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ममता बनर्जी

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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सामने पार्टी को एकजुट रखने की चुनौती दिखाई दे रही है.

पार्टी के राज्यसभा सांसद सुखेंदु रे राज्यसभा और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़ा दे चुके हैं.

अब पार्टी की लोकसभा सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने दावा किया है कि उनके साथ 20 सांसद हैं और उन्होंने लोकसभा स्पीकर से सदन में अलग बिठाने की मांग की है.

लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस पार्टी के 28 सांसद हैं. 20 सांसदों का समर्थन का मतलब है कि अलग होने वाला कथित गुट दल-बदल विरोधी क़ानून के तहत कार्रवाई से बच सकता है.

हालात ये भी हो सकते हैं कि अलग हुए गुट को असली तृणमूल कांग्रेस के तौर पर मान्यता मिल जाए. हालांकि 20 सांसदों की चिट्ठी की पुष्टि बीबीसी नहीं करता है.

महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी इस तरह के हालात देख चुके हैं, जब अलग हुए गुट को ही मूल पार्टी के तौर पर मान्यता मिल गई.

तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित ऋतब्रत बनर्जी को पहले ही विधानसभा स्पीकर विपक्ष के नेता के तौर पर मान्यता दे चुके हैं.

पार्टी ने वरिष्ठ नेता सोवनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता नियुक्त किया था लेकिन 80 में से 58 विधायकों ने उन्हें नेता मानने से इनकार कर दिया.

ऋतब्रत बनर्जी का दावा है कि पार्टी के अधिकतर विधायक उनके साथ हैं और उन्हीं का गुट असली तृणमूल कांग्रेस है. ये गुट पार्टी में ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के कथित वर्चस्व का विरोध कर रहा है.

ये गुट अभिषेक का विरोध तो कर रहा है लेकिन वो चाहता है कि ममता बनर्जी पार्टी की मुख्य सलाहकार के तौर पर दिशा-निर्देश दें.

काकोली घोष की अगुआई में बग़ावत?

काकोली घोष

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तृणमूल सांसद और सीनियर पार्टी लीडर काकोली घोष दस्तीदार ने सोमवार को दावा किया कि उनके साथ 20 लोकसभा सांसद हैं और उन्होंने एनडीए को समर्थन देने का फ़ैसला किया है.

इन लोगों ने अपने फै़सले के बारे में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को बता दिया है.

‘इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, “काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में अलग हुए गुट की बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के घर में बैठक हुई थी. यहीं पर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी उनसे मिले थे. इसी बैठक में यह फ़ैसला किया गया कि दस्तीदार के नेतृत्व में सांसदों को अलग बिठाने की मांग की जाए.”

ऋतब्रत बनर्जी ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा, “मुझे पता चला कि बीस सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं. लेकिन वास्तव में, दो-तिहाई से भी अधिक सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं. उन्होंने ऐसा क्यों किया, यह मैं ठीक-ठीक नहीं कह सकता, लेकिन तानाशाही के ख़िलाफ़ आवाज़ उठ रही है और लोकतंत्र के लिए यह काफ़ी अहम है.”

उन्होंने कहा, ”मैंने उनसे बात नहीं की है और न ही मुझे पता है कि उनका आगे क्या इरादा है. उनका रुख़ हमसे अलग है. हो सकता है कि मैं उनके साथ खड़ा न हो सकूं, लेकिन मैं उन्हें ज़रूर बधाई दूंगा कि उन्होंने अधिनायकवाद के ख़िलाफ़ लोकतंत्र की आवाज़ बुलंद की है.”

बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने अपनी टिप्पणी में कहा, ”जहां तक तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में कथित टूट-फूट का सवाल है, मैं बीजेपी का आधिकारिक प्रवक्ता होने के नाते उनकी पार्टी के अंदर क्या चल रहा है, इस पर टिप्पणी नहीं करूंगा.”

”लेकिन मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है. जब मीडिया ऐसी ख़बरें प्रकाशित कर रहा है, जब मौजूदा नेताओं के प्रामाणिक बयान सामने आ रहे हैं और जब हमारे पास टीएमसी के वर्तमान सांसदों के इस्तीफ़े के पत्र मौजूद हैं, तो यह साफ़ है कि टीएमसी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है.”

तीखी प्रतिक्रिया भी आ रही सामने

तृणमूल कांग्रेस

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तृणमूल कांग्रेस के कुछ नेताओं की ओर से इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है.

पार्टी सांसद महुआ मोइत्रा ने लिखा, “ये सांसद 2024 में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के टिकट पर जीतकर संसद पहुंचे थे. जनता ने उन्हें एनडीए के लिए नहीं, बल्कि टीएमसी के प्रतिनिधि के रूप में चुना था.”

”जो भी स्वार्थी और अवसरवादी लोग अपने निजी हितों के लिए पार्टी छोड़ना चाहते हैं, वे बेझिझक बीजेपी में शामिल हो सकते हैं. लेकिन पहले उन्हें अपने सांसद पद से इस्तीफ़ा देना चाहिए और फिर बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहिए. तब पता चल जाएगा कि वे वास्तव में कितने बड़े जननेता हैं और जनता उनके साथ है या नहीं.”

वहीं तृणमूल पार्टी के वरिष्ठ नेता कुनाल घोष ने कहा, ”जो लोग सांसद या विधायक बने हैं, उन्होंने तृणमूल कांग्रेस का टिकट लेकर, ‘दीदी’ के चुनाव चिह्न पर चुनाव जीतकर यह पद हासिल किया है. अभी कुछ दिन पहले तक वे ‘दीदी, दीदी, दीदी’ का नारा लगा रहे थे. अब सुनने में आ रहा है कि वे एनडीए के साथ जाने की तैयारी कर रहे हैं. यह कैसी राजनीति है?”

”कल तक वे लगातार ‘दीदी, दीदी, दीदी’ कह रहे थे और ममता बनर्जी के लंबे संघर्ष और योगदान को स्वीकार कर रहे थे. ऐसी स्थिति में उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है. जनता भी इस तरह की राजनीति को अच्छी नज़र से नहीं देखती.”

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने इन पूरी अटकलों को ‘नौटंकी’ बताते हुए कहा है कि “अगर ये लोग सीधे एनडीए में शामिल हो जाते तो अच्छा होता क्योंकि चार मई तक ये बीजेपी पार्टी के ख़िलाफ़ जंग लड़ रहे थे. अब जब हार मिली है तो इन्हें लग रहा है कि हमें बीजेपी के पाले में जाना चाहिए.”

“ये ख़ुद ही कह रहे हैं कि हम देश की तरक्की के लिए बीजेपी की मदद करना चाहते हैं.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS