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‘मेंटल लोड’ अधिकतर औरतें ही क्यों उठाती हैं और मर्द इसे कैसे बांट सकते हैं?

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Source :- BBC INDIA

बच्ची को पढ़ाई में मदद कराती महिला

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तीन बच्चों की मां स्टेसी मैटियास कहती हैं, “मेरे दिमाग़ में हमेशा चलता रहता है कि अब आगे क्या काम करना है. मैं सोने से पहले भी अपने दिमाग़ में करने वाले कामों की सूची बना लेती हूं.”

वो “मानसिक बोझ” (मेंटल लोड) के बारे में बात कर रही हैं. घर को सुचारू रूप से चलाने के लिए योजना बनाने, व्यवस्थित करने, याद रखने और कामों का पूर्वानुमान लगाने की वजह से जो स्ट्रेस होता है वो उसकी बात कर रही हैं.

इन कामों में शामिल हैं: स्कूल ट्रिप को याद रखना, पेरेंट्स के व्हाट्सएप ग्रुप में अपडेट देखना, घर के किन हिस्सों को सफ़ाई की ज़रूरत है यह देखना, बच्चों की नींद का ख़याल रखना, डॉक्टरों के अपॉइंटमेंट शेड्यूल करना और स्कूल यूनिफ़ॉर्म ख़रीदना.

शिक्षाविदों के मुताबिक़, ये काम पिता के बजाय मां के हिस्से में ज़्यादा आता है और घर के काम करने में ज़्यादातर मेहनत भी उन्हीं को करनी पड़ती है.

हालांकि ये बात सभी परिवारों पर लागू नहीं होती लेकिन स्टडीज़ से पैटर्न का साफ़ पता चलता है.

ब्रिटेन में बच्चे गर्मियों की छुट्टियों के बाद अभी-अभी स्कूल वापस गए हैं, और स्टॉकपोर्ट की रहने वाली 37 वर्षीय स्टेसी का कहना है कि सितंबर में उनका दिमाग़ अक्सर विशेष रूप से व्यस्त रहता है.

वो कहती हैं कि “हमेशा कुछ न कुछ याद रखने, बच्चों का शेड्यूल व्यवस्थित करने की चिंता के कारण साल का ये समय ख़ास तौर से व्यस्त रहता है.”

स्टेसी के लिए ज़िम्मेदारियों की यह सूची उनके दिमाग़ को एक ऐसे बर्तन की तरह बना देती है जो दिन भर भरता रहता है.

वो कहती हैं, “अगर कोई बर्तनों को हटाने में आपकी मदद नहीं कर रहा है, तो दिन के अंत तक आपका पानी छलकने लगेगा, और आप एक नाज़ुक स्थिति में पहुंच जाएंगे.”

एक महिला, जिसके लंबे भूरे बाल पोनीटेल में बंधे हैं और जिसने काली जैकेट पहनी है, एक बार और एक पेड़ के सामने कैमरे की ओर मुस्कुरा रही है.

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‘हर समय 10 क़दम आगे रहना पड़ता है’

3,000 अमेरिकी पेरेंट्स पर किए गए एक सर्वे में, बाथ और मेलबर्न विश्वविद्यालय के शिक्षाविदों ने पाया कि माएं 71% घरेलू कार्यों को संभालती हैं जिनमें मानसिक प्रयास की आवश्यकता होती है, जैसे कि चादरें और तौलिये कब धोने हैं, इसका ध्यान रखना और फ्रिज में रखे खाने को कब तक खाना है, यह याद रखना.

अध्ययन में पाया गया कि पिता उन कई कार्यों को संभालते हैं जिन्हें शोधकर्ताओं ने “अस्थाई” बताया है. ऐसी चीज़ें जो कम बार होती हैं, जैसे कि यह याद रखना कि कार की सर्विस कब करानी है.

मेलबर्न विश्वविद्यालय की प्रोफे़सर लिआ रूपनर मानसिक बोझ को अदृश्य, स्थायी और असीमित बताती हैं. वो कहती हैं, “आप ये मानसिक बोझ हर जगह साथ लेकर चलते हैं.”

मानसिक बोझ रेडिट और मम्सनेट जैसे प्लेटफ़ॉर्म्स पर एक लोकप्रिय विषय है, जहां महिलाएं इस बारे में सलाह मांगती हैं कि इतनी सारी अलग-अलग ज़िम्मेदारियों को निभाने में होने वाली थकावट के बारे में अपने साथी से कैसे बात करें.

माओं ने बीबीसी न्यूज़ को बताया कि उन्हें अक्सर स्कूल के व्हाट्सएप ग्रुप में “डिफ़ॉल्ट पेरेंट्स” के रूप में जोड़ा जाता था- जहां माता-पिता स्कूल ट्रिप, जन्मदिन और खोई हुई चीज़ों पर चर्चा करते हैं, जबकि उनके पति कभी भी इस ग्रुप में शामिल नहीं होते थे.

पोर्ट्समाउथ में रहने वाली 35 वर्षीय तीन बच्चों की मां सोफ़िया अपने बच्चों के स्कूल के ऐप पर स्कूल ट्रिप की पेमेंट करती है और लंच ऑर्डर करती है, लेकिन उनका कहना है कि उनके पति ने इसे कभी डाउनलोड नहीं किया है.

सोफ़िया का कहना है कि उन्होंने अपने पति को मानसिक बोझ के बारे में समझाने की कई बार कोशिश की, लेकिन उन्हें लगता है कि वह समझ नहीं पाए और उनकी चिंताओं को “मामूली काम” कहकर ख़ारिज कर दिया.

सोफ़िया कहती हैं, “काम करने के अलावा मुझे काम की योजना बनानी पड़ती है, मुझे काम का अनुमान लगाना पड़ता है, मुझे हर समय 10 क़दम आगे रहना पड़ता है.”

गहरे घुंघराले बालों वाली एक महिला रसोई में नीले रंग के बैग में पेंसिल और नोटबुक पैक कर रही है, जबकि उसके सामने बैठा एक छोटा बच्चा नाश्ता कर रहा है.

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लंदन में रहने वाले टीचर, कंटेंट क्रिएटर और दो बच्चों के पिता सैम बेरी कहते हैं कि जब उनकी पत्नी ने उनके सबसे बड़े बच्चे के जन्म के बाद पहली बार मानसिक बोझ या मेंटल लोड के बारे में बताया, तो उन्हें “वास्तव में यह बात समझ में नहीं आई” और वे “थोड़ा बचाव की मुद्रा में” थे क्योंकि उन्हें लगता था कि वे बहुत कुछ कर रहे हैं, जैसे डायपर बदलना, बच्चे को दूध पिलाना और भी बहुत कुछ.

वो पूछते थे कि वो मदद करने के लिए क्या कर सकते हैं, लेकिन उनका कहना है कि इससे भी सोचने का बोझ उनकी पत्नी पर ही पड़ता है.

जैसा कि स्टेसी बताती हैं, “मैं हमेशा अपने साथी से कहती हूं: ‘अगर मुझे आपसे कुछ करने के लिए कहना पड़े, तो इससे मेरा मानसिक बोझ और बढ़ जाता है’.”

सैम को यह समझने में कुछ महीने लगे, जिसमें बातचीत करना और उनकी बात सुनना शामिल था. उनकी पत्नी को रात में सिर्फ़ खाना बनाना ही नहीं बल्कि खाना बनाने के लिए क्या उपलब्ध है, डिनर की प्लानिंग करना और ख़रीदारी करने के बारे में भी सोचना पड़ता था.

क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट नताशा वॉलेस का कहना है कि कुछ महिलाएं अपने घरों को व्यवस्थित करने के दबाव से तनावग्रस्त होकर उनके पास आती हैं.

वह कहती हैं, “अक्सर, उनके लिए यह कोई एक बड़ा तनाव का कारण नहीं होता है. बल्कि, जब उन्हें एहसास होता है कि उन पर सैकड़ों छोटी-छोटी ज़िम्मेदारियां हैं और उनका दिमाग़ और शरीर आराम नहीं कर सकते, तब उन्हें तनाव होता है.”

वह आगे कहती हैं कि कई महिलाएं बिना सोचे-समझे काम करती रहती हैं, इसलिए उन्हें अक्सर इस बात का एहसास नहीं होता कि उन पर कितना मानसिक बोझ है, और यह लगातार बना रहने वाला हल्का तनाव उनके तंत्रिका तंत्र पर असर डाल सकता है. जिससे नींद की कमी, चिड़चिड़ापन और फ़ैसला लेने में थकान जैसी समस्याएं हो सकती हैं.

सफेद फूलों वाला टॉप पहने एक महिला एक सादी ग्रे दीवार के सामने खड़ी मुस्कुरा रही है.

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विशेषज्ञ और ‘द वर्क/पेरेंट स्विच’ की लेखिका अनीता क्लियर ने कहा कि ऐसी थकावट हमारे कामकाजी जीवन में भी झलकती है और असहनीय तनाव का कारण बनती है.

एक शोध में पाया गया कि ज़्यादा कमाने वाले पुरुष घर से जुड़े कम शारीरिक और मानसिक श्रम करते हैं, लेकिन जब महिलाओं की आय बढ़ती है, तो भले ही उन्हें शारीरिक मेहनत कम करनी पड़ती हो लेकिन मानसिक थकावट उतनी ही रहती है.

क्लियर का कहना है कि पति-पत्नी के बीच करियर चुनने की बात आए तो महिलाएं बहुत कम ही पारिवारिक जीवन से बाहर निकलने को एक विकल्प के रूप में महसूस करती हैं.

इसलिए विकल्प यह बन जाता है कि वे अपने करियर की गति धीमी करें, पार्ट-टाइम काम करें या जॉब छोड़कर घर पर रहें, और ज़्यादा से ज़्यादा महिलाएं यही फ़ैसला ले रही हैं.

“अगर आप घरेलू बोझ को कम करते हैं, अगर आप मानसिक बोझ को कम करते हैं, तो आप काम पर ज़्यादा और बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगे.”

यह असमानता क्यों है?

बीबीसी ने जिन महिलाओं का इंटरव्यू किया उनका मानना है कि यह असमानता मातृत्व अवकाश से शुरू हुई.

वॉलेस का कहना है कि चूंकि महिलाएं आमतौर पर पितृत्व अवकाश की तुलना में मातृत्व अवकाश के लिए बहुत अधिक समय लेती हैं, इसलिए वे बहुत जल्दी ही “डिफ़ॉल्ट गार्जियन ” बन जाती हैं.

वह कहती हैं, “अगर आप वह व्यक्ति बन जाते हैं जो सब कुछ जानता है, जानता है कि सब कुछ कहाँ है और अतीत में सब कुछ कर चुका है, तो हर कोई हर चीज़ के लिए आपके पास आने लगती है, इसलिए काम पर लौटने के बाद भी आप वह केंद्रीय व्यक्ति बने रहते हैं.”

ब्रिटेन में, माएं 52 सप्ताह तक वैधानिक मातृत्व अवकाश ले सकती हैं, जिसमें से 39 सप्ताह के अवकाश में वो वेतन पाने की हक़दार भी होती हैं, जबकि पिता दो सप्ताह तक ही वैधानिक पितृत्व वेतन के साथ अवकाश ले सकते हैं. मां-बाप साझा पितृत्व अवकाश भी ले सकते हैं.

कुछ कंपनीज़ अपने कर्मचारियों को अतिरिक्त पितृत्व अवकाश देती हैं, लेकिन अधिकांश लोग मातृत्व या पितृत्व अवकाश पर रहने के दौरान कम कमाते हैं, जिससे कई पिता कितनी छुट्टियां लेते हैं, इस पर असर पड़ता है.

क्लियर का कहना है कि वर्कप्लेस कई तरह से मदद कर सकते हैं: जैसे कि सिर्फ़ पितृत्व अवकाश (पिता बनने पर मिलने वाली छुट्टी) देने के बजाय, ऐसे उदाहरण पेश करना जहाँ पिता सच में यह छुट्टी लेते हैं; यह तय करना कि कर्मचारी कब उपलब्ध रहेंगे; और महिलाओं के करियर से जुड़ी बातचीत में उनका साथ देना.

यह पारंपरिक भूमिकाओं पर भी निर्भर कर सकता है.

ज़ैक वॉटसन, शादीशुदा हैं और तीन बच्चों के पिता हैं. वो अमेरिका में इस बारे में कोचिंग देते हैं कि बच्चों की ज़िम्मेदारी को मां-बाप कैसे साझा करें.

वो कहते हैं कि उनके दादा ने शायद अपने विवाहित जीवन में कभी खाना नहीं पकाया होगा, जबकि उनके पिता ने भी बहुत कम बार ही खाना बनाया था.

शादी के पहले पांच सालों में, उनकी पत्नी ज़्यादातर समय खाना बनाती थीं. अगर वह खाना बनाने की पेशकश करते, तो वह अपनी पत्नी से खाने के बारे में इतने सवाल पूछते कि पत्नी का मानसिक बोझ ही बढ़ जाता था.

धीरे-धीरे उन्होंने सीखा कि कैसे फ़्रिज को पहले से ही देखकर वो पत्नी को बता सकते थे कि डिनर में क्या-क्या बनाया जा सकता है. साथ ही सीधे ‘केचप कहां है’, पूछने के बजाय वो पत्नी को बता सकते थे कि वो कहां-कहां देख चुके हैं. इससे उनकी पत्नी का स्ट्रेस लेवल काफ़ी कम हो सकता था.

महिलाओं का कहना है कि यह बेहद ज़रूरी है कि उनके साथी अपने कामों की पूरी ज़िम्मेदारी लें

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सैम बेरी का कहना है कि जहां कुछ पुरुषों को परवाह नहीं होती, वहीं एक बड़ा समूह, जो उनके ऑनलाइन दर्शक हैं, “वास्तव में बहुत अच्छे पति हैं, बहुत अच्छे पिता हैं, वे अपनी पूरी कोशिश कर रहे हैं और जितना हो सके उतना अच्छा करना चाहते हैं, लेकिन पत्नियों को होने वाले स्ट्रेस को उन्होंने देखा नहीं है या उनके पास इसे व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं हैं.”

बीबीसी ने जिन कई महिलाओं से बात की, वे चाहती थीं कि उनके साथी कुछ ख़ास कामों की ज़िम्मेदारी लें.

सैम ने सुझाव दिया कि पिता स्कूल के सभी प्रशासनिक कार्यों को संभाल सकते हैं, जबकि माँ भोजन का प्रबंधन करती हैं.

हालांकि, उनका कहना है कि समानता का मतलब यह नहीं है कि हर चीज़ को 50/50 बांटा जाए, क्योंकि एक साथी अधिक काम कर सकता है और दूसरे को खाना बनाना पसंद हो सकता है.

इसलिए इसका मतलब यह है कि दोनों पार्टनर जिस काम को करने में अच्छे हैं वो पहचान कर, उसे करें.

बोझ को हल्का कैसे करें

बीबीसी न्यूज़ से बात करने वाले लोगों ने मानसिक तनाव को कैसे मैनेज किया जाए इस बारे में अपने-अपने सुझाव साझा किए:

  • अपने साथी से खुलकर बात करें कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं और आपके मानसिक तनाव का क्या असर हो रहा है. वॉलेस कहती हैं कि जब आप गुस्से में हों या बहुत ज़्यादा तनाव में हों, तब ये बातचीत न करें, वरना ऐसा लग सकता है कि दूसरे व्यक्ति को “दोषी ठहराया जा रहा है या उसकी आलोचना की जा रही है.”
  • ‘मानसिक तनाव काम को कैसे प्रभावित करता है’, इस बारे में की गई स्टडी की सह-लेखिका एना कैटालानो वीक्स कहती हैं, “देखें कि आप क्या कम कर सकते हैं.” वो कहती हैं कि तय करें कि क्या आपको वाकई अपने बच्चों के दोस्तों के लिए जन्मदिन के कार्ड तैयार करने की ज़रूरत है? क्या आप अभिभावकों के व्हाट्सएप ग्रुप को म्यूट करके सिर्फ़ स्कूल के आधिकारिक ईमेल पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं?
  • अपने पार्टनर के साथ नियमित रूप से बातचीत करते रहें .
  • एक साझा कैलेंडर बनाएं ताकि सभी को जन्मदिन, स्कूल की मीटिंग और अन्य जानकारी मिलती रहे.
  • वॉलेस का कहना है कि बिना याद दिलाए, कार्यों की शुरुआत से अंत तक पूरी ज़िम्मेदारी लें.
  • माता-पिता के तौर पर सबसे ज़रूरी है बच्चे के साथ अच्छे पल बिताना, न कि हर काम बिल्कुल सही तरीके से करना है, इसे समझने से अपनी उम्मीदों को भी नए सिरे से तय करने में मदद मिलती है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS