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48 घंटे में फूटा ‘इस्लामिक नाटो’ का गुब्बारा: सऊदी पर हमला, बचाने नहीं आए पाकिस्तान-तुर्की

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Source :- LIVE HINDUSTAN

सऊदी, पाकिस्तान और तुर्की के मक्का रक्षा समझौते की 48 घंटे में पोल खुल गई। जाजान में अरामको रिफाइनरी पर हूती ड्रोन हमले के बाद भी गठबंधन की ओर से कोई सैन्य कार्रवाई नहीं हुई।

सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हाल ही में घोषित मक्का संयुक्त रक्षा समझौता अपने पहले ही बड़े इम्तिहान में फेल होता दिख रहा है। ईरान समर्थित यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के जाजान स्थित अरामको रिफाइनरी पर ड्रोन से हमला कर दिया। लेकिन, ‘एक पर हमला, तीनों पर हमला’ का दावा करने वाले इस नवगठित गठबंधन ने न तो कोई सैन्य जवाबी कार्रवाई की और न ही हमले को लेकर कोई धमकी दी।

हमले के बाद खामोश रहे पाकिस्तान और तुर्की

‘द यरूशलम पोस्ट’ के एक ताजा एनालिसिस में इस सैन्य गठबंधन की हकीकत सामने आई है। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगान और पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ ने शुक्रवार को मक्का में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते को ‘इस्लामिक देशों का नाटो’ भी कहा जा रहा है। समझौता होने के महज 48 घंटे बाद रविवार सुबह हूती विद्रोहियों ने जाजान की रिफाइनरी को निशाना बना दिया।

हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सारी ने कहा कि यह हमला सादा और हज्जाह प्रांतों में सऊदी अरब के ड्रोन ऑपरेशनों के जवाब में किया गया। सऊदी ऊर्जा मंत्रालय ने भी रिफाइनरी में आग लगने की पुष्टि की, जिसे बाद में बुझा लिया गया।

समझौते के दावों पर सवाल

मक्का समझौते में यह तय हुआ था कि किसी भी एक देश पर सशस्त्र हमले को तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इसके बावजूद, जाजान हमले के बाद न तो तुर्की और न ही पाकिस्तान ने कोई प्रतिक्रिया दी। इससे असल संकट में इस समझौते के काम करने के तरीके पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।

क्या ‘इस्लामिक नाटो’ सिर्फ एक दिखावा है?

इजरायली कमेंट्री में इस समझौते को ‘इस्लामिक नाटो’ या बड़े सुन्नी गठबंधन की नींव बताया गया था। यहां तक कि इसे सऊदी अरब के लिए पाकिस्तानी ‘परमाणु छतरी’ का नाम भी दिया गया। लेकिन समझौते की बारीक डिटेल्स कुछ और ही कहानी बयां करती हैं।

तुर्की के विदेश मंत्री हाकन फिदान ने इस समझौते को नाटो के ‘आर्टिकल 5’ के समान बताया था और कहा था कि सऊदी अरब में इसका एक स्थायी सचिवालय बनाया जाएगा। हालांकि, फिदान ने यह भी स्पष्ट किया था कि किसी हमले से अपने आप तुरंत सैन्य कार्रवाई शुरू नहीं हो जाएगी। सदस्य देश पहले आपस में सलाह-मशविरा करेंगे कि किस तरह की और कितनी मदद की जरूरत है।

यरूशलम पोस्ट के मुताबिक, किसी रक्षा प्रतिबद्धता और सैन्य जवाब की गारंटी के बीच बड़ा फर्क होता है। जाजान की घटना से साफ हो गया है कि यह गठबंधन जमीनी स्तर पर तुरंत कार्रवाई करने में अभी सक्षम नहीं है।

पुराने समझौते में भी बेअसर रहा था पाकिस्तान

यह पहली बार नहीं है जब ऐसा हुआ है। सितंबर 2025 में भी सऊदी अरब और पाकिस्तान ने ऐसा ही एक रक्षा समझौता किया था, जिसमें दोनों ने एक-दूसरे की रक्षा का वादा किया था।

ईरान के हमले पर नहीं किया था बचाव

जब 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया और उसके बाद ईरान ने सऊदी रिफाइनरियों व प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर अमेरिकी विमानों पर निशाना साधा, तब पाकिस्तानी सेना ने कोई सीधा सैन्य हस्तक्षेप नहीं किया था। जबकि उस हमले में दो सऊदी नागरिकों की जान चली गई थी।

सिर्फ तैनाती, जंग नहीं

उस वक्त पाकिस्तान ने सऊदी अरब के पैसे पर वहां अपने 8,000 सैनिक, 16 लड़ाकू विमान (मुख्य रूप से JF-17), ड्रोन स्क्वाड्रन और चीनी HQ-9 एयर-डिफेंस बैटरी तैनात किए थे। लेकिन पाकिस्तानी सेना की भूमिका मुख्य रूप से सलाह देने और ट्रेनिंग तक ही सीमित रही। इस्लामाबाद वाशिंगटन और तेहरान के बीच बातचीत की मेजबानी करता रहा।

ताजा मक्का समझौता भी उसी पुराने मॉडल को ही औपचारिक रूप देता है। इसमें सऊदी अरब विदेशी सैन्य उपकरणों और जवानों की तैनाती का खर्च उठाता है, लेकिन साझेदार देशों पर तुरंत युद्ध में उतरने की कोई बाध्यता नहीं होती है। अपने पहले ही टेस्ट में कोई सैन्य जवाब न मिलने से इस नए समझौते की राजनीतिक और सैन्य कमजोरियां उजागर हो गई हैं।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN