Source :- LIVE HINDUSTAN
शेयर बाजार में IPO (Initial Public Offering) को लेकर निवेशकों में हमेशा जबरदस्त उत्साह देखने को मिलता है। जब कोई नई कंपनी पहली बार शेयर बाजार में लिस्ट होती है, तो निवेशक उम्मीद करते हैं कि उन्हें शुरुआती दिनों में ही बड़ा मुनाफा मिल जाएगा। हाल के सालों में कई IPO ने निवेशकों को शानदार रिटर्न दिए हैं, लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि हर IPO सफल नहीं होता। निवेशक एआई (AI) बूम के इस दौर में स्पेसएक्स (SpaceX), एंथ्रोपिक (Anthropic) और ओपनएआई (OpenAI) जैसी दिग्गज कंपनियों की बाजार में एंट्री का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। कई शेयर लिस्टिंग के बाद तेजी दिखाने के बजाय नीचे भी आ जाते हैं और निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ता है।
“The Lifecycle Trade” बुक के लिए ईव बोबोच, कैथी डोनेली, एरिक क्रुल और कर्ट डैल द्वारा किए गए एक व्यापक शोध में यह चौंकाने वाला सच सामने आया है कि 90% से अधिक IPO आखिरकार अपनी लिस्टिंग के पहले दिन के सबसे निचले स्तर (First-day low) से भी नीचे चले जाते हैं। भले ही वह शेयर आगे चलकर रिकवर हो जाए, लेकिन उस नुकसान से उबरने में सालों का समय लग सकता है, तो फिर सवाल उठता है कि आईपीओ शेयरों में निवेश करने की सबसे सही और सुरक्षित रणनीति क्या है?
क्या होता है ‘IPO बेस’ (The IPO Base Case)?
टैक्स और मार्केट के दिग्गजों का मानना है कि किसी भी नए शेयर में पैसा लगाने से पहले कुछ दिनों या हफ्तों का इंतजार करना चाहिए, ताकि चार्ट पर एक ‘IPO बेस’ (IPO Base) तैयार हो सके।
आसान शब्दों में समझें तो IPO बेस शेयर बाजार का एक ऐसा ‘रेस्ट स्टॉप’ है, जो ट्रेडिंग के शुरुआती 25 दिनों के अंदर बनता है। इस दौरान शेयर की शुरुआती उठापटक (Volatility) शांत होती है और वह एक बेहद सीमित दायरे (Narrow Range) में कारोबार करने लगता है।
नीचे दिए गए फ्लोचार्ट से समझिए कि एक बढ़िया ‘IPO बेस’ कैसे बनता है और आपको कब खरीदारी करनी चाहिए।
इनिशियल पीक (Initial Peak):- लिस्टिंग के बाद शेयर एक ऊपरी स्तर को छूता है, जहां से आईपीओ बेस की शुरुआत मानी जाती है।
हल्की गिरावट (Pullback):- इसके बाद शेयर में थोड़ी गिरावट (आमतौर पर ऊपरी स्तर से 20% तक, लेकिन ज्यादा उतार-चढ़ाव वाले बाजार में यह 48-50% तक भी हो सकती है) आती है। इस गिरावट के दौरान बड़े संस्थागत निवेशक (Mutual Funds और FIIs) चुपके से शेयर जमा करते हैं, जिससे शेयर को एक मजबूत सपोर्ट (Price Floor) मिलता है।
बाय पॉइंट (Buy Point):- जब शेयर दोबारा संभलकर अपने उसी पहले वाले ‘शुरुआती शिखर’ (Initial Peak) को पार करता है, तो उसे ‘बाय पॉइंट’ या ब्रेकआउट कहा जाता है।
ज्यादातर रिटेल निवेशक ‘कम में खरीदें और ज्यादा में बेचें’ (Buy Low, Sell High) के चक्कर में गिरते हुए शेयर को पकड़ने की गलती करते हैं, जो बहुत जोखिम भरा है। इसके विपरीत आईपीओ बेस रणनीति शेयर को पहले खुद को साबित करने का मौका देती है। अच्छे शेयर इस बेस से बाहर निकलने के बाद लंबी रेस के घोड़े साबित होते हैं।
गूगल (Google) के उदाहरण से समझें
साल 2004 में दिग्गज टेक कंपनी गूगल (अब अल्फाबेट) की बाजार में एंट्री ‘आईपीओ बेस’ का एक किताबी उदाहरण है। 19 अगस्त 2004 को गूगल का शेयर $85 पर लिस्ट हुआ और तुरंत $100 के आसपास स्थिर हो गया। ट्रेडिंग के तीसरे ही दिन इसने $113.48 का अपना शुरुआती हाई (Peak) बनाया, जहां से बेस बनना शुरू हुआ।
इसके बाद शेयर में 13% की एक हल्की गिरावट (Pullback) आई, लेकिन अच्छी बात यह थी कि गिरावट के दौरान ट्रेडिंग वॉल्यूम बहुत कम था, जिसका मतलब था कि लोग शेयर बेच नहीं रहे थे। यह बेस सिर्फ 15 दिनों तक चला और 15 सितंबर को भारी वॉल्यूम के साथ शेयर ने अपने पुराने हाई को तोड़कर ब्रेकआउट (Buy Point) दिया। इसके बाद गूगल के शेयर ने लगातार 8 हफ्तों तक बढ़त दर्ज की और नवंबर तक निवेशकों को 78% का बंपर मुनाफा कमा कर दिया।
हाल ही का उदाहरण देखें तो, 14 मई 2025 को AI इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइडर कोरवीव (CoreWeave) ने अपने 5 हफ्ते के आईपीओ बेस को तोड़ा था। हालांकि, बाजार में मंदी के कारण यह अपने हाई से 48% तक टूट चुका था, लेकिन जैसे ही इसने ब्रेकआउट दिया, महज तीन महीनों के भीतर यह शेयर लगभग तीन गुना (Triple) हो गया।
हर आईपीओ सफल नहीं होता
यह याद रखना बेहद जरूरी है कि हर आईपीओ बेस कामयाब नहीं होता। 3 अप्रैल 2018 को लिस्ट हुई म्यूजिक स्ट्रीमिंग कंपनी स्पॉटिफाई (Spotify) ने लिस्टिंग के बाद $169.10 का एक बाय पॉइंट बनाया था। लेकिन, इसके ब्रेकआउट में बड़े संस्थागत निवेशकों (Institutional Buying) ने दिलचस्पी नहीं दिखाई और वॉल्यूम गायब रहा। नतीजा यह हुआ कि उसी साल दिसंबर तक शेयर अपने हाई से 50% तक क्रैश हो गया और 2022 के अंत तक अपनी आईपीओ कीमत से भी नीचे चला गया। हालांकि, 2023 के बाद इसने शानदार रिकवरी की और 2025 के मिड में $785 के ऐतिहासिक शिखर को छुआ, लेकिन शुरुआती निवेशकों को इसके लिए सालों का मानसिक तनाव और इंतजार झेलना पड़ा।
इन 3 ‘ग्रीन फ्लैग्स’ को देखकर लें अंतिम फैसला
स्पॉटिफाई जैसी गलतियों से बचने और अपनी जीत की संभावनाओं को बढ़ाने के लिए निवेशकों को आईपीओ बेस बनते समय इन 3 तकनीकी संकेतों (Technical Green Flags) पर ध्यान देना चाहिए।
IPO कीमत से ऊपर रहे शेयर:- बेस बनने के दौरान क्या शेयर अपनी मूल IPO लिस्टिंग कीमत से ऊपर टिका हुआ है? अगर शेयर आईपीओ प्राइस से नीचे जाता है, तो यह बड़े फंड्स द्वारा बिकवाली का एक बड़ा चेतावनी संकेत (Warning Sign) है।
वीकली क्लोजिंग मजबूत हो:- शेयर को लगातार अपने साप्ताहिक ट्रेडिंग दायरे के ऊपरी आधे हिस्से (Upper Half) में बंद होना चाहिए, जो बाजार में इसकी मजबूत डिमांड को दर्शाता है।
गिरावट में वॉल्यूम कम हो:- जैसे-जैसे बेस बनता है और शेयर नीचे आता है, ट्रेडिंग वॉल्यूम कम होना चाहिए। कम वॉल्यूम का मतलब है कि बेचने वालों का दबाव अब खत्म हो चुका है और शेयर अगली बड़ी छलांग के लिए तैयार है।
आईपीओ के शुरुआती रोमांच और उत्साह में बहकर सीधे लिस्टिंग के दिन पैसा लगाने के बजाय, शांत दिमाग से ‘आईपीओ बेस’ बनने का इंतजार करना समझदारी है। यह न सिर्फ आपकी पूंजी को शुरुआती भारी नुकसान से बचाता है, बल्कि आपको बड़े संस्थागत निवेशकों के साथ एक मजबूत और सुरक्षित स्तर पर एंट्री करने का सही मौका भी देता है।
डिस्क्लेमर:- यह आर्टिकल केवल एजुकेशन और इंफॉर्मेशन प्रोसेस के लिए है। शेयर बाजार और IPO में निवेश जोखिमों के अधीन है। कृपया कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले अपने फाइनेंशियल सलाहकार से परामर्श जरूर लें।
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