Home National news hindi ‘हम बच नहीं सकते थे, भीड़ हमें जननांग चोर बता रही थी’,...

‘हम बच नहीं सकते थे, भीड़ हमें जननांग चोर बता रही थी’, अफ़्रीका में फैली जानलेवा अफ़वाहें

2
0

Source :- BBC INDIA

बोनिफ़ेस म्गाला

इमेज स्रोत, Alfred Lasteck / BBC

बीबीसी ग्लोबल डिसइन्फ़ॉर्मेशन यूनिट ने छह अफ़्रीकी देशों के पुलिस बलों से आंकड़े जुटाने के बाद पाया है कि अक्तूबर 2025 और इस साल जुलाई के बीच ‘जननांग चोरी’ के अफ़वाहों के बाद 80 से अधिक लोगों की लिंचिंग हुई.

ये हत्याएं उन अफ़वाहों से जुड़ी हैं जिनमें दावा किया जाता है कि कंधे पर एक साधारण सा थपथपाना किसी पुरुष के जननांगों को सिकोड़ सकता है या उन्हें ग़ायब कर सकता है.

इन दावों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. सोशल मीडिया पर फैली ग़लत जानकारी इन अफ़वाहों को बढ़ावा दे रही है.

तंज़ानिया के मैकेनिक बोनिफ़ेस म्गाला ने बीबीसी को अप्रैल में हुई अपनी आपबीती सुनाई. उस दौरान उन्हें बुरी तरह पीटा गया था क्योंकि लोगों को यक़ीन था कि वह जननांग चुराने वाले हैं.

(इस कहानी में कुछ विवरण विचलित करने वाले हो सकते हैं.)

उन्होंने कहा, “वे चिल्ला रहे थे कि हमने किसी के जननांग चुरा लिए हैं. हमारे पास बचकर निकलने का कोई रास्ता नहीं था क्योंकि वहां बहुत बड़ी भीड़ थी.”

उनका अनुभव उन वीडियो में दिखाई गई घटनाओं जैसा था जिन्हें बीबीसी ने देखा है.

इन वीडियो में पुरुष दावा करते हैं कि अजनबियों के संपर्क में आने के बाद उनके जननांग, यानी लिंग और अंडकोष, ग़ायब हो गए हैं या सिकुड़ गए हैं.

इसके बाद भीड़ कथित आरोपियों से कथित तौर पर चुराई गई चीज़ वापस करने की मांग करते हैं. लंबे समय से चली आ रही आशंकाओं और अंधविश्वासों के कारण ऐसी अफ़वाहें बढ़ी हैं.

अफ़्रीका में ये कोई नई बात नहीं है, ख़ासकर उन समुदायों में जहां जादू-टोने पर बहुत विश्वास किया जाता है. सोशल मीडिया ने इन आशंकाओं को और बढ़ा दिया है.

कैसे फैलीं ये अफ़वाहें

हाल की अफ़वाहों की यह लहर पिछले साल डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो से शुरू हुई लगती है. वहां 2008 में भी इसी तरह के दावे सामने आए थे.

इसके बाद ये अफ़वाहें धीरे-धीरे पूरे इलाक़े में फैलने लगीं. ये बुरुंडी, ज़ाम्बिया और तंज़ानिया के साथ-साथ मोज़ाम्बिक, अंगोला, मलावी और कीनिया तक पहुंच गईं.

ज़ाम्बिया में जननांग ग़ायब होने की अफ़वाहों ने पहली बार मार्च में ज़ोर पकड़ा. उस समय एक महिला की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी. इसके बाद यह दहशत सीमा पार तंज़ानिया तक फैल गई.

ज़ाम्बिया की सीमा के पास स्थित तंज़ानिया के व्यस्त व्यापारिक कस्बे टुंडुमा के नज़दीक म्पेम्बा में अपने घर पर म्गाला अपने सिर के दाहिने हिस्से पर बने हंसिया के निशान पर उंगलियां फेरते हैं.

ऐसा करते हुए वह अपने दर्दनाक अनुभव को याद करते हैं.

मैकेनिक म्गाला कहते हैं, “अगर मुझे पता होता कि उस दिन मैं मौत के इतना क़रीब पहुंच जाऊंगा, तो मैं उस रेस्तरां में खाना खाने नहीं जाता. लेकिन हमें नहीं पता होता कि मौत हमसे कितनी क़रीब है.”

वह और उनका एक दोस्त एक अप्रैल को कार बेचने के सिलसिले में एक ग्राहक से मिलने टुंडुमा गए थे. उन्होंने पहले दोपहर का भोजन करने का फ़ैसला किया.

रेस्तरां में बैठने के कुछ ही देर बाद एक भीड़ उन्हें बाहर घसीटकर ले गई.

उनकी ठुड्डी पर बने दो छोटे निशान और एक टूटा हुआ दांत भी उस घटना के निशान हैं.

मारपीट के दौरान वह बेहोश हो गए थे. म्गाला को दो दिन बाद अस्पताल में होश आया. वहां उन्हें पता चला कि उनके दोस्त की हत्या कर दी गई है.

अब वह अपने घर में पत्नी और चार बच्चों के साथ रहते हैं. वह लंगड़ाकर चलते हैं और कहते हैं कि उन्हें लगातार सिरदर्द भी रहता है.

वह अपनी मैकेनिक की दुकान पर काम पर वापस नहीं लौट पाए हैं. हालांकि उनका कहना है कि पड़ोसियों और दोस्तों ने उनकी ज़रूरी दवाओं का कुछ ख़र्च उठाने में मदद की है.

जिस दिन म्गाला और उनके दोस्त पर हमला हुआ था, उसी दिन कमर्शियल फ़ोटोग्राफ़र और कारोबारी माइकल सिलाव्वे ने भी टुंडुमा में ऐसा ही एक और हमला देखा.

उनका कहना था कि जननांग चोरी से जुड़े वीडियो टिकटॉक पर फैलने के बाद लोगों में डर बढ़ रहा था.

उन्होंने अपनी दुकान के बाहर लोगों को भागते हुए देखा. उनका कहना है कि उन्हें पता चला कि पास में एक व्यक्ति पर आरोप लगाया गया और उसे पीटा जा रहा था. बाद में उसे आग लगा दी गई.

23 वर्षीय सिलाव्वे ने बीबीसी से कहा, “जब उसे आग लगा दी गई तो पुलिस घटनास्थल पर पहुंची. इसके बाद सभी लोग वहां से भाग गए.”

बीबीसी ग्लोबल डिसइन्फ़ॉर्मेशन यूनिट की ओर से सत्यापित हमले के एक वीडियो में एक समूह एक व्यक्ति को पीटता हुआ दिखाई देता है. यह वीडियो टिकटॉक और फ़ेसबुक पर एक लाख से ज़्यादा बार देखा जा चुका है.

वीडियो में लोग उस व्यक्ति से कथित तौर पर चोरी हुए जननांग वापस किये जाने की मांग कर रहे हैं.

सिलाव्वे ने कहा, “ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही थीं और लोगों की पिटाई होती जा रही थी.”

उन्होंने कहा कि उस समय उनकी तरह के युवा लोग डरे हुए थे. लेकिन अब उन्हें समझ में आ गया है कि इन अफ़वाहों में कोई सच्चाई नहीं है.

मोज़ाम्बिक के काबो डेलगाडो में एक विस्थापन शिविर

इमेज स्रोत, AFP via Getty Images

बीबीसी ने जांच में क्या पाया

मोम्बा ज़िले के टुंडुमा में रहने वाली 50 वर्षीय फ़ैशन डिज़ाइनर आशा स्टीवन म्वाकिलासा भी इससे सहमत हैं. वह कहती हैं, “मुझे एहसास हुआ कि यह सच नहीं था.”

लेकिन इससे उनकी चिंता ख़त्म नहीं हुई है. ख़ासकर तब, जब उनके पति या बेटे घर से बाहर होते हैं. हालांकि वह कहती हैं कि पुलिस अब गश्त कर रही है और इसके लिए वह आभारी हैं.

मोम्बा ज़िले के कमिश्नर एलियास डेनियल म्वांडोबो ने बीबीसी से कहा कि स्थानीय जांच से संकेत मिले हैं कि कुछ घटनाओं के पीछे जानबूझकर आपराधिक मंशा थी.

उन्होंने कहा, “कुछ लोगों ने अपने फ़ायदे के लिए अपराध करने और लोगों में दहशत फैलाने की साज़िश रची थी.”

तंज़ानिया के सबसे बड़े शहर दार अस सलाम में रिकॉर्ड किए गए एक अन्य वीडियो में एक भीड़ एक व्यक्ति को बाज़ार में धूल भरी सड़क पर घसीटते हुए ले जाती दिखाई देती है.

लोग उसे धक्का देते हैं, पकड़ते हैं और मारते हैं. वे उससे जननांग वापस करने की मांग कर रहे हैं, जबकि वह अपनी बेगुनाही की गुहार लगा रहा है.

बीबीसी डिसइन्फ़ॉर्मेशन यूनिट ने मोज़ाम्बिक और कीनिया में हुए हमलों के ऐसे ही वीडियो की भी पुष्टि की है.

भीड़ की हिंसा, कथित प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, कथित घटनाओं से जुड़ी चेतावनियां, टिप्पणियां और अलग-अलग इलाक़ों की घटनाओं के रूप में पेश किए गए वीडियो की दर्जनों रिकॉर्डिंग टिकटॉक और फ़ेसबुक पर प्रसारित हो रही हैं.

बीबीसी की ओर से विश्लेषण की गई ऐसी कई पोस्ट अब भी ऑनलाइन मौजूद हैं. इनमें भीड़ की हिंसा दिखाने वाले कुछ वीडियो भी शामिल हैं.

मेटा के एक प्रवक्ता ने कहा, “हम साझा की गई सामग्री की समीक्षा कर रहे हैं. जो सामग्री हमारी नीतियों का उल्लंघन करती पाई जाएगी, उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी.”

टिकटॉक ने अभी तक बीबीसी के टिप्पणी के अनुरोध का जवाब नहीं दिया है.

कुछ सोशल मीडिया क्रिएटर लोगों को सतर्क रहने की सलाह देते हैं. लेकिन अक्सर यह स्पष्ट नहीं होता कि वे इन दावों पर ख़ुद विश्वास करते हैं या सिर्फ़ ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं.

इन पोस्ट के साथ-साथ कुछ लोग ऐसे कथित ताबीज़ों का भी प्रचार कर रहे हैं जो जननांग चोरी से बचाने का दावा करते हैं. वहीं कुछ कॉमेडियन ने इन दावों का मज़ाक उड़ाते हुए व्यंगात्मक वीडियो भी बनाए हैं.

लेखक जूलियन बोनोम का कहना है कि स्मार्टफ़ोन और सोशल मीडिया अफ़वाहों को पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ी से फैलाते हैं. वे उन्हें बहुत बड़े लोगों तक पहुंचा देते हैं. एक बार अफ़वाहें फैलनी शुरू हो जाएं तो उन्हें नियंत्रित करना भी अधिक मुश्किल हो जाता है.

उनकी किताब ‘द सेक्स थीव्स: द एंथ्रोपोलॉजी ऑफ़ अ रूमर’ इस बात की पड़ताल करती है कि ‘जननांग चोरी’ से जुड़ी अफ़वाहें कैसे फैलीं और लोग उन पर यक़ीन क्यों करते हैं.

उनका कहना है कि लोग सिर्फ़ यह नहीं सुन रहे कि किसी व्यक्ति के जननांग ग़ायब हो गए हैं. वे परेशान लोगों को यह कहते हुए भी देख रहे हैं कि उनके साथ ऐसा हुआ है. या फिर वे आरोपों पर भीड़ की प्रतिक्रिया भी देख रहे हैं.

वह कहते हैं कि सोशल मीडिया पर साझा किए गए वीडियो बिना पुष्टि वाले दावों को ज़्यादा विश्वसनीय बना सकते हैं. इसकी वजह यह है कि लोग घटनाओं को तुरंत देख लेते हैं.

उनके अनुसार, मौजूदा डिज़िटल माहौल और पहले फैली ऐसी अफ़वाहों के दौर के बीच यह ‘सबसे महत्वपूर्ण अंतर’ में से एक है.

मोज़ाम्बिक सबसे ज़्यादा प्रभावित

सबसे ज़्यादा प्रभावित देश मोज़ाम्बिक रहा है. वहां पुलिस ने मई में बताया था कि छह हफ़्तों के भीतर 55 लोगों की मौत हो गई.

इनमें एक पुलिस अधिकारी, स्वास्थ्यकर्मी और सरकारी कर्मचारी भी शामिल थे.

मोज़ाम्बिक के राष्ट्रपति डेनियल चापो ने इन व्यापक अफ़वाहों और मौतों की सार्वजनिक रूप से निंदा की थी. उन्होंने कहा था कि ये दावे झूठे हैं. सरकार को ऐसा कोई चिकित्सीय सबूत नहीं मिला है जिससे यह साबित हो कि किसी व्यक्ति के शरीर का कोई हिस्सा ग़ायब हुआ है.

दो स्वास्थ्यकर्मियों पर अप्रैल में उनके घर और कार्यस्थल पर हमला किया गया था. यह घटना काबो डेलगाडो प्रांत में हुई थी.

यह इलाक़ा तंज़ानिया की सीमा से लगा हुआ है और लगभग एक दशक से इस्लामी विद्रोह से प्रभावित रहा है.

हमलों वाले इलाक़ों के स्वास्थ्य केंद्रों को कई हफ़्तों तक बंद रखना पड़ा. इस दौरान अधिकारियों ने इन दावों का जवाब देने के लिए जनजागरूकता अभियान चलाया.

स्वास्थ्य अभियान के तहत सरकार ने कहा कि कुछ आशंकाएं कोरो सिंड्रोम से जुड़ी हो सकती हैं.

यह एक मानसिक बीमारी है, जिसे जननांग ग़ायब होने या सिकुड़ने से जुड़ी हिस्टीरिया के नाम से भी जाना जाता है.

हिंसा की सबसे हालिया घटनाएं कीनिया में हुई हैं. वहां क्वाले और मोम्बासा के तटीय काउंटी इलाक़ों में भीड़ ने पांच लोगों की हत्या कर दी.

जुलाई में पहली घटनाओं की ख़बर आने के बाद मोम्बासा काउंटी के कमिश्नर मोहम्मद नूर ने कुछ कंटेंट क्रिएटर्स को ज़िम्मेदार ठहराया.

उन्होंने कहा कि ये लोग केवल ज़्यादा व्यूज़ और ध्यान आकर्षित करने के लिए ऐसे दावे फैला रहे हैं.

नूर ने बीबीसी से कहा, “इस तरह की ग़लत जानकारी आसानी से लोगों की जान ले सकती है.”

उन्होंने कहा कि इसके बाद पुलिस ने हिंसा पर क़ाबू पा लिया और कई लोगों को गिरफ़्तार किया.

इनमें एक पिता और उसका बेटा भी शामिल थे. दोनों ने एक महिला पर हमला करने का अपराध स्वीकार किया था.

उन दोनों का आरोप था कि वह पुरुषों के जननांग ग़ायब कर देती है. इसके बाद उन्हें एक साल की जेल की सज़ा सुनाई गई.

इसी तरह के दावों ने मलावी में भी भीड़ के हमलों को बढ़ावा दिया. वहां आठ लोगों की मौत हो गई.

पड़ोसी देश तंज़ानिया के टुंडुमा में मैकेनिक म्गाला अब भी हमले के असर से उबर रहे हैं. लेकिन मानसिक पीड़ा अब भी ताज़ा है.

वह कहते हैं, “जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो आज भी मुझे बहुत दर्द होता है. मेरे दोस्त की जिस तरह बिना वजह मौत हुई, उसे याद करके मैं दुखी हो जाता हूं. क्योंकि आज तक मुझे नहीं पता कि आख़िर हो क्या रहा था.”

वह कहते हैं, “अचानक बिना किसी वजह के लोग आप पर पत्थर फेंकने लगें. और फिर आपकी जान चली जाए?”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट… सब एक जगह

कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.

SOURCE : BBC NEWS