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7500 घर उजड़े, 2.56 अरब डॉलर का नुकसान; नेपाल को फिर से खड़ा कर पाएंगे बालेन शाह?

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Source :- LIVE HINDUSTAN

नेपाल में फ्लैश फ्लड से 7,500 घर तबाह और 20,000 को दोबारा बनाने की जरूरत है। कम से कम 12 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट क्षतिग्रस्त हुए हैं। नुकसान का शुरुआती अनुमान 2.56 अरब डॉलर है, जो देश के सालाना बजट का करीब पांचवां हिस्सा है।

नेपाल के पहाड़ी इलाकों और नदी घाटियों में दो हफ्ते पहले आई अचानक बाढ़ ने भारी तबाही मचाई। बाढ़ में बस्तियां बह गईं और सड़कें व पुल नष्ट हो गए। अब तक सामने आए शुरुआती आकलन के मुताबिक करीब 7,500 घर पूरी तरह तबाह हो गए हैं, जबकि करीब 20,000 घरों को दोबारा बनाने की जरूरत है। कम से कम 12 जलविद्युत परियोजनाएं भी क्षतिग्रस्त हुई हैं। आपदा से हुए नुकसान का शुरुआती अनुमान 2.56 अरब डॉलर लगाया गया है। यह रकम नेपाल के मौजूदा वित्त वर्ष के करीब 14 अरब डॉलर के कुल सरकारी बजट का लगभग पांचवां हिस्सा है।

राजनीतिक उथल-पुथल के बाद अब बाढ़ की चुनौती

बाढ़ की यह तबाही ऐसे समय हुई है जब हिमालयी देश नेपाल एक साल तक चली राजनीतिक उथल-पुथल से उबर रहा है। एक विद्रोह के बाद पिछली सरकार सत्ता से बाहर हो गई थी। अब बालेन शान के नेतृत्व में नई सरकार के सामने एक साथ कई बड़ी चुनौतियां हैं- तबाह बुनियादी ढांचे को फिर से खड़ा करना, राजनीतिक स्थिरता बहाल करना और बदलते मौसम के बीच देश को भविष्य की आपदाओं के लिए ज्यादा मजबूत बनाना। सांसद और अंतरराष्ट्रीय संबंध एवं पर्यटन समिति की अध्यक्ष सुम्निमा उदास ने स्थिति की गंभीरता बताते हुए कहा कि वहां हालात बर्बादी जैसे हैं और पुनर्निर्माण आसान नहीं होगा।

बाढ़ नई सरकार की क्षमता की पहली बड़ी परीक्षा

यह आपदा 36 वर्षीय प्रधानमंत्री बालेन शाह के लिए शुरुआती बड़ी परीक्षा बन गई है। उन्होंने महीनों की राजनीतिक उथल-पुथल के बाद मार्च में प्रधानमंत्री पद संभाला था। राजनीतिक संकट की शुरुआत पिछले साल सितंबर में हुई थी। भ्रष्टाचार और सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के खिलाफ युवाओं के नेतृत्व में शुरू हुए विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए। सुरक्षा बलों की गोलीबारी में दर्जनों प्रदर्शनकारियों की मौत हुई। सरकारी इमारतों और नेताओं के घरों में आग लगा दी गई। इसके बाद प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने इस्तीफा दे दिया और देश कार्यवाहक सरकार के दौर में चला गया।

शाह काठमांडू के पूर्व मेयर और राजनीति में बाहरी व्यक्ति के तौर पर इस उथल-पुथल से उभरे। मार्च में उनकी पार्टी को बड़ी जीत मिली और उन्हें उस राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव का जनादेश मिला, जिस पर देश की समस्याओं का समाधान नहीं कर पाने के आरोप लगते रहे हैं। अब उनकी सरकार के सामने प्राकृतिक आपदा से निपटने और बाढ़ के बाद बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण की चुनौती है।

सेना, पुलिस और हेलीकॉप्टर लगाए गए

सरकार ने राहत और बचाव के लिए सेना, पुलिस, हेलीकॉप्टर और मेडिकल टीमों को लगाया है। स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने और राहत कार्यों का समन्वय किया जा रहा है।

हजारों लोगों को बचाया गया है, लेकिन दूरदराज के इलाकों तक पहुंचना अभी भी मुश्किल है। रास्ते बंद हैं, जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगों में मलबा भरा है और विशेष उपकरणों व प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी है। इससे नेपाल की आपातकालीन प्रतिक्रिया क्षमता की सीमाएं सामने आई हैं।

स्थिति इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि मौजूदा प्रशासन में संकट के इतने बड़े स्तर से निपटने का अनुभव कम है। सरकार के कई नेता राष्ट्रीय स्तर पर नए हैं। काठमांडू की द डिप्लोमैट नेपाल पत्रिका के संपादक गुणराज लुइटेल ने कहा कि सरकार के पास इतने बड़े पैमाने की आपदा से निपटने के लिए पर्याप्त अनुभव नहीं है। उन्होंने कहा कि नेपाल आपदा की आशंका वाला देश है, लेकिन उसने अतीत से सीखने में विफलता दिखाई है।

2.56 अरब डॉलर का नुकसान, पुनर्निर्माण पर 4-5 अरब डॉलर तक खर्च का अनुमान

मंगलवार तक नेपाल और तिब्बत में 1,300 से अधिक लोगों की मौत की सूचना थी, जबकि करीब 5,000 लोग अब भी लापता हैं। बचाव और तलाशी अभियान जारी है, लेकिन नेपाल को अब केवल आपातकालीन मदद से कहीं ज्यादा की जरूरत होगी।

सांसद सुम्निमा उदास के मुताबिक नेपाल को बेहतर आपदा चेतावनी प्रणाली और बदलती परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाए गए बुनियादी ढांचे की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में ऐसी तबाही का जोखिम कम करने के लिए यह भी विचार करना होगा कि सड़कें, बस्तियां और जलविद्युत परियोजनाएं कहां बनाई जाएं।

आपदा अधिकारियों के शुरुआती आकलन के अनुसार 2.56 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है। यह नेपाल के करीब 14 अरब डॉलर के सालाना सरकारी बजट का लगभग 20 फीसदी है। पुनर्निर्माण की पूरी लागत अभी तय नहीं हुई है, हालांकि कुछ अनुमानों में इसे 4 से 5 अरब डॉलर तक बताया गया है।

पर्यटन और बिजली क्षेत्र पर भी बड़ा असर

बाढ़ का असर नेपाल की अर्थव्यवस्था के अहम आधार पर्यटन पर भी पड़ सकता है। इसका प्रभाव तत्काल संकट से आगे तक जा सकता है, खासकर उन समुदायों पर जो पर्यटन सीजन की कमाई पर काफी हद तक निर्भर हैं। बाढ़ ने एक महत्वपूर्ण जलविद्युत गलियारे को भी प्रभावित किया है। नेपाल के स्वतंत्र बिजली उत्पादकों के संघ के उपाध्यक्ष उत्तम भ्लोन के मुताबिक यह गलियारा देश के करीब 10 फीसदी बिजली उत्पादन में योगदान देता है।

निर्माणाधीन परियोजनाओं को भी शामिल किया जाए तो यह गलियारा नेपाल की कुल बिजली उत्पादन क्षमता का करीब 20 फीसदी प्रतिनिधित्व करता है। पुनर्निर्माण पर होने वाला भारी खर्च नई सरकार पर अतिरिक्त दबाव डालेगा। सरकार को पहले से ही स्कूलों, अस्पतालों, रोजगार और नए निवेश के लिए संसाधन जुटाने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।

नेपाल ने मांगी अंतरराष्ट्रीय मदद

नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र समेत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मदद मांगी है। कई देशों और राहत संगठनों ने आपातकालीन सामान, बचाव विशेषज्ञता और दूसरी सहायता उपलब्ध कराई है। हालांकि सरकार का कहना है कि बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण के लिए उसे इससे कहीं ज्यादा अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत होगी।

गुणराज लुइटेल ने कहा कि विकसित देशों को नेपाल की ज्यादा मदद करनी चाहिए। उनके मुताबिक नेपाल अकेले इस आपदा का खर्च नहीं उठा सकता और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी बढ़ती आपदाओं का सामना कर रहे कमजोर देशों की मदद करना अमीर देशों की जिम्मेदारी है।

जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहा नेपाल का जोखिम

इस आपदा के पीछे की वैज्ञानिक वजह अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। शोधकर्ताओं का मानना है कि ऊंचाई वाले इलाके में चट्टानों और ग्लेशियर की बर्फ से जुड़ा भूस्खलन हुआ, जिससे भारी मात्रा में मलबा नीचे की ओर बहा। हालांकि उन्होंने इसे सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन से जोड़ने को लेकर सावधानी बरतने की बात कही है।

लेकिन हिमालय का बदलता स्वरूप चिंता बढ़ा रहा है। हिमालय तेजी से गर्म हो रहा है, ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं और बारिश तथा बर्फबारी के पैटर्न में बदलाव हो रहा है। नेपाल की संवेदनशीलता इसलिए भी अधिक है क्योंकि उसकी बड़ी आबादी और बुनियादी ढांचा अस्थिर पहाड़ी ढलानों के नीचे स्थित खड़ी घाटियों में है।

कम उत्सर्जन के बावजूद सबसे ज्यादा जोखिम वाले देशों में नेपाल

नेपाल ने वैश्विक तापमान बढ़ाने में बहुत कम योगदान दिया है। विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में नेपाल की हिस्सेदारी करीब 0.1 फीसदी है। इसके बावजूद जलवायु से जुड़े खतरों के प्रति उसकी संवेदनशीलता काफी अधिक है।

सुम्निमा उदास के मुताबिक यही असंतुलन नेपाल के सामने मौजूद बड़ी चुनौतियों में से एक है। उन्होंने कहा कि नेपाल ने पर्यावरण पर अपने प्रभाव को कम करने के लिए कई कदम उठाए हैं। पिछले तीन दशकों में देश में वन क्षेत्र लगभग दोगुना हुआ है, बिजली का अधिकांश उत्पादन स्वच्छ स्रोतों से होता है और इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने में भी नेपाल ने अच्छा प्रदर्शन किया है।

लेकिन उनके मुताबिक ये प्रयास हिमालय में हो रहे बड़े बदलावों से नेपाल को पूरी तरह सुरक्षित नहीं कर सकते। इसलिए औद्योगिक देशों को जलवायु से जुड़ी आपदाओं के लिए नेपाल को तैयार करने और ऐसी आपदाओं के बाद उसके पुनर्निर्माण में ज्यादा जिम्मेदारी लेनी चाहिए। उदास ने कहा कि यह मामला ‘वे बनाम हम’ का नहीं है, बल्कि मानवता और धरती से जुड़ा हुआ है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN