Source :- BBC INDIA
इमेज स्रोत, Sunil Ghosh/Hindustan Times via Getty Images
क़रीब दो दशकों तक सुरिंदर कोली को भारत के सबसे कुख्यात सीरियल किलरों में से एक माना जाता रहा.
निठारी हत्याकांड में उन्हें 13 बार मौत की सज़ा सुनाई गई थी. लेकिन पिछले साल नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया. इसके बाद वह 19 साल जेल में बिताने के बाद रिहा हुए.
पिछले शुक्रवार को 50 वर्षीय सुरिंदर कोली उत्तराखंड में अपनी एक छोटी सी चाय की दुकान में मृत पाए गए.
हरिद्वार सिटी पुलिस के अधिकारी शिशुपाल सिंह ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया था, “सप्तऋषि क्षेत्र में एक व्यक्ति का शव मिला है. मिली जानकारी के अनुसार मृतक सुरिंदर कोली है.”
उन्होंने कहा, “पहली नज़र में यह आत्महत्या का मामला लगता है. फ़ॉरेंसिक टीम ने घटनास्थल की जांच की है.”
हरिद्वार के एसपी सिटी दीपक सिंह ने कहा, “देखिए, सुरिंदर कोली की जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट है, ऑफ़िशियल तो मेरे पास नहीं आई है लेकिन जो जानकारी से पता चला है, उसमें मौत का कारण सुसाइड होना है.”
सुरिंदर कोली की मौत उस लंबे क़ानूनी संघर्ष का एक दुखद अध्याय बनकर रह गई, जिसने आपराधिक न्याय व्यवस्था की गहरी ख़ामियों को उजागर किया.
यह कहानी संदिग्ध सबूतों, पुलिस यातना के आरोपों, सुप्रीम कोर्ट के अपनी ग़लती स्वीकारने और न्याय के लिए लगभग दो दशक लंबे संघर्ष से जुड़ी है.
(आत्महत्या एक गंभीर मानसिक और सामाजिक समस्या है. अगर आप भी तनाव में हैं, तो आप भारत सरकार की जीवन आस्था हेल्पलाइन 18002333330 से सहायता ले सकते हैं. आपको अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से भी बात करनी चाहिए.)
2006 में नोएडा का एक बंगला और कोली
इमेज स्रोत, Sipra Das/The The India Today Group via Getty Images
इस मामले की शुरुआत दिसंबर 2006 में हुई थी. तब पुलिस को नोएडा के एक बंगले के पीछे नाले से 19 लोगों के कंकाल जैसे अवशेष मिले थे. इनमें ज़्यादातर बच्चे थे.
यह मकान उद्योगपति मोनिंदर सिंह पंढेर का था.
सुरिंदर कोली एक दलित प्रवासी थे जिन्होंने माध्यमिक शिक्षा पूरी करने से पहले ही स्कूल छोड़ दिया था. वह पंढेर के यहां घरेलू सहायक के रूप में काम करते थे.
इसके बाद दोनों को गिरफ़्तार कर लिया गया.
सनसनीखेज़ अपराध की लगातार कवरेज कर रहे टीवी चैनलों ने जल्द ही कोली को दोषी घोषित कर दिया.
कोली के ख़िलाफ़ अभियोजन पक्ष का मामला मुख्य रूप से दो आधारों पर टिका था.
पहला- मजिस्ट्रेट के सामने दिया गया उनका विस्तृत इक़बालिया बयान. दूसरा- कंकाल जैसे अवशेषों की बरामदगी.
इमेज स्रोत, Getty Images
पुलिस का दावा था कि यह बरामदगी केवल कोली की निशानदेही पर हुई थी.
मीडिया में लीक हुए इक़बालिया बयान में कोली ने कहा था कि “वह लड़कियों, महिलाओं और बच्चों को काम या मिठाई का लालच देकर बंगले में बुलाता था. अंदर आने के बाद वह उनका गला घोंट देता था.”
“इसके बाद वह चाकू या कुल्हाड़ी से उनके शवों के टुकड़े करता था. उसने यह भी कहा था कि वह उनके शरीर के कुछ हिस्सों को पकाकर खाता था और बाकी अवशेष बंगले के बाहर नाले में फेंक देता था.”
सुप्रीम कोर्ट ने बताया था- ‘सीरियल किलर’
इमेज स्रोत, Getty Images
साल 2009 में एक ट्रायल कोर्ट ने 14 वर्षीय रिम्पा हलदार की हत्या के मामले में कोली को मौत की सज़ा सुनाई थी.
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी इस सज़ा को बरक़रार रखा. साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने कोली की अपील ख़ारिज कर दी.
सुप्रीम कोर्ट ने उसे “सीरियल किलर” बताया था और उस मकान को “वर्चुअल स्लॉटरहाउस” यानी “आभासी क़त्लगाह” कहा था.
अदालत ने माना था कि यह मामला “रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर” श्रेणी में आता है. ऐसी श्रेणी के मामलों में मौत की सज़ा दी जा सकती है.
चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले मामले में कोली के इक़बालिया बयान और उसके ख़िलाफ़ मौजूद सबूतों को वैध माना था, इसलिए निचली अदालतें उस क़ानूनी मिसाल का पालन करने के लिए बाध्य थीं.
साल 2010 से 2021 के बीच ट्रायल कोर्ट ने 2011 के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का बार-बार हवाला दिया. इसके आधार पर कोली को 12 और मामलों में मौत की सज़ा सुनाई गई.
अदालतों ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह मान चुका है कि कोली का इक़बालिया बयान क़ानूनी और स्वेच्छा से दिया गया था, तो अलग निष्कर्ष पर पहुंचने का कोई सवाल ही नहीं उठता.
दया याचिकाएं ख़ारिज होने के बाद सितंबर 2014 में एक ट्रायल कोर्ट ने उसके लिए डेथ वारंट जारी किया.
कैसे कुछ घंटों पहले रुकी फांसी
सुरिंदर कोली को ऐसी जेल में भेज दिया गया जहां फांसी देने की व्यवस्था मौजूद थी. जल्लाद की भी व्यवस्था कर ली गई थी.
लेकिन 8 सितंबर 2014 को फांसी दिए जाने से सिर्फ़ चार घंटे पहले सुप्रीम कोर्ट ने देर रात हुई एक सुनवाई में उनकी फांसी पर रोक लगा दी.
यह सुनवाई वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह के हस्तक्षेप के बाद हुई थी.
रोक इसलिए लगाई गई क्योंकि हाल ही में एक नया कानूनी सिद्धांत तय किया गया था. इसके अनुसार मौत की सज़ा से जुड़े मामलों में पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई खुली अदालत में होना ज़रूरी था.
कोली की पुनर्विचार याचिका की सुनवाई बंद कमरे में हुई थी और उसे ख़ारिज कर दिया गया था.
बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उस विशेष पुनर्विचार याचिका को भी ख़ारिज कर दिया.
सरकार पर सवाल उठा सज़ा बदली
लेकिन जनवरी 2015 में इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया.
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रिम्पा हलदार हत्या मामले में कोली की मौत की सज़ा को उम्रकैद में बदल दिया.
न्यायाधीशों ने कहा कि उसकी दया याचिका पर फ़ैसला लेने में सरकार ने ढाई साल से ज़्यादा की असामान्य और बिना वजह देरी की थी.
अदालत ने यह भी पाया कि 2009 में दोषी ठहराए जाने के बाद से कोली को असंवैधानिक तरीके से एकांत कारावास में रखा गया था.
भारतीय क़ानून के अनुसार किसी व्यक्ति को लगातार 14 दिनों से ज़्यादा एकांत कारावास में नहीं रखा जा सकता. कुल मिलाकर भी यह अवधि तीन महीने से ज़्यादा नहीं हो सकती.
अदालत ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में उसे फांसी देना उसके जीवन के अधिकार का असंवैधानिक उल्लंघन होगा.
इस आदेश ने कोली की जान बचा ली.
हालांकि उसके ख़िलाफ़ अभी भी मौत की सज़ा के 12 अन्य आदेश मौजूद थे.
बचे 12 केसों में भी बरी हुए कोली
इमेज स्रोत, GETTY IMAGE
हालांकि अक्तूबर 2023 में अभियोजन पक्ष का मामला बिखरने लगा.
12 अन्य मामलों में दी गई सज़ाओं के ख़िलाफ़ दायर अपीलों की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट की एक खंडपीठ ने अभियोजन पक्ष के पूरे मामले की विस्तार से जांच की.
इसके बाद अदालत ने कोली को उन सभी मामलों में बरी कर दिया.
हाई कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष जिन दो मुख्य आधारों पर टिका था, उनमें गंभीर कमियां थीं.
पहला, अदालत ने कहा कि कोली का इक़बालिया बयान उस समय दर्ज किया गया था, जब उसे लगातार 60 दिनों तक पुलिस हिरासत में रखा गया था.
यह अवधि क़ानूनी सीमा 15 दिनों से कहीं ज़्यादा थी. अदालत ने यह भी पाया कि इस दौरान उसे प्रभावी क़ानूनी सहायता नहीं मिली थी.
अदालती दस्तावेज़ों के अनुसार, कोली ने कई बार गंभीर यातना दिए जाने का आरोप लगाया था.
उसका दावा था कि पुलिस ने उसे बिजली के झटके दिए. उसने आरोप लगाया कि उसके नाखून प्लास से उखाड़े गए.
उसने यह भी कहा कि उसके मलद्वार में पेट्रोल इंजेक्ट किया गया और उसे उल्टा लटकाया गया.
कोली का कहना था कि पुलिस अधिकारियों ने उसे नाम और घटनाओं से जुड़ी जानकारियां याद करने के लिए मजबूर किया था.
उसने यह भी आरोप लगाया कि आदेश न मानने पर उसके परिवार को भीड़ के हवाले करने की धमकी दी गई थी.
हाई कोर्ट ने माना कि यह इक़बालिया बयान स्वेच्छा से नहीं दिया गया था. अदालत ने इसे क़ानूनी रूप से स्वीकार करने योग्य नहीं माना.
दूसरा, शवों की बरामदगी से जुड़े सबूतों पर भी अदालत ने सवाल उठाए.
अदालत ने पाया कि जिस नाले से मानव अवशेष मिले थे, वह एक खुली और सार्वजनिक जगह थी.
कोली को वहां लाए जाने से पहले ही खुदाई शुरू हो चुकी थी. उसकी गिरफ़्तारी से कई महीने पहले भी उस इलाके़ से मानव अवशेष मिले थे.
कोर्ट ने सीबीआई की जांच में पाई चूक
इमेज स्रोत, Sakib Ali/Hindustan Times via Getty Images
न्यायाधीशों ने केंद्रीय जांच ब्यूरो की एक महत्वपूर्ण चूक की ओर भी ध्यान दिलाया.
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की एक समिति की 2007 की रिपोर्ट में कहा गया था कि पीड़ितों के धड़ ग़ायब थे.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि शवों को “सर्जिकल सटीकता” के साथ काटा गया था.
रिपोर्ट में यह आशंका जताई गई थी कि “नरभक्षण की कहानी ध्यान भटकाने की एक चाल हो सकती है.”
रिपोर्ट के अनुसार, इसका इस्तेमाल किसी संगठित अंग तस्करी गिरोह से ध्यान हटाने के लिए किया गया हो सकता है.
जिस जगह मानव अवशेष मिले थे, उसके ठीक बगल वाले घर में एक डॉक्टर रहता था. उस डॉक्टर का नाम पहले एक किडनी चोरी घोटाले में भी सामने आ चुका था.
लेकिन सीबीआई ने न तो उस डॉक्टर से पूछताछ की और न ही अंग तस्करी से जुड़े संभावित पहलू की जांच की.
हाई कोर्ट ने इस जांच को ‘गड़बड़’ और ‘लापरवाही से की गई’ बताया था.
जब सुप्रीम कोर्ट ने अपना फ़ैसला पलटा
इमेज स्रोत, Rahul Irani/The The India Today Group via Getty Images
सीबीआई ने कोली को बरी किए जाने के फ़ैसलों को चुनौती दी थी. लेकिन जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने उसकी अपीलें ख़ारिज कर दीं.
इससे एक कानूनी विरोधाभास पैदा हो गया.
