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आईआईटी में पढ़ चुके आरक्षित वर्ग के छात्रों ने साझा किए अपने ये अनुभव

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Source :- BBC INDIA

आईआईटी मुंबई में पढ़ने वाले साहिल वाकोडे ने 18 सितंबर, 2026 को आत्महत्या कर ली थी.

आईआईटी मुंबई में पढ़ने वाले साहिल वाकोडे की मौत के बाद छात्रों ने आंदोलन शुरू किया और इस आंदोलन के ज़रिए कई गंभीर सवाल उठाए गए.

साहिल वाकोडे ने 18 सितंबर 2026 को आत्महत्या की थी. वह आईआईटी मुंबई में बीटेक सेकंड ईयर के छात्र थे.

साहिल के माता-पिता ने आरोप लगाया कि उन्हें जातिसूचक गालियां दी जाती थीं और परेशान किया जाता था. उन्होंने इस बारे में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है. मामले की जांच चल रही है.

छात्रों का आरोप है कि आईआईटी में आरक्षित वर्ग से आने वाले विद्यार्थियों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है.

बीबीसी मराठी ने आईआईटी में पढ़ चुके छात्रों से पूछा कि इस बारे में उनके अनुभव कैसे रहे हैं.

वहाँ पढ़ाने वाले शिक्षकों से भी जातिगत भेदभाव को लेकर उनके अनुभव पूछे गए. उनसे हुई बातचीत के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है.

बीबीसी मराठी ने आईआईटी मुंबई का पक्ष जानने की भी कोशिश की. कई बार संपर्क करने के बावजूद संस्थान की ओर से कोई जवाब नहीं मिला.

(आत्महत्या एक गंभीर मानसिक और सामाजिक समस्या है. अगर आप भी तनाव में हैं तो भारत सरकार की जीवन आस्था हेल्पलाइन 18002333330 से मदद ले सकते हैं. आपको अपने दोस्तों और परिवार के लोगों से भी बात करनी चाहिए.)

आईआईटी मुंबई के पूर्व छात्रों ने भेदभाव के बारे में क्या बताया?

प्रणव जीवन आईआईटी मुंबई के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग में पीएचडी छात्र रह चुके हैं. उन्होंने आईआईटी कानपुर से मास्टर्स किया है और आईआईटी मद्रास में रिसर्च स्कॉलर भी रहे हैं.

साल 2022 में प्रणव ने आईआईटी मुंबई के एससी-एसटी सेल में टीचिंग असिस्टेंट के रूप में भी काम किया था.

प्रणव जीवन ने बीबीसी मराठी से कहा, “मैंने ख़ुद देखा और अनुभव किया है कि आईआईटी में जातिगत भेदभाव किस तरह होता है. छात्रों और शिक्षकों, दोनों की ओर से ऐसा भेदभाव किया जाता है.”

“इसकी एक वजह यह है कि 90 फ़ीसदी से ज़्यादा शिक्षक समाज में ऊंची जाति माने जाने वाले वर्गों से आते हैं. एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों के शिक्षकों की कमी है. इस वजह से छात्रों की मदद और उनका साथ देने के लिए शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं.”

प्रणव के मुताबिक़, इन लोगों के पास यह समझ नहीं होती कि बहुजन समाज से आने वाले छात्रों को किन परिस्थितियों से गुज़रना पड़ता है.

वह कहते हैं कि आईआईटी में आम तौर पर आरक्षण विरोधी सोच दिखाई देती है. इसके कारण आरक्षण के तहत दाख़िला पाने वाले छात्रों को ताने दिए जाते हैं.

प्रणव बताते हैं, “इन छात्रों से कहा जाता है कि आप बुद्धिमान नहीं हैं, आप योग्य नहीं हैं, आपने किसी दूसरे की सीट ले ली है और आप सरकार के पैसे पर मुफ़्त में पढ़ रहे हैं. किसी छात्र की निजी नाकामी को उसके पूरे समाज से जोड़ दिया जाता है.”

“ऊंची जाति से आने वाला कोई छात्र फेल हो जाए तो उसके पूरे समुदाय को बुरा नहीं कहा जाता. लेकिन आरक्षण के तहत आया छात्र फेल हो जाए तो उसके पूरे समाज को निशाना बनाया जाता है.”

उन्होंने कहा, “जब मैं एससी-एसटी सेल में था, तब हमने एक सर्वे किया था. इसमें छात्रों ने बताया कि उन्हें ग्रुप डिस्कशन में शामिल नहीं किया जाता और उनकी राय नहीं पूछी जाती.”

“कई बार शिक्षक भी आरक्षण के तहत आए छात्र को अपने शोध में शामिल करने के लिए तैयार नहीं होते. कभी-कभी ऐसे छात्रों को सिफ़ारिशी पत्र देने में भी हिचकिचाते हैं.”

साहिल की मौत के बाद छात्रों में नाराज़गी दिखाई दी.

ख़ास तरह की ट्रेनिंग की सिफ़ारिश की थी

प्रणव कहते हैं कि जनरल कैटिगरी के छात्रों को उनकी पहले से बनी सोच और पूर्वाग्रहों का एहसास कराने के लिए वर्कशॉप आयोजित की जानी चाहिए. इसे ‘सेंसिटाइज़ेशन’ कहा जाता है.

कैंपस में छात्रों की आत्महत्या की घटनाओं के बाद एक समिति बनाई गई थी. इस समिति ने सिफ़ारिश की थी कि आरक्षित वर्ग से बाहर के छात्रों को संवेदनशील बनाने के लिए इस तरह की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए.

प्रणव के मुताबिक़, इस सिफ़ारिश को लागू नहीं किया गया.

वह कहते हैं कि मौजूदा मामले में एक प्रोफ़ेसर पर आरोप लगे तो शिक्षक उनके समर्थन में सामने आए. लेकिन छात्रों के अधिकारों के लिए सभी शिक्षकों को इस तरह एक साथ आते उन्होंने कभी नहीं देखा.

बीबीसी मराठी ने आईआईटी से पीएचडी कर चुके एक अन्य पूर्व छात्र से भी बात की.

पूर्व छात्र ने कहा कि यह समझने की ज़रूरत है कि वंचित समुदायों से आने वाले कुछ छात्र कैंपस में पहुँचने के बाद मन से क्यों टूटने लगते हैं.

उन्होंने कहा, “साहिल के पिता ने बताया था कि उनका बेटा बहादुर था. दर्शन सोलंकी के पिता ने भी अपने बेटे के बारे में यही बात कही थी.”

“दोनों ने कड़ी मेहनत करके आईआईटी में दाख़िला हासिल किया था. फिर कैंपस में आने के बाद ऐसा क्या हुआ कि वे मन से टूट गए? इसका पता लगाने की ज़रूरत है.”

पूर्व छात्र के मुताबिक़, “उनके साथ बराबरी का व्यवहार नहीं होता. यह भेदभाव खुले तौर पर नहीं किया जाता, बल्कि बहुत बारीक तरीक़े से होता है.”

“ऐसा भी नहीं है कि सभी लोग भेदभाव करते हैं. लेकिन कई उदाहरणों में यह दिखाई देता है.”

जब उनसे पूछा गया कि पढ़ाई के दौरान उन्हें किस तरह के उदाहरण दिखाई दिए, तो उन्होंने कहा, “आरक्षण के तहत आए छात्रों को कम समझा जाता है. उन्हें देखने का नज़रिया अलग होता है. उन्हें बार-बार ख़ुद को साबित करना पड़ता है.”

“आरक्षित वर्ग से आया छात्र थोड़ा भी पीछे रह जाए या उससे कोई ग़लती हो जाए तो उसे यह दिखाने की कोशिश की जाती है कि देखो, तुम योग्य नहीं हो.”

“यह सब बहुत बारीक तरीक़े से होता है. किसी छात्र की रैंक पूछकर यह अंदाज़ा लगाने की कोशिश की जाती है कि वह किस आरक्षित वर्ग से आता है.”

साहिल वाकोडे के माता-पिता रवींद्र वाकोडे और सोनाली वाकोडे अपने बेटे की मौत के मामले में न्याय की मांग को लेकर मुंबई के आज़ाद मैदान में भूख हड़ताल पर बैठे थे

पूर्व छात्र ने कहा, “अगर किसी ग्रुप एक्टिविटी में वंचित समुदाय का कोई छात्र है और उसे बोलने का मौक़ा ही नहीं दिया जाता तो इससे भी भेदभाव दिखाई देता है.”

“उसे कहीं न कहीं यह दिखाने की कोशिश की जाती है कि तुम्हें बातचीत में शामिल होने का अधिकार नहीं है और तुमने अभी यह अधिकार हासिल नहीं किया है.”

“इन छात्रों के लिए ये रोज़ की लड़ाई है. काफ़ी हद तक यह कैंपस की संस्कृति का भी हिस्सा बन चुका है.”

उन्होंने कहा, “शिक्षक अपने जैसे दिखने वाले छात्रों से जिस तरह बात करते हैं और अपने से अलग दिखने वाले छात्रों से जिस तरह बात करते हैं, उसमें भी फ़र्क दिखाई देता है.”

“सभी शिक्षक ऐसा नहीं करते. लेकिन कुछ लोग अनजाने में भी ऐसी बातें करते हैं. छात्रों के कपड़ों पर टिप्पणी की जाती है और उनके कोई राय रखने पर उनका मज़ाक़ उड़ाया जाता है.”

‘सवर्णों के पूर्वाग्रह’

24 सितंबर को आईआईटी मुंबई के मुख्य प्रवेश द्वार के बाहर हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने भीम आर्मी के एक प्रदर्शनकारी को हिरासत में लिया था. प्रदर्शनकारी ने डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर का पोस्टर हाथ में लिया हुआ था.

आईआईटी मुंबई से पीएचडी कर चुके पूर्व छात्र संदीप सावरकर कहते हैं, “ओपन और रिज़र्व्ड कैटिगरी के कटऑफ़ में अब बहुत ज़्यादा अंतर नहीं रह गया है. यह अंतर केवल एक से दो फ़ीसदी होता है. इसलिए छात्र अपनी योग्यता के आधार पर ही दाख़िला लेते हैं.”

उन्होंने कहा, “सोशल मीडिया पर यह प्रचार किया जाता है कि आरक्षण के कारण पिछड़े वर्ग के छात्रों को 40 फ़ीसदी अंक पर दाख़िला मिल जाता है, जबकि ओपन कैटिगरी से आने वाले छात्र 90 फ़ीसदी अंक लेकर आते हैं.”

“इसके आधार पर यह भी कहा जाता है कि पिछड़े वर्ग के छात्रों को पढ़ाई समझ नहीं आती और इसलिए वे नक़ल करते हैं. यह पूरी बात बेकार है.”

सावरकर के मुताबिक़, “इस तरह का प्रचार करने वाले बहुत से लोगों ने किसी विश्वविद्यालय का दरवाज़ा तक नहीं देखा होता.”

उन्होंने कहा, “आईआईटी मुंबई को यह साफ़ करना चाहिए कि उसके शिक्षकों में सभी समुदायों को ज़रूरी प्रतिनिधित्व मिला है या नहीं.”

“पिछले पांच वर्षों में ‘मिशन मोड रिक्रूटमेंट’ के तहत कितने शिक्षकों की भर्ती की गई है, इसका आंकड़ा सामने आना चाहिए. इससे स्थिति को समझना आसान होगा. शिक्षकों के जो पद ख़ाली हैं, उन्हें भरा जाना चाहिए.”

आईआईटी मुंबई के प्रोफ़ेसर ने क्या कहा?

आईआईटी मुंबई के एक प्रोफ़ेसर ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि आईआईटी में होने वाला जातिगत भेदभाव सीधे दिखाई नहीं देता. यह बहुत बारीक और अप्रत्यक्ष तरीक़े से होता है.

उनका कहना था कि अगर समाज में जातिगत भेदभाव है तो उसकी झलक कैंपस में भी दिखाई देगी.

उन्होंने कहा कि अगर एक बार ये मान भी लिया जाए कि आरक्षण से आए किसी छात्र के अंक कम हैं, तब भी यह समझना होगा कि उसने अपने जीवन में दूसरों से ज़्यादा संघर्ष किया है.

ऐसे छात्र को आईआईटी में मदद मिलनी चाहिए और उसका आत्मविश्वास बढ़ाया जाना चाहिए.

प्रोफ़ेसर ने कहा, “हमें ऐसे छात्रों पर विशेष ध्यान देना होगा और उनके लिए समय निकालना होगा. तभी वे अच्छे अंक हासिल कर पाएंगे.”

“अगर हम उनकी मदद के लिए थोड़ी मेहनत भी नहीं करेंगे तो बदलाव कैसे आएगा?”

आरक्षित वर्ग से आए छात्रों को किस नज़र से देखा जाता है?

आईआईटी मुंबई के छात्र साहिल वाकोडे की मौत के बाद छात्रों ने अपनी विभिन्न मांगों को लेकर कैंपस में मार्च निकाला था.

आईआईटी मुंबई के एक प्रोफ़ेसर ने कहा, “उपनाम सुनते ही पता चल जाता है कि छात्र दलित है या किस जाति से आता है.”

“अगर कोई व्यक्ति जातिगत भेदभाव कर रहा है तो उसे साबित करना मुश्किल होता है, क्योंकि यह बहुत बारीक तरीक़े से किया जाता है.”

“यह व्यवस्था सभी संस्थानों में दिखाई देती है. पढ़ाई के पहले साल में इसका असर तब दिखाई देता है, जब किसी छात्र को अंग्रेज़ी बोलनी नहीं आती. धीरे-धीरे उसका क्लास और दूसरी गतिविधियों में शामिल होना कम होता जाता है. इसे बदलना चाहिए.”

किन बदलावों की ज़रूरत है?

प्रोफ़ेसर का कहना है कि आईआईटी मुंबई में छात्रों का प्रतिनिधित्व करने वाली कोई संस्था नहीं है. सभी फ़ैसले प्रशासन की ओर से लिए जाते हैं. इसे बदलने की ज़रूरत है.

उन्होंने कहा कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी जेएनयू की तरह आईआईटी मुंबई में छात्र संघ के चुनाव नहीं होते. यहां छात्रों का प्रतिनिधित्व करने वाली कोई व्यवस्था नहीं है.

प्रोफ़ेसर के मुताबिक़, कैंपस में ऐसा माहौल होना चाहिए, जिसमें छात्र सुरक्षित महसूस करें. इससे इन समुदायों से आने वाले छात्र अपनी समस्याएं सामने रख पाएंगे.

पूर्व छात्रों और शिक्षकों ने जातिगत भेदभाव के बारे में जो बातें कहीं, उन पर जवाब लेने के लिए बीबीसी मराठी ने आईआईटी मुंबई के जनसंपर्क विभाग और निदेशक से संपर्क किया. लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला.

इससे पहले साहिल की मौत के बाद उनके माता-पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी. उस समय आईआईटी मुंबई ने एक बयान जारी करके जातिगत भेदभाव के आरोपों को ख़ारिज कर दिया था.

आईआईटी मुंबई ने इससे पहले जारी एक बयान में उन परिस्थितियों का वर्णन किया था, जिनमें साहिल की मौत हुई थी. बाद में संस्थान ने ऐसा करने के लिए माफ़ी मांगी थी.

आईआईटी मुंबई ने साहिल की मौत को दुर्भाग्यपूर्ण बताया था. संस्थान ने कहा था कि मामले की जांच चलने के दौरान मौत की परिस्थितियों का इस तरह वर्णन करना ठीक नहीं था.

आईआईटी मुंबई फ़ैकल्टी फ़ोरम ने भी साहिल की मौत पर दुख जताया था. फ़ोरम ने यह भी कहा था कि वह प्रोफ़ेसर सूर्यनारायण दुल्ला के साथ खड़ा है.

ज़रूरी जानकारी

मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियों का इलाज दवाओं और थेरेपी की मदद से किया जा सकता है. इसके लिए मनोचिकित्सक की मदद लेना ज़रूरी है.

अगर आपको या आपके किसी परिचित में मानसिक बीमारी के लक्षण दिखाई दें तो इन हेल्पलाइन नंबरों पर संपर्क करके मदद ली जा सकती है.

हितगुज हेल्पलाइन, मुंबई: 022-24131212

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय: 1800-599-0019

यह हेल्पलाइन 13 भाषाओं में उपलब्ध है.

इंस्टीट्यूट ऑफ़ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेज़:

9868396824, 9868396841, 011-22574820

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज़:

080-26995000

विद्यासागर इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ एंड एलाइड साइंसेज़ की 24 घंटे चलने वाली हेल्पलाइन:

011-29802980

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SOURCE : BBC NEWS