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यूपीआई भुगतान पर चार्ज को अमेरिकी दबाव से क्यों जोड़ा जा रहा है?

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Source :- BBC INDIA

ट्रंप

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नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) ने 2,000 रुपए से ज़्यादा के यूपीआई भुगतान पर 0.4% शुल्क लागू किया है.

यह शुल्क बैंकों और पेमेंट प्रोसेसर्स को मिलेगा, जिसका भुगतान मर्चेंट यानी दुकानदार करेंगे.

मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर मर्चेंट पेमेंट इकोसिस्टम के भीतर लगाया जाने वाला शुल्क है.

यूपीआई से लेनदेन करते समय ग्राहक को यह शुल्क नहीं देना होगा. पर्सन-टु-पर्सन (पी2पी) यूपीआई ट्रांसफर मुफ़्त जारी रहेंगे जबकि 2,000 रुपए तक के मर्चेंट भुगतान भी मुफ्त रहेंगे.

सरकार ने कहा है कि क़रीब 96% ग्राहकों और दुकानदारों के लेनदेन पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा. जब आप कोई सामान ख़रीदने के बदले दुकानदार को भुगतान करते हैं तो उसे मर्चेंट ट्रांजैक्शन कहते हैं.

15 अक्तूबर से 2,000 रुपए से ज़्यादा के मर्चेंट लेनदेन में लागत बदल जाएगी. एमडीआर डिजिटल भुगतान स्वीकार करने के लिए लिया जाने वाला शुल्क है. नए ढांचे के तहत 2,000 से अधिक के सामान्य यूपीआई पर्सन टु मर्चेंट (पी2एम) लेनदेन पर 0.4% एमडीआर लगेगा.

75,000 रुपए या उससे अधिक के लेनदेन के लिए एमडीआर प्रति लेनदेन अधिकतम 300 रुपए तक सीमित रहेगा.

अहम बात यह है कि एनपीसीआई के एफ़एक्यू के मुताबिक़, दुकानदार एमडीआर का बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल सकते. ग्राहक को वही क़ीमत चुकानी होगी, जो मर्चेंट ने दिखाई है.

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि सरकार जब डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा दे रही है और कैश के इस्तेमाल को कम करना चाह रही है फिर एमडीआर लाने का फ़ैसला क्यों किया?

यूपीआई

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एमडीआर क्यों?

वित्त मंत्रालय का कहना है कि नए एमडीआर ढांचे से यूपीआई को आत्मनिर्भर बनाने में मदद मिलेगी, ग्रामीण और सेमी अर्बन इलाक़ों में इसके और विस्तार के लिए प्रोत्साहन मिलेगा और इसकी प्रतिस्पर्धात्मकता बनी रहेगी. साथ ही यह सुनिश्चित होगा कि अधिकांश भुगतान मुफ़्त रहें.

यूपीआई को आत्मनिर्भर बनाने का मतलब क्या है?

दिल्ली स्थित थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के निदेशक अजय श्रीवास्तव कहते हैं, ”यूपीआई में ट्रांजैक्शन फीस लगाने के पीछे यही दलील दी जा रही है कि वह आर्थिक मोर्चे पर आत्मनिर्भर हो जाए. मुझे भी लगता है कि यह अच्छी बात है. आरबीआई के डेटा के विश्लेषण के आधार पर मेरा मानना है कि यूपीआई मैनेज करने में सालाना 2,500 करोड़ से 8,000 करोड़ रुपये तक का ख़र्च आता है.”

”मान लीजिए कि इसको मैनेज करने में सालाना दस हज़ार करोड़ रुपए का ख़र्च आ रहा है तो क्या सरकार को इसे शुल्क के रूप में लेना चाहिए? यूपीआई भुगतान पर शुल्क का असर यह होगा कि लोग इसका इस्तेमाल सीमित करेंगे. कैश की तरफ़ बढ़ेंगे.”

”कैश प्रिंटिग, डिस्ट्रिब्यूशन और नक़दी अर्थव्यवस्था को मैनेज करने में भी भारी ख़र्च आते हैं. केवल नोट छापने में ही छह से सात हज़ार करोड़ रुपए लगते हैं. बाक़ी मैनेजमेंट मिला दें तो सालाना 15 हज़ार से 20 हज़ार करोड़ रुपए ख़र्च होंगे. मेरा मानना है कि अगर एमडीआर से यूपीआई ट्रांजैक्शन कम होते हैं तो सरकार बचत बिल्कुल नहीं कर पाएगी.”

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने मंगलवार को आरोप लगाया कि यह क़दम सरकार के अमेरिकी दबाव के आगे झुकने का नतीजा है.

इस मामले में विपक्ष अमेरिकी दबाव क्यों देख रहा है?

इसी साल मार्च में यूनाइटेड स्टेट ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (यूएसटीआर) ने घरेलू कंपनियों को फ़ायदा पहुँचाने वाली भारत की डिजिटल भुगतान नीतियों को विदेशी कारोबार में बाधा के रूप में चिह्नित किया था.

यूएसटीआर ने कहा था कि उसने अमेरिकी इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट सर्विसेज सप्लायर्स के यूपीआई इकोसिस्टम में शामिल होने में असमर्थता को लेकर चिंता जताई है.

अमेरिका ने जताई थी चिंता

हाल के वर्षों में यूपीआई पेमेंट भारत में काफ़ी लोकप्रिय हुआ है

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यूएसटीआर ने कहा था, “नवंबर 2020 में एनपीसीआई ने भारत के यूपीआई के ज़रिए ऑनलाइन भुगतान शुरू करने वाले थर्ड-पार्टी ऐप सप्लयार्स के लिए मार्केट शेयर की सीमा 30 फ़ीसदी तय करने की घोषणा की थी. यह सीमा ट्रांजैक्शन की संख्या के आधार पर तय की गई थी.”

”इस नियम को जनवरी 2023 से लागू किया जाना था, लेकिन एनपीसीआई ने इसे लागू करने की समयसीमा कई बार आगे बढ़ाई. अब यह सीमा दिसंबर 2026 से लागू होनी है. 31 दिसंबर, 2025 तक अमेरिका के स्वामित्व वाली दो पेमेंट कंपनियां मिलकर यूपीआई के 80% से ज़्यादा लेनदेन प्रोसेस कर रही थीं. ये कंपनियां वॉलमार्ट समर्थित फोनपे और गूगलपे हैं.”

पिछले साल सरकार ने टैरिफ के दबाव के बीच 6% का गूगल टैक्स ख़त्म कर दिया था. अमेरिका ने कहा था कि डिजिटल सर्विस टैक्स उसकी टेक कंपनियों जैसे एप्पल, एमजॉन, गूगल और फ़ेसबुक के ख़िलाफ़ हैं.

भारत अकेला ऐसा देश नहीं है, जिसके पेमेंट सिस्टम पर अमेरिका की नज़र है.

जुलाई 2025 में ब्राज़ील की इंस्टेंट पेमेंट सिस्टम पिक्स अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निशाने पर आ गया था.

पिछले साल 15 जुलाई को अमेरिका ने ब्राज़ील की कथित “अनफेयर ट्रेड पैक्टिस” की जांच शुरू करते हुए कहा था कि वह इस बात की पड़ताल करेगा कि क्या दक्षिण अमेरिकी देश अपने इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट सिस्टम पिक्स को बढ़ावा देने के लिए अमेरिकी कंपनियों के साथ भेदभाव कर रहा है.

अमेरिकी टेक कंपनी मेटा के मैसेजिंग प्लेटफॉर्म व्हाट्सऐप ने जून 2020 में ब्राज़ील में डिजिटल पेमेंट सिस्टम शुरू किया था, लेकिन एक हफ़्ते बाद ही वहाँ केंद्रीय बैंक ने प्रतिस्पर्धा और डेटा प्रीवेसी से जुड़ी चिंताओं के आधार पर इस सेवा पर प्रभावी रूप से रोक लगा दी.

व्हाट्सऐप को पिक्स के लॉन्च के छह महीने बाद इसे दोबारा शुरू करने की अनुमति मिली. उस समय सेवा पर रोक लगाए जाने के दौरान व्हाट्सऐप ने कहा था कि उसका मानना है कि ब्राज़ील के केंद्रीय बैंक को चिंता थी कि मैसेजिंग ऐप की पेमेंट सेवा पिक्स के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकती है.

सरकार ने कहा है कि क़रीब 96% ग्राहकों और दुकानदारों के लेनदेन पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा

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क्या मोदी सरकार ने अमेरिकी दबाव में एमडीआर लाया?

जीटीआरआई के निदेशक अजय श्रीवास्तव कहते हैं, ”सरकार ने यह फ़ैसला अमेरिकी दबाव में लिया है. इसे अमेरिका के नेशनल ट्रेड एस्टिमेट्स रिपोर्ट 2026 से समझ सकते हैं. इसे यूएसटीआर हर साल जारी करता है. इसमें वे पूरी दुनिया के देशों के ख़िलाफ़ अमेरिका की शिकायतों को सूचीबद्ध करते हैं. इसमें स्पष्ट रूप से कहा जाता है कि फलाने देश की नीति के कारण अमेरिकी कंपनियों को नुक़सान हो रहा है.”

”भारत के ख़िलाफ़ भी उसमें बहुत सारी शिकायतें लिस्टेड हैं. उनमें से एक शिकायत है कि भारत सरकार यूपीआई और रुपे को समर्थन दे रही है, जिससे अमेरिकी कंपनियों को नुक़सान हो रहा है. यूपीआई आने के बाद मास्टरकार्ड और वीज़ा से ट्रांजैक्शन कम हुए हैं. ऐसा नहीं है कि वे बिल्कुल ख़त्म हो गए हैं. उन्हें भारत में बैन नहीं किया गया है, लेकिन कम हुए हैं. अभी रुपे डेबिट में कोई ट्रांजैक्शन फीस नहीं ले सकता. उसकी वजह से लोग क्रेडिट कार्ड कम इस्तेमाल कर रहे हैं.”

अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि इस मामले में सरकार की कार्रवाइयों का पूरा सिलसिला है. अभी थोड़े समय पहले भारत सरकार के डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड ने ई-कॉर्मस में एफ़डीआई को मज़ूरी दी थी.”

”यह भी अमेरिकी मांग थी. इससे अमेरिकी कंपनी एमेज़ॉन और वॉलमार्ट को फ़ायदा होगा. एक चीज़ लोग भूल जाते हैं, वह यह है कि भले ही मास्टरकार्ड और वीज़ा के ट्रांजैक्शन कम हो रहे हैं क्योंकि यूपीआई एडवांस टेक्नोलॉजी है लेकिन यूपीआई में 80 फ़ीसदी ट्रांजैक्शन तो अमेरिकी कंपनियाँ ही कर रही हैं, गूगल पे और फोनपे.”

लेकिन अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग के कॉलमिस्ट एंडी मुखर्जी अजय इसे बिल्कुल अलग तरह से देखते हैं और सरकार के फ़ैसले का समर्थन कर रहे हैं.

एंडी मुखर्जी ने पिछले महीने 21 अगस्त को अपने कॉलम में लिखा था, ”प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार सालाना चार ट्रिलियन डॉलर की इंडस्ट्री को बिना मुनाफ़े वाली सफलता के बोझ से बिखरने से बचाने की कोशिश कर रही है. यह बिल्कुल सही क़दम है. विपक्ष ने इसे जन विरोधी विरोधी क़दम बताया है और आरोप लगाया है कि यह वीज़ा और मास्टरकार्ड के कहने पर ट्रंप प्रशासन के सामने वित्तीय संप्रभुता का समर्पण है.”

मोदी सरकार के फ़ैसले का अमेरिका से संबंध को समझना मुश्किल नहीं है.

यूएसटीआर 2026 की रिपोर्ट में यूपीआई को लेकर ख़ास तौर पर चिंता जताई गई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी इलेक्ट्रॉनिक सर्विसेज सप्लायर्स यूपीआई में समान अवसरों के साथ भाग नहीं ले पा रहे हैं.

यूपीआई का संचालन एनपीसीआई करती है, जो एक सेमी-गवर्नमेंट संस्था है.

इसके पास अपने रुपे कार्ड भी हैं, जिन्हें वीज़ा और मास्टरकार्ड की तुलना में कहीं अधिक व्यापक स्तर पर स्वीकार किया जाता है. इससे अमेरिकी क्रेडिट-कार्ड कारोबार को नुक़सान पहुँचता है.

एंडी मुखर्जी ने लिखा है, ”जो बदलाव होने जा रहा है, उसका क्रेडिट कार्ड से कोई लेना-देना नहीं है. यह डेबिट ट्रांसफर से जुड़ा है. इसके दो प्रकार हैं. पर्सन-टु-पर्सन ट्रांसफर कुल लेनदेन का 70% है, जिसे मुफ्त ही रखना होगा. बहस बाकी 30% को लेकर है. यानी सालाना एक ट्रिलियन डॉलर से अधिक के मर्चेंट भुगतान.”

”बड़ी वित्तीय क्षमता वाली वॉलमार्ट और गूगल ने यूपीआई के विस्तार को आगे बढ़ाया और 140 करोड़ भारतीयों के ख़र्च से जुड़े बेहद मूल्यवान डेटा तक पहुंच हासिल की. लेकिन इस पूरी व्यवस्था में उनकी भूमिका उपभोक्ता पक्ष से थी. क़रीब एक ट्रिलियन डॉलर के सालाना लेनदेन को प्रोसेस करते हुए भी कोई कमाई नहीं होना कोई टिकाऊ सिस्टम नहीं है. यह चौबीसों घंटे मर्चेंट भुगतान की सुविधा उपलब्ध कराते हैं.”

यूपीआई

एंडी मुखर्जी ने लिखा है, ”हर महीने 20 अरब से अधिक लेनदेन को प्रोसेस करने के लिए सर्वर, कंप्लायंस व्यवस्था और साइबर सुरक्षा में भारी निवेश की ज़रूरत होती है. धोखाधड़ी के मामले बड़े पैमाने पर होते हैं और उपभोक्ताओं को उम्मीद रहती है कि इनसे होने वाले नुक़सान की भरपाई बैंक या फिनटेक कंपनियां करेंगी. सरकार की घटती सब्सिडी फ़िलहाल इन बुनियादी ढांचे की लागत को कुछ हद तक संभाल रही है, लेकिन वित्तीय दबाव का सामना कर रहा भारत हमेशा इसका खर्च नहीं उठा सकता.”

लेकिन अजय श्रीवास्तव इस तर्क से सहमत नहीं हैं कि गूगल पे और फोन पे को कमाई नहीं हो रही है. श्रीवास्तव कहते हैं, ”भारत पहले ही अमेरिकी टेक कंपनियों को यूपीआई तक असाधारण पहुँच दे चुका है. इन प्लेटफॉर्म्स से अमेरिकी कंपनियों को करोड़ों भारतीयों के खर्च करने के व्यवहार से जुड़ी बेहद मूल्यवान जानकारी भी हासिल होती है. इसका इस्तेमाल अमेरिकी कंपनियां अपना कारोबार बढ़ाने में कर रही हैं. भारतीय उपभोक्ताओं की ख़र्च करने की आदत से जुड़े डेटा को हासिल करना कोई मुफ़्त की सेवा देना नहीं है.”

ब्लैक डॉट पब्लिक पॉलिसी एडवाइजर्स के संस्थापक मंदार कागड़े ने कहा कि दुनिया भर में कार्ड नेटवर्क और कई रियल-टाइम पेमेंट सिस्टम में मर्चेंट से शुल्क लिया जाना आम बात है.

मंदार ने ब्लूमबर्ग से कहा, ”इससे भुगतान व्यवस्था में शामिल कंपनियों को पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करने और उसका विस्तार करने के लिए प्रोत्साहन मिलता है. फ़िलहाल यूपीआई के 50 करोड़ से ज़्यादा यूजर्स हैं, लेकिन इसकी ग्रोथ अब एक स्तर पर आकर ठहर गई है. ऐसे में अगले चरण के यूज़र्स को जोड़ने और उन्हें बनाए रखने के लिए एमडीआर से होने वाली आय अहम हो जाती है.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS