Home National news hindi दिव्या मित्तल से पहले भी कई आईएएस अफ़सर छोड़ चुके हैं नौकरी,...

दिव्या मित्तल से पहले भी कई आईएएस अफ़सर छोड़ चुके हैं नौकरी, राजनीति में किसका क्या हुआ?

3
0

Source :- BBC INDIA

दिव्या मित्तल

उत्तर प्रदेश कैडर की पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने प्रशासनिक सेवा छोड़ने के कुछ ही हफ़्तों के बाद राजनीति में उतरने का एलान किया है.

2013 बैच की अधिकारी रहीं दिव्या मित्तल ने 30 अगस्त 2026 को सोशल मीडिया साइट एक्स पर अपने पद से इस्तीफ़े की पेशकश की थी. वह उत्तर प्रदेश सरकार के रेवेन्यू डिपार्टमेंट में स्पेशल सेक्रेटरी के पद पर तैनात थीं.

उनका इस्तीफ़ा सितंबर में स्वीकार हुआ और अब उन्होंने एक वीडियो संदेश जारी कर साफ़ किया है कि वह राजनीति में प्रवेश करने जा रही हैं, पर किसी राजनीतिक दल का हिस्सा बनकर नहीं.

उन्होंने कहा कि वह जनता के साथ जुड़कर, उनके सहयोग से एक स्वतंत्र राजनीतिक मंच स्थापित करेंगीं.

राजनीति में आने के अपने निर्णय पर उन्होंने कहा, ”प्रशासन में रहते हुए उन्होंने ऐसे मामले देखे जहां सरकार की मंज़ूरी और पैसे होने के बावजूद स्कूल नहीं बन पाए, ज़मीन के पट्टे लोगों तक नहीं पहुंच पाए और बुनियादी सुविधाओं की कमी बनी रही. इसलिए वह अब इन सबका हिसाब चाहती हैं.”

उन्होंने पेपर लीक और युवाओं के रोज़गार जैसे मुद्दों को भी अपनी राजनीति के केंद्र में रखने की बात कही है.

राजनीति में आने के अपने निर्णय पर उन्होंने कहा, ”प्रशासन में रहते हुए उन्होंने ऐसे मामले देखे जहां सरकार की मंज़ूरी और पैसे होने के बावजूद स्कूल नहीं बन पाए, ज़मीन के पट्टे लोगों तक नहीं पहुंच पाए और बुनियादी सुविधाओं की कमी बनी रही. इसलिए वह अब इन सबका हिसाब चाहती हैं.”

उन्होंने पेपर लीक और युवाओं के रोज़गार जैसे मुद्दों को भी अपनी राजनीति के केंद्र में रखने की बात कही है.

दिव्या मित्तल ने एक पार्टी विशेष के प्रवक्ता पर निशाना साधते हुए कहा, ” मैंने जब इस्तीफ़ा दिया तो एक पार्टी के प्रवक्ता ने कहा कि रात के अंधेरे में मेरी मुलाक़ात किसी बड़ी पार्टी के एक बड़े नेता से हुई है. उन्हें पता था कि वो झूठ बोल रहे हैं, उनकी मंशा केवल मुझे डराने की थी. पर मैं डरने वालों में से नहीं.”

दिव्या ने कहा है कि वो अलग तरह की राजनीति करना चाहती हैं, जहां पैसे, बाहुबल, जाति-धर्म की ज़रूरत न पड़े, केवल जनता और उनके मुद्दों की ज़रूरत हो.

कहा जा रहा है कि दिव्या मिर्ज़ापुर की ही किसी सीट से चुनाव भी लड़ सकती हैं. वह यहां की डीएम भी रही हैं और लोग उनके काम की यहां काफ़ी सराहना भी करते हैं.

राजनीति में उतरने की उनकी घोषणा के बाद से सोशल मीडिया पर नेताओं और बुद्धिजीवियों की अलग-अलग और मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं.

दिव्या मित्तल को कांग्रेस में शामिल होने का ऑफ़र

अजय राय

यूपी के तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने जहां दिव्या मित्तल के राजनीति में आने का स्वागत करते हुए कांग्रेस में शामिल होने का न्योता दिया था.

वहीं दिल्ली पूर्व शिक्षा मंत्री और आम आदमी पार्टी नेता मनीष सिसोदिया ने एक्स पर लिखा, ”देश को पढ़े लिखे, अच्छे स्कूल कॉलेज खुलवाने के लिए समर्पित लीडर्स की ज़रूरत है.”

”यह सच है इस विचार की राजनीति के लिए कोई रेड कार्पेट वेलकम लेकर नहीं बैठा मिलेगा लेकिन .. यह भी सच है कि किसी भी ज़रूरी बदलाव की पहल करने वाले के लिए कब कोई रेड कार्पेट लेकर बैठा है ?”

यूपी सरकार के मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने कहा, “आईएएस बनना आसान है लेकिन एमएलए बनना बहुत कठिन है.”

