Home National news hindi ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग, जानिए मुख्य चुनाव आयुक्त को कैसे...

ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग, जानिए मुख्य चुनाव आयुक्त को कैसे हटाया जा सकता है

4
0

Source :- BBC INDIA

चीफ़ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार

प्रकाशित

पढ़ने का समय: 7 मिनट

अंग्रेजी अख़बार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने अपनी एक खोजी रिपोर्ट में कहा है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले कुछ महीनों में भारत निर्वाचन आयोग के फ़ैसलों और कामकाज की प्रक्रिया को लेकर आंतरिक तौर पर आपत्तियां उठाईं.

अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक़, पिछले साल स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न यानी एसआईआर अभियान के दौरान चुनाव आयुक्तों को कई फ़ैसलों की जानकारी नहीं दी गई थी और दोनों चुनाव आयुक्तों ने इन फ़ैसलों पर बार-बार आपत्तियां जताई थीं.

हालांकि निर्वाचन आयोग का कहना है कि बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में अलग-अलग राय, सुझाव और टिप्पणियां आना सामान्य प्रक्रिया है.

आयोग ने कहा कि एसआईआर समेत पिछले एक साल में लिए गए सभी अंतिम फ़ैसले सर्वसम्मति से हुए हैं.

अख़बार की इस रिपोर्ट के बाद विपक्षी दलों ने आरोप लगाना शुरू किया कि एसआईआर में गड़बड़ियां हुई हैं और इसके लिए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ज़िम्मेदार हैं.

इंडियन एक्सप्रेस ने कांग्रेस के सूत्रों के हवाले से कहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए विपक्षी दल संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव लाएंगे.

वहीं कॉकरोच जनता पार्टी ने कहा है कि अगर शनिवार तक ज्ञानेश कुमार ने इस्तीफ़ा नहीं दिया तो 2 अक्तूबर से आंदोलन शुरू किया जाएगा.

आइए जानते हैं कि चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कैसे की जाती है और उन्हें कैसे हटाया जा सकता है.

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कैसे होती है?

चुनाव आयुक्त, एसएस संधू, सीईसी ज्ञानेश कुमार, तीसरे चुनाव आयुक्त विवेक जोशी

मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तीन सदस्यीय सेलेक्शन कमेटी की सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति की ओर से की जाती है.

कमेटी में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और केंद्रीय मंत्रिमंडल का एक सदस्य शामिल होता है.

2023 के क़ानून के मुताबिक़, आयुक्त नियुक्त होने वाले शख़्स सचिव स्तर के पद पर रह चुके हों. वो ‘ईमानदार’ हों और उनके पास चुनावों के प्रबंधन और संचालन का ज्ञान और अनुभव होना चाहिए.

उनका कार्यकाल छह साल या 65 वर्ष की उम्र तक होता है.

चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त का वेतन

कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके

1991 के क़ानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों का वेतन सुप्रीम कोर्ट के जज के वेतन के बराबर था.

नए विधेयक में मुख्य चुनाव आयुक्त और आयुक्तों का वेतन केंद्र सरकार के कैबिनेट सचिव के वेतन के बराबर करने का प्रावधान किया गया है.

फ़िलहाल दोनों का वेतन बराबर है, लेकिन उनके वेतन का निर्धारण अलग-अलग तरीक़े से होता है.

संविधान के अनुच्छेद 125 के मुताबिक़, सुप्रीम कोर्ट के जज का वेतन संसद के बनाए गए क़ानून के ज़रिए तय किया जाना ज़रूरी है.

वहीं, कैबिनेट सचिव का वेतन सरकार केंद्रीय वेतन आयोग की सिफ़ारिश के आधार पर तय करती है.

मुख्य चुनाव आयुक्त को कैसे हटाया जा सकता है?

संसद

संविधान के अनुच्छेद 324(5) के मुताबिक़, मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से केवल उसी तरीक़े और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस आधार पर सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है.

2023 के क़ानून की धारा 11(2) में भी यही प्रावधान है.

संविधान में यह भी कहा गया है कि किसी अन्य चुनाव आयुक्त या क्षेत्रीय आयुक्त को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफ़ारिश के अलावा पद से नहीं हटाया जा सकता.

चुनाव आयोग को राजनीतिक दबाव न पड़े इसलिए मुख्य चुनाव को हटाने की प्रक्रिया मुश्किल रखी गई है.

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया से जुड़े संविधान के अनुच्छेद 124(4) के मुताबिक़, उन्हें सिर्फ़ “कदाचार साबित होने या अक्षमता” के आधार पर हटाया जा सकता है.

कदाचार में भ्रष्ट आचरण या पद का दुरुपयोग शामिल हो सकता है.

समय-समय पर अदालतों ने इसकी व्याख्या ऐसे कामों के रूप में भी की है जो मुख्य चुनाव आयुक्त के पद की गरिमा के मुताबिक़ न हों या जब मुख्य चुनाव आयुक्त अपने आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन करने में विफल रहें.

अक्षमता का मतलब ऐसी स्थिति है जिसमें अधिकारी अपने कर्तव्यों का पालन करने में सक्षम न हों.

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए संसद के दोनों सदनों के सदस्य एक प्रस्ताव का नोटिस देते हैं, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त पर स्पष्ट रूप से कदाचार या अक्षमता का आरोप लगाया गया हो.

महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार किए जाने के लिए लोकसभा में कम से कम 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के दस्तख़त जरूरी है.

पीठासीन अधिकारी प्रस्ताव को स्वीकार करने या खारिज़ करने से पहले संबंधित लोगों और दस्तावेज़ों से जानकारी ले सकते हैं.

अगर प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो आरोपों की सच्चाई की जांच के लिए जांच कराई जाती है.

इसके लिए एक कमेटी बनाई जाती है, जो कदाचार या अक्षमता से जुड़े सबूतों की जांच करती है.

इसके बाद मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में “उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों” के दो-तिहाई बहुमत से पारित होना ज़रूरी है.

प्रस्ताव दोनों सदनों में पारित होने के बाद राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का आदेश देते/देती हैं.

संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद राष्ट्रपति के पास कोई अलग विवेकाधिकार नहीं रहता, क्योंकि इस मामले में राष्ट्रपति को संसद की सलाह के अनुसार काम करना होता है.

अभी तक भारत में कभी किसी मुख्य चुनाव आयुक्त पर महाभियोग नहीं चलाया गया है.

राहुल गांधी

इस साल अप्रैल में राज्यसभा के सभापति और लोकसभा अध्यक्ष ने विपक्ष की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए दिए गए महाभियोग प्रस्तावों को ख़ारिज कर दिया था.

दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों ने अपने फैसले का कोई कारण नहीं बताया.

तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष ने 12 मार्च को लोकसभा और राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव पेश किए थे.

लोकसभा वाले प्रस्ताव पर 130 सांसदों और राज्यसभा वाले प्रस्ताव पर 63 सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे.

दोनों प्रस्तावों में चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूचियों और एसआईआर का ज़िक्र किया गया था.

इनमें मुख्य चुनाव आयुक्त पर “पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण” और चुनावी धोखाधड़ी और एसआईआर की जांच में ‘बाधा डालने’ के आरोप लगाए गए थे.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट… सब एक जगह

कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.

SOURCE : BBC NEWS