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अमेरिकी कांग्रेस ने 16 सितंबर को लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशा एंड ईरान एक्ट को 262 के मुक़ाबले 159 मतों से पास किया था.
अमेरिकी सीनेट इस बिल को सात अगस्त को भारी बहुमत से पास कर चुकी थी. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पर हस्ताक्षर भी कर दिया है और यह बिल क़ानून बन गया है.
अब ट्रंप को भारत पर 100 फ़ीसदी तक टैरिफ़ लगाने का अधिकार मिल गया है.
बिल पास होने के बाद डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद रिचर्ड ब्लूमेंथल ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि चीन और भारत को अपना रवैया सुधारना चाहिए और तेल, गैस “कहीं और से ख़रीदना चाहिए”.
यह क़ानून ट्रंप को ये तय करने की व्यापक छूट देता है कि इन टैरिफ़ का इस्तेमाल कब और किस तरह किया जाए. यह अभी स्पष्ट नहीं है कि वह भारतीय सामान के अमेरिकी आयात की लागत बढ़ाने वाले टैरिफ़ कब लगाएंगे या लगाएंगे भी या नहीं.
भारत के लिए इस क़ानून को एक धमकी के तौर पर देखा जा रहा है. इससे ट्रंप का दबाव बनाने का प्रभाव बढ़ सकता है, ख़ासकर ऐसे समय में जब वह रूस के साथ व्यापारिक समझौतों की संभावनाएं भी तलाश रहे हैं.
अगस्त 2026 तक भारत, चीन के बाद रूसी तेल का दूसरा सबसे बड़ा ख़रीदार था. ऐसे में संभावित अमेरिकी टैरिफ़ का सबसे ज़्यादा असर इन दोनों एशियाई देशों पर पड़ सकता है.
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रूसी तेल को लेकर बढ़ता दबाव
दिसंबर 2022 से अगस्त 2026 के बीच रूस के कुल कच्चे तेल निर्यात में चीन की हिस्सेदारी 50 फ़ीसदी जबकि भारत की हिस्सेदारी 37 फ़ीसदी थी.
भारत के विदेश मंत्रालय ने बिल पास होने के बाद तुरंत बयान जारी किया. मंत्रालय ने कहा कि उसने अमेरिका के समक्ष इस मुद्दे को उठाया है और इस बात पर ज़ोर दिया है कि इसका असर न केवल द्विपक्षीय संबंधों, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाज़ार पर भी पड़ सकता है.
जुलाई 2026 के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, भारत के कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 51 फ़ीसदी से अधिक थी. ऐसे समय में जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से होकर तेल की आवाजाही बाधित है, 30 दिनों के भीतर रूसी तेल पर निर्भरता को बड़े पैमाने पर कम करना भारत के लिए मुश्किल हो सकता है.
भारत के लिए दोनों स्थितियां ही मुश्किल हैं. भारत रूस से बड़ी मात्रा में तेल ख़रीदना जारी रखता है तो ट्रंप के टैरिफ़ का बोझ उठाना पड़ सकता है. दूसरी स्थिति यह है कि टैरिफ़ से बचने के लिए भारत रूसी तेल के आयात में कटौती करता है तो इसे बार-बार अमेरिका के दबाव में झुकने जैसा देखा जाएगा.
इसके अलावा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से तेल की आवाजाही बाधित है और कच्चे तेल की क़ीमतें फिर से 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं, भारत के लिए तेल के नए स्रोत तलाशना महंगा पड़ सकता है.
अगर अमेरिका भारतीय सामान पर 100 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाता है, तो यह एक बड़ा झटका होगा. इससे अमेरिका में भारतीय आयात की लागत लगभग दोगुनी हो जाएगी और कई उत्पाद व्यावसायिक रूप से प्रतिस्पर्धी नहीं रहेंगे.
इसका तत्काल बोझ मुख्य रूप से भारतीय निर्यातकों और उनके कर्मचारियों पर पड़ेगा, लेकिन अमेरिकी आयातकों, खुदरा विक्रेताओं और उपभोक्ताओं को भी अधिक क़ीमतों या सीमित विकल्पों का सामना करना पड़ सकता है.
अमेरिका टैरिफ़ बढ़ाता है तो इसकी वसूली अमेरिकी आयातकों से होती है लेकिन व्यवहार में इसका सीधा असर भारत के निर्यात पर पड़ेगा. भारत पहले से ही व्यापार घाटा से जूझ रहा है.
अगर कोई अमेरिकी आयातक भारत से 20 डॉलर का कपड़ा ख़रीदता है, तो 100 फ़ीसदी टैरिफ़ से सीमा पर ही 20 डॉलर का अतिरिक्त शुल्क लग सकता है.
इसके बाद घरेलू परिवहन, खुदरा मार्जिन और अन्य टैक्ट भी जुड़ेंगे. अगर वही उत्पाद किसी दूसरे देश से काफ़ी कम टैरिफ़ पर मिल सकता है, तो भारत से महंगा सामान ख़रीदने का कोई कारण नहीं रहेगा.
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भारत को क्या करना चाहिए?
दिल्ली स्थित थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के निदेशक अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि भारत से रूसी तेल की ख़रीद में भारी कटौती और एक असमान द्विपक्षीय व्यापार समझौते के तहत रियायतें की मांग की जा सकती हैं.
अजय श्रीवास्तव कहते हैं, ”भारत को अस्थायी टैरिफ़ राहत के बदले अपनी ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं करना चाहिए. न तो व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करना और न ही रूसी तेल की ख़रीद बंद करना चाहिए. अमेरिका ने यूरोपीय संघ, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे प्रमुख साझेदारों के साथ व्यापार समझौते होने के बाद भी नए टैरिफ़ लगाए हैं. इसलिए भारत को अमेरिकी टैरिफ़ की धमकियों को अपनी ऊर्जा नीति तय करने का आधार नहीं बनने देना चाहिए.”
रियायती रूसी कच्चे तेल ने भारत के तेल आयात बिल को कम करने, ऊर्जा सुरक्षा मज़बूत करने और महंगाई को नियंत्रित रखने में मदद की है. अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि इसलिए जब तक रूसी तेल व्यावसायिक रूप से प्रतिस्पर्धी बना रहता है, भारत को उसकी ख़रीद जारी रखनी चाहिए और बिना एकतरफ़ा व्यापारिक रियायत दिए मज़बूती से बातचीत करनी चाहिए.
भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत की जीडीपी ग्रोथ 7.8 फ़ीसदी रही.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2047 तक, यानी ब्रिटेन से भारत की आजादी के 100 साल पूरे होने तक, देश को विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य रखा है.
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अगले दो दशकों तक भारत को औसतन 7.8 फ़ीसदी सालाना आर्थिक वृद्धि दर्ज करनी होगी. लेकिन ट्रंप की की नीति भारत की आर्थिक वृद्धि पर असर डाल सकती है.
अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार है. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले वित्त वर्ष में भारतीय कंपनियों ने अमेरिका को 87 अरब डॉलर के सामान का निर्यात किया. यह भारत के कुल 438 अरब डॉलर के निर्यात का क़रीब 20 फ़ीसदी था.
एक बात यह भी कही जाती है कि भारत के पास अपने एशियाई प्रतिद्वंद्वी देशों की तुलना में टैरिफ़ से पैदा होने वाले उथल-पुथल के प्रति अपेक्षाकृत कम जोखिम है, क्योंकि भारत का घरेलू बाज़ार बहुत बड़ा है. भारत आयात आधारित अर्थव्यवस्था कहा जाता है.
ट्रंप के टैरिफ़ और पाकिस्तान के साथ बढ़ती नज़दीकी ने अमेरिका को एक भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार के रूप में लेकर भारत के विश्वास को कमज़ोर किया है.
भारत अपनी खपत के 90 फ़ीसदी से अधिक कच्चे तेल का आयात करता है और रूस पर उसकी निर्भरता एक बार फिर बढ़ गई है, क्योंकि ईरान में युद्ध के कारण मध्य-पूर्व से तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई है.
वैश्विक समुद्री डेटा कंपनी केप्लर के मुताबिक, इस गर्मी में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूसी कच्चे तेल की हिस्सेदारी क़रीब आधी रही.
चीन भारत से अधिक रूसी तेल ख़रीदता है और वह भी इस नए क़ानून के दायरे में आता है. भारत में यह देखा जाता है कि क्या अमेरिका चीन पर भी नई दिल्ली की तरह ही दबाव डालता है.
यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि भारत ने पिछले कई वर्षों में अमेरिका के साथ अपने संबंधों को मज़बूत किया है, जिसका एक कारण चीन के प्रभाव को संतुलित करना भी रहा है.
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क्या अमेरिका की जगह कोई ले सकता है?
भारत अपने व्यापार की निर्भरता अमेरिका पर कम करने की कोशिश कर रहा है. फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट को इसी रूप में देखा जा रहा है. हालांकि वे रातोंरात अमेरिकी बाज़ार का विकल्प नहीं मिल सकता है.
भारत-यूके व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता 15 जुलाई 2026 को लागू हुआ. इसके तहत ब्रिटेन को भारत के लगभग 99 फ़ीसदी निर्यात को शुल्क-मुक्त पहुँच मिलती है.
भारत-ओमान व्यापार समझौता भी लागू हो गया है. इसके तहत ओमान ने अपनी 98.08 फीसदी टैरिफ लाइनों पर शून्य-शुल्क पहुँच दी है.
भारत-न्यूजीलैंड एफटीए लागू होने के बाद भारत के सभी निर्यातों को शून्य-शुल्क पहुंच देने का प्रावधान करता है और इसके 20 अक्टूबर से लागू होने की संभावना है. वहीं, भारत-यूरोपीय संघ एफटीए पर जनवरी में बातचीत पूरी हुई थी. इसमें 96.8 फ़ीसदी टैरिफ लाइनों पर तरजीही पहुंच का प्रावधान है, जो भारत के 99.5 फीसदी निर्यात को कवर करती है.
ये समझौते अमेरिकी बाजार की जगह नहीं ले सकते. लेकिन वे दूसरे बड़े बाज़ारों में प्रवेश की लागत कम कर सकते हैं.
सिर्फ़ टैरिफ़ में रियायतें इन बाज़ारों तक पहुँच सुनिश्चित नहीं करेंगी. भारतीय निर्यातकों को लॉजिस्टिक्स में निवेश करना होगा, तकनीकी और उत्पाद मानकों को पूरा करना होगा, अपने डिजाइन में बदलाव करना होगा और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क तैयार करने होंगे. यही वे क्षमताएं हैं, जिन्होंने उन्हें अमेरिकी बाज़ार में अपनी जगह बनाने में मदद की.
अजय श्रीवास्तव कहते हैं, ”निर्यात बाज़ारों में विविधता लाने की भी एक सीमा है. अगर कोई कंपनी अमेरिका पर अपनी 60 फ़ीसदी निर्भरता घटाकर यूरोप पर 60 फ़ीसदी निर्भर हो जाती है, तो भौगोलिक रूप से तो उसने विविधता लाई है, लेकिन रणनीतिक रूप से नहीं. बाज़ारों में विविधता के साथ-साथ ग्राहकों के आधार को भी व्यापक बनाना होगा.”
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