Home National news hindi 250 साल बाद भी ‘अमेरिकन ड्रीम’ ज़िंदा है, लेकिन मुश्किल से

250 साल बाद भी ‘अमेरिकन ड्रीम’ ज़िंदा है, लेकिन मुश्किल से

2
0

Source :- BBC INDIA

स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी की फ़ाइल फ़ोटो

इमेज स्रोत, Getty Images

सोलह साल पहले, आब्दी नॉर इफ़्तिन कीनिया की सबसे बदहाल झुग्गियों में से एक में रहने वाले एक सोमाली शरणार्थी थे, जब उन्हें पता चला कि उन्होंने ज़िंदगी भर के लिए ‘एक लॉटरी’ जीत ली है.

साल 2013 में क़रीब अस्सी लाख आवेदकों में से, वह उन भाग्यशाली पचास हज़ार लोगों में से एक थे जिन्हें अमेरिकी सरकार की ओर से 1990 के दशक में शुरू की गई डाइवर्सिटी वीज़ा योजना के तहत अमेरिकी वीज़ा दिया गया था.

आब्दी का सपना हमेशा से अमेरिका में बसने का था. वह इस सपने को लेकर इतने जुनूनी थे कि हॉलीवुड फिल्में देखने और अंग्रेज़ी सीखने की वजह से उनके बचपन के दोस्तों ने उन्हें “आब्दी अमेरिका” उपनाम दे दिया था.

साल 2014 में उन्होंने बीबीसी को बताया था, “पूरी ज़िंदगी मुझे अमेरिका से प्यार रहा है – दुनिया का सबसे बेहतरीन देश, सपनों की दुनिया, अवसरों की धरती.”

उसी साल, 41 वर्षीय आब्दी अमेरिका पहुंचे, मेन के एक छोटे से क़स्बे में बस गए. उन्होंने इन्सुलेशन लगाने का काम हासिल किया और अमेरिकी नागरिक बन गए.

लेकिन अब उनकी उम्मीदें हक़ीक़त से टकरा गई हैं. इस साल उन्होंने एक शरणार्थी पुनर्वास एजेंसी में अपनी नौकरी खो दी, और इसकी वजह से उनका स्वास्थ्य बीमा भी ख़त्म हो गया.

अमेरिका के 250वें जन्मदिन के मौक़े पर कई अमेरिकियों की तरह आब्दी भी अपने देश (अमेरिका) के भविष्य को लेकर चिंतित महसूस कर रहे हैं.

एक व्यक्ति ऑफिस में हेडफोन और सफेद शर्ट पहने हुए माइक्रोफोन में बात कर रहा है.

उन्होंने मुझसे कहा, “मुझे ऐसा लगता है कि अमेरिकी सपना अभी भी जीवित है, लेकिन वह अच्छी हालत में नहीं है.”

इसी बीच, कैलिफोर्निया के 24 वर्षीय अभिनेता ल्यूक मुलेन ने मुझे बताया कि वह हॉलीवुड फिल्मों में अवसरों की कमी के कारण कनाडा जाने की योजना बना रहे हैं.

उन्होंने कहा, “इस देश में पूंजी का केंद्रीकरण हो रहा है और ऐसा होने के साथ-साथ अवसर कम होते जा रहे हैं.”

अमेरिका की स्थापना की 250वीं वर्षगांठ से पहले एक के बाद एक किए गए सर्वेक्षणों से पता चलता है कि कई अमेरिकियों को लगता है कि ‘अमेरिकी सपना’ – यानी यह वादा कि अमेरिका में कोई भी व्यक्ति अपने लिए एक उज्ज्वल भविष्य बना सकता है, धूमिल हो रहा है.

एसोसिएटेड प्रेस-एनओआरसी के हालिया सर्वेक्षण में पाया गया कि केवल एक तिहाई लोग ही मानते हैं कि अमेरिकी सपना अब भी कायम है. कई सर्वेक्षणों में ऐसी ही स्थिति देखने को मिली है.

प्यू रिसर्च सेंटर के एक हालिया अध्ययन से पता चलता है कि अधिकांश अमेरिकी मानते हैं कि देश के सबसे अच्छे दिन बीत चुके हैं.

अमेरिका का 250वां जन्मदिन ऐसे समय में आया है जब देश में गहरा ध्रुवीकरण और राजनीतिक विभाजन व्याप्त है.

तो इसका क्या मतलब है ‘ड्रीम’ – एक ऐसा ब्रांड जिसे फिल्मों, संगीत और पॉप संस्कृति के माध्यम से दुनिया भर में निर्यात किया जाता है – लोगों की पहुंच से बाहर हो गया है?

‘मोटर कारों का कोई सपना नहीं’

19वीं और 20वीं शताब्दी में इमिग्रेंट्स बड़ी संख्या में एलिस द्वीप पर आकर बस गए

इमेज स्रोत, Getty Images

रिवोल्युशनरी वॉर (1775-83) के बाद के शुरुआती दिनों से लेकर 21वीं सदी तक, जिसे ‘सपना’ कहा जाने लगा, उसने लाखों प्रवासियों को आशा, उम्मीद और व्यक्तिवाद से भरे इस नए राष्ट्र की ओर आकर्षित किया.

कारखाने के मजदूर, किसान, सोने की खोज करने वाले और सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोग इस विश्वास के साथ अमेरिका पहुंचे कि वे यूरोप की वर्ग व्यवस्था से मुक्त होकर एक नई पहचान (एक ‘अमेरिकी’) बना सकते हैं.

इतिहासकार आपको बताएंगे कि इस सपने में कभी भी सभी लोग शामिल नहीं थे – निश्चित रूप से मूल अमेरिकी, गुलाम या यहां तक कि महिलाएं भी नहीं. फिर भी, अमेरिकी सपने का विचार कायम रहा.

अमेरिकी सपने की अवधारणा अमेरिका की स्थापना के समय से ही मौजूद है, लेकिन यह मुहावरा बाद में, महामंदी के दौरान 1931 में प्रकाशित पुस्तक “द एपिक ऑफ़ अमेरिका” में लोकप्रिय हुआ.

इसमें इतिहासकार जेम्स ट्रस्लो एडम्स ने लिखा, “यह केवल मोटर कारों और ऊंची सैलरी का सपना नहीं है, बल्कि एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था का सपना है जिसमें हर पुरुष और हर महिला अपनी जन्मजात क्षमता के मुताबिक़ उच्चतम स्तर तक पहुंचने में सक्षम होंगे.”

यह नारा पिछले कई वर्षों में विकसित हुआ है. आजकल इसे अक्सर उद्यमिता, सामाजिक गतिशीलता और सबसे बढ़कर, आर्थिक अवसरों से जोड़ा जाता है.

द पॉलिटिक्स ऑफ द अमेरिकन ड्रीम: डेमोक्रेटिक इन्क्लूजन इन कंटेम्परेरी अमेरिकन पॉलिटिकल कल्चर के लेखक सिरिल घोष कहते हैं, “यह हमेशा से जीवन में पहले से बेहतर करने के बारे में रहा है. कुछ लोगों के लिए, जीवन में बेहतर का मतलब केवल इंग्लैंड के चर्च की ओर से सताया जाना नहीं है.”

उनका कहना है, “यह सिर्फ भौतिकवाद के बारे में नहीं है. यह सुरक्षा के बारे में है. यह पिछली स्थिति से बेहतर करने के बारे में है. यह हमेशा से इसी बारे में रहा है.”

आब्दी सोमालिया में पले-बढ़े थे और ‘अल-शबाब’ आतंकवादी समूह की गोलीबारी से बचने के लिए गड्ढों में छिपते रहते थे.

उन्होंने अमेरिका जाने की अपनी इच्छा का कारण बताते हुए कहा, “आज़ादी मेरी सबसे बड़ी प्राथमिकता थी. जीना और सांस लेना कल एक बहुत बड़ा मुद्दा था, और मैं वास्तव में यही चाहता था.”

शोधकर्ताओं का कहना है कि आब्दी जैसे पहली पीढ़ी के प्रवासी अक्सर अमेरिका की संभावनाओं के बारे में अधिक आशावादी होते हैं.

‘डिबेटिंग द अमेरिकन ड्रीम: हाउ एक्सप्लेनेशंस फॉर इनइक्वलिटी पोलराइज पॉलिटिक्स’ की लेखिका एलिजाबेथ सुहे कहती हैं, “इनमें से कई लोग कम समृद्ध देशों से आ रहे हैं. इसलिए अगर वे पलायन नहीं करते तो उनकी तुलना में वे वास्तव में बेहतर स्थिति में होंगे.”

प्यू रिसर्च सेंटर में नस्ल और जातीयता अनुसंधान के निदेशक मार्क ह्यूगो लोपेज़ ने विशेष रूप से लैटिनी आप्रवासियों के दृष्टिकोण का गहन अध्ययन किया है.

उन्होंने कहा, “अधिकांश आप्रवासियों में यह कहने की अधिक संभावना दिखती है कि वे अपने सपनों को साकार कर रहे हैं, या उन्होंने इसे हासिल कर लिया है.”

लोपेज़ ने यह भी कहा कि ‘वे अपने बच्चों के भविष्य को लेकर अधिक आशावादी होते हैं.’

अमेरिकी सपना हुआ बाधित

मौजूदा अमेरिकी प्रशासन ने प्रवासियों को लेकर सख़्ती बढ़ा दी है (सांकेतिक तस्वीर)

इमेज स्रोत, Getty Images

अमेरिकी सपना हमेशा से ही आप्रवासियों को आकर्षित करता रहा है. हालांकि, आजकल कम ही लोग अमेरिका आ रहे हैं.

राष्ट्रपति ट्रंप ने चुनाव प्रचार में इतिहास के सबसे बड़े सामूहिक निर्वासन कार्यक्रम को अंजाम देने का वादा किया था. उन्होंने अब इमिग्रेशन पर अंकुश लगाना अपने राष्ट्रपति पद का एक मुख्य काम बना लिया है.

अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान, ट्रंप ने न केवल अमेरिका की दक्षिणी सीमा से अवैध रूप से प्रवेश करने वाले प्रवासियों की संख्या पर अंकुश लगाया है, बल्कि उन्होंने अमेरिका आने के कुछ कानूनी रास्तों को भी अवरुद्ध कर दिया है, जिसमें डाइवर्सिटी वीज़ा कार्यक्रम भी शामिल है.

लेकिन आज स्थिति सिर्फ इतनी ही नहीं है कि अमेरिका कम आप्रवासियों का स्वागत कर रहा है, बल्कि ऐसा लगता है कि रिकॉर्ड संख्या में लोग देश छोड़कर जा रहे हैं.

कनाडा के वैंकूवर में दक्षिणी कैलिफोर्निया की तुलना में फिल्मों से जुड़े प्रोजेक्ट में अच्छे अवसर मिल रहे हैं (सांकेतिक तस्वीर)

इमेज स्रोत, Getty Images

एक सुझाव यह है कि अमेरिका में पले-बढ़े कई अमेरिकी यह नहीं सोचते कि देश ने अपने वादे को पूरा किया है कि ‘अगर आप कड़ी मेहनत करते हैं और नियमों का पालन करते हैं, तो आपको एक सभ्य, आरामदायक जीवन मिलना चाहिए.’

पिछले साल, एक ऐतिहासिक उलटफेर में, आयरलैंड जाने वाले अमेरिकियों की संख्या, अमेरिका आने वाले आयरिश लोगों की संख्या से अधिक थी.

अमेरिकी सरकार अपनी मर्ज़ी से देश छोड़ने वाले अमेरिकियों की संख्या का रिकॉर्ड नहीं रखती है, इसलिए इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन रिपोर्टों से पता चलता है कि यह स्थिति केवल आयरलैंड तक ही सीमित नहीं है.

अमेरिकी रिकॉर्ड संख्या में ब्रिटेन की नागरिकता के लिए आवेदन कर रहे हैं, और वॉल स्ट्रीट जर्नल ने बताया कि यूरोपीय संघ के लगभग सभी 27 सदस्य देशों में रहने और काम करने के लिए आने वाले अमेरिकियों की संख्या बढ़ रही है.

लोग देश क्यों छोड़ रहे हैं? कुछ लोग इसका कारण अमेरिका की मौजूदा राजनीति को बताते हैं, तो कुछ स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत और जीवन स्तर में गिरावट को.

अधिकतर मामलों में इसके कई कारण हो सकते हैं, जिनमें से कुछ व्यक्तिगत भी होते हैं.

ल्यूक मुलेन के लिए, यह नौकरी की संभावनाओं से जुड़ा मामला है. वे किशोरावस्था में डिज्नी के शो ‘एंडी मैक’ में एक्टिंग कर चुके हैं और अब लेखन और निर्माण में अधिक सक्रिय हैं.

उनका कहना है कि उन्हें इन दिनों कनाडा के वैंकूवर में दक्षिणी कैलिफोर्निया की तुलना में फिल्मों से जुड़े प्रोजेक्ट के अधिक अवसर मिल रहे हैं.

हॉलीवुड से प्रतिस्पर्धा करने और एक प्रमुख फिल्म केंद्र बनने में मदद करने के लिए सरकार ने वैंकूवर को टैक्स छूट की नई योजना के तहत रखा है.

ICE अधिकारी एक सफेद वैन के किनारे खड़े एक व्यक्ति की तलाशी ले रहे हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images

अमेरिकी सिनेमा के ज़रिए दुनिया भर में अमेरिकी सपने का प्रचार-प्रसार किया गया है और कई मायनों में हॉलीवुड अमेरिका में कामयाबी हासिल करने के विचार का प्रतीक है.

हालांकि, ल्यूक के लिए मामला थोड़ा जटिल है. उनका कहना है कि पहले ज़्यादा मौके थे. पिछले कुछ सालों में बड़े स्टूडियो की ओर से हॉलीवुड फिल्मों और टीवी पर ख़र्च या तो स्थिर हो गया है या कम हो गया है.

उन्होंने कहा, “अभी हम देख रहे हैं कि कॉस्ट कटिंग के प्रयास ने प्रोजेक्ट को पूरा करना बहुत मुश्किल बना दिया है. इसमें जोखिम कम करने के लिए कम लोगों को काम पर रखा जा रहा है.”

पिछले साल दिसंबर में कनाडा के कानून में हुए बदलाव के कारण उन्हें हाल ही में कनाडा की नागरिकता मिली है.

उन्होंने कहा, “कनाडाई नागरिक बनने की मेरी प्रक्रिया इस सच से बहुत हद तक जुड़ी हुई है कि मैं यहां उन चीजों का निर्माण नहीं करवा सकता जिन पर मैं वर्षों से काम कर रहा हूं और जिनके बारे में मैं भावुक हूं.”

इसलिए वह कनाडा में बसने का इरादा रखते हैं. हालांकि, वह यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि वे हमेशा के लिए वहां नहीं रहेंगे.

उन्होंने कहा, “मैं अमेरिका को कभी नहीं छोडूंगा. यह मेरा घर है और मुझे लगता है कि इसके लिए लड़ना अभी भी जरूरी है. इस देश को बेहतर बनाने के लिए हमें बहुत कुछ करना है.”

आकांक्षा बनाम वास्तविकता

हर पीढ़ी पिछली पीढ़ी से बेहतर प्रदर्शन करेगी- आंकड़े यह भी बताते हैं कि पिछले 50 वर्षों में यह धारणा कमजोर पड़ गई है.

इमेज स्रोत, Getty Images

आजकल समाजशास्त्रियों और राजनीति वैज्ञानिकों के बीच आम सहमति यह है कि वित्तीय सफलता तेजी से उस ‘सपने’ का एक केंद्रीय सिद्धांत बन गई है – यह यकीन कि मेरे बच्चों या पोते-पोतियों का जीवन मुझसे बेहतर होगा.

सुहे ने कहा, “मोटे तौर पर कहें तो, अमेरिकी सपना यह विचार है कि यदि आप कड़ी मेहनत करते हैं, तो आपको एक अच्छा जीवन मिलना चाहिए, जिसे हम मध्यम वर्गीय जीवन शैली कह सकते हैं. यानी एक घर, स्वास्थ्य सेवा, अपने बच्चों की देखभाल करने की क्षमता, एक कार और कॉलेज की शिक्षा.”

हर पीढ़ी पिछली पीढ़ी से बेहतर प्रदर्शन करेगी- आंकड़े यह भी बताते हैं कि पिछले 50 वर्षों में यह धारणा कमजोर पड़ गई है.

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री राज चेट्टी के शोध से पता चला है कि सन 1940 में जन्मे बच्चों में से 90% अपने माता-पिता से अधिक कमाने वाले बने. आज, 1980 के दशक में जन्मे बच्चों में से केवल आधे ही आर्थिक रूप से अपने माता-पिता से बेहतर प्रदर्शन करने की राह पर हैं.

आर्थिक समृद्धि की यह धारणा दूसरे विश्व युद्ध के बाद की आर्थिक उछाल के साथ 1950 के दशक में फैली, जिसका सबसे अच्छा संकेत सफेद बाड़ों से सजे एकल-परिवार घरों की बढ़ोतरी थी.

घोष कहते हैं कि नागरिक अधिकार आंदोलन और अधिक व्यापक आप्रवासन नीतियों के साथ 1960 के दशक के मध्य में यह सपना राजनीतिक बयानबाजी में विशेष रूप से लोकप्रिय हो गया.

सुहे ने कहा, “यह अमेरिका का एक मूल हिस्सा है. लगभग सभी इस बात से सहमत हैं कि यह एक महत्वपूर्ण आदर्श है. लेकिन… इस बात पर बहुत बहस होती है कि क्या अमेरिका वास्तव में ‘अमेरिकी सपने’ को साकार कर पाता है या नहीं.”

तो सपना कब धुंधलाने लगा?

डोनाल्ड ट्रंप ने दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद इमिग्रेशन को अहम मुद्दा बनाया है

इमेज स्रोत, Getty Images

मार्क रैंक, ‘चेज़िंग द अमेरिकन ड्रीम: अंडरस्टैंडिंग व्हाट शेप्स आवर फॉर्च्यून्स’ के सह-लेखक हैं. उनके मुताबिक़, वैश्वीकरण और सैलरी में ठहराव के साथ ही क़रीब 50 साल पहले यानी 1970 के दशक में, इस सपने का पतन शुरू हो गया था.

उन्होंने कहा, “अमेरिकी सपने को साकार करना बहुत मुश्किल हो गया है. यह आर्थिक सौदे का विचार है कि अगर आप कड़ी मेहनत करते हैं और नियमों का पालन करते हैं, तो आपका जीवन अच्छा और आरामदायक होना चाहिए.”

उन्होंने आगे कहा, “हर पीढ़ी का पिछली पीढ़ी से आर्थिक रूप से बेहतर होना अमेरिकी सपने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. और 1970 के दशक तक यही स्थिति थी.”

और विशेषज्ञों का कहना है कि बाद के वर्षों में, सामाजिक-आर्थिक असमानता बढ़ने के साथ-साथ ‘सपने’ का पतन लगातार जारी रहा.

फिर, कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि एक और निर्णायक मोड़ आया, साल 2008 का आर्थिक संकट और उसके बाद के झटके. इसके बाद घर का मालिक होना और स्थिर नौकरी, तेजी से पहुंच के बाहर होती जा रही थी.

और कई अमेरिकी उस आर्थिक आशावाद को फिर कभी हासिल नहीं कर पाए. इसके बावजूद, अमेरिका में सैलरी ब्रिटेन और यूरोप के अधिकांश हिस्सों की तुलना में कहीं अधिक है.

इसके बावजूद, इस सपने के साकार होने की संभावना को लेकर राजनीतिक दलों में व्यापक मतभेद बने हुए हैं.

सर्वेक्षणों से पता चलता है कि रिपब्लिकन और बुजुर्ग अमेरिकी अब भी इस सपने को लेकर आश्वस्त हैं. इसे लेकर युवा वर्ग विशेष रूप से संदेह में है.

एक सर्वेक्षण में पाया गया कि ल्यूक की तरह 18-29 आयु वर्ग के पांच में से केवल एक शख़्स का मानना है कि यह सपना अब भी साकार हो सकता है.

हालांकि, यह सपना कभी भी पूरी तरह से वित्तीय सफलता के बारे में नहीं रहा है. कई लोगों के लिए, यह स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों का सपना है, जिसकी जड़ें अमेरिका के संस्थापक दस्तावेजों, जैसे कि बिल ऑफ राइट्स में निहित हैं.

और इसी संदर्भ में, यह ध्यान देने योग्य है कि कई काले अमेरिकियों ने लंबे समय से यह सोचा है कि यह सपना देश संस्थापकों के ऊंचे-ऊंचे बयानों पर आधारित एक मिथक था जो अमेरिकी ग़ुलामी और अलगाव की वास्तविकता से मेल नहीं खाता था.

1900 के दशक की शुरुआत में कपास के खेत में काम करते हुए अश्वेत लोगों को दर्शाने वाली एक ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर.

इमेज स्रोत, Getty Images

मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने अमेरिका की “स्किज़ोफ्रेनिक पर्लनैलिटी” के रूप में व्याख्या की थी, यह उस समय से बहुत पहले की बात है जब देश भर में उस सपने के प्रति मोहभंग शुरू हुआ था.

उन्होंने 1960 में नॉर्थ कैरोलाइना में दिए गए एक भाषण में कहा, “वास्तव में, अमेरिका मूल रूप से एक सपना है – एक ऐसा सपना जो अभी तक पूरा नहीं हुआ है. दासता और नस्लीय भेदभाव एक ऐसे राष्ट्र में विचित्र विरोधाभास रहे हैं जिसकी स्थापना इस सिद्धांत पर हुई थी कि सभी इंसान समान हैं.”

रेनिक्वा एलन-लैम्फेयर, जिन्होंने ‘ड्रीम’ के प्रति काले लोगों के दृष्टिकोण पर शोध किया है, उन्होंने इस अवधारणा को अमेरिका के “सबसे स्थायी मिथकों” में से एक बताया है.

वह कहती हैं, “अमेरिकी सपने को लेकर काले लोगों के अपने अलग अनुभव हैं, क्योंकि उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा वास्तविक आज़ादी के लिए संघर्ष करने में बीता है.”

उन्होंने आगे कहा, “अमेरिकी सपना मेरे भीतर का एक हिस्सा है. एक बेहतर दिन की उम्मीद- भले ही मुझे यह कठिन लगता है. मुझे यह सचमुच बहुत कठिन लगता है.”

सपने को जीवित रखना

लाल और सफेद वर्दी पहने पुरुषों का एक समूह युद्ध के पुनर्अभिनय के हिस्से के रूप में एक रेतीले टीले पर चढ़ता है.

इमेज स्रोत, Getty Images

पिछले कई महीनों के अलग-अलग सर्वेक्षणों को खंगालते हुए मुझे जो एक बात सबसे अलग लगी, वह ‘द टाइम्स’ की ओर से किया गया एक सर्वेक्षण था, जिसमें यह सुझाव दिया गया था कि इस समय सपने के बारे में आम निराशावाद के बावजूद, “सर्वेक्षण में शामिल 61% लोगों ने कहा कि वे इस अवधारणा में विश्वास करते हैं.”

44 वर्षीय ब्रैंडन पैटी, उन कुछ अमेरिकियों में से एक हैं जो दृढ़ता से मानते हैं कि अमेरिकी सपना अभी भी जीवित है और साकार हो रहा है. वे फ्लोरिडा के सेंट जॉन्स काउंटी में क्लर्क और कॉम्प्ट्रोलर (नौसेना के रिजर्व कमांडर) हैं.

उन्होंने मुझसे कहा, “ईश्वर की कृपा से ही सही यहां जन्म लेकर, अमेरिका का हिस्सा बनकर और इस देश का होने के नाते मैं ख़ुद को सम्मानित महसूस करता हूं.”

“जब मैं ‘अमेरिकन ड्रीम’ मुहावरा सुनता हूं, तो मेरे लिए इसका मतलब है कि अवसर असीमित हैं, और यह कि अमेरिका में, आप शून्य से शुरुआत करके अपना रास्ता ख़ुद बना सकते हैं. यह कई मायनों में एक अमेरिकी होने का अंतर्निहित गुण है.”

ब्रैंडन अपने परिवार में बैचलर्स पास करने वाले पहले व्यक्ति थे, और अपनी पीढ़ी में हाई स्कूल पास करने वाले भी पहले शख़्स थे.

उन्होंने अपने सपने के बारे में कहा, “मैं अब 44 साल का हूं, और सच कहूं तो मैं इसे जी रहा हूं.”

पब्लिक पॉलिसी पर आधारित एक थिंक टैंक, द आर्चब्रिज इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष और सीईओ, गोंजालो श्वार्ज़ इस बात से सहमत हैं कि अमेरिका में रहने के सकारात्मक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करना महत्वपूर्ण है.

आर्चब्रिज इंस्टीट्यूट के अपने सर्वेक्षण में पाया गया कि विभिन्न आबादी समूहों के अधिकांश लोग इस बात से सहमत हैं कि अमेरिकी सपना आज भी जीवित और समृद्ध है.

संगठन का कहना है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि इसके कामकाज का तरीका अलग है और यह अन्य सर्वेक्षणों की तुलना में अधिक सीधे सवाल पूछता है, जो कि स्वभाव में कंसेप्ट पर ज़्यादा आधारित होते हैं.

“अगर हम सिर्फ नकारात्मक पहलुओं और उन लोगों पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो मानते हैं कि अमेरिकी सपने को साकार करना असंभव है, तो हम अमेरिकी सपने के पतन को एक ऐसी भविष्यवाणी बना देंगे जो खुद ही सच हो जाएगी.”

श्वार्ज़ कहते हैं. “हमें पीछे हटकर, लंबा नज़रिया अपनाना चाहिए और अमेरिका के अगले 250 वर्षों के लिए आशा की किरण के रूप में अमेरिकी सपने को फिर से ज़िंदा करने के लिए प्रेरित होना चाहिए.”

इस विषय पर लिखने वाले समाजशास्त्री मार्क रैंक के अनुसार, यह सपना, भले ही पहले की तुलना में अधिक सशर्त हो, लेकिन अभी भी जीवित है.

वे कहते हैं, “अगर आप कहते हैं कि यह अब जीवित नहीं है… तो आपने अमेरिका की पहचान के एक अहम हिस्से को ही छीन लिया है. मुझे लगता है कि इसके बारे में सवाल हैं और इसके बारे में अनिश्चितता भी है.”

लेकिन जिस तरह से वे इसे देखते हैं – अमेरिकी आशावाद की भावना से प्रेरित होकर, ये सवाल इस बात पर फिर से विचार करने का मौक़ा हैं कि अमेरिका यह कैसे सुनिश्चित कर सकता है कि अगले 250 वर्षों तक यह सपना सभी के लिए सुलभ बना रहे.

मेन में वापस आकर, आब्दी ने बताया कि उनके भाई हसन, जो वीज़ा प्रतिबंधों के कारण अमेरिका में नहीं रुक कर सके, हाल ही में कनाडा के नागरिक बन गए हैं.

उन्होंने हंसते हुए मुझसे कहा, “मेरे भाई का कहना है कि वहां स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतर हैं.”

तमाम असफलताओं के बावजूद, आब्दी का कहना है कि अगर उन्हें सब कुछ दोबारा करना पड़े, तो भी वे अमेरिका को ही चुनेंगे.

वे कहते हैं, “मुझे लगता है कि यह मेरा पहला प्यार है.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS