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जानी-मानी गायिका सुमन कल्याणपुर का 31 मई को 89 साल की उम्र में निधन हो गया

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हिन्दी फ़िल्म पार्श्व गायन की दुनिया लगातार सिमटती जा रही है.

अभी आशा भोसले को गये कुछ ही दिन बीते हैं और अब 31 मई को उसी दौर की प्रतिष्ठित गायिका सुमन कल्याणपुर का निधन- जैसे पिछली सदी के सुनहरे दौर वाले संगीत का लगभग समाप्त हो जाने सरीखा मामला बन गया है.

आज ग़ौर से याद करें, तो एकमात्र सुधा मल्होत्रा ही बची हैं, जिनके अलावा उस दौर की गायिकी का सदाबहार दृश्य पटल लगभग ओझल हो चुका है.

ब्रिटिशकालीन भारत के दौर में ढाका में जन्मीं सुमन कल्याणपुर के पिता 1943 में जब बंबई (आज मुंबई) आकर बसे, तब वहीं से छोटी सी उम्र में उनकी संगीत की तालीम शुरू हुई.

सुमन कल्याणपुर ने यह स्वीकारा भी किया था कि बचपन का संगीत रुझान बाद में उन्हें बाक़ायदा इस क्षेत्र में सीखने की ओर ले आया, जिसका नतीजा यह रहा कि उन्होंने उस्ताद अब्दुल रहमान ख़ाँ और नवरंग मास्टर, जिनका पूरा नाम वामनराव सादोलिकर (शास्त्रीय गायिका श्रुति सादोलिकर के पिता) था, से संगीत सीखा.

1952 में उनका बाक़ायदा गायन का सफ़र शुरू हुआ और 1953 में स्टंट फ़िल्मों के महारथी कलाकार शेख मुख़्तार ने उन्हें अपनी फ़िल्म ‘मंगू’ में गायन का मौक़ा दिया. इस फ़िल्म को पहले मोहम्मद शफ़ी संगीतबद्ध कर रहे थे, जिनकी जगह बाद में ओ.पी. नैय्यर ने ली.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुमन कल्याणपुर के निधन पर ये फ़ोटो शेयर करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी (फ़ाइल फ़ोटो)

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पहली ही फ़िल्म से हटाए गए दो गाने

क़िस्मत का खेल देखिए, पहली ही फ़िल्म में तीन गाने पा चुकीं सुमन कल्याणपुर के दो गाने नैय्यर ने फ़िल्म से हटा दिए और मात्र एक लोरी गीत ‘कोई पुकारे तुझे धीरे से’ ही फ़िल्म में रखा.

उनकी इस हरकत से सुमन कल्याणपुर दुखी हुईं और बाद में जब ‘आर-पार’ के लिए भी उन्हें अपेक्षित सहयोग नैय्यर ने नहीं दिया, तब वो पूरी तरह नैय्यर की फ़िल्मों में गाने से विमुख हो गयीं.

नियति का खेल, बड़ी सी बड़ी कला को आसमान पर पहुँचा देता है और दूसरी तरफ़ अत्यधिक श्रेष्ठ कलावन्त को उभरने का मौक़ा तक नहीं देता.

सुमन कल्याणपुर इन दोनों ही परिस्थितियों के बीच फँसी हुई पार्श्व गायिका थीं. उनकी आवाज़ की लता मंगेशकर से तुलना, जहाँ उन्हें तुरन्त परिदृश्य पर विमर्श के लिए ले आया, वहीं उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी बनकर भी उभरा.

उनकी मधुरता में लता मंगेशकर की आवाज़ से साम्य ने उनको पहचान दिलाने और स्थापित होने के बाद भी हमेशा पीछे ही रखा.

लता मंगेशकर से तुलना

सुमन कल्याणपुर को 22 मार्च 2023 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने पद्म भूषण से सम्मानित किया (फ़ाइल फ़ोटो)

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शायद वो अपनी अलग राह बनातीं, तो आशा भोसले और गीता दत्त की तरह का मुकाम उन्हें ज़रूर मिलता.

इस बात की इसी तथ्य से पुष्टि की जा सकती है कि लता-रफ़ी मनमुटाव के बाद उनके हिस्से आये रफ़ी साहब के साथ युगल गीत, बाद में मिलने एकदम बंद हो गए, जब लता मंगेशकर और रफ़ी विवाद निपट गया. बाद में फिर उस तरह से उनको गायिकी के स्तरीय मौके कम मिले.

यह देखना अचम्भित करता है, कई बार रेडियो के प्रसारण में मोहम्मद रफ़ी और सुमन कल्याणपुर के गीतों की सूचना देने में उद्घोषक ग़लती से यह कह जाते थे कि अब ये जो गीत आप सुन रहे हैं, वह लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में है. …और थोड़ी देर बाद ही, भूल सुधार की तरह यह आवाज़ गूँजती थी- ‘हमें खेद है कि पीछे सुने गये इस गीत को लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी ने नहीं, बल्कि मोहम्मद रफ़ी और सुमन कल्याणपुर ने आवाज़ दी है.’

लता को किस बात का अफ़सोस

लता मंगेशकर ख़ुद सुमन कल्याणपुर को बेहद प्रतिभाशाली गायिका मानती थीं

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बहुत सारे लोग इस तरह की घटनाओं से वाकिफ़ होंगे, जिन्होंने रेडियो पर विशेष जयमाला, विविध भारती और भूले-बिसरे गीत, छाया गीत जैसे कार्यक्रमों में न जाने कितनी बार उन गीतों को सुना होगा.

आज जब वो नहीं हैं, तो यह सोचकर सिहरन होती है कि उनके खाते में आई हुई ख्याति भी अकसर धूमिल हो जाती थी, जब उनकी आवाज़ को लता जी की आवाज़ मान लिया जाता था. वो कैसे इसे बर्दाश्त कर पाती होंगी, आज सोच पाना मुश्किल है.

हालाँकि फ़िल्मी हल्कों में प्रचलित तमाम विवादों और गॉसिप से अलग सुमन कल्याणपुर की उपस्थिति बेहद सादगी भरी और विश्वसनीय रही.

मैंने जब लता मंगेशकर पर ‘लता: सुर-गाथा’ किताब लिखी, तो उस दौरान सुमन जी पर उनसे बहुत बातें हुई थीं. लता जी स्वयं उनके बारे में क्या सोचती थीं, यह किताब में दर्ज है, उसकी कुछ पंक्तियाँ उन्हीं की ज़ुबानी यहाँ लिख रहा हूँ-

“उसके कई गानों से तो ऐसा ही लगता था, जैसे लता ही गा रही हों. वह लड़की बहुत अच्छी थी, मतलब इसमें कोई शक नहीं कि वह सुरीली थी और भली महिला थी. बाद में जाकर उसका संगीत इसलिए ख़ारिज हो गया, क्योंकि उसकी आवाज़ मेरी जैसी लगती थी. मुझे इस बात का अफ़सोस है कि उसकी आवाज़ अच्छी थी, लेकिन उसे निखारने और अलग तरीक़े से डेवलप करने के लिए उसने ध्यान नहीं दिया. सुमन कल्याणपुर ऐसा कर पातीं, तो निश्चित ही उनका एक बड़ा और अलग मुकाम बनता.”

यह स्वीकारोक्ति बहस तलब हो सकती है, अपने-अपने ढंग से. लता मंगेशकर और सुमन कल्याणपुर के प्रशंसक इसकी विवेचना कर सकते हैं. मगर, जो बात मुझे इसमें सबसे काम की लगती है, वह यह कि सुरों के शिखर पर बैठी हुई लता मंगेशकर जैसी पार्श्व गायिका भी यह मानने से नहीं हिचकतीं कि उनकी आवाज़ और सुमन कल्याणपुर की आवाज़ लगभग एक सी थी.

सुमन कल्याणपुर के लिए इससे बड़ा कॉम्पलीमेंट कुछ नहीं हो सकता कि इतनी बड़ी पार्श्व गायिका को उनकी आवाज़ में अपनी छाया दिखे और इस बात से वो चिंतित हों.

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SOURCE : BBC NEWS