Source :- LIVE HINDUSTAN
अमेरिका और डेनमार्क ग्रीनलैंड के बीच में समझौते पर सहमति बन गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को ऐलान किया कि अब इस समझौते के बाद ग्रीनलैंड की सुरक्षा को लेकर अमेरिका को हर तरह के फैसले लेने की आजादी होगी।
संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आखिरकार डेनमार्क और ग्रीनलैंड को अपने सामने झुकने के लिए मजबूर कर ही दिया। महीनों के कूटनीतिक दबाव और ग्रीनलैंड पर सेना भेजने की धमकी के बाद ट्रंप ने आखिरकार शुक्रवार को इस बात का ऐलान कर दिया कि अब उस द्वीपीय क्षेत्र की सुरक्षा में अमेरिका की भागीदारी स्थायी होगी। खैर, वह बात अलग है कि डेनमार्क पहले से ही नाटो का हिस्सा है और इस नाते अमेरिकी सेना का एक बेस ग्रीनलैंड की सुरक्षा पहले ही कर रही है। लेकिन अब इस समझौते के तहत दोनों पक्षों के बीच में किस-किस मुद्दे पर सहमति बनी है। इस पर अभी ज्यादा जानकारी सामने नहीं आई है।
अमेरिका के राष्ट्रपति ने डेनमार्क और ग्रीनलैंड के साथ हुई इस डील को अपनी जीत की तरह पेश करते हुए शुक्रवार को ट्रुथ सोशल पर इसका ऐलान किया। उन्होंने लिका, “मेरे निर्देश पर, हमने डेनमार्क और ग्रीनलैंड के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर यह पक्का किया है कि अब से ग्रीनलैंड और खुद अमेरिका की सुरक्षा के लिए हम ग्रीनलैंड पर हर जरूरी कदम उठा सकेंगे।”
उन्होंने आगे लिखा, “इस समझौते के तहत अब अमेरिका का कोई भी दुश्मन वाशिंगटन की लिखित मंजूरी के बिना ग्रीनलैंड पर कभी बेस नहीं बना पाएगा। इसके अलावा कोई भी यहां पर संवेदनशील जगहों पर निवेश नहीं कर पाएगा।” ट्रंप की इस भाषा शैली से साफ पता चलता है कि बेस बनाने की धमकी से उनका संकेत रूस की तरफ है। वहीं संवेदनशील निवेश से उनका निशाना चीन की तरफ है। फिलहाल राष्ट्रपति ट्रंप ने इस डील के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दी है। लेकिन इतना तय है कि इससे ग्रीनलैंड में अमेरिका के अधिकार बढ़ जाएंगे।
ग्रीनलैंड, डेनमार्क के नेताओं ने भी की समझौते की तारीफ
संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति की धमकियों के बाद बैकफुट पर आए डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने इस समझौते को सही बताया है। प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने सोमवार को कहा कि उन्हें उम्मीद है कि जनवरी से अमेरिका और ग्रीनलैंड के साथ चल रही बातचीत से विवाद सुलझ सकता है। शुक्रवार को उन्होंने कहा कि उन्हें “खुशी है कि ग्रीनलैंड, डेनमार्क साम्राज्य और अमेरिका के बीच एक अच्छे समझौते की संभावना है,” और साथ ही कहा कि यह “नाटो और यूरोप के लिए अच्छा है।” उन्होंने कहा कि यह समझौता “डेनमार्क साम्राज्य की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता, तथा ग्रीनलैंड के लोगों के आत्म-निर्णय के अधिकार को मान्यता देता है”।
बता दें, फिलहाल ग्रीनलैंड, डेनमार्क गणराज्य के अंतर्गत एक स्वायत्त क्षेत्र है। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक कल के दिन ग्रीनलैंड अगर आजाद भी हो जाता है। तब भी वह अमेरिका के साथ इस डील में बंधा रहेगा। ट्रंप ने दावा किया है कि अगले कुछ दिनों में होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान ही इस डील पर समझौता हो सकता है। इसके बाद अमेरिकी सैनिक यहां पर नया बेस बनाना शुरू कर सकते हैं।
ग्रीनलैंड और अमेरिका की सुरक्षा के लिए जरूरी- ट्रंप
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से यह दावा करते हुए नजर आए हैं कि ग्रीनलैंड पर यूएसए का ही अधिकार होना चाहिए। इसकी लोकेशन की वजह से यह जगह अमेरिका के प्रभुत्व के लिए बहुत जरूरी है। हाल ही में ट्रंप कई बार इस मुद्दे पर यूरोप को खरी-खोटी सुनाते हुए नजर आए हैं कि ग्रीनलैंड अगर कल के दिन युद्ध में उलझता है , तो केवल अमेरिका की सेना ही उसकी रक्षा कर सकती है।
ग्रीनलैंड पर पहले से ही है अमेरिका का बेस
बता दें, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की सेना के लिए ग्रीनलैंड को अलग जगह नहीं है। इस बर्फीले क्षेत्र के उत्तरी इलाके में पहले से ही अमेरिका का पिटुफिक बेस मौजूद है। लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका यहां तीन और बेस खोलना चाहता है। गौर करने वाली बात है कि अमेरिका और डेनमार्क दोनों ही नाटो के सदस्य हैं। ऐसे में अमेरिका का यहां सेना भेजना कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन इसके बाद भी डोनाल्ड ट्रंप ज्यादा अधिकार चाहते हैं।
हालात यहां तक आ गए थे कि उन्होंने डेनमार्क को खरीदने की बात तक कह दी थी। इस पर डेनमार्क और ग्रीनलैंड की तरफ से कहा गया था कि वह क्षेत्र बिकाऊ नहीं है।
चीन और रूस पर क्या प्रभाव?
डोनाल्ड ट्रंप शुरुआत से ही यह आरोप लगाते आ रहे हैं कि चीन इस क्षेत्र में निवेश के जरिए अपने पैर जमाना चाहता है। वहीं अगर रूस ने किसी दिन ग्रीनलैंड पर हमला कर दिया, तो इसे बचाने के लिए अमेरिका को ही आना पड़ेगा। क्योंकि इसकी सुरक्षा करने की क्षमता केवल अमेरिका में ही है। हालांकि, विशेषज्ञों की मानें, तो यह मामला इससे कहीं ज्यादा है। ट्रंप ग्रीनलैंड को केवल सुरक्षा की दृष्टि से ही नहीं बल्कि इसके रेयर अर्थ मिनरल्स के लिए भी अपनाना चाहते हैं। बर्फ की मोटी पर्त के नीचे दबी ग्रीनलैंड की धरती में बड़ी मात्रा में मिनिरल्स होने की संभावना है। ऐसे में ट्रंप किसी भी हालत में इसे अमेरिका के हाथों में ही रखना चाहते हैं। ग्रीनलैंड पर अमेरिकी प्रभुत्व से सीधे तौर पर रूस और चीन को अभी कोई परेशानी नहीं है। लेकिन वह उनके लिए एक बड़े खतरे के तौर पर दिखाई दे सकता है।
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