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टाटा संस की लिस्टिंग रोकने के लिए टाटा ट्रस्ट का नया प्लान, 2 कंपनियों के मर्जर का प्रस्ताव

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Source :- LIVE HINDUSTAN

मुख्य बातें

  • टाटा ट्रस्ट ने टाटा संस को CIC और NBFC से जुड़े रेगुलेटरी फ्रेमवर्क से बाहर लाने के लिए दो कंपनियों के विलय का प्रस्ताव दिया है
  • टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम सॉल्युशन और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स को टाटा संस में मर्ज करने की योजना है

टाटा ग्रुप (Tata Group) की होल्डिंग कंपनी टाटा संस (Tata Sons) को शेयर बाजार में लिस्ट कराने की संभावित जरूरत से बचने के लिए टाटा ट्रस्ट (Tata Trusts) ने एक नया रीस्ट्रक्चरिंग प्लान सामने रखा है। इसके तहत टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स सॉल्युशन प्राइवेट लिमिटेड (TESS) और TCE (Tata Consulting Engineers) का टाटा संस में विलय करने का प्रस्ताव दिया गया है। टाटा ट्रस्ट (Tata Trusts) का मानना है कि इस बदलाव से टाटा संस (Tata Sons) की रेगुलेटरी क्लासिफिकेशन (Regulatory Classification) बदल सकती है और कंपनी को CIC (Core Investment Company) व NBFC से जुड़े नियमों के दायरे से बाहर आने में मदद मिल सकती है।

टाटा ट्रस्ट (Tata Trusts) के पास टाटा संस (Tata Sons) की करीब 65.9% हिस्सेदारी है। प्रस्ताव के अनुसार, दोनों कंपनियों के टाटा संस (Tata Sons) में शामिल होने के बाद संयुक्त कंपनी की कुल नेट असेट्स करीब ₹2,00,158 करोड़ हो जाएगी। इसमें ग्रुप कंपनीज में निवेश लगभग ₹1,77,120 करोड़ होगा, जो कुल नेट असेट्स के 90% से कम है। वहीं, ऑपरेटिंग रेवेन्यू करीब ₹1,05,043 करोड़ रहने का अनुमान है, जबकि फाइनेंशियल असेट्स से आय करीब ₹40,072 करोड़ होगी। यही आंकड़े टाटा ट्रस्ट (Tata Trusts) के प्रस्ताव का मुख्य आधार है।

क्या कहते हैं RBI के नियम?

RBI के नियमों के मुताबिक, अगर किसी कंपनी की 50% से अधिक आय फाइनेंशियल असेट्स से आती है, तो उसे NBFC की कैटेगिरी में रखा जा सकता है। वहीं, CIC (Core Investment Company) के लिए कंपनी की कम से कम 90% असेट्स का ग्रुप कंपनीज में निवेश होना प्रमुख शर्तों में शामिल है। टाटा ट्रस्ट (Tata Trusts) का तर्क है कि रीस्ट्रक्चरिंग के बाद टाटा संस (Tata Sons) एक ऐसी कंपनी के रूप में काम करेगी, जिसमें इंवेस्टमेंट के साथ-साथ पर्याप्त ऑपरेटिंग बिजनेस भी होगा। ट्रस्ट के सलाहकार फारोख सुबेदार ने कहा है कि इस स्थिति में कंपनी पर CIC या NBFC से जुड़े मौजूदा नियम लागू नहीं होने चाहिए।

प्रस्ताव में शामिल TESS टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स की सब्सिडियरी है और कर्नाटक में iPhone मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी है। इसे 2024 में ताइवान की Wistron से खरीदा गया था। दूसरी ओर TCE इंजीनियरिंग और प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंसी का कारोबार करती है और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में काम करती है। टाटा ट्रस्ट (Tata Trusts) का कहना है कि टाटा संस (Tata Sons) के इतिहास में ऑपरेटिंग बिजनेसेस की भूमिका पुरानी रही है। उदाहरण के लिए TCS साल 2004 में अलग होने से पहले टाटा संस (Tata Sons) का बिजनेस डिविजन था।

प्रस्ताव को लागू करना आसान क्यों नहीं?

हालांकि, इस प्रस्ताव को लागू करना आसान नहीं होगा। सबसे पहले टाटा संस के बोर्ड को रीस्ट्रक्चरिंग को मंजूरी देनी होगी। इसके बाद RBI की स्वीकृति भी महत्वपूर्ण होगी। यह मामला इसलिए भी संवेदनशील है, क्योंकि टाटा ट्रस्ट और टाटा संस बोर्ड के बीच कंपनी की लिस्टिंग को लेकर अलग-अलग रुख सामने आए हैं। टाटा संस बोर्ड ने पहले कंपनी को अनलिस्टेड रखने का रिजॉल्यूशन पारित किया था, जबकि RBI ने कंपनी को अपर-लेयर NBFC के रूप में क्लासिफाइड करते हुए लागू नियमों के अनुसार कंप्लायंस करने को कहा है।

टाटा संस बोर्ड और RBI की मंजूरी पर अंतिम फैसला

RBI ने सितंबर 2026 में टाटा संस (Tata Sons) की CIC रजिस्ट्रेशन से बाहर निकलने की पिछली रिक्वेस्ट को स्वीकार नहीं किया था और कंपनी को अपर-लेयर NBFC से जुड़े नियमों का पालन करने के लिए जरूरी कदम उठाने की सलाह दी थी। अब टाटा ट्रस्ट का नया मर्जर प्रपोजल उसी रेगुलेटरी स्थिति का एक वैकल्पिक समाधान पेश करता है। हालांकि, अंतिम फैसला टाटा संस बोर्ड और RBI की मंजूरी पर निर्भर करेगा। इसलिए आने वाले समय में इस रीस्ट्रक्चरिंग प्रपोजल पर होने वाली चर्चा टाटा संस (Tata Sons) के भविष्य के कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर (Corporate Structure) और उसकी लिस्टिंग से जुड़े मामले के लिए महत्वपूर्ण होगी।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN