Source :- BBC INDIA

नेपाल में आई भीषण बाढ़ से बचकर निकले वेलाचेरी के मुरुगु नगर के एक दंपति ने बताया कि उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे उनका पुनर्जन्म हुआ हो.
नावू कबीरदास और उनकी पत्नी विजया भुवनेश्वरी उन 21 लोगों में शामिल थे जो शुक्रवार रात नेपाल के काठमांडू से चेन्नई पहुँचे.
कुंभकोणम की एक एजेंसी के ज़रिए यात्रा कर रहे 57 लोगों का एक समूह तीन बसों में सवार होकर रासुवा इलाके से गुज़र रहा था, जो बाढ़ की चपेट में आ गया.
वे दो पहाड़ों के बीच घुमावदार सड़क पर यात्रा करते हुए आस-पास के खूबसूरत नज़ारों का आनंद ले रहे थे.
इस सड़क मार्ग के नीचे एक नदी बह रही थी.
अचानक, कुछ ही सेकंड में रासुवा का इलाका आपदा क्षेत्र में बदल गया – तेज़ आवाज़, गिरते पत्थर-चट्टानें, कीचड़ और मलबे के साथ तेज़ी से बहता बाढ़ का पानी.
‘हमारे पीछे वाली बस झुक गई’
इमेज स्रोत, Vijaya Buvaneswari
तीनों बसों में से सिर्फ़ दूसरी बस ही बाढ़ की चपेट में आने से बची.
विजया भुवनेश्वरी कहती हैं, “कुछ मिनटों तक तो हमें समझ ही नहीं आया कि क्या हो रहा है. मैंने देखा कि हमारे पीछे वाली बस झुक रही थी. मैं वह नज़ारा और ज़्यादा देर तक नहीं देख सकी; तभी मुझे स्थिति की गंभीरता का एहसास हुआ.”
उस पल को याद करते हुए नावू कबीरदास बताते हैं, “अचानक धमाके जैसी तेज़ आवाज़ हुई और गाड़ी पर पत्थर गिरने लगे. फिर, बाढ़ का पानी तेज़ी से अंदर आने लगा, जैसे कोई बांध खोल दिया गया हो.”
‘हमारी गाड़ी लेट हो गई थी’
इमेज स्रोत, Getty Images
बाढ़ आने से पहले, उस इलाके से गुज़र रही उनकी बस कीचड़ में फंस गई और मरम्मत के लिए थोड़ी देर रुकी. विजया भुवनेश्वरी कहती हैं, “उन्हीं कुछ मिनटों ने हमारी जान बचाई.”
उनका ड्राइवर नेपाल का रहने वाला एक स्थानीय व्यक्ति था. यह पहाड़ी इलाका था जहाँ अक्सर भूस्खलन और हिमस्खलन होते रहते थे. बाढ़ का पानी देखते ही उसे ख़तरे का अंदाज़ा हो गया.
विजया भुवनेश्वरी बताती हैं, “उसने सबसे कहा कि वैन से बाहर निकलें और ऊँची जगह पर जाना ही सबसे सुरक्षित विकल्प है, फिर वह खुद भी सुरक्षित जगह की ओर भागा. हम भी उसी रास्ते पर गए. उस समय हमारे दिमाग में सिर्फ़ हमारे बच्चे ही थे.”
बचने के लिए उन्हें ऊँची जगह पर चढ़ना पड़ा – लगभग एक इमारत की मंज़िल जितनी ऊँचाई पर. कुछ लोगों को छोड़कर, बचे हुए 21 लोगों में से ज़्यादातर की उम्र 50 साल से ज़्यादा थी. अपनी जान बचाने के लिए उन्हें किसी तरह कीचड़ और गाद से ढंकी ढलान पर चढ़ना पड़ा.
इमेज स्रोत, Vijaya Buvaneswari
विजया भुवनेश्वरी कहती हैं, “एक और महिला और मैंने चढ़ना शुरू किया, लेकिन आधे रास्ते में ही फिसलकर गिर गईं. मैं दो बार फिसली. मेरे पैर कीचड़ से सने हुए थे और पकड़ने के लिए कुछ भी नहीं था.”
आखिरकार, वह एक दूसरी महिला की साड़ी को मज़बूती से पकड़कर ऊपर पहुँच पाईं -वह महिला पहले ही ऊपर पहुँच चुकी थी और उसने अपनी साड़ी उतारकर नीचे की ओर बढ़ाई थी.
वह बताती हैं, “मेरी रिश्तेदार, पूंगोडी, पहले ही ऊपर पहुँच चुकी थीं. उस दिन सिर्फ़ वही साड़ी पहने हुए थीं. उसने स्वेटर पहना, अपनी साड़ी उतारी और हमारे लिए नीचे लटका दी. हमने उस साड़ी और पास के एक केबल को पकड़कर खुद को ऊपर खींचा.”
वह आगे कहती हैं, “मिट्टी के एक ऐसे टीले पर चढ़ने में हमें डेढ़ घंटा लग गया जो एक इमारत जितना ऊँचा था. एक बार तो, मैंने जिस पेड़ की टहनी को पकड़ा, वह टूट गई. उसके बाद, पेड़ों को पकड़ने के बजाय, हमने ऊपर चढ़ने के लिए साड़ियों को पकड़ा. आखिर में, एक महिला ऊपर नहीं पहुँच पा रही थी; हमने उससे कहा कि वह अपनी कमर के चारों ओर साड़ी बांध ले, और हमारे ग्रुप के सदस्यों ने उसे पकड़कर ऊपर खींच लिया.”
प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

SOURCE : BBC NEWS




