Home National news hindi कुवैत के साथ पाकिस्तान का रक्षा समझौता सऊदी अरब के साथ हुए...

कुवैत के साथ पाकिस्तान का रक्षा समझौता सऊदी अरब के साथ हुए सौदे से कितना अलग है?

3
0

Source :- BBC INDIA

आसिम मुनीर

इमेज स्रोत, ISPR

पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर करने के तीन साल बाद, कुवैत ने समझौते को क़ानूनी रूप देने की मंज़ूरी दे दी है.

कुवैत में पाकिस्तानी अधिकारियों के मुताबिक़, यह समझौता दोनों देशों की सेनाओं के बीच सहयोग का एक ढांचा तैयार करता है और सैन्य प्रशिक्षण, खुफ़िया जानकारी, रसद सहायता, रक्षा प्रौद्योगिकी, अनुसंधान और अनुभव के आदान-प्रदान जैसे क्षेत्रों पर केंद्रित है.

इसका मक़सद दोनों देशों के बीच सैन्य ट्रेनिंग, इंटेलिजेंस, लॉजिस्टिक सपोर्ट, डिफ़ेंस टेक्नोलॉजी, रिसर्च और ‘मिलिटरी इंस्टीट्यूशन संबंधों को मज़बूत’ करना है.

कुवैत में पाकिस्तान के राजदूत ज़फ़र इक़बाल ने कुवैती अख़बार अल-जरीदा को बताया कि समझौते पर 11 जून 2023 में हस्ताक्षर किए गए थे और अब इसका अध्यादेश जारी होने के साथ प्रक्रिया पूरी हो गई है.

इक़बाल के अनुसार, यह समझौता ‘रक्षात्मक प्रकृति’ का है और इसमें आपसी समझ, पेशेवर सहयोग और क्षमता निर्माण शामिल है.

कुवैत के विदेश मंत्री शेख़ जर्राह जाबेर अल-अहमद अल-सबाह ने हाल ही में एक आधिकारिक दौरे पर इस्लामाबाद की यात्रा की थी और तभी उम्मीद जताई जा रही थी कि समझौता अब अमल में आएगा.

कुवैत-पाकिस्तान के बीच क्या है समझौता?

पाकिस्तान और कुवैत

इमेज स्रोत, Pakistan Embassy, Kuwait

जून 2023 में समझौते पर हस्ताक्षर करने वालों में पाकिस्तान के राजदूत मलिक मुहम्मद फारूक और कुवैती रक्षा मंत्रालय में संयुक्त योजना के निदेशक ब्रिगेडियर जनरल फ़वाज़ खुदेर मुहम्मद अल-हरबी शामिल थे.

उस समय, दोनों पक्षों ने आशा व्यक्त की थी कि यह समझौता ‘दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को मज़बूत’ करेगा.

तीन साल बाद कुवैत सरकार की ओर से जारी अध्यादेश को अल-अन्बा अख़बार ने प्रकाशित किया है. इस अध्यादेश में कहा गया है, “कुवैत सरकार और पाकिस्तान इस्लामी गणराज्य की सरकार के बीच रक्षा क्षेत्र में सहयोग के लिए 11 जून, 2023 को कुवैत में हस्ताक्षरित समझौते को मंज़ूरी दी जाती है.”

इस अध्यादेश में इस बात पर भी ज़ोर दिया गया है कि कुवैती मंत्री अपने-अपने ज़िम्मेदारी के क्षेत्रों के दायरे में इस क़ानून के प्रावधानों को लागू करने के लिए बाध्य हैं. इस समझौते में 12 अनुच्छेद शामिल हैं.

समझौते में मिलिटरी ट्रेनिंग, रसद सेवाएं, सैनिकों और तकनीकी विशेषज्ञों का आदान-प्रदान, मिलिटरी टेक्नोलॉजी में सहयोग और सैन्य ख़ुफ़िया सहयोग शामिल है.

तालमेल के लिए एक संयुक्त सैन्य समिति के गठन का प्रावधान है, जिसकी बैठक साल में एक बार होगी.

इस समझौते के प्रावधान दोनों देशों के बीच अन्य अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौतों से पैदा होने वाले अधिकारों और ज़िम्मेदारियों को प्रभावित नहीं करते हैं.

दोनों पक्षों की लिखित सहमति से किसी भी समय समझौते में संशोधन करने की अनुमति देता है.

समझौते को लागू करने की ज़िम्मेदारी दोनों देशों के रक्षा मंत्रालयों की है.

सऊदी-पाकिस्तान संयुक्त रक्षा समझौते से कितना अलग?

 पाकिस्तान और कुवैत

इमेज स्रोत, X/@kuna_en

पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच सितंबर 2025 में एक ‘संयुक्त रणनीतिक रक्षा समझौता’ हुआ था, जिसके अनुसार ‘किसी भी देश के ख़िलाफ़ कोई भी विदेशी आक्रमण दोनों देशों के ख़िलाफ़ आक्रमण माना जाएगा.’

अप्रैल 2026 में, सऊदी रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की कि इस समझौते के ढांचे के भीतर, लड़ाकू जेट और सहायक विमानों सहित एक पाकिस्तानी सैन्य टुकड़ी सऊदी अरब के किंग अब्दुलअज़ीज़ हवाई अड्डे पर पहुंच गई है.

लेकिन कुवैत और पाकिस्तान के बीच हुए समझौते में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है.

रक्षा विश्लेषक अमिद महमूद शाह ने बीबीसी को बताया, “सऊदी अरब के साथ हुए समझौते में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सऊदी अरब पर हमला पाकिस्तान पर हमला माना जाएगा और इसके विपरीत भी. लेकिन कुवैत के साथ हुए समझौते में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है और यह प्रशिक्षण, रसद, अनुभव, प्रौद्योगिकी, ख़ुफ़िया जानकारी के आदान-प्रदान और रक्षा उद्योगों के विकास पर अधिक केंद्रित है.”

कुवैत में पाकिस्तान के राजदूत ज़फ़र इक़बाल ने अल-जरीदा अख़बार को बताया कि दोनों देशों के बीच रक्षा संबंध 1980 के दशक की शुरुआत से चले आ रहे हैं और अब इन्हें नए घटनाक्रमों के अनुरूप एक संगठित प्रारूप में औपचारिक रूप दिया गया है.

पाकिस्तान और कुवैत के लिए क्या महत्व है?

 पाकिस्तान और कुवैत

इमेज स्रोत, Pakistan Embassy, Kuwait

फरवरी से ईरान के साथ अमेरिका और इसराइल के बीच चल रही जंग के दौरान खाड़ी देशों को कई जवाबी हमलों का सामना करना पड़ा है.

ईरान ने बार-बार कहा है कि उसने बहरीन और कुवैत में उन ठिकानों को निशाना बनाया है जहां अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं. कुवैती सेना ने बार-बार ईरानी ड्रोन और मिसाइलों को रोकने की भी सूचना दी है.

कुछ पर्यवेक्षकों का मानना है कि क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देने में ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थ के रूप में इस्लामाबाद की भूमिका तेज़ी से महत्वपूर्ण हो गई है.

सिंगापुर स्थित डिफ़ेंस रिसर्चर अब्दुल बासित ने बीबीसी से कहा, “क्षेत्र में अमेरिकी भू-राजनीतिक प्रभाव घट रहा है और अमेरिकी सुरक्षा गारंटी पर खाड़ी देशों का भरोसा भी कम हो रहा है.”

उन्होंने आगे कहा कि अमेरिकी सैन्य अभियान के बावजूद, ईरान की राजनीतिक व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं आया है और होर्मुज़ स्ट्रेट में यातायात सामान्य नहीं हो पाया है.

उनके अनुसार, “दोहा में हमास नेताओं पर इसराइली हमला एक निर्णायक मोड़ था जिसने दिखाया कि अधिक उपकरण ख़रीदने से ज़रूरी नहीं कि सुरक्षा सुनिश्चित ही हो, बल्कि पारस्परिक सुरक्षा गारंटी अधिक महत्वपूर्ण हैं.”

अब्दुल बासित

अब्दुल-बासित ने बताया कि फारस की खाड़ी के देश द्विपक्षीय और त्रिपक्षीय रक्षा साझेदारी की ओर बढ़ रहे हैं और सऊदी अरब और अमेरिका की सहमति से यह प्रक्रिया एक ‘नई क्षेत्रीय व्यवस्था’ को आकार दे रही है.

उन्होंने कहा कि अमेरिका अपने सुरक्षा बोझ को कम करने की कोशिश कर रहा है, जबकि खाड़ी देश जोखिम को कम करने और अपने संबंधों को संतुलित करने के लिए ‘साझेदारों की विविधता लाने’ की रणनीति अपना रहे हैं.

विश्लेषकों का मानना है कि सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र मध्य पूर्व में शांति और स्थिरता को मज़बूत करने के उद्देश्य से एक नई क्षेत्रीय व्यवस्था को आकार देने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं.

समझौते पर हस्ताक्षर होने के तीन साल बाद कुवैत के अध्यादेश पर अब्दुल बासित ने कहा, “यह सहयोग समझौता पहले से मौजूद था लेकिन अब इसे एक राजनीतिक संदेश देने के लिए क़ानूनी रूप दिया गया है.”

उन्होंने आगे कहा, “पाकिस्तान इस जंग में शामिल नहीं होगा, लेकिन सैन्य उपकरण और प्रशिक्षण प्रदान करेगा और तनाव कम करने के प्रयास जारी रखेगा.”

उनके अनुसार, इस क़दम से कुवैत ने यह दिखाया है कि मौजूदा स्थिति में उसकी सुरक्षा प्राथमिकताएं बदल रही हैं.

भारतीय रक्षा विश्लेषक प्रवीण साहनी ने भी इस समझौते को एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटनाक्रम बताया जो पाकिस्तान की स्थिति को मज़बूत करता है.

उन्होंने कहा कि गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) के देश अमेरिकी सुरक्षा गारंटी पर पूरी निर्भरता के बजाय क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए एक ‘इस्लामी ढांचे’ की ओर बढ़ रहे हैं.

उन्होंने आगे कहा कि पश्चिम एशिया में जंग फैलने के साथ ही पाकिस्तान अपनी मध्यस्थता की भूमिका के माध्यम से संकट से प्रभावित देशों के ‘सामूहिक रक्षा’ तंत्र का हिस्सा बन गया है.

प्रवीण साहनी ने कहा, “सऊदी अरब और ईरान दोनों को पाकिस्तान की ज़रूरत है.”

पाकिस्तान को क्या हासिल होगा?

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर

इमेज स्रोत, Getty Images

अब्दुल बासित का मानना है कि कुवैत, सऊदी अरब की तरह, पाकिस्तान को एक परमाणु शक्ति के रूप में देखता है और इस तरह की साझेदारी से इस्लामाबाद को तेल तक पहुंच, निवेश आकर्षित करने, रोज़गार के अवसर पैदा करने और विदेशी मुद्रा भंडार को मज़बूत करने जैसे लाभ मिल सकते हैं.

महमूद शाह ने इस समझौते को क्षेत्र में हाल के घटनाक्रमों से भी जोड़ा.

उन्होंने कहा कि 2025 में पाकिस्तान और भारत के बीच चार दिनों के संघर्ष ने ‘पाकिस्तान की विश्वसनीयता को बढ़ाया’ और यही कारण है कि कई देशों ने इस्लामाबाद के साथ संबंध बढ़ाने और रक्षा समझौतों पर हस्ताक्षर करने में रुचि दिखाई है.

उन्होंने आगे कहा कि पाकिस्तान की मध्यस्थता की भूमिका ने अमेरिका और ईरान दोनों के साथ देश के संबंधों को बेहतर बनाया है और इसकी क्षेत्रीय स्थिति को मज़बूत किया है.

कनाडा में रहने वाले रक्षा विश्लेषक बिलाल ख़ान का कहना है, “मौजूदा समय में हमें ज़्यादातर बयानों और समझौतों का सिलसिला दिख रहा है, जबकि व्यावहारिक सहयोग के कोई साफ़ संकेत नहीं दिख रहा.”

उन्होंने आगे कहा कि पाकिस्तान खाड़ी देशों के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करना जारी रखेगा और खाड़ी देश भी पाकिस्तान को क़र्ज़ चुकाने की समयसीमा बढ़ाकर मदद कर सकते हैं.

उनके अनुसार, पाकिस्तान और खाड़ी देश मुख्य रूप से अपने प्रमुख घरेलू साझेदारों को संदेश भेज रहे हैं.

उन्होंने कहा, “कुवैत अपने प्रमुख साझेदारों को यह दिखाना चाहता है कि वह अपने सुरक्षा संबंधों में विविधता ला रहा है और पाकिस्तान एक ऐतिहासिक और भरोसेमंद साझेदार बना हुआ है. इसके बदले में, पाकिस्तान यह दिखाना चाहता है कि फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के नेतृत्व में उसके विदेश संबंध और मध्य पूर्व में उसकी उपस्थिति ने सकारात्मक परिणाम दिए हैं.”

बिलाल ख़ान कहते हैं, “मौजूदा समय में दोनों पक्ष राजनीतिक संदेश देने पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रहे हैं.”

भारत के लिए क्या हैं मायने

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (दाएं) कुवैत के क्राउन प्रिंस शेख सबाह खालिद हमद अल-सबाह

इमेज स्रोत, Getty Images

रॉयटर्स के मुताबिक़, इसी साल फ़रवरी में भारत ने छह देशों वाले गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफ़टीए) पर बातचीत शुरू करने के लिए शर्तों पर सहमति जताई थी.

इन छह देशों में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), कुवैत, बहरीन, क़तर और ओमान हैं. जीसीसी में भारत के अहम व्यापारिक हित हैं.

मनीकंट्रोल के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र में भारत की करीब 100 अरब डॉलर की द्विपक्षीय व्यापारिक मौजूदगी है और उसके कुवैत, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात समेत खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के कई सदस्य देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी संबंध हैं.

खाड़ी क्षेत्र के कई देश अब भी भारत के साथ अपने आर्थिक संबंधों और पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग को अलग-अलग नीतिगत क्षेत्रों के रूप में देखते हैं.

भारत से उम्मीद है कि वह अपने खाड़ी साझेदारों के साथ संपर्क बनाए रखेगा ताकि पाकिस्तान के साथ सैन्य सहयोग ऐसे ख़ुफ़िया तालमेल तक न पहुंचे जो भारत के सुरक्षा हितों को प्रभावित कर सकते हैं.

ये समझौते इस आवश्यकता को भी रेखांकित करते हैं कि भारत अरब सागर, होर्मुज़ स्ट्रेट और बाब-अल-मंदब क्षेत्र में समुद्री मार्गों पर करीबी नज़र रखे, खासकर तब जब पाकिस्तान खाड़ी देशों के साथ रक्षा सहयोग और नौसैनिक सहयोग का विस्तार कर रहा है.

एक अन्य अहम बात वहां रहने वाला बड़ा भारतीय प्रवासी समुदाय है.

कुवैत में 10 लाख से अधिक भारतीय रहते और काम करते हैं, जबकि जीसीसी देशों में 85 लाख से अधिक भारतीय नागरिक निवास करते हैं.

हालांकि यह समझौता सैन्य सहयोग पर केंद्रित है, लेकिन भविष्य में कुवैती रक्षा या खुफिया संस्थानों में पाकिस्तान की भूमिका बढ़ती है तो यह भारत के लिए एक विशेष परिस्थिति बनने की संभावना है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट… सब एक जगह

कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.

SOURCE : BBC NEWS