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अमेरिकी सांसद ने चेताया, FCRA संशोधन भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों में तनाव पैदा कर सकते हैं

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अमेरिकी सांसद भारत के विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) में प्रस्तावित संशोधनों को लेकर चिंता जता रहे हैं और चेतावनी दे रहे हैं कि ये बदलाव Washington और New Delhi के बीच तनाव को और बढ़ा सकते हैं। बढ़ती चिंताएं नागरिक समाज, धार्मिक संस्थानों और व्यापक द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित करने वाले संभावित अतिक्रमण से जुड़ी हैं।

## निगरानी की सीमा: जांच के दायरे में प्रमुख प्रावधान

FCRA Amendment Bill, 2026 को 25 मार्च को Lok Sabha में पेश किया गया था। इसका उद्देश्य भारत में विदेशी धन से संबंधित नियमों का विस्तार करना है। इसके कई प्रावधान गंभीर चिंता का कारण बन रहे हैं:

– **नामित प्राधिकरण**: एक प्रमुख प्रावधान के तहत सरकार द्वारा नियुक्त निकाय को उस समय संपत्तियों और विदेशी अंशदानों का नियंत्रण अपने हाथ में लेने का अधिकार दिया जाएगा, जब किसी संगठन का FCRA पंजीकरण रद्द, समर्पित या समाप्त माना जाता है। यदि प्रमाणपत्र बहाल नहीं किया जाता है, तो संपत्तियां स्थायी रूप से सरकार के अधिकार में निहित की जा सकती हैं।
– **निहितीकरण और निपटान**: प्रस्तावित विधेयक और उससे संबंधित नियमों के तहत विभिन्न परिस्थितियों में राज्य को उन NGOs की संपत्तियों का प्रबंधन या उनका विघटन करने की अनुमति दी जा सकती है, अथवा ऐसा करना आवश्यक हो सकता है, जो नए मानदंडों या प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं को पूरा करने में विफल रहते हैं।
– **उपयोग की न्यूनतम सीमा**: पंजीकरण प्रमाणपत्र के नवीनीकरण के लिए पिछले दो वित्तीय वर्षों में कम से कम Rs. 10 lakh के विदेशी अंशदान के उपयोग की शर्त शामिल की गई है।

June 2026 में अधिसूचित नियम पहले से लागू हैं, जबकि प्रस्तावित विधेयक पर संसद की कार्रवाई अभी बाकी है।

## द्विदलीय अमेरिकी आवाजें: चेतावनियां और आरोप

### Senator James Risch

Senate Foreign Relations Committee के अध्यक्ष के रूप में Senator Risch ने प्रस्तावित संशोधनों को “deeply concerning” बताया। उन्होंने गैर-सरकारी संगठनों, विशेष रूप से Christian ministries पर लगाए गए अस्पष्ट प्रतिबंधों को रेखांकित किया। Risch ने चेतावनी दी कि आस्था-आधारित संगठनों को परेशान करने या उनकी संपत्तियां जब्त करने के लिए FCRA नियमों का इस्तेमाल भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव पैदा करेगा।

### Congressman Chris Smith

Secretary of State Marco Rubio की भारत यात्रा से पहले लिखे गए एक लेख में Chris Smith (Republican, New Jersey’s 4th district) ने तर्क दिया कि ये संशोधन “do lasting damage to the relations between our two countries” कर सकते हैं। उन्होंने उन प्रावधानों पर ध्यान केंद्रित किया जो अंशदान और संपत्तियों की जब्ती की अनुमति देते हैं और जोर दिया कि अनेक Christian charities इससे असमान रूप से प्रभावित हो सकती हैं। Smith ने कहा कि संस्थागत संपत्तियों को जोखिम में डालने से धार्मिक संस्थान, अस्पताल और स्कूल कमजोर हो सकते हैं।

## संभावित राजनयिक प्रभाव

सांसदों को आशंका है कि इन संशोधनों से:

– **धार्मिक स्वतंत्रता** और आस्था-आधारित NGOs के स्वतंत्र रूप से काम करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
– **नागरिक समाज** कमजोर हो सकता है, क्योंकि विदेशी धन तक पहुंच सीमित हो सकती है या मजबूत कानूनी सुरक्षा उपायों के बिना राज्य को संपत्तियां जब्त करने की अनुमति मिल सकती है।
– **द्विपक्षीय संबंध** प्रभावित हो सकते हैं, खासकर मानवीय सहायता, शोध, शिक्षा और धार्मिक आदान-प्रदान जैसे पारस्परिक सहयोग वाले क्षेत्रों में।

कांग्रेस के एक सहयोगी ने कहा कि अमेरिकी चिंताएं साझा लोकतांत्रिक सिद्धांतों और मजबूत people-to-people संबंधों पर आधारित हैं, जिन्हें बनाए रखने में नागरिक समाज मदद करता है।

## New Delhi का बचाव

भारतीय अधिकारियों का कहना है कि आलोचक प्रस्तावित बदलावों को गलत तरीके से प्रस्तुत कर रहे हैं। Ministry of Home Affairs की प्रेस विज्ञप्तियों के अनुसार:

– संशोधन और नियमों में बदलाव **शासन संबंधी कमियों** को दूर करते हैं तथा विदेशी अंशदान के संबंध में जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाने का उद्देश्य रखते हैं।
– कानूनी रूप से विदेशी धन प्राप्त करने वाली संस्थाओं पर अनुचित प्रभाव नहीं पड़ेगा।
– कानून ने विदेशी वित्तपोषण की निगरानी की हमेशा अनुमति दी है, विशेष रूप से तब, जब इसका संबंध सार्वजनिक व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा या संप्रभुता की अखंडता से हो।

## क्या पहले से लागू है और किस पर बहस हो रही है

इस ढांचे में दो प्रकार के बदलाव शामिल हैं:

1. **Rules (June 22, 2026)** — ये पहले से लागू हैं। इनके तहत पंजीकरण के समय विशिष्ट उद्देश्यों और संचालन के भौगोलिक क्षेत्रों का उल्लेख करने जैसी आवश्यकताएं लागू की गई हैं।
2. **Amendment Bill (FCRA Bill, 2026)** — यह संसद में लंबित है। प्रस्तावों में संपत्ति-निहितीकरण की प्रक्रियाएं स्थापित करना तथा दंड और अनुपालन मानदंड निर्धारित करना शामिल है।

## धार्मिक अल्पसंख्यक और नागरिक समाज: बढ़ती चिंताएं

Christian organisations के साथ-साथ शैक्षणिक और धर्मार्थ धार्मिक संस्थान भी संभावित प्रतिकूल प्रभावों को लेकर सबसे अधिक मुखर हैं। उनका कहना है कि:

– यदि प्रमुख पदाधिकारियों का पंजीकरण समाप्त हो जाता है या उसका नवीनीकरण नहीं होता है, तो चर्च और उनसे जुड़े संस्थानों की संपत्ति या वित्तीय संसाधन जोखिम में पड़ सकते हैं।
– कई स्कूल और अस्पताल वंचित या ग्रामीण आबादी की सेवा करते हैं। वे विदेशी वित्तपोषण खो सकते हैं, जिससे सेवा प्रदान करने की क्षमता कमजोर हो सकती है।

भारत में विपक्षी राजनीतिक नेताओं ने भी सरकार पर नियमों के जरिए सत्ता को केंद्रीकृत करने और नागरिक समाज समूहों की संचालन संबंधी लचीलेपन को सीमित करने का आरोप लगाया है।

## व्यापक संदर्भ: रुझान और प्रभाव

– अमेरिका (FARA), Australia, the UK और the EU सहित अन्य लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में भी इसी तरह के कानून मौजूद हैं, लेकिन वहां अक्सर **न्यायिक निगरानी** या अधिक मजबूत उचित प्रक्रिया संबंधी सुरक्षा उपाय होते हैं। आलोचकों का कहना है कि भारत के प्रस्तावों में इन सुरक्षा उपायों का अभाव है।
– 2020 FCRA संशोधनों के बाद से भारत ने प्रशासनिक खर्च की सीमाओं को लगातार कम किया है और अनुपालन संबंधी नियमों को कड़ा किया है, जिससे विनियमन बनाम अति-विनियमन पर बहस छिड़ी है।

## आगे क्या होगा

– संसद को अभी FCRA Amendment Bill पर बहस कर उसे पारित करना बाकी है। विपक्षी दलों और नागरिक समाज ने परामर्श, संशोधन या विधेयक वापस लेने की मांग की है।
– अमेरिका राजनयिक वार्ताओं में यह मुद्दा उठा सकता है। सांसदों ने State Department से आग्रह किया है कि सुधारात्मक कार्रवाई नहीं होने पर भारत को “Country of Particular Concern” माना जाए।
– नागरिक समाज समूह, विशेष रूप से धार्मिक मिशनों से जुड़े संगठन, इस बात पर करीबी नजर रख रहे हैं कि ये संशोधन मौजूदा प्रारूप में कानून बनते हैं या संसदीय अथवा न्यायिक हस्तक्षेप के जरिए इनमें बदलाव होता है।

बहस आगे बढ़ने के साथ FCRA संशोधन संप्रभुता, धार्मिक स्वतंत्रता, नागरिक स्वतंत्रता और भारत-अमेरिका संबंधों की मजबूती से जुड़े एक महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में उभरे हैं। भारतीय संसद, कार्यपालिका और नागरिक समाज नियामकीय निगरानी तथा संवैधानिक अधिकारों के बीच किस तरह संतुलन स्थापित करते हैं, यह आने वाले महीनों में घरेलू कल्याण और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति—दोनों की दिशा तय कर सकता है।

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