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कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है। यह गिरावट तब आई जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वह अमेरिकी सेना को ईरान के खिलाफ नए हमले रोकने का आदेश देंगे। उन्होंने दावा किया कि मध्य पूर्व में लड़ाई खत्म करने के लिए एक समझौता लगभग तय हो चुका है। हालांकि, रविवार रात को अमेरिकी क्रूड तेल की कीमतें, संघर्ष शुरू होने से पहले की तुलना में लगभग 20% अधिक ही बनी हुई हैं।
अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतें गिरीं
रविवार रात को अमेरिकी क्रूड तेल की कीमत 5% गिरकर 80.79 डॉलर प्रति बैरल हो गई। वहीं, अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड की कीमत भी 5% गिरकर 83.87 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई।
फरवरी से अब तक उतार-चढ़ाव भरा रहा है बाजार
अमेरिका और इजराइल ने फरवरी के अंत में ईरान पर हमले शुरू किए थे, तभी से तेल की कीमतों में बहुत उतार-चढ़ाव आ रहा है। वसंत ऋतु में कई बार तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर चली गई थी।
लड़ाई रुकने से तेल की ढुलाई होगी आसान: यह संघर्ष पांच महीने से अधिक समय से चल रहा है। अगर यह खत्म हो जाता है, तो तेल के जहाज फारस की खाड़ी से बाहर निकल पाएंगे। अब तक लड़ाई की वजह से तेल और दूसरे सामानों से भरे टैंकर वहां फंसे हुए थे।
आम लोगों की जेब पर पड़ा भारी असर
इस संघर्ष की वजह से ऊंची तेल कीमतों ने पेट्रोल, जेट ईंधन और डीजल से चलने वाली अन्य चीजों की कीमतों को भी बढ़ा दिया था। इससे पेट्रोल-डीजल,एटीएफ की कीमत बढ़ने से यात्रियों को महंगे किराए चुकाने पड़े। कुछ देशों में तो पेट्रोल-डीजल की कमी हो गई, जिससे राशनिंग लागू करनी पड़ी और स्कूलों व सरकारी दफ्तरों को बीच-बीच में बंद करना पड़ा।
तेल कंपनियों को जबरदस्त मुनाफा: इस दौरान तेल और गैस कंपनियों को भारी मुनाफा हुआ। दरअसल, लड़ाई की वजह से तेल के जहाज होर्मुज से नहीं निकल पा रहे थे, जिससे पेट्रोल और डीजल की कीमतें बहुत बढ़ गई थीं और कंपनियों ने इसका फायदा उठाया।
पेट्रोल-डीजल के दाम तुरंत क्यों नही बदलते
कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर हर देश में एक जैसा नहीं होता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस देश में फ्यूल की कीमतें बाजार तय करता है या सरकार। विशेषज्ञ इसे “पास-थ्रू इफेक्ट ” कहते हैं, यानी कच्चे तेल की कीमत में बदलाव का कितना हिस्सा पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों तक पहुंचता है।
भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें पूरी तरह मुक्त बाजार जैसी नहीं हैं और न ही पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में हैं। तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल, रुपये-डॉलर के एक्सचेंज रेट, रिफाइनिंग लागत और टैक्स जैसे कई फैक्टर्स को ध्यान में रखकर कीमतें तय करती हैं। इसलिए कच्चे तेल में तेजी या गिरावट का असर तुरंत और पूरी तरह खुदरा कीमतों में दिखाई नहीं देता।
इनपुट: ब्लूमबर्ग
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