कोली को 12 मामलों में इसलिए बरी किया गया था क्योंकि अदालत ने सबूतों को अविश्वसनीय और मनगढ़ंत माना था. लेकिन वह पहले मामले में उसी तरह के सबूतों के आधार पर दोषी बना हुआ था.
इस स्थिति को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक क्यूरेटिव याचिका पर सुनवाई की.
यह एक दुर्लभ क़ानूनी उपाय होता है, जिसका इस्तेमाल न्याय में हुई गंभीर ग़लतियों को सुधारने के लिए किया जाता है.
नवंबर 2025 में अदालत ने 12 मामलों में बरी किए जाने की दलीलों को मूल मामले पर भी लागू किया.
सुप्रीम कोर्ट ने अपना 2011 का फ़ैसला पलट दिया और कोली को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया.
अदालत ने कहा कि लापरवाही और देरी ने तथ्यों की सही जांच की प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाया. साथ ही उन संभावनाओं को भी बंद कर दिया, जिनसे असली अपराधी की पहचान हो सकती थी.
लेकिन जेल से रिहा होने के दस महीने बाद ही कोली की मौत हो गई.
कोली की मौत पर क्या बोलीं वरिष्ठ वकील
इमेज स्रोत, Sanchit Khanna/Hindustan Times via Getty Images
साल 2014 में आधी रात को हस्तक्षेप कर कोली की फांसी रुकवाने वाली वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह का कहना है कि उसका दुखद अंत भारतीय क़ानूनी व्यवस्था की एक बड़ी कमी को उजागर करता है.
जयसिंह ने बीबीसी से कहा, “इसे न्याय की विफलता का मामला कहा जा सकता है.”
उन्होंने कहा कि कई अन्य देशों के विपरीत भारत में ऐसा मज़बूत तंत्र नहीं है, जो बरी किए गए लोगों को समाज में फिर से स्थापित होने या न्याय पाने में मदद कर सके.
उन्होंने कहा, “उसे कभी ऐसे व्यक्ति की तरह नहीं देखा गया, जिसने अपराध नहीं किया था.”
उन्होंने कहा, “बरी होने के बाद भी वह सामान्य समाज में दोबारा शामिल नहीं हो सका.”
उन्होंने कहा, “उसके पास आय का कोई साधन नहीं था. उसका कोई फ्रेंड सर्किल नहीं था और न ही ऐसा कोई समुदाय था जिसे वह अपना कह सके.”
एक दशक तक कोली का पक्ष रखने वाले वकील युग मोहित चौधरी ने कहा कि यह मामला उस संवेदनहीन व्यवस्था को दिखाता है, जिसने इस त्रासदी को होने दिया.
चौधरी ने कहा, “कोली का मामला हमें साफ़ तौर पर दिखाता है कि हम समाज के ग़रीब और हाशिए पर रहने वाले लोगों पर होने वाली अकल्पनीय पीड़ा के प्रति कितने कठोर और असंवेदनशील हो गए हैं.”
उन्होंने कहा, “जब तक ऐसी घटनाएं होती रहेंगी, तब तक हमारी बड़ी-बड़ी उपलब्धियों का कोई अर्थ नहीं रहेगा.”
उन्होंने कहा, “अगर हमारे लोग इस तरह कष्ट झेलते रहें, तो इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि हम चांद पर पहुंच गए हैं या दुनिया के अमीरों की सूची में हमारे धनवान लोगों के नाम शामिल हैं.”
कोली के लिए “नरभक्षी” का ठप्पा ऐसा साबित हुआ, जिससे वह कभी पीछा नहीं छुड़ा सका.
वहीं, 19 पीड़ितों के परिवारों के लिए मामले के बिखर जाने का मतलब है कि असली अपराधी आज भी अज्ञात हैं.
इंदिरा जयसिंह ने कहा, “सबसे बड़ा अनुत्तरित सवाल यह है कि सही जांच न करने के लिए पुलिस की जवाबदेही कौन तय करेगा?”
उन्होंने कहा, “इस मामले में किसी को भी न्यायपूर्ण निष्कर्ष नहीं मिला है.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट… सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.
SOURCE : BBC NEWS