राजनीति की तैयारी लेकिन नहीं मिला टिकट

डॉ राकेश वर्मा

पर ऐसे नौकरशाहों की एक लंबी फ़ेहरिस्त है, जिन्होंने प्रशासनिक नौकरी छोड़कर राजनीति में प्रवेश किया और फिर विधायक से लेकर सांसद, मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक का सफ़र तय किया है.

हम इस लेख में उन्हीं में से कुछ पूर्व नौकरशाहों का ज़िक्र करेंगे.

जैसे दिव्या मित्तल से पहले इसी साल यूपी कैडर के ही एक और आईएएस अधिकारी राकेश वर्मा ने अपने पद से इस्तीफ़ा दिया था.

2013 बैच के आईएएस अधिकारी डॉ. राकेश वर्मा ने वीआरएस लेकर 9 सितंबर को कांग्रेस की सदस्यता ले ली.

उन्होंने कहा कि देश को शिक्षा पर ध्यान देने और संविधान एवं लोकतांत्रिक मूल्यों को मज़बूत करने की ज़रूरत है.

वर्मा प्रशासनिक सेवा के बाद लेखन और सामाजिक काम से भी जुड़े रहे हैं. कांग्रेस में शामिल होने के समय पार्टी ने कहा कि वे संगठन में काम करना चाहते हैं.

तीन साल पहले 2011 बैच के आईएएस अधिकारी अभिषेक सिंह ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. फ़रवरी 2024 में इस्तीफ़ा स्वीकार हुआ.

मीडिया रिपोर्ट्स में उनके जौनपुर से लोकसभा चुनाव लड़ने की चर्चा तेज़ थी. बीजेपी से टिकट मिलने की भी उम्मीद थी पर 2024 के लोकसभा चुनाव में टिकट नहीं मिला.

इसके बाद ऐसी ख़बरें भी आईं कि वह फिर नौकरी में लौटना चाहते हैं, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. 2025 में द प्रिंट से बातचीत में सिंह ने कहा कि वो राजनीति में आने की योजना रखते हैं, लेकिन जल्दबाजी में नहीं हैं.

उन्होंने कहा कि पूर्वांचल में राजनीति की छवि अक्सर बाहुबल या किसी ख़ास जाति से जुड़ी हुई है और वो इस धारणा को बदलना चाहते हैं.

2026 में वो जौनपुर में रोज़गार मेलों और सामाजिक गतिविधियों के ज़रिए युवाओं के बीच भी सक्रिय दिखाई दिए.

यूपी कैडर के 1984 बैच के आईएएस अधिकारी आरसीपी सिंह की कहानी भी इसका उदाहरण हैं.

एक वक़्त तक वो बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेहद क़रीबी नौकरशाह के रूप में जाने जाते थे.

जेडीयू पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे. 2005 में जब नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने, तब आरसीपी उनके प्रमुख सचिव थे.

2010 में उन्होंने वीआरएस लिया और राजनीति में आ गए. उसी साल जेडीयू ने उन्हें राज्यसभा भेज दिया.

2021 में नरेंद्र मोदी सरकार में इस्पात मंत्री भी बने. जेडीयू से अलग होने के बाद वो बीजेपी में गए और फिर प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी में शामिल हुए.

ये तो वो लोग थे जिन्होंने नौकरी छोड़कर राजनीति में प्रवेश किया. प्रशासनिक सेवा पूरी कर के राजनीति में आने वालों की सूची और भी लंबी है.

उदाहरण के लिए कुछ चर्चित नाम गिनाए जाएं तो पीएल पुनिया एक अहम नाम के तौर पर सामने आता है.

रिटायर होकर राजनीति में उतरने वालों की भी लंबी लिस्ट

पीएल पुनिया

1971 बैच के आईएएस अधिकारी पुनिया लंबे समय तक उत्तर प्रदेश में महत्वपूर्ण पदों पर रहे.

मायावती के मुख्यमंत्री रहने के दौरान वे उनके प्रमुख सचिव भी रहे और राज्य के सबसे प्रभावशाली नौकरशाहों में गिने जाते थे.

2005 में रिटायर होने के बाद उन्होंने कांग्रेस का रुख किया.

2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उन्होंने फतेहपुर सीट से कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और करीब 28 हजार वोट पाकर पांचवें स्थान पर रहे.

दो साल बाद 2009 में पुनिया ने बाराबंकी लोकसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीता. उन्हें 3.28 लाख से अधिक वोट मिले और वे सांसद बने. बाद में उन्हें राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का अध्यक्ष भी बनाया गया.

2014 में वह बाराबंकी से दोबारा चुनाव हार गए.

ऐसा ही एक नाम राम बहादुर का है. सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने बीएसपी ज्वाइन की और 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में लखनऊ की मोहनलालगंज सीट से चुनाव भी लड़े. साल 2022 में वह बीजेपी में शामिल हो गए.

अजीत जोगी की राजनीति में एंट्री

मगर उत्तर प्रदेश से निकलें तो आईएएस की नौकरी छोड़कर राजनीति में उतरने वालों में अजीत जोगी एक प्रमुख नाम हैं. जोगी

1971 में आईएएस में आए और मध्य प्रदेश के अलग-अलग ज़िलों में कलेक्टर रहे.

1986 में उन्होंने आईएएस छोड़कर कांग्रेस का दामन थामा. राजनीति में आने के बाद वे दो बार राज्यसभा पहुंचे और 1998 में लोकसभा सांसद बने.

फिर 2000 में मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ नया राज्य बना तो कांग्रेस ने जोगी को उसका पहला मुख्यमंत्री बनाया.

जोगी ने बाद में बताया था कि रायपुर के कलेक्टर रहते हुए उनकी राजीव गांधी से मुलाकातें हुई थीं.

उनके मुताबिक़, 1986 में राजीव गांधी के दफ़्तर से उन्हें कांग्रेस में आने का प्रस्ताव मिला और उन्हें फै़सला करने के लिए बहुत कम समय मिला था.

जोगी बाद में कांग्रेस से अलग हुए और उन्होंने अपनी पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ बनाई.

आईएएस से वित्त मंत्री और विदेश मंत्री तक

यशवंत सिन्हा

1960 बैच के आईएएस अधिकारी यशवंत सिन्हा ने क़रीब 24 साल प्रशासन में काम किया और 1984 में इस्तीफ़ा देकर सक्रिय राजनीति में आ गए. शुरुआत जनता पार्टी से हुई और 1988 में वे राज्यसभा पहुंचे.

इसके बाद वे बीजेपी में आ गए. 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वित्त मंत्री बने और बाद में विदेश मंत्री भी रहे. बाद में बीजेपी से अलग हुए और 2022 में विपक्ष के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार भी बने.

1975 बैच के बिहार कैडर के आईएएस अधिकारी आरके सिंह देश के गृह सचिव के पद पर भी रहे, पर दिसंबर 2013 में उन्होंने प्रशासनिक सेवा की नौकरी छोड़कर बीजेपी ज्वाइन कर ली और 2014 में आरा से लोकसभा चुनाव जीता.

2019 में वह फिर आरा के सांसद चुने गए. राजनीति में आने के कुछ साल बाद उन्हें केंद्र में ऊर्जा मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली. 2017 से वे बिजली और नवीकरणीय ऊर्जा से जुड़े मंत्रालयों के प्रभारी रहे और 2021 में कैबिनेट मंत्री बने.

लेकिन 2024 में वे आरा लोकसभा सीट से चुनाव हार गए. फ़िलहाल वह कई मौकों पर अपनी ही पार्टी पर हमलावर नज़र आते हैं.

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भारतीय प्रशासनिक सेवा में तो नहीं थे, पर राजस्व सेवा अधिकारी के पर कार्यरत थे.

पूर्व आईएफ़एस अधिकारी हरदीप सिंह पुरी ने क़रीब चार की सेवा के बाद 2014 में बीजेपी ज्वाइन की और बाद में केंद्र सरकार में मंत्री बने. राजस्थान के पूर्व प्रशासनिक अधिकारी अर्जुन राम मेघवाल ने भी वीआरएस लेकर 2009 में बीजेपी के टिकट पर बीकानेर से लोकसभा चुनाव जीता था.

इसके बाद वे कई बार सांसद रहे और केंद्र में मंत्री बने.

केरल के पूर्व आईएएस अधिकारी केजे अल्फोंस ने भी 2006 में आईएएस छोड़ा, विधानसभा चुनाव जीता और बाद में बीजेपी में शामिल हुए. 2017 में वे केंद्र में पर्यटन मंत्री बने.

पर कुछ ऐसे उदाहरण भी हैं, जहां नौकरशाही छोड़कर वापस नौकरशाही की तरफ़ लौटने के भी वाकये नज़र आए हैं.

जैसे – जम्मू-कश्मीर के शाह फै़सल. 2010 में सिविल सेवा परीक्षा में टॉप करने वाले फै़सल जम्मू-कश्मीर के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने यह परीक्षा शीर्ष स्थान पर पास की थी. जनवरी 2019 में उन्होंने IAS से इस्तीफ़ा दे दिया.

उन्होंने इसके पीछे कश्मीर में हिंसा और केंद्र सरकार की राजनीतिक पहल की कमी को वजह बताया था.

उन्होंने बाद में जम्मू-कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट नाम की राजनीतिक पार्टी बनाई.लेकिन करीब डेढ़ साल के भीतर उन्होंने राजनीति छोड़ दी और 2022 में वह फिर से प्रशासनिक सेवा में वापस लौट आए.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट… सब एक जगह

कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.

SOURCE : BBC NEWS