या अन्य भाषाओं में डबिंग के अधिकारों से भी कमाई होती है.”

बड़ी फिल्मों के लिए थियेटर से होने वाली कमाई आज भी भावनात्मक और व्यावसायिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है, लेकिन कमाई के ये दूसरे स्रोत फ़िल्म की लागत वसूलने और कुल कारोबार को संतुलित करने में अहम भूमिका निभाते हैं.

इस पर जैकी भगनानी कहते हैं कि, “फ़िल्म का कारोबार सिर्फ़ सिनेमाघरों की कमाई तक ही सीमित नहीं रह गया. ओटीटी, सैटेलाइट और अन्य अधिकारों के अलावा ब्रांड इंटीग्रेशन, मर्चेंडाइजिंग और फिल्मांकन से जुड़े प्रोत्साहनों (इंसेंटिव्स) के जरिए भी कमाई के अवसर मौजूद हैं, जो फ़िल्म की लोकेशन और वहां की नीतियों पर निर्भर करते हैं.”

हिंदी फ़िल्म उद्योग के सामने बड़ी चुनौतियां क्या हैं?

बॉलीवुड फ़िल्म का एक पोस्टर

इस सवाल पर विशाल रामचंदानी कहते हैं कि, “हिंदी फ़िल्म उद्योग किसी बड़ी समस्या से नहीं बल्कि बदलाव से गुजर रहा है. दर्शकों की पसंद बहुत तेजी से बदल रही है और फ़िल्म बनाने के व्यवसाय को भी उसी तरह से बदलना होगा.”

वो कहते हैं, “हमें बजट को लेकर अधिक अनुशासित होना होगा, कहानियों के मामले में अधिक महत्वाकांक्षी बनना होगा और यह बेहतर समझना होगा कि ऐसी कौन-सी बातें हैं जो किसी फ़िल्म को सिनेमाघरों में देखने लायक बनाती हैं.”

विपुल शाह कहते हैं कि, “फ़िल्म निर्माताओं को कई चीजों में सुधार करने की ज़रूरत है. खासकर इंवेस्टमेंट और उससे मिलने वाले रिटर्न के अनुपात में.”

उनका कहना है, “द केरल स्टोरी उन फ़िल्मों में से एक है जिसने अपनी लागत के मुकाबले सबसे ज़्यादा कमाई की. बेशक, मुझे लगता है कि हनुमान अंश (यदि वह इससे आगे निकलती है) और भी बेहतर प्रदर्शन कर सकती है. लेकिन हनुमान अंश के आने से पहले निवेश के मुकाबले रिटर्न के हिसाब से द केरल स्टोरी वास्तव में नंबर एक फिल्म थी.”

दिल राजू कहते हैं कि, “हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री की भी समस्याएं कुछ हद तक दूसरी फ़िल्म इंडस्ट्री जैसी ही हैं.”

उनका कहना है, “हमारी समझ के अनुसार, और क्योंकि हमने पहले जर्सी और हिट जैसी कुछ हिंदी फिल्में भी बनाई हैं, हिंदी फिल्म उद्योग की समस्याएं कुछ हद तक दूसरी फिल्म इंडस्ट्रीज़ जैसी ही हैं, लेकिन यहां वे ज्यादा स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं.”

बॉलीवुड फ़िल्म पद्मावत का एक पोस्टर

उनका मानना है कि, “ओटीटी पर फ़िल्मों के बहुत जल्दी आ जाने से दर्शकों के सिनेमाघरों में जाने की उत्सुकता कम हो जाती है. इसके अलावा, कई बार फ़िल्में पारिवारिक या बड़े दर्शक वर्ग की उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतर पातीं.”

वो कहते हैं, “अब कंटेंट ही असली स्टार होना चाहिए. अगर किसी फ़िल्म के लिए शुक्रवार को सिनेमाघर नहीं भरते, तो सिर्फ़ स्टार पावर के दम पर फिल्म को सफल बनाना मुश्किल है. दर्शकों की पसंद भी बदल चुकी है. वे अब ऐसी फिल्में चाहते हैं, जिन पर उनका समय और पैसा खर्च करना उन्हें वाजिब लगे.”

इस सवाल पर जैकी भगनानी कहते हैं, “हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हम यह समझने में चूक रहे हैं कि दर्शक वास्तव में क्या देखना चाहते हैं. हम फ़िल्मों के बड़े पैमाने, स्टार पावर और प्रचार पर बहुत ज्यादा ध्यान देने लगे हैं, और कई बार इस प्रक्रिया में कहानी पीछे छूट जाती है.”

उनका मानना है कि, “मौजूदा समय में दर्शकों के पास अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर बेहतरीन कंटेंट की भरमार है. इसलिए वे पहले से कहीं ज़्यादा सोच-समझकर तय करते हैं कि सिनेमाघर जाकर कौन-सी फिल्म देखनी है.”

वो कहते हैं, “फ़िल्म इंडस्ट्री को मजबूत कहानियों, मौलिकता और दर्शकों के साथ भावनात्मक जुड़ाव की ओर फिर से लौटने की ज़रूरत है. साथ ही, बजट को लेकर भी ज्यादा अनुशासित होना होगा.”

वो कहते हैं कि, “हिंदी फ़िल्म उद्योग को सिर्फ़ बॉक्स ऑफिस को ध्यान में रखकर फिल्में बनाना बंद करना होगा और ऐसी फिल्में बनानी होंगी जो दर्शकों को सिनेमाघरों तक आने की वजह दे.”

प्रोड्यूसर्स की स्थिति बेहतर बनाने के लिए किस तरह के कदम उठाए जाने चाहिए?

हिन्दी फ़िल्मों का पोस्टर

इस पर विशाल रामचंदानी कहते हैं कि, “सबसे पहले फ़िल्म निर्माताओं को इंस्टीट्यूशनल फाइनेंसिंग तक अधिक पहुंच मिलनी चाहिए, ताकि वे सोच-समझकर क्रेयेटिव जोखिम लेने के लिए अधिक स्वतंत्र हो सकें.”

वो बताते है, “दूसरा, हमें देश में सिनेमाघरों के बुनियादी ढांचे का बड़े पैमाने पर विस्तार करने की ज़रूरत है, खासकर उन इलाकों में जहां थियेटरों की कमी है. भारत में सिनेमा देखने वाले दर्शकों की संख्या बढ़ाने की अपार संभावनाएं हैं, बशर्ते सिनेमाघर लोगों के लिए अधिक सुलभ बने.”

बातचीत में आगे वो कहते हैं कि, “तीसरा, निर्माताओं के लिए थियेटर आधारित कारोबार का मॉडल अधिक टिकाऊ बनाया जाना चाहिए. इसमें फिल्मों की रिलीज़ से जुड़े खर्चों को तर्कसंगत और नियंत्रित करना भी शामिल है.”

विपुल शाह कहते हैं, “निर्माताओं के तौर पर हमें एकजुट होकर उद्योग से जुड़े मुद्दों का समाधान करना होगा. अगर बड़े फैसलों के पीछे सामूहिक ताकत नहीं होगी, तो यह उद्योग के लिए अच्छी स्थिति नहीं होगी. दूसरा, फिल्मों के लिए ओटीटी रिलीज़ की अवधि बढ़ाई जानी चाहिए.”

“दूसरी बात, निर्माताओं के लिए ओटीटी रिलीज़ की समय-सीमा (विंडो) बढ़ाई जानी चाहिए. मौजूदा आठ सप्ताह की बजाय इसे कम से कम 16 सप्ताह होना चाहिए. इससे फ़िल्म उद्योग को बड़ा फायदा होगा. अन्यथा, छोटे और मध्यम बजट की फ़िल्मों के लिए लंबे समय तक टिके रहना मुश्किल हो जाएगा.”

दिल राजू कहते हैं कि, “फिल्मों के बजट और शूटिंग के दिनों को नियंत्रित करना जरूरी है, जहां संभव हो, वहां मुनाफा साझेदारी (प्रॉफिट-शेयरिंग) मॉडल को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. अनावश्यक खर्च और बजट की बर्बादी पर सख्ती से नियंत्रण रखना होगा, ताकि अगर कोई फिल्म बड़ी हिट न भी हो, तब भी वह आर्थिक रूप से टिकाऊ बनी रहे.”

वो कहते हैं कि, “सबसे ज्यादा ध्यान ऐसी कहानियों पर होना चाहिए जो दर्शकों को सिनेमाघरों तक ला सके. इसके साथ ही, फिल्मों को ओटीटी पर आने से पहले थियेटर में ज्यादा समय तक चलने का मौका मिलना चाहिए, जिससे सिनेमाघरों में दर्शकों की संख्या बढ़ सके.”

इस पर जैकी भगनानी कहते हैं कि, “बड़ा बजट हमेशा बेहतर फिल्म की गारंटी नहीं होता. किसी फ़िल्म का पैमाना उसकी कहानी और संभावित दर्शकों के अनुरूप होना चाहिए. स्टार से पहले कहानी को महत्व देना होगा.”

वो कहते हैं कि, “एक स्टार दर्शकों को पहले वीकेंड में सिनेमाघरों तक ला सकता है, लेकिन किसी फ़िल्म को लंबे समय तक सफल बनाने का काम उसका कंटेंट और उसके बारे में लोगों के बीच फैलने वाली सकारात्मक चर्चा करती है.”

बातचीत में आगे वो बताते हैं कि, “इसके अलावा, ऐसा सहयोगी माहौल बनाना जरूरी है, जिसमें किसी फिल्म के असफल होने का पूरा बोझ केवल निर्माता पर न पड़े.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS