Home rss business hindi 5 आसान प्वाइंट में समझें ट्रंप के 100% टैरिफ का कहां और...

5 आसान प्वाइंट में समझें ट्रंप के 100% टैरिफ का कहां और कितना होगा असर

3
0

Source :- LIVE HINDUSTAN

अमेरिका में रूस के खिलाफ नए प्रतिबंधों से भारत की चिंता बढ़ सकती है। अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने की पावर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को देने वाले बिल को मंजूरी दे दी है। भारत और चीन जैसे बड़े रूसी तेल खरीदार इसकी नजर में हैं। बिल अब ट्रंप के हस्ताक्षर के लिए भेजा गया है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पर तुरंत 100% टैरिफ लग जाएगा। यह राष्ट्रपति को ऐसा टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। आइए 5 आसान प्वाइंट में समझते हैं कि ट्रंप के 100% टैरिफ का कहां और कितना असर होगा?

1 – क्यों इतना अहम है ये मामला?

भारत के लिए यह मामला इसलिए अहम है, क्योंकि रूस पिछले कुछ सालों में देश के सबसे बड़े कच्चे तेल सप्लायरों में शामिल हो गया है। 2022 के बाद पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों और बदले हुए ग्लोबल ऑयल ट्रेड के बीच भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी कच्चा तेल बड़े पैमाने पर खरीदा। GTRI के अनुमान के अनुसार जुलाई 2026 में भारत के कुल क्रूड इंपोर्ट में रूस की हिस्सेदारी करीब 52% तक पहुंच गई थी। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में बदलाव का सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

2 – रूसी तेल कम करने का भारत पर क्या असर?

अब सबसे बड़ा सवाल है कि अगर भारत रूसी तेल कम करता है, तो क्या पेट्रोल तुरंत महंगा हो जाएगा? इसका जवाब है- जरूरी नहीं। भारतीय रिफाइनर रूस की जगह मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और अमेरिका सहित दूसरे देशों से क्रूड खरीद सकते हैं। लेकिन, समस्या कीमत की हो सकती है। रूसी Urals क्रूड को लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क की तुलना में छूट पर खरीदा गया। हालांकि, जुलाई में भारत पहुंचने वाले Urals पर यह डिस्काउंट घटकर करीब 1-2 डॉलर प्रति बैरल रह गया था। इसलिए रूसी तेल छोड़ने का असर केवल डिस्काउंट खत्म होने तक सीमित हो सकता है, लेकिन अगर पूरी दुनिया में क्रूड की सप्लाई घटती है, तो दबाव काफी बढ़ सकता है।

3 – पेट्रोल की कीमत के लिए सबसे बड़ा जोखिम?

पेट्रोल की कीमत के लिए सबसे बड़ा जोखिम ग्लोबल क्रूड मार्केट हो सकता है। अगर रूसी तेल का बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय बाजार से हटता है, तो सप्लाई कम और कीमतें ज्यादा हो सकती हैं। ऐसी स्थिति में भारत को दूसरे देशों से तेल खरीदने के लिए ज्यादा भुगतान करना पड़ सकता है। इसके अलावा शिपिंग, इंश्योरेंस, रिफाइनिंग लागत और डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत भी महत्वपूर्ण होगी, यानी भारत रूस से तेल की जगह दूसरा तेल खरीद सकता है, लेकिन असली सवाल यह होगा कि वह तेल कितनी कीमत पर मिलता है।

4 – महंगे कच्चे तेल का पेट्रोल पर कितना असर ?

हालांकि, कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का पूरा बोझ तुरंत पेट्रोल पंप पर नहीं आता। पेट्रोल की खुदरा कीमत में क्रूड की लागत के अलावा रिफाइनिंग, ट्रांसपोर्ट, डीलर कमीशन और केंद्र व राज्य के टैक्स जैसे कई हिस्से शामिल होते हैं। इसलिए सरकार और तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी का कुछ असर खुद भी संभाल सकती हैं। यही वजह है कि रूसी तेल की खरीद में कमी आने का मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल सीधे 10, 20 या 30 रुपये प्रति लीटर महंगा हो जाएगा। कीमत कितनी बढ़ेगी, यह कई परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

5 – भारत के सामने क्या हैं असल चुनौतियां?

इस पूरे मामले में भारत के सामने दो अलग-अलग जोखिम हैं। पहला अगर रूसी तेल महंगा पड़ता है या उसकी सप्लाई घटती है, तो भारत का क्रूड इंपोर्ट बिल बढ़ सकता है और पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव आ सकता है। दूसरा अगर भारत रूसी तेल खरीदना जारी रखता है और अमेरिका अतिरिक्त टैरिफ लगाता है, तो भारतीय कंपनियों के अमेरिकी बाजार में निर्यात पर असर पड़ सकता है। फिलहाल, यह कहना जल्दबाजी होगी कि इसका सीधा असर पेट्रोल की कीमत पर कितना होगा। आने वाले समय में रूसी तेल की उपलब्धता, वैश्विक क्रूड कीमत, रुपये की चाल और सरकार की टैक्स नीति ही तय करेगी कि आम उपभोक्ता को कितना असर झेलना पड़ेगा।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN